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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

झारखंड की संस्कृति

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जुलाई 2025 जुलाई 2025 संथाल कुड़ुख मुंडारी खड़िया नगपु झारखंड की संस्कृति में लोकनृत्य और संगीत का गहरा स्थान है। ये पर्वों, विवाह, और सामाजिक आयोजनों में जीवन्त रूप से दिखाई देते हैं: प्रमुख लोकनृत्य करमा नृत्य – करम पर्व के अवसर पर झूमर – फसल कटाई या उत्सवों पर पैका नृत्य – युद्ध शैली आधारित नृत्य छऊ नृत्य – मुखौटा पहनकर किया जाने वाला नाटकीय नृत्य लोकसंगीत इन नृत्यों में पारंपरिक वाद्ययंत्रों जैसे माँदर, ढोल, बांसुरी, नगाड़ा, और तुरी का प्रयोग होता है। लोकगीतों में प्रेम, प्रकृति, कृषि, देवता और सामाजिक जीवन की झलक होती है। त्यौहार और उत्सव झारखंड में जनजातीय तथा हिंदू दोनों प्रकार के त्यौहार मनाए जाते हैं: प्रमुख त्यौहार सोहराई – पशुपालन और फसल कटाई का पर्व सरहुल – वसंत ऋतु में वृक्ष पूजा का पर्व करमा – भाई-बहन और प्रकृति की पूजा का पर्व टुसू पर्व – मकर संक्रांति से जुड़ा लोक उत्सव फगुआ (होली), दशहरा, दीवाली – हिंदू धार्मिक पर्व भी व्यापक रूप से मनाए जाते हैं। पारंपरिक चित्रकला झारखंड की पारंपरिक चित्रकलाएँ दीवारों पर बनाई जाती हैं और प्राकृतिक रंगों से सजाई जाती हैं: सोहराई चित्रकला – दीपावली के समय बनती है, विषय: पशु-पक्षी, देवी-देवता खोवर चित्रकला – विवाह के समय बनती है, विषय: प्रेम, जीवन, वन्यजीवन जादोपटिया चित्रकला – स्क्रॉल पर चित्र और कहानियाँ वस्त्र और आभूषण जनजातीय पहनावे में स्थानीयता और मौसम का प्रभाव दिखाई देता है: महिलाएँ – साड़ी, गमछा, बालों में फूल, चांदी के गहने पुरुष – धोती, अंगवस्त्र, पारंपरिक गहने पर्वों पर रंग-बिरंगे वस्त्र और आभूषण पहने जाते हैं। संथाली महिलाएँ खासकर सुंदर पैटर्न वाली साड़ियाँ पहनती हैं। खानपान झारखंड का खानपान स्थानीय कृषि, वन उत्पाद और पारंपरिक ज्ञान पर आधारित है: मुख्य भोजन – चावल, दाल, सब्ज़ियाँ, साग, भात प्रसिद्ध व्यंजन: चावल के लड्डू (पीठा) हैंड़िया (चावल से बनी देसी शराब) रुगड़ा, पुटू (जंगली मशरूम) पकोड़ी, चीला, धुसका लाल साग, सेम, मड़ुआ की रोटी हस्तशिल्प और लोककला झारखंड के आदिवासी समाज में हस्तशिल्प का भी विशेष स्थान है: टेराकोटा – मिट्टी की मूर्तियाँ और बर्तन लकड़ी की मूर्तिकला बाँस और बेंत शिल्प लोहा शिल्प – असुर जनजाति द्वारा संगीत वाद्ययंत्र झारखंड के पारंपरिक वाद्ययंत्रों में: माँदर ढोल तुरी बांसुरी नागड़ा सांस्कृतिक केंद्र और आयोजन रांची का त्रैवार्षिक जनजातीय महोत्सव राष्ट्रीय आदिवासी महोत्सव, दिल्ली झारखंड अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव हजारीबाग कला विद्यालय – सोहराई चित्रकला का प्रशिक्षण वर्तमान समय की चुनौतियाँ जनजातीय संस्कृति पर शहरीकरण का प्रभाव पारंपरिक भाषाओं और कलाओं में युवाओं की घटती रुचि धर्म परिवर्तन सरकारी संरक्षण की कमी संरक्षण के प्रयास कई NGOs और कला संगठन जनजातीय कला के संरक्षण में लगे हैं। सरकारी योजनाओं के अंतर्गत हस्तशिल्प को प्रोत्साहन मिल रहा है। आदिवासी महोत्सवों और स्कूल पाठ्यक्रमों में स्थानीय संस्कृति को स्थान दिया जा रहा है। निष्कर्ष झारखंड की संस्कृति विविध, जीवंत और अत्यंत समृद्ध है। इसकी जड़ें प्रकृति, परंपरा और सामुदायिक जीवन में गहराई से रची-बसी हैं। इस सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करना न केवल आदिवासी पहचान को बनाए रखने हेतु आवश्यक है, बल्कि यह भारत की सांस्कृतिक विविधता को भी मजबूती प्रदान करता है। संबंधित लेख झारखंड सोहराई चित्रकला सरहुल झारखंड की जनजातियाँ आदिवासी संस्कृति श्रेणी:झारखंड की संस्कृति