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जय सिंह प्रथम
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Jai Singh I.png 1611 07 15 y जय सिंह-प्रथम/ मिर्जाराजा जय सिंह दौसा, राजस्थान, भारत 1667 08 28 1611 07 15 y बुरहानपुर, मध्य प्रदेश * आमेर के मिर्जाराजा जयसिंह रानी सुकमती(1622-1700)
राजिबा बाई (निधन-1667) राजा राम सिंह-प्रथम
जगत सिंह
सुखिजावती बाई (1641-1693)
निज़ाम बाई (1647-1716)
5 daughters and 2 sons महा सिंह जय सिंह प्रथम मेवाड़ राजकुमारी दमयंती कँवर मिर्जाराजा भाव सिंह (1614-1621) राजा राम सिंह प्रथम (1667-1682) 1621-1667 (46 वर्ष)
मिर्जा राजा जयसिंह या प्रथम जयसिंह (15 जुलाई, 1611 – 28 अगस्त, 1667) आमेर राज्य के शासक थे, जिन्होंने सन् 1621-1667 (46 वर्ष) तक आमेर पर शासन किया। ये आमेर के शासक के रूप में मुग़ल दरबार में सेनापति के पद पर सर्वाधिक सेवाएं (46 वर्ष) देने वाले शासक रहे हैं। जयसिंह ने 3 मुग़ल राजाओं का शासन काल देखा- जहांगीर, शाहजहां, और औरंगज़ेब। शाहजहां ने 1637 ई. में इन्हें "मिर्जा राजा" की उपाधि से सम्मानित किया गया था।
शासन का आरम्भिक काल (1621-1630)
मिर्ज़ा राजा भाव सिंह का कोई पुत्र ना होने के कारण 1621 ई. में उनके छोटे भाई महासिंह के पुत्र जय सिंह प्रथम मात्र 11 वर्ष की आयु में आमेर के शासक बने। अपने शासन काल के शुरआत में इन्होने मुग़ल बादशाह जहांगीर व शाहजहां की सेवा की । 1623 ई. में जहांगीर ने इन्हें अहमदनगर के शासक मालिक अम्बर के विरुद्ध भेजा जहाँ इन्होंने सफल सैन्य अभियान चलाया। जिस कारण से 1625 ई. में इन्हें जहांगीर ने दलेल खां पठान के विद्रोह का दमन करने भेजा और वहां भी ये विद्रोह को दबाने में सफल रहे।
शाहजहां के काल में इन्होंने 1629 ई. में उज़बेगों के विद्रोह का सफलतापूर्वक दमन किया।
बीजापुर व गोलकुंडा अभियान (1636 ई.)
1636 ई. में शाहजहां ने मुग़ल सेना को जय सिंह प्रथम के नेतृत्व में बीजापुर व गोलकुंडा अभियान पर भेजा वहां इनके सैन्य कौशल के कारण मुग़ल साम्राज्य को सफलताएं मिली । इस से खुश होकर मुग़ल बादशाह ने इनके लौटने पर इन्हें चाकसू व अजमेर के परगने उपहार में दिए। और इन्हें मिर्ज़ा राजा की उपाधि से सम्मानित किया।
कंधार की सूबेदारी (1651 -1653 ई.)
प्रथम बार 1637 ई. में शाहजहां के पुत्र शुजा के साथ इन्हें कंधार अभियान पर भेजा गया। इसके बाद 1651 ई. में शाहजहां ने इन्हें सदुल्ला खां के साथ में कंधार के युद्ध में नियुक्त किया जहाँ इन्होंने मुग़ल सेना के हरावल दस्ते ( सेना का अग्रभाग) का नेतृत्व किया। इस युद्ध के बाद कंधार में मुग़ल सत्ता स्थापित हो गयी और शाहजहां ने अपने पौत्र सुलेमान शिकोह ( दारा शिकोह का पुत्र) के साथ में संयुक्त रूप से इन्हें कंधार की सूबेदारी दे दी।
मिर्ज़ा राजा जय सिंह और मुग़ल उत्तराधिकार का युद्ध (1658 -59 ई.)
1657-58 ई. में जब मुग़ल सत्ता में उत्तराधिकार को लेकर मतभेद हुए तब शाहजहां ने इन्हें 1658 ई. में इन्हें अपने पुत्र शुजा के विरुद्ध भेजा क्योंकि शाहजहां चाहते थे कि इनके ज्येष्ठ पुत्र दारा शिकोह अगला मुग़ल बादशाह बने। मिर्ज़ा राजा जय सिंह के नेतृत्व में सेना ने बहादुरपुर ( वर्तमान बनारस, उत्तर प्रदेश के पास) के युद्ध में शुजा को पराजित कर दिया। इस से खुश होकर शाहजहां ने इनका मनसब बढ़ा के 6000 कर दिया।
धरमत का युद्ध (15 अप्रैल 1658)
शाहजहां के बाद अगला मुग़ल बादशाह बनने के लिए इनके 2 पुत्रों दारा शिकोह और औरंगज़ेब के मध्य विवाद था। इन दोनों के मध्य 15 अप्रैल 1658 को धरमत (मध्य प्रदेश) की मैदान पर युद्ध हुआ। इस युद्ध में शाहजहां के निवेदन करने पर मिर्ज़ा राजा जय सिंह ने दारा शिकोह के पक्ष से मुग़ल सेना का नेतृत्व किया। लेकिन इस युद्ध में औरंगज़ेब की जीत हुई। इससे एक बात स्पष्ट हो गयी थी कि औरग़ज़ेब में ही अगला मुग़ल शासक बनने की योग्यता है। इस कारण इन्होंने औरंगज़ेब के अगला मुग़ल शासक बनने की प्रबलता को देखते हुए 25 जून 1658 ई. को मथुरा (उत्तर प्रदेश) में औरंगज़ेब से मुलाकात की व अपना पूर्ण सहयोग औरंगज़ेब को देने का वचन देकर उसके पक्ष में शामिल हो गये।
दौराई/ देवराई का युद्ध ( मार्च, 1659 )
मार्च 1659 ई. में दौराई (अजमेर की निकट) की मैदान में औरंगज़ेब व दारा शिकोह की मध्य मुग़ल सत्ता के लिए दूसरा व अंतिम युद्ध हुआ। इस युद्ध में अपने वचन अनुसार मिर्ज़ा राजा जय सिंह ने औरंगज़ेब के पक्ष से युद्ध लड़ा व उसकी सेना में हरावल दस्ते का नेतृत्व किया। इस युद्ध में औरग़ज़ेब विजयी होकर अगला मुग़ल बादशाह बना।
औरंगज़ेब काल और मिर्जा राजा जय सिंह (1659-1667)
जिस समय औरंगज़ेब शासक बना उस समय सतपुड़ा के दक्षिण में मराठे शिवाजी के नेतृत्व में शक्तिशाली होते जा रहे थे और मुग़ल सत्ता को वहां चुनौती दे रहे थे। साथ ही में मुगलों का खजाना भी लूटा जा रहा था । इस कारण 1665 ई. में औरंगज़ेब ने मिर्ज़ा राजा जय सिंह को १४ हजार सैनिक देकर दक्षिण के सुल्तानों और शिवाजी के विद्रोह को दबाने के लिये भेजा। जय सिंह ने महाराष्ट्र में शिवाजी से कई दुर्ग जीत लिये। इसके बाद पुरन्दर के दुर्ग का घेरा डाल दिया। इसके बाद शिवाजी ने १६६५ में पुरन्दर की सन्धि की।
इससे खुश होकर औरंगज़ेब ने उनके पद में वृद्धि की और उन्हें आगे बीजापुर (कर्नाटक) और तमिलनाडु में भेज दिया। लेकिन इस बार जय सिंह बीजापुर सल्तनत और तमिलनाडु पर पूर्णत विजय प्राप्त करने और उन्हे मुगल साम्राज्य का हिस्सा बनाने में असफल रहे। इस कारण औरंगजेब बहुत नाराज़ हुआ और इन्हें वापस आने का हुकुम दिया। इस समय तक शिवाजी मिर्ज़ा राजा जयसिंह के पुत्र राजा राम सिंह प्रथम की हवेली में मुग़ल कैद से भाग निकले। बीजापुर और तमिलनाडु के विजय अभियान में इनके असफल होने की कारण, जय सिंह और औरंगज़ेब के मध्य उतने अच्छे सम्बन्ध नहीं रहे। मिर्ज़ा राजा जयसिंह बूढ़े हो चुके थे। इस कारण मुगल बादशाह औरंगज़ेब ने राजा रामसिंह प्रथम को मुग़ल सम्राज्य का सेनापति घोषित कर दिया।
मिर्जा राजा जय सिंह के ही कुछ सामंतों ने मराठों के साथ मिलकर ने इनकी वापसी में बुरहानपुर ( वर्तमान समय में मध्य प्रदेश में है) में जहर देकर हत्या कर दी।
मिर्जा राजा जयसिंह के नाम शिवाजी का पत्र
भारतीय इतिहास में दो ऐसे पत्र मिलते हैं जिन्हें दो विख्यात महापुरुषों ने लिखे थे। इनमे पहला पत्र "जफरनामा" कहलाता है, जिसे गुरु गोविन्द सिंह ने औरंगजेब को भाई दया सिंह के हाथों भेजा था। दूसरा पत्र शिवाजी ने आमेर के राजा जयसिंह को भेजा था जो उसे 3 मार्च 1665 को मिल गया था। इन दोनों पत्रों में यह समानताएं हैं की दोनों फारसी भाषा में शेर के रूप में लिखे गए हैं। दोनों की पृष्टभूमि और विषय एक जैसी है। दोनों में देश और धर्म के प्रति अटूट प्रेम प्रकट किया गया है।
शिवाजी का पत्र बरसों तक पटना साहेब के गुरुद्वारे के ग्रंथागार में रखा रहा। बाद में उसे बाबू जगन्नाथदास रत्नाकर ने सन 1909 अप्रेल में काशी में काशी नागरी प्रचारिणी सभा से प्रकाशित किया था। बाद में "अमर स्वामी सरस्वती" ने उस पत्र का हिन्दी में पद्य और गद्य ने अनुवाद किया था। फिर सन 1985 में अमरज्योति प्रकाशन गाजियाबाद ने पुनः प्रकाशित किया था।
औरंगजेब पूरे भारत में इस्लामी राज्य फैलाना चाहता था, लेकिन शिवाजी के कारण वह सफल नही हो रहा था। औरंगजेब चालाक और मक्कार था। उसने पहले तो शिवाजी से मित्रता करनी चाही और दोस्ती के बदले शिवाजी से 23 किले मांगे। लेकिन शिवाजी उसका प्रस्ताव ठुकराते हुए 1664 में सूरत पर हमला कर दिया और मुगलों की वह सारी संपत्ति लूट ली जो उनहोंने हिन्दुओं से लूटी थी। फिर औरंगजेब ने अपने मामा शाईश्ता खान को चालीस हजार की फ़ौज लेकर शिवाजी पर हमला करावा दिया और शिवाजी ने पूना के लाल महल में उसकी उंगलियाँ काट दीं, और वह भाग गया।
फिर औरंगजेब ने जयसिंह को कहा कि वह शिवाजी को परास्त कर दे। जयसिंह खुद को राम का वंशज मानता था। उसने युद्ध में जीत हासिल करने के लिए एक सहस्र चण्डी यज्ञ भी कराया। शिवाजी को इसकी खबर मिल गयी थी जब उन्हें पता चला कि औरंगजेब हिन्दुओं को हिन्दुओं से लड़ाना चाहता है। जिस से दोनों तरफ से हिन्दू ही मरेंगे। तब शिवाजी ने जयसिंह को समझाने के लिए जो पत्र भेजा था, उसके कुछ अंश नीचे दिये गये हैं-
१. जिगरबंद फर्जानाये रामचंद, ज़ि तो गर्दने राजापूतां बुलंद।
(हे रामचंद्र के वंशज, तुमसे तो क्षत्रिओं की इज्जत उंची हो रही है।)२. शुनीदम कि बर कस्दे मन आमदी, ब फ़तहे दयारे दकन आमदी।
(सुना है तुम दखन की तरफ हमले के लिए आ रहे हो।)
३. न दानी मगर कि ईं सियाही शवद, कज ईं मुल्को दीं रा तबाही शवद।
(तुम क्या यह नहीं जानते कि इससे देश और धर्म बर्बाद हो जाएगा?)४. बगर चारा साजम ब तेगोतबर, दो जानिब रसद हिंदुआं रा जरर।
(अगर मैं अपनी तलवार का प्रयोग करूंगा तो दोनों तरफ से हिन्दू ही मरेंगे।)
५. बि बायद कि बर दुश्मने दीं ज़नी बुनी बेख इस्लाम रा बर कुनी।
(उचित तो यह होता कि आप धर्म के दुश्मन इस्लाम की जड़ उखाड़ देते।)६. बिदानी कि बर हिन्दुआने दीगर, न यामद चि अज दस्त आं कीनावर।
(आपको पता नहीं कि इस कपटी ने हिन्दुओं पर क्या-क्या अत्याचार किये हैं।)
७. ज़ि पासे वफ़ा गर बिदानी सखुन, चि कर्दी ब शाहे जहां याद कुन।
(इस आदमी की वफादारी से क्या लाभ है? तुम्हें पता नही कि इसने बाप शाहजहाँ के साथ क्या किया?)८. मिरा ज़हद बायद फरावां नमूद, पये हिन्दियो हिंद दीने हिनूद।
(हमें मिल कर हिंद देश हिन्दू धर्म और हिन्दुओं के लिए लड़ाना चाहिए।)
९. ब शमशीरो तदबीर आबे दहम, ब तुर्की बतुर्की जवाबे दहम।
(हमें अपनी तलवार और तदबीर से दुश्मन को जैसे को तैसा जवाब देना चाहिए।)१०. तराज़ेम राहे सुए काम ख्वेश, फरोज़ेम दर दोजहाँ नाम ख्वेश।
(अगर आप मेरी सलाह मानेंगे तो आपका लोक परलोक नाम होगा।)
मृत्यु
28 अगस्त 1667 ई. को इनकी बुरहानपुर(मध्य प्रदेश) में इनके विश्वासपात्र सामंतो द्वारा ज़हर देकर हत्या कर दी गयी। यहीं बुरहानपुर में मिर्ज़ा राजा जय सिंह की 38 खम्बों कि छतरी मौजूद है। इनकी मृत्यु की पश्चात् इनके ज्येष्ठ पुत्र राम सिंह प्रथम (1667 -1682 ) व उनके बाद उनके ज्येष्ठ पुत्र बिशन सिंह( 1682 -1700) आमेर के राजा बनते है जिनके पुत्र सवाई जय सिंह/ जय सिंह द्वितीय (1700-1743) हुए ।
इन्हें भी देखें
जयसिंह द्वितीय
श्रेणी:भारत के शासक
श्रेणी:1611 में जन्मे लोग
श्रेणी:१६६७ में निधन
श्रेणी:जयपुर के महाराजा
श्रेणी:जयपुर के लोग