Skip to main content

  | मौसम…

411 समाचार
Public archive edition · Attributed source reporting with original dates · AI drafts are excluded

411 REFERENCE · Wikipedia

आगम (जैन)

Reference material by Wikipedia contributors. This retains its source identity and is not 411 news reporting.

आगम शब्द का प्रयोग जैन धर्म के मूल ग्रंथों के लिए किया जाता है। केवल ज्ञान, मनःपर्यय ज्ञानी, अवधि ज्ञानी, चतुर्दशपूर्व के धारक तथा दशपूर्व के धारक मुनियों को 'आगम' कहा जाता है। कहीं-कहीं नवपूर्व के धारक को भी आगम माना गया है। उपचार से इनके वचनों को भी आगम कहा गया है। जब तक आगम बिहारी मुनि विद्यमान थे, तब तक इनका इतना महत्त्व नहीं था, क्योंकि तब तक मुनियों के आचार व्यवहार का निर्देशन आगम मुनियों द्वारा मिलता था। जब आगम मुनि नहीं रहे, तब उनके द्वारा रचित आगम ही साधना के आधार माने गए और उनमें निर्दिष्ट निर्देशन के अनुसार ही मुनि अपनी साधना करते हैं। आगम शब्द का उपयोग जैन दर्शन में साहित्य के लिए किया जाता है। श्रुत, सूत्र, सुतं, ग्रन्थ, सिद्धांत, देशना, प्रज्ञापना, उपदेश, आप्त वचन, जिन वचन, ऐतिह्य, आम्नाय आदि सभी आगम के पर्यायवाची शब्द है। आगम शब्द "आ" उपसर्ग और गम धातु से निष्पन्न हुआ है। 'आ' उपसर्ग का अर्थ समन्तात अर्थात् पूर्ण और गम धातु का अर्थ गति प्राप्त है अर्थात् जिससे वस्तु तत्त्व (पदार्थ के रहस्य) का पूर्ण ज्ञान हो वह आगम है अथवा ये भी कहा जा सकता है कि आप्त पुरुष (अरिहंत, तीर्थंकर या केवली) जिनेश्वर रूप में जो ज्ञान का उपदेश देते हैं उन शब्दों को गणधर (उनके प्रमुख शिष्य) जिनकी लिपि बद्ध रूप में रचना करते हैं उन सूत्रों को आगम कहते हैं। वर्गीकरण आगम साहित्य भी दो भागों में विभक्त है: अंगप्रविष्ट और अंगबाह्य'। श्वेताम्बर पन्थ के अनुसार कुल ४५ आगम हैं, जिनमें से ११ अंगप्रविष्ट हैं तथा ३४ अंगवाह्य। अंग अंगों की संख्या 12 है। उन्हें गणिपिटक या द्वादशांगी भी कहा जाता है: 1- आचारांग 2- सूत्रकृतांग 3- स्थानांग 4- समवायांग 5- भगवती 6- ज्ञाता 7- उपासक दशांग 8- अंतकृत्‌ दशा 9- अनुतरोपपातिकदशा 10- प्रश्न व्याकरण 11- विपाक 12- दृष्टिवाद इनमें दृष्टिवाद का पूर्णत: विच्छेद हो चुका है। शेष ग्यारह अंगों का भी बहुत सा अंग विच्छिन्न हो चुका है। अंगबाह्य इसके अतिरिक्त जितने आगम हैं वे सब अंगबाह्य हैं; क्योंकि अंगप्रविष्ट केवल गणधरकृत आगम ही माने जाते हैं। गणधरों के अतिरिक्त श्रुतकेवली, पूर्वधर आदि ज्ञानी पुरुषों द्वारा रचित आगम अंगबाह्य माना जाता है। मूल जैन श्वेतांबर परंपरा अनुसार आचार्य देवर्धिगणि क्षमाश्रमण ने 84 आगमों को लिपिबद्ध किया था, किन्तु समय के साथ कई आगम स्वतः नष्ट हो गए, कुछ शासकों के राज में नष्ट कर दिए गए एवं कई आगम इतने प्रभावशाली थे की उनके स्मरण से देवतागण आ जाते थे, अतः ऐसी विद्या के दुरूपयोग से बचने हेतु गीतार्थ साधुओं ने उसे भंडारस्थ कर दिया। विषय के आधार पर आगमों का वर्गीकरण भगवान महावीर से लेकर आर्यरक्षित तक आगमों का वर्गीकरण नहीं हुआ था। प्रवाचक आर्यरक्षित ने शिष्यों की सुविधा के लिए विषय के आधार पर आगमों को चार भागों में वर्गीकृत किया। 1-चरणकरणानुयोग 2-द्रव्यानुयोग 3-गणितानुयोग 4-धर्मकथानुयोग चरणकरणानुयोग इसमें आचार विषयक सारा विवेचन दिया गया है। आचार प्रतिपादक आगमों की संज्ञा चरणकरणानुयोग की गई है। जैन दर्शन की मान्यता है कि नाणस्स सारो आयारो'' ज्ञान का सार आचार है। ज्ञान की साधना आचार की आराधना के लिए होनी चाहिए। इस पहले अनुयोग में आचारांग, दशवैकालिक आदि आगमों का समावेश होता है। द्रव्यानुयोग लोक के शाश्वत द्रव्यों की मीमांसा तथा दार्शनिक तथ्यों की विवेचना करनेवाले आगमों के वर्गीकरण को द्रव्यानुयोग कहा गया है। गणितानुयोग ज्योतिष संबंधी तथा भंग (विकल्प) आदि गणित संबंधी विवेचन इसके अंतर्गत आता है। चंद्रप्रज्ञप्ति, सूर्यप्रज्ञप्ति आदि आगम इसमें समाविष्ट होते हैं। धर्मकथानुयोग दृष्टांत उपमा कथा साहित्य और काल्पनिक तथा घटित घटनाओं के वर्णन तथा जीवन-चरित्र-प्रधान आगमों के वर्गीकरण को धर्मकथानुयोग की संज्ञा दी गई है। इन आचार और तात्विक विचारों के प्रतिपादन के अतिरिक्त इसके साथ साथ तत्कालीन समाज, अर्थ, राज्य, शिक्षा व्यवस्था आदि ऐतिहासिक विषयों का प्रासंगिक निरूपण बहुत प्रामाणिक पद्धति से हुआ है। भारतीय जीवन के आध्यात्मिक, सामाजिक तथा तात्विक पक्ष का आकलन करने के लिए जैनागमों का अध्ययन आवश्यक ही नहीं, किंतु दृष्टि देनेवाला है। इन्हें भी देखें जैन ग्रंथ तत्त्वार्थ सूत्र आगम ग्रन्थ आगम (हिन्दू) आगम (बौद्ध) प्राकृत साहित्य बाहरी कड़ियाँ जैन धर्मग्रंथों का संक्षिप्त परिचय Jain Agams Clay Sanskrit Library publishes classical Indian literature, including a number of works of Jain Literature, with facing-page text and translation. Also offers searchable corpus and downloadable materials. Jainism in Buddhist Literature श्रेणी:जैन धर्म श्रेणी:जैन ग्रंथ