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411 समाचार
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कुमाऊँनी होली

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उत्तराखण्ड राज्य के कुमाऊँ क्षेत्र में होली का त्यौहार एक अलग तरह से मनाया जाता है, जिसे कुमाऊँनी होली कहते हैं। कुमाऊँनी होली का अपना ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्त्व है। यह कुमाऊँनी लोगों के लिए सबसे महत्वपूर्ण त्यौहारों में से एक है, क्योंकि यह केवल बुराई पर अच्छाई की जीत का ही नहीं, बल्कि पहाड़ी सर्दियों के अंत का और नए बुआई के मौसम की शुरुआत का भी प्रतीक है, जो इस उत्तर भारतीय कृषि समुदाय के लिए बहुत महत्व रखता है। होली का त्यौहार कुमाऊँ में बसंत पंचमी के दिन शुरू हो जाता है। कुमाऊँनी होली के तीन प्रारूप हैं; बैठकी होली, खड़ी होली और महिला होली। इस होली में सिर्फ अबीर-गुलाल का टीका ही नहीं होता, वरन बैठकी होली और खड़ी होली गायन की शास्त्रीय परंपरा भी शामिल होती है। बसंत पंचमी के दिन से ही होल्यार प्रत्येक शाम घर-घर जाकर होली गाते हैं, और यह उत्सव लगभग २ महीनों तक चलता है। उत्पत्ति कुमाऊँनी होली की उत्पत्ति, विशेष रूप से बैठकी होली की संगीत परंपरा की शुरुआत तो १५वीं शताब्दी में चम्पावत के चन्द राजाओं के महल में, और इसके आस-पास स्थित काली-कुमाऊँ, सुई और गुमदेश क्षेत्रों में मानी जाती है। बाद में चन्द राजवंश के प्रसार के साथ ही यह सम्पूर्ण कुमाऊँ क्षेत्र तक फैली। सांस्कृतिक नगरी अल्मोड़ा में तो इस त्यौहार पर होली गाने के लिए दूर दूर से गायक आते थे। कुमाऊनी होली के बारे में कहते हैं कि ,सन 1870 से नियमित वार्षिक उत्सव के रूप में मनाई रही हैं। उससे पहले ये होलियां एक नियमित बैठक के रूप में गायी जाती थी। प्रकार बैठकी होली गीत बैठकी बैठकी होली पारम्परिक रूप से कुमाऊँ के बड़े नगरों में (मुख्यतः अल्मोड़ा और नैनीताल में) ही मनाई जाती रही है। बैठकी होली बसंत पंचमी के दिन से शुरू हो जाती है, और इस में होली पर आधारित गीत घर की बैठक में राग रागनियों के साथ हारमोनियम और तबले पर गाए जाते हैं। इन गीतों में मीराबाई से लेकर नज़ीर और बहादुर शाह ज़फ़र की रचनाएँ सुनने को मिलती हैं। ये बैठकें आशीर्वाद के साथ संपूर्ण होती हैं जिसमें मुबारक हो मंजरी फूलों भरी..। या ऐसी होली खेले जनाब अली...जैसी ठुमरियाँ गाई जाती हैं। कुमाऊं के प्रसिद्द जनकवि गिरीश गिर्दा ने बैठकी होली के सामाजिक शास्त्रीय संदर्भों के बारे में गहराई से अध्ययन किया है, और इस पर इस्लामी संस्कृति और उर्दू का असर भी माना है। खड़ी होली खड़ी होली बैठकी होली के कुछ दिनों बाद शुरू होती है। इसका प्रसार कुमाऊँ के ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक देखने को मिलता है। खड़ी होली में गाँव के लोग नुकीली टोपी, कुरता और चूड़ीदार पायजामा पहन कर एक जगह एकत्रित होकर होली गीत गाते हैं, और साथ साथ ही ढोल-दमाऊ तथा हुड़के की धुनों पर नाचते भी हैं। खड़ी होली के गीत, बैठकी के मुकाबले शास्त्रीय गीतों पर कम ही आधारित होते हैं, तथा पूर्णतः कुमाऊँनी भाषा में होते हैं। होली गाने वाले लोग, जिन्हें होल्यार कहते हैं, बारी बारी गाँव के प्रत्येक व्यक्ति के घर जाकर होली गाते हैं, और उसकी समृद्धि की कामना करते हैं। महिला होली महिला होली में प्रत्येक शाम बैठकी होली जैसी ही बैठकें लगती हैं, परन्तु इनमें केवल महिलाएं ही भाग लेती हैं। इसके गीत भी प्रमुखतः महिलाओं पर ही आधारित होते हैं। अनुष्ठान चीर बन्धन तथा चीर दहन कुमाऊनी होली में चीर बंधन का विशेष महत्त्व है। चीर को हिनाकश्यप की बहिन होलिका का प्रतीक माना जाता है। चीर कपड़ो की करतन को एक लकड़ी में जोड़ कर बनाया जाता है। कई जगह कुमाऊं के राज ध्वज निशाण का प्रयोग किया जाता है। एकादशी के दिन कुमाऊं में खड़ी होली की शुरुवात होती है। उसी दिन चीर की प्राण प्रतिष्ठा की जाती है। उसके बाद इसे पूरी होलियों में मजबूत हाथों में सौपा जाता है। क्योंकि कुमाऊँ की होलियों में चीर हरण की परम्परा होती है। इसके अनुसार यदि कोई दूसरे गांव का व्यक्ति होली की चीर में से एक टुकड़ा तोड़ कर नदी पार कर लेता है तो उस गांव की होली बंद हो जाती है। होलिका दहन के दिन इसका होलिका दहन के रूप में दहन किया जाता है। इसके दहन दौरान कुमाऊनी अंतिम संस्कार नियमों का पालन किया जाता है। कुमाऊँ के कई हिस्सों में होलिका दहन के दिन इसपर लगे कपडे के टुकड़ो को प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि चीर के टुकड़ों को घर में रखने से घर की बुरी शक्तियों से होती है। छरड़ी छरड़ी (धुलेंडी) के दिन लोग एक दूसरे पर रंग, अबीर-गुलाल इत्यादि फेंकते हैं। ऐतिहासिक तौर पर इस क्षेत्र में छरड़ से होली मनाई जाती थी, जिस कारण इसे छरड़ी कहा जाता था। छरड़ बनाने के लिए टेसू के फूलों को धूप में सुखाकर पानी में घोला जाता था, जिससे नारंगी-लाल रंग का घोल बनता था, जो छरड़ कहलाता था। इन्हें भी देखें कुमाऊँ मण्डल उत्तराखण्ड की संस्कृति सन्दर्भ एडविन टी एटकिंसन Kumaun hills कुमाऊंनी पहाड़ियां १९७४ कॉस्मो प्रकाशन दिल्ली en बद्री दत्त पाण्डेय कुमाऊं का इतिहास १९३७ श्याम प्रकाशन अल्मोड़ा https://devbhoomidarshan.in/holi-in-uttarakhand/ https://devbhoomidarshan.in/kumaoni-holi/ बाहरी कड़ियाँ कुमाऊं की होली में साफ झलकता है ब्रज और उर्दू का प्रभाव देहरादून: दैनिक जागरण. २७ फरवरी २०१८ उत्तराखंड में होली गायन की अनूठी परंपरा, कुमाऊं क्षेत्र में पौष से शुरू हो जाती है होली बैठक. नवोदय टाइम्स. २८ फरवरी २०१८ तिवारी, दीपेश (२७ फरवरी २०१८) दुनिया भर में प्रसिद्ध है कुमाऊं की होली भोपाल: पत्रिका कुमाऊं की होली: यहां रंगों के साथ रागों की होती है जुगलबंदी। द क्विंट. २८ फरवरी २०१८ श्रेणी:उत्तराखण्ड की संस्कृति श्रेणी:होली