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मंजुल भगत
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मंजुल भगत (22 जून 1936 - 31 जुलाई 1998) का जन्म उत्तर प्रदेश के मेरठ में हुआ। बाद में उनका परिवार कलकत्ता आ बसा। मंजुलजी के चार बहनें और एक भाई हैं, जिनमें मंजुलजी का स्थान प्रथम है। मंजुलजी हिंदी साहित्य की तीन सगी बहनों में वरिष्ठ हैं। कथा-साहित्य में विख्यात मंजुल भगत, मृदुला गर्ग और अचला बंसल तीन सगी बहनें हैं।मंजुल भगत के कथा-साहित्य में नारी सुमा के. एस. हिंदी विभाग, केरल विश्वविद्यालय 2015 15
मंजुल भगत के साहित्य का उद्देश्य बहुआयामी है, जिसमें प्रमुख रूप से सामाजिक समस्याओं को उभारना शामिल है। उनकी अधिकांश रचनाएँ महिला-केंद्री हैं और वे स्वयं एक नारीवादी लेखिका के रूप में जानी जाती हैं। उन्होंने अपने कार्यों में निम्न और मध्यम वर्गीय महिलाओं के जीवन के विविध पहलुओं को चित्रित किया है। चाहे वह पत्नी, कार्यरत महिला या झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाली कोई भी महिला क्यों न हो, उनके व्यक्तिगत, पारिवारिक, वैवाहिक और सामाजिक संघर्षों का सजीव चित्रण किया गया है। भगत की सभी महिला पात्रें, चाहे वे किसी भी वर्ग से हों, एक आदर्श व्यक्तित्व धारण करती हैं। संक्षेप में, निम्न और मध्यम वर्गीय महिला पात्रों की विभिन्न समस्याओं को गहराई से प्रस्तुत करना ही उनके साहित्य का मुख्य लक्ष्य रहा है।
रचनाएँ
उपन्यास
टूटा हुआ इन्द्रधनुष (1976)
लेडीज़ क्लब (1976)
अनारो (1977)
बेगाने घर में (1978)
खातुल (1983)
तिरछी बौछार (1984)
गंजी (1995)
कहानी संग्रह
गुलमोहर के गुच्छे (1974)
क्या छूट गया (1976)
आत्महत्या से पहले (1976)
कितना छोटा सफर (1980)
बावन पत्ते एक जोकर (1982)
सफेद कौवा (1986)
दूत (1992)
चर्चित कहानियाँ (1995)
बूँद (1998)
आखिरी चोट (1998)
अंतिम बयान (2001)
सन्दर्भ
बाहरी कड़ियाँ
सुनो मिरांडा की कहानी मंजुल भगत की ज़बानी | मंजुल भगत का मिरांडा हाउस संस्मरण