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411 समाचार
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भारत के मूल अधिकार, निदेशक तत्त्व और मूल कर्तव्य

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thumb|right|300px|भारत के संविधान की प्रस्तावना - भारत के मौलिक और सर्वोच्च कानून मूल अधिकार, राज्य की नीति के निदेशक तत्त्व और मूल कर्तव्यराज्य की नीति के निदेशक तत्त्व Directive Principles of State Policy https://india.gov.in/sites/upload_files/npi/files/constitution/PartIV.pdf india.gov.in राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केन्द्र (एनआईसी), इलेक्‍ट्रॉनिकी और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय, भारत सरकार 19 नवम्बर 2016 1 https://web.archive.org/web/20160116221739/http://india.gov.in/sites/upload_files/npi/files/constitution/PartIV.pdf 16 जनवरी 2016 dead भारत के संविधान के अनुच्छेद हैं जिनमें अपने नागरिकों के प्रति राज्य के दायित्वों और राज्य के प्रति नागरिकों के कर्तव्यों का वर्णन किया गया है। इन अनुच्छेदों में सरकार के द्वारा नीति-निर्माण तथा नागरिकों के आचार एवं व्यवहार के संबंध में एक संवैधानिक अधिकार विधेयक शामिल है। ये अनुच्छेद संविधान के आवश्यक तत्व माने जाते हैं, जिसे भारतीय संविधान सभा द्वारा 1947 से 1949 के बीच विकसित किया गया था। मूल अधिकारों को सभी नागरिकों के बुनियादी मानव अधिकार के रूप में परिभाषित किया गया है। संविधान के भाग III में परिभाषित ये अधिकार नस्ल, जन्म स्थान, जाति, पंथ या लिंग के भेद के बिना सभी पर लागू होते हैं। ये विशिष्ट प्रतिबंधों के अधीन अदालतों द्वारा प्रवर्तनीय हैं। राज्य के नीति निदेशक सिद्धांत सरकार द्वारा कानून बनाने के लिए दिशानिदेश हैं। संविधान के भाग IV में वर्णित ये प्रावधान अदालतों द्वारा प्रवर्तनीय नहीं हैं, लेकिन जिन सिद्धांतों पर ये आधारित हैं, वे शासन के लिए मौलिक दिशानिदेश हैं जिनको राज्य द्वारा कानून तैयार करने और पारित करने में लागू करने की आशा की जाती है। मौलिक कर्तव्यों को देशभक्ति की भावना को बढ़ावा देने तथा भारत की एकता को बनाए रखने के लिए भारत के सभी नागरिकों के नैतिक दायित्वों के रूप में परिभाषित किया गया है। संविधान के चतुर्थ भाग में वर्णित ये कर्तव्य व्यक्तियों और राष्ट्र से संबंधित हैं। निदेशक सिद्धांतों की तरह, इन्हें कानूनी रूप से लागू नहीं किया जा सकता। इतिहास भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन भारतीय संविधान सभा मूल अधिकारों और निदेशक सिद्धांतों का मूल भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में था, जिसने स्वतंत्र भारत के लक्ष्य के रूप में समाज कल्याण और स्वतंत्रता के मूल्यों को प्राप्त करने के लिए संघर्ष किया।Austin 1999 50 भारत में संवैधानिक अधिकारों का विकास इंग्लैंड के अधिकार विधेयक, अमेरिका के अधिकार विधेयक तथा फ्रांस द्वारा मनुष्य के अधिकारों की घोषणा से प्रेरित हुआ।तायल बी। बी। और जेकब, ए। (2005), इंडियन हिस्ट्री, वर्ल्ड डेवलपमेंट्स एंड सिविक्स, पृष्ठ। ए-23 ब्रिटिश शासकों और उनकी भारतीय प्रजा के बीच भेदभाव का अंत करने के भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (आईएनसी (INC)) के एक उद्देश्य के साथ-साथ नागरिक अधिकारों की मांग भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा थी। आईएनसी (INC) द्वारा 1917 से 1919 के बीच अपनाए गए संकल्पों में इस मांग का स्पष्ट उल्लेख किया गया था।Austin 1999 52–53 इन संकल्पों में व्यक्त की गई मांगों में भारतीयों को कानूनी रूप से बराबरी का अधिकार, बोलने का अधिकार, मुकदमों की सुनवाई करने वाली जूरी में कम से कम आधे भारतीय रखने, राजनैतिक शक्ति तथा ब्रिटिश नागरिकों के समान हथियार रखने का अधिकार देना शामिल था।Austin 1999 53 प्रथम विश्व युद्ध के अनुभवों, 1919 के असंतोषजनक मोंटेग-चेम्सफोर्ड सुधारों सुधार और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में एम.के.गांधी उभरते प्रभाव के कारण नागरिक अधिकारों के लिए मांगे तय करने के संबंध में उनके नेताओं के दृष्टिकोण में उल्लेखनीय परिवर्तन आया। उनका ध्यान भारतीयों और अंग्रेजों के बीच समानता का अधिकार मांगने से हट कर सभी भारतीयों के लिए स्वतंत्रता सुनिश्चित करने पर केंद्रित हो गया।Austin 1999 53–54 1925 में एनी बीसेंट द्वारा तैयार किए गए भारत के राष्ट्रमंडल विधेयक में सात मूल अधिकारों की विशेष रूप से मांग की गई थी - व्यक्तिगत स्वतंत्रता, विवेक की स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, एकत्र होने की स्वतंत्रता, लिंग के आधार पर भेद-भाव न करने, अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा और सार्वजनिक स्थलों के उपयोग की स्वतंत्रता।Austin 1999 54 1927 में, कांग्रेस ने उत्पीड़न के खिलाफ निगरानी प्रदान करने वाले अधिकारों की घोषणा के आधार पर, भारत के लिए स्वराज संविधान का मसौदा तैयार करने के लिए एक समिति के गठन का संकल्प लिया। 1928 में मोतीलाल नेहरू के नेतृत्व में एक 11 सदस्यीय समिति का गठन किया गया। अपनी रिपोर्ट में समिति ने सभी भारतीयों के लिए मूल अधिकारों की गारंटी सहित अनेक सिफारिशें की थीं। ये अधिकार अमेरिकी संविधान और युद्ध के बाद यूरोपीय देशों द्वारा अपनाए गए अधिकारों से मिलते थे तथा उनमें से कई 1925 के विधेयक से अपनाए गए थे। इन प्रावधानों को बाद में मूल अधिकारों एवं निदेशक सिद्धांतों सहित भारत के संविधान के विभिन्न भागों में ज्यों का त्यों शामिल कर लिया गया था।Austin 1999 54–55 1931 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने अपने कराची अधिवेशन में शोषण का अंत करने, सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने और भूमि सुधार लागू करने के घोषित उद्देश्यों के साथ स्वयं को नागरिक अधिकारों तथा आर्थिक स्वतंत्रता की रक्षा करने के प्रति समर्पित करने का एक संकल्प पारित किया। इस संकल्प में प्रस्तावित अन्य नए अधिकारों में राज्य के स्वामित्व का निषेध, सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार, मृत्युदंड का उन्मूलन तथा आवागमन की स्वतंत्रता शामिल थे। Austin 1999 56 जवाहरलाल नेहरू द्वारा तैयार किए गए संकल्प के मसौदे, जो बाद में कई निदेशक सिद्धांतों का आधार बना, में सामाजिक सुधार लागू करने की प्राथमिक जिम्मेदारी राज्य पर डाली गई और इसी के साथ स्वतंत्रता आंदोलन पर समाजवाद तथा गांधी दर्शन के बढ़ते प्रभाव के चिह्न दिखाई देने लगे थे।Austin 1999 56–57 स्वतंत्रता आंदोलन के अंतिम चरण में 1930 के दशक के समाजवादी सिद्धांतों की पुनरावृत्ति दिखाई देने के साथ ही मुख्य ध्यान का केंद्र अल्पसंख्यक अधिकार - जो उस समय तक एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन चुका था - बन गए जिन्हें 1945 में तेज बहादुर सप्रू रिपोर्ट में प्रकाशित किया गया था। रिपोर्ट में अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करने पर जोर देने के अलावा "विधायिकाओं, सरकार और अदालतों के लिए ऐचरण के मानक" निर्धारित करने की भी मांग की गई थी।Austin 1999 57 ब्रिटिश राज/अंग्रेजी राज के अंतिम चरण के दौरान, भारत के लिए 1946 के कैबिनेट मिशन ने सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया के भाग के रूप में भारत के लिए संविधान का मसौदा तैयार करने के लिए संविधान सभा का एक मसौदा(प्रारूप) तैयार किया।Basu 1993 15 ब्रिटिश प्रांतों तथा राजसी रियासतों से परोक्ष रूप से चुने हुए प्रतिनिधियों से बनी भारत की संविधान सभा ने दिसंबर 1946 में अपनी कार्यवाही आरंभ की और नवंबर 1949 में भारत के संविधान का मसौदा पूर्ण किया।Basu 1993 19 कैबिनेट मिशन की योजना के मुताबिक, मूल अधिकारों की प्रकृति और सीमा, अल्पसंख्यकों की रक्षा तथा आदिवासी क्षेत्रों के प्रशासन के लिए सलाह देने हेतु सभा को सलाह देने के लिए एक सलाहकार समिति का गठन होना था। तदनुसार, जनवरी 1947 में एक 64 सदस्यीय सलाहकार समिति का गठन किया गया, इनमें से ही फरवरी 1947 में मूल अधिकारों पर जे.बी.कृपलानी की अध्यक्षता में एक 12 सदस्यीय उप-समिति का गठन किया गया।Austin 1999 61–62 उप समिति ने मूल अधिकारों का मसौदा तैयार किया और समिति को अप्रैल 1947 तक अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी और बाद में उसी महीने समिति ने इसको सभा के सामने प्रस्तुत कर दिया, जिसमें अगले वर्ष तक बहस और चर्चाएं हुईं तथा दिसंबर 1948 में अधिकांश मसौदे को स्वीकार कर लिया गया।Austin 1999 62–63 मूल अधिकारों का आलेखन संयुक्त राष्ट्र महासंघ द्वारा मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा को स्वीकार करने, संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग की गतिविधियों Austin 1999 59 के साथ ही साथ अमेरिकी संविधान में अधिकार विधेयक की व्याख्या में अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णयों से प्रभावित हुआ था।Austin 1999 73 निदेशक सिद्धांतों का मसौदे, जिसे भी मूल अधिकारों पर बनी उप समिति द्वारा ही तैयार किया गया था, में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के समाजवादी उपदेशों का समावेश किया गया था और वह आयरिश संविधान में विद्यमान ऐसे ही सिद्धांतों से प्रेरित था।Austin 1999 73–74 मौलिक कर्तव्य बाद में 1976 में संविधान के 42वें संशोधन द्वारा जोड़े गए थे।Basu 1993 131 मूल अधिकार भारत के नागरिकों का मूल अधिकार संविधान के भाग III में सन्निहित मूल अधिकार, सभी भारतीयों के लिए नागरिक अधिकार सुनिश्चित करते हैं और सरकार को व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अतिक्रमण करने से रोकने के साथ नागरिकों के अधिकारों की समाज द्वारा अतिक्रमण से रक्षा करने का दायित्व भी राज्य पर डालते हैं।Austin 1999 50–51 संविधान द्वारा मूल रूप से सात मूल अधिकार प्रदान किए गए थे- समानता का अधिकार, स्वतंत्रता का अधिकार, शोषण के विरुद्ध अधिकार, धर्म, संस्कृति एवं शिक्षा की स्वतंत्रता का अधिकार, संपत्ति का अधिकार तथा संवैधानिक उपचारों का अधिकार।Austin 1999 51 हालांकि, संपत्ति के अधिकार को 1978 में 44वें संशोधन द्वारा संविधान के तृतीय भाग से हटा दिया गया था।Basu 1993 79 मूल अधिकारों का उद्देश्य व्यक्तिगत स्वतंत्रता तथा समाज के सभी सदस्यों की समानता पर आधारित लोकतांत्रिक सिद्धांतों की रक्षा करना है।Austin 1999 114 वे, अनुच्छेद 13 के अंतर्गत विधायिका और कार्यपालिका की शक्तियों की परिसीमा के रूप में कार्य करते हैं और इन अधिकारों का उल्लंघन होने पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय तथा राज्यों के उच्च न्यायालयों को यह अधिकार है कि ऐसे किसी विधायी या कार्यकारी कृत्य को असंवैधानिक और शून्य घोषित कर सकें।Basu 1993 78–79 ये अधिकार राज्य, जिसमें अनुच्छेद 12 में दी गई व्यापक परिभाषा के अनुसार न केवल संघीय एवं राज्य सरकारों की विधायिका एवं कार्यपालिका स्कंधों बल्कि स्थानीय प्रशासनिक प्राधिकारियों तथा सार्वजनिक कार्य करने वाली या सरकारी प्रकृति की अन्य एजेंसियों व संस्थाओं के विरुद्ध बड़े पैमाने पर प्रवर्तनीय हैं।Basu 2003 35 हालांकि, कुछ अधिकार - जैसे कि अनुच्छेद 15, 17, 18, 23, 24 में - निजी व्यक्तियों के विरुद्ध भी उपलब्ध हैं।Basu 1993 86–87 इसके अलावा, कुछ मूल अधिकार - जो अनुच्छेद 14, 20, 21, 25 में उपलब्ध हैं, उन सहित - भारतीय भूमि पर किसी भी राष्ट्रीयता वाले व्यक्ति पर लागू होते हैं, जबकि अन्य - जैसे जो अनुच्छेद 15, 16, 19, 30 के अंतर्गत उपलब्ध है - केवल भारतीय नीगरिकों पर लागू होते हैं।तायल बी। बी। और जेकब, ए। (2005), इंडियन हिस्ट्री, वर्ल्ड डेवलपमेंट्स एंड सिविक्स, पृष्ठ। ए-25Basu 1993 85 मूल अधिकार संपूर्ण नहीं होते तथा वे सार्वजनिक हितों की रक्षा के लिए आवश्यक उचित प्रतिबंधों के अधीन होते हैं। 1973 में केशवानंद भारती बनाम केरल सरकार के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने अपने 1967 के पूर्व निर्णय को रद्द करते हुए निर्णय दिया कि मूल अधिकारों में संशोधन किया जा सकता है, यदि इस तरह के किसी संशोधन से संविघान के बुनियादी ढांचे का उल्लंघन होता हो, तो न्यायिक समीक्षा के अधीन।Basu 2003 1647–1649 मूल अधिकारों को संसद के प्रत्येक सदन में दो तिहाई बहुमत से पारित संवैधानिक संशोधन के द्वारा बढ़ाया, हटाया जा सकता है या अन्यथा संशोधित किया जा सकता है।Basu 2003 1645 आपात स्थिति लागू होने की स्थिति में अनुच्छेद 20 और 21 को छोड़कर शेष मूल अधिकारों में से किसी को भी राष्ट्रपति के आदेश द्वारा अस्थाई रूप से निलंबित किया जा सकता है।Basu 2003 1615–1616 आपातकाल की अवधि के दौरान राष्ट्रपति आदेश देकर संवैधानिक उपचारों के अधिकारों को भी निलंबित कर सकते हैं, जिसके परिणामस्वरूप सिवाय अनुच्छेद 20 व 21 के किसी भी मूल अधिकार के प्रवर्तन हेतु नागरिकों के सर्वोच्च न्यायालय में जाने पर रोक लग जाती है।Basu 2003 1617–1618 संसद भी अनुच्छेद 33 के अंतर्गत कानून बना कर, उनकी सेवाओं का समुचित निर्वहन सुनिश्चित करने तथा अनुशासन के रखरखाव के लिए भारतीय सशस्त्र सेनाओं और पुलिस बल के सदस्यों के मूल अधिकारों के अनुप्रयोग को प्रतिबंधित कर सकती है।Basu 1993 129–130 समानता का अधिकार Vikash समानता का अधिकार संविधान की प्रमुख गारंटियों में से एक है। यह अनुच्छेद 14-18 में सन्निहित हैं जिसमें सामूहिक रूप से कानून के समक्ष समानता तथा गैर-भेदभाव के सामान्य सिद्धांत शामिल हैं, तथा अनुच्छेद 17-18 जो सामूहिक रूप से सामाजिक समानता के दर्शन को आगे बढ़ाते हैं।Basu 1993 93–94 अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता की गारंटी देता है, इसके साथ ही भारत की सीमाओं के अंदर सभी व्यक्तियों को कानून का समान संरक्षण प्रदान करता है। इस में कानून के प्राधिकार की अधीनता सबके लिए समान है, साथ ही समान परिस्थितियों में सबके साथ समान व्यवहार।Basu 2003 56–57 उत्तरवर्ती में राज्य वैध प्रयोजनों के लिए व्यक्तियों का वर्गीकरण कर सकता है, बशर्ते इसके लिए यथोचित आधार मौजूद हो, जिसका अर्थ है कि वर्गीकरण मनमाना न हो, वर्गीकरण किये जाने वाले लोगों में सुगम विभेदन की एक विधि पर आधारित हो, साथ ही वर्गीकरण के द्वारा प्राप्त किए जाने वाले प्रयोजन का तर्कसंगत संबंध होना आवश्यक है।Basu 1993 88 अनुच्छेद 15 केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्म स्थान, या इनमें से किसी के ही आधार पर भेदभाव पर रोक लगाता है। अंशतः या पूर्णतः राज्य के कोष से संचालित सार्वजनिक मनोरंजन स्थलों या सार्वजनिक रिसोर्ट में निशुल्क प्रवेश के संबंध में यह अधिकार राज्य के साथ-साथ निजी व्यक्तियों के खिलाफ भी प्रवर्तनीय है।Basu 1993 90–91 हालांकि, राज्य को महिलाओं और बच्चों या अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति सहित सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों के नागरिकों के लिए विशेष प्रावधान बनाने से राज्य को रोका नहीं गया है। इस अपवाद का प्रावधान इसलिए किया गया है क्योंकि इसमें वर्णित वर्गो के लोग वंचित माने जाते हैं और उनको विशेष संरक्षण की आवस्यकता है।Basu 1993 91 अनुच्छेद 16 सार्वजनिक रोजगार के संबंध में अवसर की समानता की गारंटी देता है और राज्य को किसी के भी खिलाफ केवल धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, वंश, जन्म स्थान या इनमें से किसी एक के आधार पर भेदभाव करने से रोकता है। किसी भी पिछड़े वर्ग के नागरिकों का सार्वजनिक सेवाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व सुनुश्चित करने के लिए उनके लाभार्थ सकारात्मक कार्रवाई के उपायों के कार्यान्वयन हेतु अपवाद बनाए जाते हैं, साथ ही किसी धार्मिक संस्थान के एक पद को उस धर्म का अनुसरण करने वाले व्यक्ति के लिए आरक्षित किया जाता है।Basu 2003 133–134 अस्पृश्यता की प्रथा को अनुच्छेद 17 के अंतर्गत एक दंडनीय अपराध घोषित कर किया गया है, इस उद्देश्य को आगे बढ़ाते हुए नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम 1955 संसद द्वारा अधिनियमित किया गया है। अनुच्छेद 18 राज्य को सैन्य या शैक्षणिक विशिष्टता को छोड़कर किसी को भी कोई पदवी दे्ने से रोकता है तथा कोई भी भारतीय नागरिक किसी विदेशी राज्य से कोई पदवी स्वीकार नहीं कर सकता। इस प्रकार, भारतीय कुलीन उपाधियों और अंग्रेजों द्वारा प्रदान की गई और अभिजात्य उपाधियों को समाप्त कर दिया गया है। हालांकि, भारत रत्न पुरस्कारों जैसे, भारतरत्न को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इस आधार पर मान्य घोषित किया गया है कि ये पुरस्कार मात्र अलंकरण हैं और प्रप्तकर्ता द्वारा पदवी के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।Basu 1993 94–95Basu 2003 164 स्वतंत्रता का अधिकार संविधान के निर्माताओं द्वारा महत्वपूर्ण माने गए व्यक्तिगत अधिकारों की गारंटी देने की दृष्टि से स्वतंत्रता के अधिकार को अनुच्छेद 19-22 में शामिल किया गया है और इन अनुच्छेदों में कुछ प्रतिबंध भी शामिल हैं जिन्हें विशेष परिस्थितियों में राज्य द्वारा व्यक्तिगं स्वतंत्रता पर लागू किया जा सकता है। अनुच्छेद 19 नागरिक अधिकारों के रूप में छः प्रकार की स्वतंत्रताओं की गारंटी देता है जो केवल भारतीय नागरिकों को ही उपलब्ध हैं।Basu 2003 167–168 इनमें शामिल हैं(19 अ ) भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, (19 ब ) शांतिपूर्वक बिना हथियारों के एकत्रित होने और सभा करने की स्वतंत्रता , भारत के राज्यक्षेत्र में कहीं भी आने-जाने की स्वतंत्रतता, भारत के किसी भी भाग में बसने और निवास करने की स्वतंत्रता तथा कोई भी पेशा अपनाने की स्वतंत्रता। ये सभी स्वतंत्रताएं अनुच्छेद 19 में ही वर्णित कुछ उचित प्रतिबंधों के अधीन होती हैं, जिन्हें राज्य द्वारा उन पर लागू किया जा सकता है। किस स्वतंत्रता को प्रतिबंधित किया जाना प्रस्तावित है, इसके आधार पर प्रतिबंधों को लागू करने के आधार बदलते रहते हैं, इनमें शामिल हैं राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था, शालीनता और नैतिकता, न्यायालय की अवमानना, अपराधों को भड़काना और मानहानि। आम जनता के हित में किसी व्यापार, उद्योग या सेवा का नागरिकों के अपवर्जन के लिए राष्ट्रीयकरण करने के लिए राज्य को भी सशक्त किया गया है।Basu 1993 96–97 अनुच्छेद 19 द्वारा गारंटीशुदा स्वतंत्रताओं की आगे अनुच्छेद 20-22 द्वारा रक्षा की जाती है।Basu 2003 167 इन अनुच्छेदों के विस्तार, विशेष रूप से निर्धारित प्रक्रिया के सिद्धांत के संबंध में, पर संविधान सभा में भारी बहस हुई थी। विशेष रूप से बेनेगल नरसिंह राव ने यह तर्क दिया कि ऐसे प्रावधान को लागू होने से सामाजिक कानूनों में बाधा आएगी तथा व्यवस्था बनाए रखने में प्रक्रियात्मक कठिनाइयां उत्पन्न होंगी, इसलिए इसे पूरी तरह संविधान से बाहर ही रखा जाए।Austin 1999 101–102 संविधान सभा ने 1948 में अंततः "निर्धारित प्रक्रिया" शब्दों को हटा दिया और उनके स्थान पर “कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया” को शामिल कर लिया।Austin 1999 104–105 परिणाम के रूप में एक, अनुच्छेद 21,यह जापान से लिया गया है। जो विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार होने वाली कार्यवाही को छोड़ कर, जीवन या व्यक्तिगत संवतंत्रता में राज्य के अतिक्रमण से बचाता है, के अर्थ को 1978 तक कार्यकारी कार्यवाही तक सीमित समझा गया था। हालांकि, 1978 में, मेनका गांधी बनाम भारत संघ के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 21 के संरक्षण को विधाई कार्यवाही तक बढ़ाते हुए निर्णय दिया कि किसी प्रक्रिया को निर्धारित करने वाला कानून उचित, निष्पक्ष और तर्कसंगत होना चाहिए,Basu 2003 258 और अनुच्छेद 21 में निर्धारित प्रक्रिया को प्रभावी ढंग से पढ़ा।Basu 1993 105–106 इसी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि अनुच्छेद 21 के अंतर्गत "जीवन" का अर्थ मात्र एक "जीव के अस्तित्व" से कहीं अधिक है; इसमें मानवीय गरिमा के साथ जीने का अधिकार तथा वे सब पहलू जो जीवन को "अर्थपूर्ण, पूर्ण तथा जीने योग्य" बनाते हैं, शामिल हैं।Basu 2003 259 इस के बाद की न्यायिक व्याख्याओं ने अनुच्छेद 21 के अंदर अनेक अधिकारों को शामिल करते हुए इसकी सीमा का विस्तार किया है जिनमें शामिल हैं आजीविका, स्वच्छ पर्यावरण, अच्छा स्वास्थ्य, अदालतों में तेवरित सुनवाई तथा कैद में मानवीय व्यवहार से संबंधित अधिकार। Basu 2003 260–261 प्राथमिक स्तर पर शिक्षा के अधिकार को 2002 के 86वें संवैधानिक संशोधन द्वारा अनुच्छेद 21ए में मूल अधिकार बनाया गया है।86वीं अमेंडमेंट एक्ट, 2002।जून 2020 InternetArchiveBot अनुच्छेद 20 अपराधों के लिए दोषसिद्धि के संबंध में संरक्षण प्रदान करता है, जिनमें शामिल हैं पूर्वव्यापी कानून व दोहरे दंड के विरुद्ध अधिकार तथा आत्म-दोषारोपण से स्वतंत्रता प्रदान करता है।Basu 1993 102 अनुच्छेद 22 गिरफ्तार हुए और हिरासत में लिए गए लोगों को विशेष अधिकार प्रदान करता है, विशेष रूप से गिरफ्तारी के आधार सूचित किए जाने, अपनी पसंद के एक वकील से सलाह करने, गिरफ्तारी के 24 घंटे के अंदर एक मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किए जाने और मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना उस अवधि से अधिक हिरासत में न रखे जाने का अधिकार।Basu 2003 282–284 संविधान राज्य को भी अनुच्छेद 22 में उपलब्ध रक्षक उपायों के अधीन, निवारक निरोध के लिए कानून बनाने के लिए अधिकृत करता है।Basu 1993 106 निवारक निरोध से संबंधित प्रावधानों पर संशयवाद तथा आशंकाओं के साथ चर्चा करने के बाद संविधान सभा ने कुछ संशोधनों के साथ 1949 में अनिच्छा के साथ अनुमोदन किया था।Austin 1999 110–112 अनुच्छेद 22 में प्रावधान है कि जब एक व्यक्ति को निवारक निरोध के किसी भी कानून के तहत हिरासत में लिया गया है, ऐसे व्यक्ति को राज्य केवल तीन महीने के लिए परीक्षण के बिना गिरफ्तार कर सकता है, इससे लंबी अवधि के लिए किसी भी निरोध के लिए एक सलाहकार बोर्ड द्वारा अधिकृत किया जाना आवश्यक है। हिरासत में लिए गए व्यक्ति को भी अधिकार है कि उसे हिरासत के आधार के बारे में सूचित किया जाएगा और इसके विरुद्ध जितना जल्दी अवसर मिले अभ्यावेदन करने की अनुमति दी जाएगी।Basu 1993 107 शोषण के खिलाफ अधिकार thumb|180px|left|राइट्स के अंतर्गत शोषण के खिलाफ बाल श्रम और भिक्षुक निषिद्ध हो गए। शोषण के विरुद्ध अधिकार, अनुच्छेद 23-24 में निहित हैं, इनमें राज्य या व्यक्तियों द्वारा समाज के कमजोर वर्गों का शोषण रोकने के लिए कुछ प्रावधान किए गए हैं।Basu 1993 110 अनुच्छेद 23 के प्रावधान के अनुसार मानव तस्करी को प्रतिबन्धित है, इसे कानून द्वारा दंडनीय अपराध बनाया गया है, साथ ही बेगार या किसी व्यक्ति को पारिश्रमिक दिए बिना उसे काम करने के लिए मजबूर करना जहां कानूनन काम न करने के लिए या पारिश्रमिक प्राप्त करने के लिए हकदार है, भी प्रतिबंधित किया गया है। हालांकि, यह राज्य को सार्वजनिक प्रयोजन के लिए सेना में अनिवार्य भर्ती तथा सामुदायिक सेवा सहित, अनिवार्य सेवा लागू करने की अनुमति देता है।Basu 1993 110–111Basu 2003 325 बंधुआ श्रम व्यवस्था (उन्मूलन) अधिनियम, 1976, को इस अनुच्छेद में प्रभावी करने के लिए संसद द्वारा अधिनियमित किया गया है।Basu 2003 326 अनुच्छेद 24 कारखानों, खानों और अन्य खतरनाक नौकरियों में 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के रोजगार पर प्रतिबंध लगाता है। संसद ने बाल श्रम (निषेध और विनियमन) अधिनियम, 1986 अधिनियमित किया है, जिसमें उन्मूलन के लिए नियम प्रदान करने और बाल श्रमिक को रोजगार देने पर दंड के तथा पूर्व बाल श्रमिकों के पुनर्वास के लिए भी प्रावधान दिए गए हैं।Basu 2003 327 धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार भारत एक धर्मनिरपेक्ष प्रजातंत्र है धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार अनुच्छेद 25-28 में निहित है, जो सभी नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान करता है और भारत में धर्मनिरपेक्ष राज्य सुनिश्चित करता है। संविधान के अनुसार, यहां कोई आधिकारिक राज्य धर्म नहीं है और राज्य द्वारा सभी धर्मों के साथ निष्पक्षता और तटस्थता से व्यवहार किया जाना चाहिए।Basu 1993 111 अनुच्छेद 25 सभी लोगों को विवेक की स्वतंत्रता तथा अपनी पसंद के धर्म के उपदेश, अभ्यास और प्रचार की स्वतंत्रता की गारंटी देता है। हालांकि, यह अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य तथा राज्य की सामाजिक कल्याण और सुधार के उपाय करने की शक्ति के अधीन होते हैं।Basu 2003 327–328 हालांकि, प्रचार के अधिकार में किसी अन्य व्यक्ति के धर्मांतरण का अधिकार शामिल नहीं है, क्योंकि इससे उस व्यक्ति के विवेक के अधिकार का हनन होता है।Basu 2003 330 अनुच्छेद 26 सभी धार्मिक संप्रदायों तथा पंथों को सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता तथा स्वास्थ्य के अधीन अपने धार्मिक मामलों का स्वयं प्रबंधन करने, अपने स्तर पर धर्मार्थ या धार्मिक प्रयोजन से संस्थाएं स्थापित करने और कानून के अनुसार संपत्ति रखने, प्राप्त करने और उसका प्रबंधन करने के अधिकार की गारंटी देता है। ये प्रावधान राज्य की धार्मिक संप्रदायों से संबंधित संपत्ति का अधिग्रहण करने की शक्ति को कम नहीं करते।Basu 2003 336–337 राज्य को धार्मिक अनुसरण से जुड़ी किसी भी आर्थिक, राजनीतिक या अन्य धर्मनिरपेक्ष गतिविधि का विनियमन करने की शक्ति दी गई है। अनुच्छेद 27 की गारंटी देता है कि किसी भी व्यक्ति को किसी विशेष धर्म या धार्मिक संस्था को बढ़ावा देने के लिए टैक्स देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।Basu 2003 343 अनुच्छेद 28 पूर्णतः राज्य द्वारा वित्तपोषित शैक्षिक संस्थाओं में धार्मिक शिक्षा का निषेध करता है तथा राज्य से वित्तीय सहायता लेने वाली शैक्षिक संस्थाएं, अपने किसी सदस्य को उनकी (या उनके अभिभावकों की) स्वाकृति के बिना धार्मिक शिक्षा प्राप्त करने या धार्मिक पूजा में भाग लेने के लिए मजबूर नहीं कर सकतीं। सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार अनुच्छेद 29 व 30 में दिए गए सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार, उन्हें अपनी विरासत का संरक्षण करने और उसे भेदभाव से बचाने के लिए सक्षम बनाते हुए सांस्कृतिक, भाषाई और धार्मिक अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा के उपाय हैं।Basu 2003 345 अनुच्छेद 29 अपनी विशिष्ट भाषा, लिपि और संस्कृति रखने वाले नागरिकों के किसी भी वर्ग को उनका संरक्षण और विकास करने का अधिकार प्रदान करता है, इस प्रकार राज्य को उन पर किसी बाह्य संस्कृति को थोपने से रोकता है।Basu 1993 115 यह राज्य द्वारा चलाई जा रही या वित्तपोषित शैक्षिक संस्थाओं को, प्रवेश देते समय किसी भी नागरिक के साथ केवल धर्म, मूलवंश, जाति, भाषा या इनमें से किसी के आधार पर भेदभाव करने से भी रोकता है। हालांकि, यह सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए राज्य द्वारा उचित संख्या में सीटों के आरक्षण तथा साथ ही एक अल्पसंख्यक समुदाय द्वारा चलाई जा रही शैक्षिक संस्था में उस समुदाय से संबंधिक नागरिकों के लिए 50 प्रतिशत तक सीटों के आरक्षण के अधीन है।Basu 2003 346–347 अनुच्छेद 30 सभी धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों को अपनी स्वयं की संस्कृति को बनाए रखने और विकसित करने के लिए अपनी पसंद की शैक्षिक संस्थाएं स्थापित करने और चलाने का अधिकार प्रदान करता है और राज्य को, वित्तीय सहायता देते समय किसी भी संस्था के साथ इस आधार पर कि उसे एक धार्मिक या सांस्कृतिक अल्पसंख्यक द्वारा चलाया जा रहा है, भेदभाव करने से रोकता है। हालांकि शब्द "अल्पसंख्यक" को संविधान में परिभाषित नहीं किया गया है, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा की गई व्याख्या के अनुसार इसका अर्थ है कोई भी समुदाय जिसके सदस्यों की संख्या, जिस राज्य में अनुच्छेद 30 के अंतर्गत अधिकार चाहिए, उस राज्य की जनसंख्या के 50 प्रतिशत से कम हो। इस अधिकार का दावा करने के लिए, यह जरूरी है कि शैक्षिक संस्था को किसी धार्मिक या भाषाई अल्पसंख्यक द्वारा स्थापित और प्रशासित किया गया हो। इसके अलावा, अनुच्छेद 30 के तहत अधिकार का लाभ उठाया जा सकता है, भले ही स्थापित की गई शैक्षिक संस्था स्वयं को केवल संबंधित अल्पसंख्यक समुदाय के धर्म या भाषा के शिक्षण तक सीमित नहीं रखती, या उस संस्था के अधिसंख्य छात्र संबंधित अल्पसंख्यक समुदाय से संबंध नहीं रखते हों।Basu 2003 348–349 यह अधिकार शैक्षिक मानकों, कर्मचारियों की सेवा की शर्तों, शुल्क संरचना और दी गई सहायता के उपयोग के संबंध में उचित विनियमन लागू करने की राज्य की शक्ति के अधीन है।Basu 2003 354–355 संवैधानिक उपचारों का अधिकार संवैधानिक उपचारों का अधिकार नागरिकों को अपने मूल अधिकारों के प्रवर्तन या उल्लंघन के विरुद्ध सुरक्षा के लिए भारत के सर्वोच्च न्यायालय में जाने की शक्ति देता है।Basu 2003 391 अनुच्छेद 32 स्वयं एक मूल अधिकार के रूप में, अन्य मूल अधिकारों के प्रवर्तन के लिए गारंटी प्रदान करता है, संविधान द्वारा सर्वोच्च न्यायालय को इन अधिकारों के रक्षक के रूप में नामित किया गया है।Basu 1993 122 सर्वोच्च न्यायालय को मूल अधिकारों के प्रवर्तन के लिए बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, निषेध, उत्प्रेषण और अधिकार पृच्छा प्रादेश (रिट, writ) जारी करने का अधिकार दिया गया है, जबकि उच्च न्यायालयों को अनुच्छेद 226 - जो एक मैलिक अधिकार नहीं है - मूल अधिकारों का उल्लंघन न होने पर भी इन विशेषाधिकार प्रादेशों को जारी करने का अधिकार दिया गया है।Basu 1993 123 निजी संस्थाओं के खिलाफ भी मूल अधिकार को लागू करना तथा उल्लंघन के मामले में प्रभावित व्यक्ति को समुचित मुआवजे का आदेश जारी करना भी सर्वोच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार में है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्वप्रेरणा से या जनहित याचिका के आधार पर अपने क्षेत्राधिकार का प्रयोग कर सकता है। अनुच्छेद 359 के प्रावधानों जबकि आपातकाल लागू हो, को छोड़कर यह अधिकार कभी भी निलंबित नहीं किया जा सकता। राज्य के नीति निदेशक सिद्धांत भारतीय संविधान में नीति निर्देशक तत्त्व संविधान के चतुर्थ भाग में सन्निहित राज्य के नीति निदेशक सिद्धांतों, में संविधान की प्रस्तावना में प्रस्तावित आर्थिक और सामाजिक लोकतंत्र की स्थापना हेतु मार्गदर्शन के लिए राज्य को निदेश uदिए गए हैं।Basu 1993 137 वे संविधान सभा द्वारा भारत में परिकल्पित सामाजिक क्रांति के लक्ष्य रहे मानवीय और समाजवादी निदेशों को बताते हैं।Austin 1999 75 राज्य से यह अपेक्षा की गई है कि हालांकि ये प्रकृति में न्यायोचित नहीं हैं, कानून और नीतियां बनाते समय इन सिद्धांतों को ध्यान में रखा जाएगा। निदेशक सिद्धांतों को निम्नलिखित श्रेणियों के अंतर्गत वर्गीकृत किया जा सकता है: वे आदर्श जिन्हें प्राप्त करने के लिए राज्य को प्रयास करने चाहिएं; विधायी और कार्यकारी शक्तियों के प्रयोग के लिHKïए निदेश और नागरिकों के अधिकार जिनकी सुरक्षा करना राज्य का लक्ष्य होना चाहिए। न्यायोचित न होने के बावजूद निदेशक सिद्धांत राज्य पर एक रोक का काम करते हैं; इन्हें मतदाताओं एवं विपक्ष के हाथों में एक मानदंड के रूप में माना गया है जिससे वे चुनाव के समय सरकार के कार्यप्रदर्शन को माप सकें।Basu 1999 140–142 अनुच्छेद 37, यह बताते हुए कि निदेशक सिद्धांत कानून की किसी भी अदालत में प्रवर्तनीय नहीं हैं, उन्हें "देश के शासन के लिए बुनियादी" घोषित करता है और विधान के मामलों में इन्हें लागू करने का दायित्व भी राज्य पर डालता है।Basu 1993 140 इस प्रकार वे संविधान के कल्याणकारी राज्य के मॉडल पर जोर देने का काम करते हैं और सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय को स्वीकार करते हुए लोगों के कल्याण को प्रोत्साहन देने के लिए, साथ ही अनुच्छेद 38 के अनुसार आय असमानता से लड़ने और व्यक्तिगत गरिमा को सुनिश्चित करने के लिए राज्य के सकारात्मक कर्तव्यों पर जोर देते हैं।Basu 1993 141Basu 2003 448 अनुच्छेद 39 राज्य द्वारा अपनाई जाने वाली नीतियों के कुछ सिद्धांत तय करता है, जिनमें सभी नागरिकों के लिए आजीविका के पर्याप्त साधन प्रदान करना, स्त्री और पुरुषों के लिए समान कार्य के लिए समान वेतन, उचित कार्य दशाएं, कुछ ही लोगों के पास धन तथा उत्पादन के साधनों के संकेंद्रन में कमी लाना और सामुदायिक संसाधनों का “सार्वजनिक हित में सहायक होने” के लिए वितरण करना शामिल हैं।Basu 2003 448–449 ये धाराएं, राज्य की सहायता से सामाजिक क्रांति लाकर, एक समतावादी सामाजिक व्यवस्था बनाने तथा एक कल्याणकारी राज्य की स्थापना करने के संवैधानिक उद्देश्यों को चिह्नांकित करती हैं और इनका खनिज संसाधनों के साथ-साथ सार्वजनिक सुविधाओं के राष्ट्रीयकरण को समर्थन देने के लिए उपयोग किया गया है।Basu 2003 449–450 इसके अलावा, भूसंसाधनों के न्यायसंगत वितरण के सुनिश्चित करने के लिए, संघीय एवं राज्य सरकारों द्वारा कृषि सुधारों और भूमि पट्टों के कई अधिनियम बनाए गए हैं।Basu 1993 143 अनुच्छेद 41-43 जनादेश राज्य को सभी नागरिकों के लिए काम का अधिकार, न्यूनतम मजदूरी, सामाजिक सुरक्षा, मातृत्व राहत और एक शालीन जीवन स्तर सुरक्षित करने के प्रयास करने के अधिकार देते हैं।Basu 2003 454–456 इन प्रावधानों का उद्देश्य प्रस्तावना में परिकल्पित एक समाजवादी की राज्य की स्थापना करना है।Basu 2003 456 अनुच्छेद 43 भी राज्य को कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहन देने की जिम्मेदारी देता है और इसको आगे बढ़ाते हुए संघीय सरकार ने राज्य सरकारों के समन्वय से खादी, हैंडलूम आदि को प्रोत्साहन देने के लिए अनेक बोर्डों की स्थापना की है।Basu 1993 144 अनुच्छेद 39ए के अनुसार राज्य को आर्थिक अथवा अन्य अयोग्यताओं पर ध्यान दिए बिना निशुल्क कानूनी सहायता उपलब्ध करवाकर यह सुनिश्चित करना है कि सभी नागरिकों को न्याय प्राप्त करने के अवसर मिलें।Basu 2003 453 अनुच्छेद 43ए राज्य को उद्योगों के प्रबंधन में श्रमिकों की भागीदारी सुनिश्चित करने की दिशा में काम करने के लिए अधिकार देता है। अनुच्छेद 46 के तहत, राज्य को अनुसूचित जातियों व अनुसूचित जनजातियों के हितों को प्रोत्साहन देने और उनके आर्थिक स्तर को ऊपर उठाने के लिए काम करने और उन्हें भैद-भाव तथा शोषण से बचाने का अधिकार दिया गया है। इस प्रावधान को प्रभावी बनाने के लिए दो संविधान संशोधनों सहित कई अधिनियम बनाए गए हैं।Basu 2003 457–458 अनुच्छेद 44 देश में वर्तमान में लागू विभिन्न निजी कानूनों में विसंगतियों को दूर करके सभी नागरिकों के लिए समान नगगरिक संहिता बनाने के लिए राज्य को प्रोत्साहित करता है। हालांकि, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रावधानों को लागू करने के लिए अनेक अनुस्मारक दिए जाने के बावजूद यह एक अंधपत्र होकर रह गया है।Basu 2003 456–457 अनुच्छेद 45 द्वारा मूल रूप में राज्य को 6 से 14 वर्ष की आयु के बच्चों को निशुल्क तथा अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने का अधिकार दिया गया था;Basu 2003 457 लेकिन बाद में 2002 में 86वें संविधान संशोधन के बाद इसे मूल अधिकार में परिवर्तित कर दिया गया है और छः वर्ष तक की आयु के बच्चों के बचपन की देखभाल सुनिश्चित करने का दायित्व राज्य पर डाला गया है। अनुच्छेद 47 जीवन स्तर ऊंचा उठाने, सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार करने तथा स्वास्थ्य के लिए हानिकारक नशीले पेय और दवाओं के सेवन पर रोक लगाने की प्रतिबद्धता राज्य को सौंपी गई है।Basu 2003 459 परिणाम के रूप में कई राज्यों में आंशिक या संपूर्ण निषेध लागू कर दिया गया है, लेकिन वित्तीय मजबूरियों ने इसको पूर्ण रूप से लागू करने से रोक रखा है।Basu 1993 144–145 अनुच्छेद 48 के द्वारा भी राज्य को नस्ल सुधार कर तथा पशुवध पर रोक लगा कर आधुनिक एवं वैज्ञानिक तरीके से कृषि और पशुपालन को संगठित करने की जिम्मेदारी दी गई है।Basu 2003 459–460 अनुच्छेद 48ए राज्य को पर्यावरण की रक्षा और वनों तथा वन्यजीवों के संरक्षण का आदेश देता है, जबकि अनुच्छेद 49 राष्ट्रीय महत्त्व के स्मारकों और वस्तुओं का संरक्षण सुनिश्चित करने का दायित्व राज्य को सौंपता है।Basu 2003 460 अनुच्छेद 50 के अनुसार राज्य को न्यायिक स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए सार्वजनिक सेवाओं में न्यायपालिका का कार्यपालिका से अलगाव सुनिश्चित करना है और संघीय कानून बनाकर इस उद्देश्य को प्राप्त कर लिया गया है।Basu 1993 145Basu 2003 461 अनुच्छेद 51 के अनुसार, राज्य को अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के संवर्धन हेतु प्रयास करने चाहिएं तथआ अनुच्छेद 253 के द्वारा संसद को अंतर्राष्ट्रीय संधियां लागू करने के लिए कानून बनाने का अधिकार दिया गया है।Basu 2003 461–462 मूल कर्तव्य 200px|thumb|left|भारतीय राष्ट्रीय ध्वज के प्रति कोई भी अनादर कार्य गैर कानूनी है। नागरिकों के मूल कर्तव्य 1976 में सरकार द्वारा गठित स्वर्णसिंह समिति की सिफारिशों पर, 42वें संशोधन द्वारा संविधान में जोड़े गए थे।Basu 2003 465 मूल रूप से संख्या में दस, मूल कर्तव्यों की संख्या 2002 में 86वें संशोधन द्वारा ग्यारह तक बढ़ाई गई थी, जिसमें प्रत्येक माता-पिता या अभिभावक को यह सुनिश्चित करने का कर्तव्य सौंपा गया कि उनके छः से चौदह वर्ष तक के बच्चे या वार्ड को शिक्षा का अवसर प्रदान कर दिया गया है। अन्य मूल कर्तव्य नागरिकों को कर्तव्यबद्ध करते हैं कि संविधान सहित भारत के राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान करें, इसकी विरासत को संजोएं, इसकी मिश्रित संस्कृति का संरक्षण करें तथा इसकी सुरक्षा में सहायता दें। वे सभी भारतीयों को सामान्य भाईचारे की भावना को बढ़ावा देने, पर्यावरण और सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करने, वैज्ञानिक सोच का विकास करने, हिंसा को त्यागने और जीवन के सभी क्षेत्रों में उत्कृष्टता की दिशा में प्रयास करने के कर्तव्य भी सौंपते हैं।Basu 1993 131 नागरिक इन कर्तव्यों का पालन करने के लिए संविधान द्वारा नैतिक रूप से बाध्य हैं। हालांकि, निदेशक सिद्धांतों की तरह, ये भी न्यायोचित नहीं हैं, उल्लंघन या अनुपालना न होने पर कोई कानूनी कार्यवाही नहीं हो सकती।तायल बी। बी। और जेकब, ए। (2005), इंडियन हिस्ट्री, वर्ल्ड डेवलपमेंट्स एंड सिविक्स, पृष्ठ। ए-35 ऐसे कर्तव्यों का उल्लेख मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा तथा नागरिक एवं राजनीतिक अधिकारों पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिज्ञापत्र जैसे अंतर्राष्ट्रीय लेखपत्रों में है, अनुच्छेद 51ए भारतीय संविधान को इन संधियों के अनुरूप लाता है। आलोचना और विश्लेषण अब कम ही बच्चे खतरनाक वातावरण में कार्यरत हैं, लेकिन गैर खतरनाक नौकरियों में उनका रोजगार, घरेलू नौकर के रूप में प्रचलन, कई आलोचकों और मानव अधिकार अधिवक्ताओं की नजरों में संविधान की भावना का उल्लंघन करता है। एक करोड़ पैंसठ लाख से अधिक बच्चे रोजगार में हैं। http://www।indiatogether।org/photo/2006/chi-labour।htm Child labour in India India Together 2006-06-27जून 2020 InternetArchiveBot सरकारी अधिकारियों और राजनीतिज्ञों में मौजूद भ्रष्टाचार के स्तर के अनुसार 2005 में भारत 159 देशों की सूची में 88वें स्थान पर था।ट्रांसपैरेंसी इंटरनैशनल द्वारा भ्रष्टाचार की धारणा का सूचकांक प्रकाशित। वर्ष 1990-1991 को बीआर अम्बेडकर की स्मृति में "सामाजिक न्याय वर्ष" घोषित किया गया था। http://ambedkarfoundation।nic।in/html/bharat।htm Dr। Bhimrao Ambedkar Dr। Ambedkar Foundation 2006-06-29जून 2020 InternetArchiveBot सरकार चिकित्सा एवं अभियांत्रिकी पाठ्यक्रमों के अनुसूचित जाति एवं जनजाति के छात्रों को निशुल्क पाठ्यपुस्तकें प्रदान करती है। 2002-2003 के दौरान रुपये 4.77 करोड़ (477 लाख) इस उद्देश्य के लिए जारी किए गए थे।तायल बी। बी। और जेकब, ए। (2005), इंडियन हिस्ट्री, वर्ल्ड डेवलपमेंट्स एंड सिविक्स, पृष्ठ। ए-45 अनुसूचित जातियों और जनजातियों को भेदभाव से बचाने के लिए, सरकार ने ऐसे कृत्यों के लिए कड़े दंडों का प्रावधान करते हुए 1995 में अत्याचार निवारण अधिनियम अधिनियमित किया था। http://www।hrw।org/reports/1999/india/India994-18।htm Prevention of Atrocities Act, 1995 Human Rights Watch 2006-06-29जून 2020 InternetArchiveBot 1948 का न्यूनतम मजदूरी अधिनियम सरकार को संपूर्ण आर्थिक क्षेत्र में काम कर रहे लोगों की न्यूनतम मजदूरी तय करने का अधिकार देता है। http://www।helplinelaw।com/docs/THE%20MINIMUM%20WAGES%20ACT,%201948 Minimum Wages Act, 1948 Helplinelaw।com 2006-06-29जून 2020 InternetArchiveBot उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 उपभोक्ताओं को बेहतर सुरक्षा प्रदान करता है। अधिनियम का उद्देश्य उपभोक्ताओं की शिकायतों का सरल, त्वरित और सस्ता समाधान प्रदान करना और जहां उपयुक्त पाया जाए राहत और मुआवजा दिलाना हैं। फ़रवरी 2011 समान पारिश्रमिक अधिनियम 1976 महिलाओं और पुरुषों दोनों को समान कार्य के लिए समान वेतन प्रदान करता है। http://www।indialawinfo।com/bareacts/equal।html Equal Remuneration Act, 1976 IndianLawInfo।com 2006-06-29जून 2020 InternetArchiveBot सम्पूर्ण ग्रामीण रोजगार योजना (यूनिवर्सल ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम) 2001 में ग्रामीण गरीबों को लाभदायक रोजगार प्रदान करने के उद्देश्य से शुरू किया गया था। कार्यक्रम पंचायती राज संस्थाओं के माध्यम से कार्यान्वित किया गया था। http://rural.nic.in/book01-02/ch-2.pdf Sampoorna Grameen Rozgar Yojana, 2001 PDF Ministry of Rural Development, भारत 2006-06-29 4 मार्च 2009 https://web.archive.org/web/20090304204508/http://rural.nic.in/book01-02/ch-2.pdf bot: unknown निर्वाचित ग्राम परिषदों का एक तंत्र पंचायती राज के नाम से जाना जाता है, यह लगभग भारत के सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में लागू है। http://www।empowerpoor।org/backgrounder।asp?report=164 Panchayati Raj in India Poorest Areas Civil Society 2006-06-29जून 2020 InternetArchiveBot पंचायती राज में प्रत्येक स्तर पर कुल सीटों की संख्या की एक तिहाई महिलाओं के लिए आरक्षित की गई हैं, बिहार के मामले में आधी सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हैं।73वीं अमेंडमेंट एक्ट, 1992जून 2020 InternetArchiveBot । http://www।newpaltz।edu/asianstudies/nycas/2004%20UG%20Ryan%20Prise%20Alexandra%20Geertz.pdf Seat Reservation for Women in Local Panchayats PDF 2 2006-06-29 सितम्बर 2010 H3llBot जम्मू एवं काश्मीर तथा नागालैंड को छोड़ कर सभी राज्यों और प्रदेशों में न्यायपालिका को कार्यपालिका से अलग कर दिया गया है। भारत की विदेश नीति निदेशक सिद्धांतों से प्रभावित है। भारतीय सेना द्वारा संयुक्त राष्ट्र के शांति कायम करने के 37 अभियानों में भाग लेकर भारत ने संयुक्त राष्ट्र संघ के शांति प्रयासों में सहयोग दिया है। http://www।un।int/india/india_and_the_un_pkeeping।html India and संयुक्त राष्ट्र Permanent Mission of India to the संयुक्त राष्ट्र 2006-06-29जून 2020 InternetArchiveBot सभी नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता का कार्यान्वयन राजनैतिक दलों और विभिन्न धार्मिक समूहों के बड़े पैमाने पर विरोध के कारण हासिल नहीं किया जा सका है। शाह बानो मामले (1985-1986) ने भारत में एक राजनीतिक तूफान भड़का दिया था जब सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि एक मुस्लिम महिला शाह बानो जिसे 1978 में उसके पति द्वारा तलाक दे दिया गया था, सभी महिलाओं के लिए लागू भारतीय विधि के अनुसार अपने पूर्व पति से गुजारा भत्ता प्राप्त करने की हकदार थी। इस फैसले ने मुस्लिम समुदाय में नाराजगी पैदा कर दी जिसने मुस्लिम पर्सनल लॉ लागू करने की मांग की और प्रतिक्रिया में संसद ने सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को उलटते हुए मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकार संरक्षण) अधिनियम 1986 पारित कर दिया। http://www।hinduonnet।com/thehindu/2003/08/10/stories/2003081000221500।htm Shah Bano legacy 1 2006-09-11जून 2020 InternetArchiveBot इस अधिनियम ने आगे आक्रोश भड़काया, न्यायविदों, आलोचकों और नेताओं ने आरोप लगाया कि धर्म या लिंग के बावजूद सभी नागरिकों के लिए समानता के मूल अधिकार की विशिष्ट धार्मिक समुदाय के हितों की रक्षा करने के लिए अवहेलना की गई थी। फैसला और कानून आज भी गरम बहस के स्रोत बने हुए हैं, अनेक लोग इसे मूल अधिकारों के कमजोर कार्यान्वयन का एक प्रमुख उदाहरण बताते हैं। मूल अधिकारों, निदेशक सिद्धांतों और मौलिक कर्तव्यों के बीच संबंध निदेशक सिद्धांतों को मूल अधिकारों के साथ विवाद की स्थिति में कानून की संवैधानिक वैधता को बनाए रखने के लिए इस्तेमाल किया गया है। 1971 में 25वें संशोधन द्वारा जोड़े गए अनुच्छेद 31सी में प्रावधान है कि अनुच्छेद 39(बी)-(सी) में निदेशक सिद्धांतों को प्रभावी बनाने के लिए बनाया गया कोई भी कानून इस आधार पर अवैध नहीं होगा कि वे अनुच्छेद 14, 19 और 31 द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारों से अवमूल्यित हैं। 1976 में 42वें संशोधन द्वारा इस अनुच्छेद का सभी निदेशक सिद्धांतों पर विस्तार किया गया था लेकिन ने इस विस्तार को शून्य घोषित कर दिया क्योंकि इससे संविधान के बुनियादी ढांचे में परिवर्तन होता था।Basu 1993 142 मूल अधिकार और निदेशक सिद्धांत दोनों का संयुक्त इस्तेमाल सामाजिक कल्याण के लिए कानूनों का आधार बनाने में किया गया है।hindiAustin 1999 114–115 केशवानंद भारती मामले में फैसले के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने यह दृष्टिकोण अपना लिया है कि मूल अधिकार और निदेशक सिद्धांत एक दूसरे के पूरक हैं, दोनों एक कल्याणकारी राज्य बनाने के लिए सामाजिक क्रांति के एक ही लक्ष्य के लिए कार्य करते हैं।Basu 2003 444 इसी प्रकार, सर्वोच्च न्यायालय ने मौलिक कर्तव्यों का प्रयोग मौलिक कर्तव्यों में दिए गए उद्देश्यों को प्रोत्साहित करने वाले कानूनों की संवैधानिक वैधता बनाए रखने के लिए किया है।Basu 2003 466 इन कर्तव्यों को सभी नागरिकों के लिए अनिवार्य ठहराया गया है, बशर्ते राज्य द्वारा उनका प्रवर्तन एक वैध कानून के द्वारा किया जाए। सर्वोच्च न्यायालय ने एक नागरिक को अपने कर्तव्य के उचित पालन के लिए प्रभावी और सक्षम बनाने हेतु प्रावधान करने की दृष्टि से राज्य को इस संबंध में निदेश जारी किए हैं। इन्हें भी देखें राज्य के नीति निर्देशक तत्व भारत में मानवाधिकार संवैधानिक अर्थशास्त्र आधारभूत लक्षण का सिद्धान्त समान नागरिक संहिता भारतीय कानून में प्रादेश उच्चतम क़ानून के अनुसार शासन टिप्पणी "note" According to Articles 12 and 36, the term State, for the purposes of the chapters on Fundamental Rights and Directive Principles, includes all authorities within the territory of India. It includes the भारत सरकार, the Parliament of India, the Government and legislature of the states of India. It also includes all local or other authorities such as Municipal Corporations, Municipal Boards, District Boards, Panchayats etc. To avoid confusion with the term states, the administrative divisions, State (encompassing all the authorities in India) has been capitalized and the term state is in lowercase. The right to property is still a Constitutionally recognised right, but is now contained outside the Part on Fundamental Rights, in Article 300A which states: No person shall be deprived of his property save by authority of law. According to Article 13, The State shall not make any law which takes away or abridges the rights conferred by this Part and any law made in contravention of this clause shall, to the extent of the contravention, be void. The term law has been defined to include not only legislation made by Parliament and the legislatures of the states, but also ordinances, rules, regulations, bye laws, notifications, or customs having the force of law. His Holiness Kesavananda Bharati v. State of Kerala, AIR 1973 SC 1461. This was popularly known as the Fundamental Rights Case. Article 14 states: The State shall not deny to any person equality before the law or the equal protection of the laws within the territory of India. Article 21 states: No person shall be deprived of his life or personal liberty except according to procedure established by law. पादटिप्पणी 30em सन्दर्भ The Indian Constitution: Cornerstone of a Nation https://archive.org/details/nlsiu.342.5402.aus-4.14208 Austin Granville Granville Austin 1999 Oxford University Press नई दिल्ली 0-19-564959-1 390 harv Introduction to the Constitution of India Basu Durga Das 1993 15th नई दिल्ली Prentice Hall of India 81-203-0839-5 475 harv Shorter Constitution of India Basu Durga Das 2003 13th Nagpur Wadhwa & Co 978-81-8038-206-2 1972 harv आगे पढ़ें http://www।worldlii।org/int/cases/ICHRL/1995/69।html Bodhisattwa Gautam vs। Subhra Chakraborty; 1995 ICHRL 69 World Legal Information Institute 2006-05-25जून 2020 InternetArchiveBot शासन करने की तिथि 15 दिसम्बर 1995 Laski Harold Joseph Harold Laski 1930 Liberty in the Modern State https://archive.org/details/libertyinmoderns0000haro New York and London Harpers and Brothers मेनका गांधी वर्सेस यूनियन ऑफ़ इंडिया, एयर (AIR) 1978 एस। सी। 597, (1978)। Pylee M।V। 1999 India’s constitution नई दिल्ली S। Chand and Company ISBN 81-219-1907-X O'Flaharty W।D। J।D।M। Derrett 1981 The Concept of Duty in Asia; African Charter on Human and People's Right of 1981 युनिवर्सल डिक्लेरेशन ऑफ़ ह्युमन राइट्स एंड इंटरनैशनल कोवेनैंट ऑन सिविल एंड पॉलिटिकल राइट्स का लेख 29। बाहरी कड़ियाँ left|50px इस लेख से सम्बंधित विकीसोर्स के पास मूल पाठ हैं: फंडामेंटल राइट्स ''डाइरेक्टिव प्रिंसिपल्स औरफंडामेंटल ड्युटिज़'' श्रेणी:भारत का संविधान श्रेणी:मानवाधिकार श्रेणी:गूगल परियोजना