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411 समाचार
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पद्मिनी

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पद्मिनी (बहुविकल्पी) पद्मावती 2017 की हिंदी फ़िल्म पद्मावती (फ़िल्म) मेवाड़ की रानी 22Princess Padmavati ca. 1765 Bibliothèque nationale de France, Paris.jpg पद्मिनी की 18वीं शताब्दी की चित्रकला रत्नसिंह गंधर्वसेन चंपावती हिन्दू धर्म गुहिल (विवाह से)सिंहल (जन्म से)सिंगोली (अमर काव्य वंशावली के अनुसार)Ram Vallabh Somani 1976 102 पद्मावती या पद्मिनी चित्तौड़ के राजा रत्नसिंह (रतनसेन) [1302-1303 ई०] की रानी थी। यह एक राजपूत रानी थी https://theprint.in/opinion/padmavati-left-liberals-trapped-catch-22-situation/17398/ On Padmavati, Left-liberals are trapped in a catch-22 situation 25 नवंबर 2017 https://web.archive.org/web/20171201035716/https://theprint.in/2017/11/21/padmavati-left-liberals-trapped-catch-22-situation/amp/ 1 दिसंबर 2017 dead और इनका ऐतिहासिक अस्तित्व तो प्रायः इतिहासकारों द्वारा काल्पनिक स्वीकार कर लिया गया है।http://indiatoday.intoday.in/story/padmavati-sanjay-leela-bhansali-alauddin-khilji-karni-sena-jauhar/1/869359.html संग्रहीत प्रति 29 नवंबर 2017 https://web.archive.org/web/20171128190838/http://indiatoday.intoday.in/story/padmavati-sanjay-leela-bhansali-alauddin-khilji-karni-sena-jauhar/1/869359.html 28 नवंबर 2017 live इस नाम का मुख्य स्रोत मलिक मुहम्मद जायसी कृत 'पद्मावत' नामक महाकाव्य है।http://www.bbc.com/hindi/india-42080687 कहाँ से आई थीं पद्मावती? 22 नवंबर 2017 https://web.archive.org/web/20171125053856/http://www.bbc.com/hindi/india-42080687 25 नवंबर 2017 live अन्य जिस किसी ऐतिहासिक स्रोतों या ग्रंथों में 'पद्मावती' या 'पद्मिनी' का वर्णन हुआ है वे सभी 'पद्मावत' के परवर्ती हैं।https://aajtak.intoday.in/story/the-padmini-mystique-1-967503.html आवरण कथाः पद्मावती का मिथक और यथार्थ 30 नवंबर 2017 https://web.archive.org/web/20171201043236/https://aajtak.intoday.in/story/the-padmini-mystique-1-967503.html 1 दिसंबर 2017 livehttps://khabar.ndtv.com/news/bollywood/padmavati-story-incomplete-without-chittor-warriors-gora-and-badal-1780793 Padmavati: चित्तौड़ के इन दो योद्धाओं के बिना अधूरी है रानी पद्मावती की कहानी 30 नवंबर 2017 https://web.archive.org/web/20171201034149/https://khabar.ndtv.com/news/bollywood/padmavati-story-incomplete-without-chittor-warriors-gora-and-badal-1780793 1 दिसंबर 2017 dead नाम 'पद्मिनी' या 'पद्मावती' ? इतिहास ग्रंथों में अधिकतर 'पद्मिनी' नाम स्वीकार किया गया है, जबकि जायसी ने स्पष्ट रूप से 'पद्मावती' नाम स्वीकार किया है। जायसी के वर्णन से स्पष्ट होता है कि 'पद्मिनी' से उनका भी तात्पर्य स्त्रियों की उच्चतम कोटि से ही है। जायसी ने स्पष्ट लिखा है कि राजा गंधर्वसेन की सोलह हजार पद्मिनी रानियाँ थींजायसी-ग्रंथावली, माताप्रसाद गुप्त, हिंदुस्तानी एकेडमी, इलाहाबाद, संस्करण-2011, पद-49, पृष्ठ-152; तथा 'पद्मावत' (मूल और संजीवनी व्याख्या) वासुदेवशरण अग्रवाल, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, संस्करण-2013, पृष्ठ-49-50., जिनमें सर्वश्रेष्ठ रानी चंपावती थी, जो कि पटरानी थी। इसी चंपावती के गर्भ से पद्मावती का जन्म हुआ था।पूर्ववत, पद-50-51; तथा 'पद्मावत' (मूल और संजीवनी व्याख्या) वासुदेवशरण अग्रवाल, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, संस्करण-2013, पृष्ठ-50-52(भूमिकादि के बाद). इस प्रकार कथा के प्राथमिक स्रोत में ही स्पष्ट रूप से 'पद्मावती' नाम ही स्वीकृत हुआ है। काव्य/किंवदंतियों के अनुसार कथा जायसी के अनुसार पद्मावती सिंहल द्वीपजायसी-ग्रंथावली, माताप्रसाद गुप्त, हिंदुस्तानी एकेडेमी, इलाहाबाद, संस्करण-2011, पद-25, पृष्ठ-136. के राजा गंधर्वसेनपूर्ववत्, पद-26, पृ०-137; तथा 'पद्मावत' (मूल और संजीवनी व्याख्या) वासुदेवशरण अग्रवाल, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, संस्करण-2013, पृष्ठ-26(भूमिकादि के बाद). की पुत्री थी और चित्तौड़ के राजा रतन सिंह योगी के वेश में वहाँ जाकर अनेक वर्षों के प्रयत्न के पश्चात उसके साथ विवाह कर के उन्हे चित्तौड़ ले आये थे। वह अद्वितीय सुन्दरी थी और रतनसेन के द्वारा निरादृत कवि-पंडित-तांत्रिक राघव चेतनपद्मावत, पूर्ववत्, पद-446से448. के द्वारा उनके रूप का वर्णन सुनकर दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़गढ़ पर आक्रमण कर दिया था। 8 माह के युद्ध के बाद भी अलाउद्दीन खिलजी चित्तौड़ पर विजय प्राप्त नहीं कर सका तो लौट गया और दूसरी बार आक्रमण करके उस ने छल से राजा रतनसिंह को बंदी बनाया और उन्हे लौटाने की शर्त के रूप में पद्मावती को मांगा। तब पद्मावती की ओर से भी छल का सहारा लिया गया और गोरा-बादल की सहायता से अनेक वीरों के साथ वेश बदलकर पालकियों में पद्मावती की सखियों के रूप में जाकर राजा रतनसिंह को मुक्त कराया गया। परंतु इस छल का पता चलते ही अलाउद्दीन खिलजी ने प्रबल आक्रमण किया, जिसमें दिल्ली गये प्रायः सारे राजपूत योद्धा मारे गये। राजा रतन सिंह चित्तौड़ लौटे परंतु यहाँ आते ही उन्हें कुंभलनेर पर आक्रमण करना पड़ा और कुंभलनेर के शासक देवपाल के साथ युद्ध में देवपाल मारा गया परंतु राजा रतन सिंह भी अत्यधिक घायल होकर चित्तौड़ लौटे और स्वर्ग सिधार गये। इतिहास में भ्रांतियों का मिश्रण कर्नल टॉड ने अपने राजस्थान के इतिहास में जायसी के उक्त कथानक में कुछ हेर-फेर के साथ प्रायः उसी कहानी को दोहराया है। मुख्यतः भाटों की कथाओं के आधार पर लिखने के कारण कर्नल टॉड का वर्णन ऐतिहासिक बहुत कम रह गया है। उन्होंने राजा रत्नसिंह या रतनसेन के बदले भीमसी (भीमसिंह) का नाम दिया है और वह भी वस्तुतः राणा नहीं बल्कि राणा लखमसी (लक्ष्मण सिंह) के चाचा थे जो कि लक्ष्मण सिंह के बच्चे होने के कारण शासन संभाल रहे थे। कर्नल टॉड ने लक्ष्मण सिंह और उसके संरक्षक के रूप में भीमसिंह के शासन का आरंभ 1275 ईस्वी में माना है; जबकि यह सर्वज्ञात बात है कि अलाउद्दीन खिलजी का आक्रमण 1303 ईस्वी में हुआ था। इसी प्रकार कर्नल टॉड ने पद्मिनी को सिंहल द्वीप के चौहान वंशी हमीर शंख की लड़की बतलाया है। इन परिवर्तनों के सिवा शेष कहानी अपवादों को छोड़कर प्रायः पद्मावत वाली ही है।कर्नल टॉड कृत राजस्थान का इतिहास, अनुवादक-केशव ठाकुर, साहित्यागार, जयपुर, संस्करण-2008, पृष्ठ-132 से 36. 14 वीं और 16 वीं शताब्दी के बीच जैन ग्रंथ- नबीनंदन जेनुधर, चितई चरित्रा और रायन सेहरा ने रानी पद्मिनी का उल्लेख किया है।https://timesofindia.indiatimes.com/city/jaipur/khilji-did-not-attack-chittor-for-padmini/articleshow/57154581.cms “Khilji did not attack Chittor for Padmini” 25 अप्रैल 2018 https://web.archive.org/web/20181101150212/https://timesofindia.indiatimes.com/city/jaipur/khilji-did-not-attack-chittor-for-padmini/articleshow/57154581.cms 1 नवंबर 2018 live तेजपाल सिंह धामा ने अपने चर्चित शोधपरक उपन्यास अग्नि की लपटें में इन्हें जाफना से प्रकाशित ग्रंथों के आधार पर श्रीलंका की राजकुमारी सिद्ध किया है। http://punjabkesari.com/other/why-is-so-angry-at-the-people-of-the-story-of-rani-padmavati/ संग्रहीत प्रति 8 मई 2018 https://web.archive.org/web/20180508185725/http://punjabkesari.com/other/why-is-so-angry-at-the-people-of-the-story-of-rani-padmavati/ 8 मई 2018 dead http://indiagatenews.com/indiagatese-17-11-17-padmini-film संग्रहीत प्रति 8 मई 2018 18 सितंबर 2020 https://web.archive.org/web/20200918231235/http://indiagatenews.com/indiagatese-17-11-17-padmini-film dead http://www.opinionpost.in/padmavati-history-myths-and-controversy-17029-2/ https://www.google.co.in/search?q=tejpal+singh+dhama+padmavati&ei=Z5PxWpT7BcLxvASz-4qQBw&start=20&sa=N&biw=931&bih=602इनकी कहानी जायसी के पद्मावत से थोड़ी अलग है। ऐतिहासिक प्रमाण right|thumb|200px|रानी पद्मिनी का कथित शैल-चित्र, बिरला मंदिर, दिल्ली में रानी पद्मिनी, राजा रत्नसिंह तथा अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण को लेकर इतिहासकारों के बीच काफी पहले से पर्याप्त मंथन हो चुका है।https://www.livemint.com/Sundayapp/diEHiKRTtaXp3Cjalpv3JJ/A-tale-of-two-legends-Padmavat-and-DodoChanesar.html A tale of two legends: Padmavat and Dodo-Chanesar 10 सितंबर 2018 https://web.archive.org/web/20180911002515/https://www.livemint.com/Sundayapp/diEHiKRTtaXp3Cjalpv3JJ/A-tale-of-two-legends-Padmavat-and-DodoChanesar.html 11 सितंबर 2018 live इस संदर्भ में सर्वाधिक उद्धृत तथा प्रमाणभूत महामहोपाध्याय रायबहादुर गौरीशंकर हीराचंद ओझा का मत माना गया है। ओझा जी ने पद्मावत की कथा के संदर्भ में स्पष्ट लिखा है कि "इतिहास के अभाव में लोगों ने पद्मावत को ऐतिहासिक पुस्तक मान लिया, परंतु वास्तव में वह आजकल के ऐतिहासिक उपन्यासों की सी कविताबद्ध कथा है, जिसका कलेवर इन ऐतिहासिक बातों पर रचा गया है कि रतनसेन (रत्नसिंह) चित्तौड़ का राजा, पद्मिनी या पद्मावती उसकी राणी और अलाउद्दीन दिल्ली का सुल्तान था, जिसने रतनसेन (रत्नसिंह) से लड़कर चित्तौड़ का किला छीना था। बहुधा अन्य सब बातें कथा को रोचक बनाने के लिए कल्पित खड़ी की गई है; क्योंकि रत्नसिंह एक बरस भी राज्य करने नहीं पाया, ऐसी दशा में योगी बन कर उस की सिंहलद्वीप (लंका) तक जाना और वहाँ की राजकुमारी को ब्याह लाना कैसे संभव हो सकता है। उसके समय सिंहलद्वीप का राजा गंधर्वसेन नहीं किन्तु राजा कीर्तिनिश्शंक देव पराक्रमबाहु (चौथा) या भुवनेक बाहु (तीसरा) होना चाहिए। सिंहलद्वीप में गंधर्वसेन नाम का कोई राजा ही नहीं हुआ। उस समय तक कुंभलनेर (कुंभलगढ़) आबाद भी नहीं हुआ था, तो देवपाल वहाँ का राजा कैसे माना जाय ? अलाउद्दीन ८ बरस तक चित्तौड़ के लिए लड़ने के बाद निराश होकर दिल्ली को नहीं लौटा किंतु अनुमान छः महीने लड़ कर उसने चित्तौड़ ले लिया था, वह एक ही बार चित्तौड़ पर चढ़ा था, इसलिए दूसरी बार आने की कथा कल्पित ही है।"'राजपूताने का इतिहास', पहली जिल्द, रायबहादुर गौरीशंकर हीराचंद ओझा, वैदिक यंत्रालय अजमेर, संस्करण-1927 ई०, पृ०-491-92. तथा 'उदयपुर राज्य का इतिहास' भाग-1, राजस्थानी ग्रंथागार, जोधपुर, द्वितीय संस्करण-1999, पृ०-187-88. इस प्रकार यह स्पष्ट हो जाता है कि जायसी रचित पद्मावत महाकाव्य की कथा में ऐतिहासिकता ढूँढना बहुत हद तक निरर्थक ही है। कुछ नाम ऐतिहासिक अवश्य हैं, परंतु घटनाएं अधिकांशतः कल्पित ही हैं। कुछ घटनाएँ जो ऐतिहासिक हैं भी उनका संबंध 1303 ईस्वी से न होकर 1531 ईस्वी से है।पद्मावत का अनुशीलन, इन्द्रचन्द्र नारंग, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, संस्करण-1999, पृष्ठ-352. इसी प्रकार कर्नल टॉड का वर्णन भी काफी हद तक अनैतिहासिक ही है। इस संदर्भ में ओझा जी का स्पष्ट कथन है कि "कर्नल टॉड ने यह कथा विशेषकर मेवाड़ के भाटों के आधार पर लिखी है और भाटों ने उसको 'पद्मावत' से लिया है। भाटों की पुस्तकों में समर सिंह के पीछे रत्नसिंह का नाम न होने से टाड ने पद्मिनी का संबंध भीमसिंह से मिलाया और उसे लखमसी (लक्ष्मणसिंह) के समय की घटना मान ली। ऐसे ही भाटों के कथनानुसार टाड ने लखमसी का बालक और मेवाड़ का राजा होना भी लिख दिया, परन्तु लखमसी न तो मेवाड़ का कभी राजा हुआ और न बालक था, किंतु सिसोदे का सामंत (सरदार) था और उस समय वृद्धावस्था को पहुंच चुका था, क्योंकि वह अपने सात पुत्रों सहित अपना नमक अदा करने के लिए रत्नसिंह की सेना का मुखिया बनकर अलाउद्दीन के साथ की लड़ाई में लड़ते हुए मारा गया था, जैसा कि विक्रम संवत १५१७ (ई० स० १४६०) के कुंभलगढ़ के शिलालेख से ऊपर बतलाया गया है। इसी तरह भीमसी (भीमसिंह) लखमसी (लक्ष्मणसिंह) का चाचा नहीं, किन्तु दादा था, जैसा कि राणा कुंभकर्ण के समय के 'एकलिंगमाहात्म्य' में पाया जाता है। ऐसी दशा में टाड का कथन भी विश्वास के योग्य नहीं हो सकता। 'पद्मावत', 'तारीख़ फिरिश्ता' और टाड के राजस्थान के लेखों की यदि कोई जड़ है तो केवल यही कि अलाउद्दीन ने चित्तौड़ पर चढ़ाई कर छः मास के घेरे के अनंतर उसे विजय किया; वहाँ का राजा रत्नसिंह इस लड़ाई में लक्ष्मणसिंह आदि कई सामंतो सहित मारा गया, उसकी राणी पद्मिनी ने कई स्त्रियों सहित जौहर की अग्नि में प्राणाहुति दी; इस प्रकार चित्तौड़ पर थोड़े-से समय के लिए मुसलमानों का अधिकार हो गया। बाकी बहुधा सब बातें कल्पना से खड़ी की गई है।"'राजपूताने का इतिहास', पहली जिल्द, रायबहादुर गौरीशंकर हीराचंद ओझा, वैदिक यंत्रालय अजमेर, संस्करण-1927 ई०, पृ०-494-95. तथा 'उदयपुर राज्य का इतिहास' भाग-1, राजस्थानी ग्रंथागार, जोधपुर, द्वितीय संस्करण-1999, पृ०-190-91. यह इमारत पद्मिनी का महल बताया गया है, परंतु यह अपेक्षाकृत एक आधुनिक इमारत है।Shiri Ram Bakshi 2008 182|thumb|left ओझा जी के बहु उद्धृत उपर्युक्त मत को प्रायः सभी इतिहासकारों ने स्वीकार किया है। डॉ० लाल ने भी अपनी पुस्तक 'History of the Khaljis, में लिखा है कि कहानी के परंपरागत वर्णन को ताक पर रखने के पश्चात् नग्न सत्य यह है कि सुल्तान अलाउद्दीन ने 1303 ईस्वी में चित्तौड़ पर आक्रमण किया और आठ माह के विकट संघर्ष के पश्चात् उसे अधिकृत कर लिया। वीर राजपूत योद्धा आक्रांताओं से युद्ध करते हुए खेत रहे और वीर राजपूत स्त्रियाँ जौहर की ज्वालाओं में समाधिस्थ हो गयीं। जो स्त्रियाँ समाधिस्थ हुईं, उनमें संभवतः रत्नसिंह की एक रानी भी थी, जिसका नाम पद्मिनी था। इन तथ्यों के अतिरिक्त और सब कुछ एक साहित्यिक संरचना है और उसके लिए ऐतिहासिक समर्थन नहीं है।Dr.K.S.Lal, History of the Khaljis, The Indian press LTD, Allahabad, Ed.1950, p.129-130.(pdf- https://archive.org/details/2015.98691.HistoryOfTheKhaljis12901320) इसी प्रकार का मत डॉ० एस० एल० नागोरी एवं जीतेश नागोरी का भी है।भारतीय इतिहास कोश, डॉ० एस० एल० नागोरी एवं जीतेश नागोरी, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, जयपुर, संस्करण-2005, पृष्ठ-231. यह चित्तौड़ का प्रथम शाका माना गया है। कहा जाता है कि खिलजी ने किले पर अपनी विजय पताका फहराकर वहाँ के 30,000 नागरिकों को मौत के घाट उतारा।राजस्थान का इतिहास, बी०एल० पानगड़िया, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, जयपुर, संस्करण-1996, पृष्ठ-15. अनेक इतिहासकारों ने पद्मिनी के नाम तथा अस्तित्व दोनों को अस्वीकारा है; परंतु पर्याप्त विचार के बाद डॉ० आशीर्वादीलाल श्रीवास्तवदिल्ली सल्तनत, आशीर्वाद लाल श्रीवास्तव, शिवलाल अग्रवाल एंड कंपनी, आगरा, पृष्ठ-156-157. तथा डॉ० गोपीनाथ शर्मा जैसे अनेक इतिहासकारों ने कहानी की बहुत सी बातों को अप्रामाणिक मानते हुए भी पद्मिनी के अस्तित्व को स्वीकृत किया है, जैसा कि ओझा जी के भी उपर्युक्त मत में व्यक्त हुआ है। डॉ० गोपीनाथ शर्मा ने लिखा है कि "हमारे विचार से यह मानना की पद्मिनी की कथा परंपरा जायसी के पद्मावत से आरंभ होती है वह सर्वथा भ्रम है। छिताईचरित में जो जायसी से कई वर्षों पूर्व लिखा गया था, पद्मिनी तथा अलाउद्दीन के चित्तौड़ आक्रमण का वर्णन है। हेमरतन के गोरा-बादल चौपाई में; तथा लब्धोदय के पद्मिनी चरित्र में इस कथा को स्वतंत्र रूप से लिखा गया है।... यह कथा एक राजपूत प्रणाली के अनुरूप विशुद्ध तथा स्वस्थ परंपरा के रूप में चली आयी है उसे सहज में अस्वीकार करना ठीक नहीं। हो सकता है कि कई बातें पाठ भेद से तथा वर्णन शैली से विभिन्न रूप में प्रचलित रही हों, किन्तु उनका आधार सत्य से हटकर नहीं ढूँढा जा सकता। स्थापत्य इस बात का साक्षी है कि चित्तौड़ में पद्मिनी के महल हैं और पद्मिनी ताल है जो आज भी उस विस्तृत तथा विवादग्रस्त महिला की याद दिला रहे हैं। पद्मिनी के संबंध में दी गयी सभी घटनाएँ सम्भवतः सत्य की कसौटी पर ठीक नहीं उतरें, किन्तु पद्मिनी की विद्यमानता, आक्रमण के समय उसकी सूझबूझ, उसके द्वारा जौहर व्रत का नेतृत्व आदि घटनाओं का एक स्वतंत्र महत्व है।"राजस्थान का इतिहास, डॉ० गोपीनाथ शर्मा, शिवलाल अग्रवाल एंड कंपनी, आगरा, पृष्ठ-172. वस्तुतः अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण एवं युद्ध का प्रमुख कारण अलाउद्दीन की साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षा एवं चित्तौड़ की सैनिक एवं व्यापारिक उपयोगिता थी। गुजरात, मालवा, मध्य प्रदेश, संयुक्त प्रांत, सिन्ध आदि भागों के व्यापारिक मार्ग चित्तौड़ से होकर गुजरते थे।राजस्थान : इतिहास एवं संस्कृति एन्साइक्लपीडिया, डॉ० हुकम चन्द जैन एवं नारायण माली, जैन प्रकाशन मंदिर, जयपुर, संस्करण-2010, पृष्ठ-413. स्वाभाविक है कि अलाउद्दीन खिलजी जैसा सुल्तान ऐसे क्षेत्र पर अवश्य अधिकार प्राप्त करना चाहता। इसमें कोई संदेह नहीं कि चित्तौड़ आक्रमण के लिए अलाउद्दीन का प्रमुख आशय राजनीतिक था, परंतु जब पद्मिनी की सुंदरता का हाल उसे मालूम हुआ तो उसको लेने की उत्कंठा उसमें अधिक तीव्र हो गयी।राजस्थान का इतिहास, डॉ० गोपीनाथ शर्मा, शिवलाल अग्रवाल एंड कंपनी, आगरा, पृष्ठ-174. चित्र दीर्घा 250 4 File:Jallandharnath and the Princess Padmini fly over King Padam's palace, folio from the Suraj Prakash, Amardas Bhatti, 1830 (Samvat 1887).jpg जलंधरनाथ एवं कुमारी पद्म्मिनी राजा पदम सिंह के महल पर उड़ते हुए, सूरज अमरदास भट्टी १८३० (संवत १८८७) के चित्र में चित्रित File:Queen Nagamati talks to her parrot, Padmavat, c1750.jpg बोलहु सुआ पियारे-नाहाँ। मोरे रूप कोइ जग माहाँ ?सुमिरि रूप पदमावति केरा। हँसा सुआ, रानी मुख हेरा ॥(नागमती-सुवा-संवाद-खंड)पद्मावत की पाण्डुलिपि, सं.१७५० इन्हें भी देखें रत्नसिंह कृष्णा कुमारी रानी कर्णवती मस्तानी सन्दर्भ 2 बाहरी कड़ियाँ Rani Padmini NCERT श्रेणी:राजपूत श्रेणी:राजस्थान के लोग श्रेणी:वीरांगनाएं श्रेणी:राजस्थान का इतिहास श्रेणी:मेवाड़