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बस्ती जिला
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बस्ती जनपदBasti district India Uttar Pradesh districts 2012 Basti.svg बस्ती, उत्तर प्रदेश 2,688 24,64,464 2011 917 तहसील 4 अवधी
बस्ती जनपद भारत के उत्तर प्रदेश राज्य का एक जनपद है। ज़िले का मुख्यालय बस्ती है।https://books.google.com/books?id=qzUqk7TWF4wC Uttar Pradesh in Statistics 1987 APH Publishing 978-81-7024-071-6 enhttps://books.google.com/books?id=S46rbUL6GrMC Political Process in Uttar Pradesh: Identity, Economic Reforms, and Governance Pai Sudha 2007 Pearson Education India 978-81-317-0797-5 en https://web.archive.org/web/20170423083533/https://books.google.com/books?id=S46rbUL6GrMC 2017-04-23 इसे वसिष्ठ नगर भी कह सकते हैं ये रघुकुल घराने के गुरु के नाम पे सुशोभित है।
नाम की उत्पत्ति
अप्रैल 2020
प्राचीन काल में बस्ती मूलतः वशिष्ठी के नाम से जाना जाता था। इस क्षेत्र के वशिष्ठी नाम की उत्पत्ति ऋषि वशिष्ठ जी के नाम से हुयी, जो भगवान श्रीरामचन्द्र जी के कुलगुरु थे और उनका आश्रम यहां पर था। यही वशिष्ठी नाम ही लोगों द्वारा उच्चारण में गलत होते हुए अन्ततः "बस्ती" हो गया।
इतिहास
अप्रैल 2020
काल
बहुत प्राचीन काल में बस्ती के आसपास का जगह कौशल देश का हिस्सा था। शतपथ ब्राह्मण अपने सूत्र में कौशल का उल्लेख किया हैं, यह एक वैदिक आर्यों और वैयाकरण पाणिनी का देश था। भगवान श्रीरामचन्द्र जी राजा दशरथ के ज्येष्ठ पुत्र थे, जिनकी महिमा का केन्द्र कौशल राज्य था। उन्हें एक आदर्श राज्य की स्थापना का श्रेय जाता है, जिसे सभी द्वारा "राम-राज्य" कहकर हृदयतल पर अंकित रखा गया। परंपरा के अनुसार, श्रीरामचन्द्र जी के बड़े बेटे कुश कौशल के सिंहासन पर बैठे, जबकि छोटे बेटे लव को राज्य के उत्तरी भाग का शासक बनाया गया, जिसकी राजधानी श्रावस्ती थी। सम्राट इक्ष्वाकु से 93वीं पीढ़ी और श्रीरामचन्द्र जी से 30वीं पीढ़ी में बृहद्वल था, यह इक्ष्वाकु शासन का अंतिम प्रसिद्ध राजा था, जो महान महाभारत युद्ध में चक्रव्यूह में मारा गया था।
छठी शताब्दी ई. में गुप्त शासन की गिरावट के साथ बस्ती भी धीरे - धीरे उजाड़ हो गया। इस समय एक नए राजवंश मौखरी हुआ, जिसकी राजधानी कन्नौज था। जो उत्तरी भारत के राजनैतिक नक्शे पर एक महत्वपूर्ण स्थान ग्रहण किया और इसी राज्य में मौजूद जिला बस्ती भी शामिल था।
9वीं शताब्दी ई. की शुरुआत में, गुजॅर प्रतिहार राजा नागभट्ट द्वितीय ने अयोध्या से कन्नौज शासन को उखाड़ फेंका और यह शहर उनके नये बनते शासन का राजधानी बना, जो राजा मिहिरभोज 1 (836 - 885 ई.) के समय में बहुत उँचाई पर था। राजा महिपाल के शासनकाल के दौरान, कन्नौज के सत्ता में गिरावट शुरू हो गई थी और अवध छोटा छोटे हिस्सों में विभाजित हो गया था लेकिन उन सभी को अंततः नये उभरते शक्ति कन्नौज के गढवाल राजा जय् चंद्र (1170-1194 ई.) मिले। यह वंश के अंतिम महत्वपूर्ण शासक थे जो हमलावर सेना मुहम्मद गौर के खिलाफ चँद॔वार की लड़ाई (इटावा के पास) में मारा गये थे उनकी मृत्यु के तुरंत बाद कन्नौज तुर्कों के कब्जे में चला गया।
किंवदंतियों के अनुसार, सदियों से बस्ती एक जंगल था और अवध की अधिक से अधिक भाग पर राजभरो कब्जा था। राजभरो के मूल और इतिहास के बारे में कोई निश्चित प्रमाण शीघ्र उपलब्ध नहीं में व्यापक भारशिव (राजभरो)के राज्य के सबूत के रूप में प्राचीन ईंट इमारतों के खंडहर लोकप्रिय है जो जिले के कई गांवों में बहुतायत संख्या में फैले है।
मध्ययुगीन काल
अप्रैल 2020
13वीं सदी की शुरुआत में, 1225 में इल्तुतमिश का बड़ा बेटा, नासिर-उद-दीन महमूद, अवध के गवर्नर बन गया और इसने भर लोगो के सभी प्रतिरोधो को पूरी तरह कुचल डाला। 1323 में, गयासुद्दीन तुगलक बंगाल जाने के लिए बेहराइच और गोंडा के रास्ते गया शायद वह जिला बस्ती के जंगल के खतरों से बचना चाहता था और वह आगे अयोध्या से नदी के रास्ते गया। 1479 में, बस्ती और आसपास के जिले, जौनपुर राज्य के शासक ख्वाजा जहान के उत्तराधिकरियो के नियंत्रण में था। बहलूल खान लोधी अपने भतीजे काला पहाड़ को इस क्षेत्र का शासन दे दिया था जिसका मुख्यालय बेहराइच को बनाया था जिसमे बस्ती सहित आसपास के क्षेत्र भी थे। इस समय के आसपास, महात्मा कबीर, प्रसिद्ध कवि और दार्शनिक इस जिले में मगहर में रहते थे।
हिंदुओं में भूमिहार ब्राह्मण, सर्वरिया ब्राह्मण और विसेन शामिल थे। पश्चिम से राजपूतों के आगमन से पहले इस जिले में हिंदू समाज का राज्य था। 13वीं सदी के मध्य में श्रीनेत्र पहला नवागंतुक था जो इस क्षेत्र में आ कर स्थापित हुआ। जिनका प्रमुख चंद्रसेन पूर्वी बस्ती से दोम्कातर को निष्कासित किया था। गोंडा प्रांत के कल्हण राजपूत स्वयं परगना बस्ती में स्थापित हुए थे। कल्हण प्रांत के दक्षिण में नगर प्रांत में गौतम राजा स्थापित थे। महुली में महसुइया नाम का कबीला था जो महसो के राजपूत थे।
अन्य विशेष उल्लेख राजपूत कबीले में चौहान का था। यह कहा जाता है कि चित्तौङ से तीन प्रमुख मुकुंद भागे थे जिनका जिला बस्ती की अविभाजित हिस्से पर (अब यह जिला सिद्धार्थ नगर में है) शासन था। 14वीं सदी की अंतिम तिमाही तक बस्ती जिले का एक भाग अमोढ़ा पर कायस्थ वंश का शासन था।
अकबर और उनके उत्तराधिकारी के शासनकाल के दौरान जिला बस्ती, अवध सुबे के गोरखपुर सरकार का एक हिस्सा बना हुआ था। जौनपुर के गवर्नर के शासनकाल के शुरू के दिनों में यह जिला विद्रोही अफगानिस्तान के नेताओं जैसे अली कुली खान, खान जमान का शरणस्थली था। 1680 में मुगल काल के दौरान औरंग़ज़ेब ने एक दूत (पथ के धारक) काजी खलील-उर-रहमान को गोरखपुर भेजा था शायद स्थानीय प्रमुखों से राजस्व का नियमित भुगतान प्राप्त करने के लिए। खलील-उर-रहमान ने ही गोरखपुर से सटे जिलो के भर सरदारों को मजबूर किया था कि वे राजस्व का भुगतान करे। इस कदम का यह परिणाम हुआ कि अमोढ़ा और नगर के राजा, जो हाल ही में सत्ता हासिल की थी, राजस्व का भुगतान को तैयार हो गये और टकराव इस तरह टल गया। इसके बाद खलील-उर-रहमान मगहर के लिए रवाना हुआ जहाँ उसने अपनी चौकी बनाया तथा राप्ती के तट पर बने बांसी के राजा के किले पर कब्ज़ा कर लिया। नव निर्मित जिला संत कबीर नगर का मुख्यालय खलीलाबाद शहर का नाम खलील उर रहमान से पङा जिसका कब्र मगहर में बना है। उसी समय एक प्रमुख सङक गोरखपुर से अयोध्या का निर्माण हुआ था 1690 फ़रवरी में, हिम्मत खान (शाहजहाँ खान बहादुर जफर जंग कोकल्ताश का पुत्र, इलाहाबाद का सूबेदार) को अवध का सूबेदार और गोरखपुर फौजदार बनाया गया, जिसके अधिकार में बस्ती और उसके आसपास का क्षेत्र बहुत समय तक था।
आधुनिक काल
एक महान और दूरगामी परिवर्तन तब आया जब 9 सितम्बर 1772 में सआदत खान को अवध सूबे का राज्यपाल नियुक्त किया गया जिसमे गोरखपुर का फौजदारी भी था। उसी समय बांसी और रसूलपुर पर सर्नेट राजा का, बिनायकपुर पर बुटवल के चौहान का, बस्ती पर कल्हण शासक का, अमोढ़ा पर सुर्यवंश का, नगर पर गौतम का, महुली पर सुर्यवंश का शासन था। जबकि अकेला मगहर पर नवाब का शासन था, जो मुसलमान चौकी से मजबूत बनाया गया था।
नवंबर 1801 में नवाब शुजा उद दौलाह का उत्तराधिकारी सआदत अली खान ने गोरखपुर को ईस्ट इंडिया कंपनी को आत्मसमर्पण कर दिया, जिसमे मौजूद जिला बस्ती और आसपास के क्षेत्र का भी समावेश था। रोलेजे गोरखपुर का पहला कलेक्टर बना था। इस कलेक्टर ने भूमि राजस्व की वसूली के लिए कुछ कदम उठाये थे लेकिन आदेश को लागू करने के लिए मार्च 1802 में कप्तान माल्कोम मक्लोइड ने मदद के लिए सेना बढा दिया था।
ऐसा कहा जाता है कि सन 1801 ईस्वी में बस्ती तहसील मुख्यालय बन गया था और सन 1865 ईस्वी में यह नव स्थापित जिले के मुख्यालय के रूप में चुना गया था।
भूगोल
अप्रैल 2020
स्थिति और सीमा
यह जिला 26° 23' और 27° 30' उत्तर अक्षांश तथा 82° 17' और 83° 20' पूर्वी देशांतर के बीच उत्तर भारत में स्थित है। इसका उत्तर से दक्षिण की अधिकतम लंबाई 75 किमी है और पूर्व से पश्चिम में लगभग 70 किमी की चौड़ाई है। बस्ती जिला पूर्वी में नव निर्मित जिला संत कबीर नगर और पश्चिम में गोंडा के बीच स्थित है, दक्षिण में घाघरा नदी इस जिले को फैजाबाद जिला और नव निर्मित अंबेडकर नगर जिला से अलग करती है, जबकि उत्तर में सिद्धार्थ नगर जिला से घिरा है। जिला तलहटी - संबंधी मैदान में पूरी तरह से फैला है।
जलवायु
बस्ती जिले के मौसम को चार सत्रो में विभाजित किया सकता है। मध्य नवंबर से फरवरी तक सर्दियों के मौसम, मई से जून गर्मी के मौसम, जुलाई से सितंबर के अंत मानसून के मौसम, मध्य नवंबर से अक्टूबर मानसून का मिलन मौसम है। सर्दियों में कोहरा बहुत ही हो जाता है। और गर्मियों में बहुत ही लू चलती है वर्षा: - जिले में औसत वार्षिक वर्षा 1166 मिमी है। तापमान: - सर्दियों के मौसम के दौरान औसत न्यूनतम तापमान लगभग 9-15 तक डिग्री सेल्सियस है और गर्मी के मौसम के दौरान कम से कम लगभग 25 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया है, जबकि अधिकतम 44 डिग्री सेल्सियस मतलब है आर्द्रता: - दक्षिण पश्चिम मानसून के मौसम में सापेक्षिक आर्द्रता 70 प्रतिशत से ऊपर जाता है गर्मियों में हवा में बहुत शुष्क है। हवायें: - जिले में औसत वार्षिक हवा कि गति 2 से 7.1 किमी/घंटे पूर्व से पश्चिम कि तरफ चलती रहती है कभी कभी गर्मियों के मौसम के शुरुआत में तेज आंधी चलती है जिसकी गति 50 से 80 किमी/घंटे तक होती है।
अपवाह
यहाँ कई सहायक नदियों में रवाई, मनवार, मनोरमा आदि है रवाई रवाई दाहिने किनारे पर कुवानो से मिलती है और अमोढ़ा के उत्तर में निकलती है। इनके किनारे में रेह बहुत पाये जाते है मनोरमा मनोरमा, गोंडा से निकलती है जिले की सीमा के सीकरी जंगल के किनारे के साथ एक पूर्व की ओर दिशा में बहती है। एक छोटी दूरी के लिए यह गोंडा से उत्तरार्द्ध जिले को अलग करता है और फिर, एक छोटे और सुस्त धारा से जुड़े हुए हैं। कठनाई अपने बाएं किनारे पर कुवानो नदी है द्वारा निकलती है उगता है और नगर पूर्व, जहां यह इकाइयों के साथ की सीमाओं के साथ दक्षिण पूर्व की ओर दिशा में बहती है अमी अमी राप्ती की प्रमुख सहायक नदी है। अमी धान भूमि का एक बड़ा तंत्र है।
जानवर
बस्ती जिले में जंगली जानवरों नील गाय, सुअर, सियार, लोमड़ी, बंदर, जंगली बिल्ली, जंगली खरगोश और साही आदि पाए जाते हैं।
पक्षी
मोर, काला तीतर विविधता के लिए प्रसिद्ध है। हंस चैती, लाल बतख, गौरया, कोयल आदि।
सरीसृप
सांप विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में जिले में आम हैं, मुख्य कोबरा, करइत, और चूहे आदि; भारतीय मगरमच्छ भी नदी घाघरा में पाए जाते हैं।
मछली
जिले के नदियो, तालाबो में होने वाले लगभग सभी किस्मों की मछली पाई जाती है जैसे, रोहू ,कतला, नैन ,गंगेय डालफिन ,सिलवर, ग्रास ,लपची आदि।
जनसांख्यिकी
2001 की जनगणना के रूप में बस्ती की आबादी 2068922 (1991 में 2750764) थी। जिनमें से 1079971 पुरुष (1991 में 1437727) और 988951 महिला (1991 में 1313037) (916 लिंग अनुपात) थी। पुरुषों और महिलाओं की जनसंख्या 48% से 52 % थी। बस्ती 69% की एक औसत साक्षरता दर 59.5% के राष्ट्रीय औसत से अधिक थी। पुरुष साक्षरता 74% और महिला साक्षरता 62% थी। बस्ती में, जनसंख्या का 13% उम्र के 6 साल के अंतर्गत थी। यहाँ पर सबसे अधिक दलित जाति के लोग की संख्या हैं।
2001 के रूप में, साक्षरता दर 1991 में 35.36% से 54.28% की वृद्धि हुई है। साक्षरता दर पुरुषों के लिए 68.16% (1991 में 50.93% से बढ़ी हुई) और 39.००% प्रतिशत महिलाओं के लिए (1991 में 18.08% से बढ़ गया)। बस्ती शिक्षा और औद्योगिक में उत्तर प्रदेश के पिछड़े जिले में है।
यातायात
अप्रैल 2020
रेल द्वारा -- बस्ती अच्छी तरह से रेल और सड़क मार्ग से देश एवं प्रदेश के प्रमुख शहरों से जुड़ा हुआ है। बस्ती रेलवे स्टेशन लखनऊ और गोरखपुर के बीच एक मुख्य रेलवे स्टेशन है। यहाँ से हावड़ा, दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरू, जम्मू, इनके साथ के कई राज्यो के लिय समय समय पर रेल गाड़ी मिलती है है। इंटरसिटी, सुपरफास्ट जैसे तेज गति से चलने वाली रेल गाड़ी भी चलती है। मुख्य रेल गाड़ी है वैशाली सुपरफास्ट एक्सप्रेस, गोरखधाम एक्सप्रेस, गोरखपुर लखनऊ इंटरसिटी, गोरखपुर बंगलोर सुपरफास्ट, राप्ती सागर सुपरफास्ट और कई मेल, पसेंजर रेल गाड़ी चलती है। मुख्य रेल लाइन लखनऊ और गोरखपुर को जोङता है और बिहार से होते हुए पूर्व में असम को जाता है, यह जिले के दक्षिण से होकर गुजरता है। मुख्य रेल लाइन में जनपद के भीतर पूर्व से पश्चिम की तरफ 7 मुख्य रेलवे स्टेशन मुंडेरवा, ओडवारा, बस्ती, गोविंद नगर, टिनिच, गौर, बभनान पड़ता है।
सड़क मार्ग द्वारा -- बस्ती राष्ट्रीय राजमार्ग सं० - 28 पर स्थित है जो लखनऊ से मोकामा (बिहार) तक जाता है। लखनऊ और गोरखपुर के चार लेन का बहुत ही साफ़ सुथरी सड़क है। जिसके दोनों तरफ घेरा है जानवरो या अन्य वाहनो को प्रवेश मुख्य मार्ग पर सरल नहीं है जिससे वाहनो कि गति में कोई फर्क नहीं पड़ता वर्तमान में उत्तर प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम की (लगभग) 300 बसें जिले में 27 मार्गों पर चल रही है।
राष्ट्रीय राजमार्ग -72 राम जानकी मार्ग -यह मार्ग मूलतः अयोध्या से शुरू होती है लेकिन इसकी अपनी पहचान बस्ती जनपद के छावनी बाज़ार से होती है । ये सड़क छावनी सेे शुरू होकर अमोढ़ा बाज़ार, विशेशरगंज ,रमवापुर ,दुबौलिया बाज़ार , चिलमा बाज़ार, अगौना बाज़ार , कलवारी बाज़ार को जोड़ती हुई संतकबीर नगर जनपद से होती हुई गोरखपुर जनपद तक जाती है ।
हवाई मार्ग द्वारा यहाँ से 200 किलोमीटर दूर लखनऊ में अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा है और वह देश के सारे मुख्य शहरों से जुड़ा हुआ है। यहाँ से मात्र 3 घंटो में बस्ती पहुंचा जा सकता है
प्रमुख स्थल
अप्रैल 2020
अमोढ़ा, बाबा मोछेस्वर नाथ,छावनी बाजार, रामरेखा मन्दिर, देवकली का हनुमान मंदिर, संत रविदास वन विहार, भद्रेश्वर नाथ, मखौडा, श्रृंगीनारी, धनोहरी, गणेशपुर, उमरिया, नगर, चंदू ताल, बराह, माता मरही मंदिर, अगौना, पकरी भीखी, सरघाट माता मंदिर आदि यहां के प्रमुख पर्यटन स्थलों में से है।
बाबा जागेश्वरनाथ मंदिर (तिलकपुर)
जिला मुख्यालय से 8 किलोमीटर पश्चिम nh 28 के पास तिलकपुर गाँव में भगवान शिव का बहुत ही लोकप्रिय मंदिर है,जहाँ सैंकड़ो लोग प्रतिदिन पूजा व दर्शन के लिए आते हैं यह मंदिर पर्यटन की की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है,मंदिर का बहुत ही प्राचीन इतिहास है।
अमोढ़ा:
अमोढ़ा जिला मुख्यालय से 41 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह पुराने दिनों में राजा जालिम सिंह का राज्य था। इसके अलावा राजा जालिम सिंह के महल यहाँ है, महल की पुरानी दीवार अंग्रेज द्वारा इस्तेमाल के लिए गोली के निशान के साथ अभी भी वहाँ है। इसके अलावा एक प्रसिद्ध मंदिर (रामरेखा मन्दिर) यहाँ है। रामरेखा मन्दिर भगवान राम और सीता देवी के सबसे प्राचीन हिंदू मंदिर में से एक है। भगवान श्री राम जनकपुर-अयोध्या की अपनी यात्रा के दौरान एक दिन के लिए यहाँ रुके थे। उसके बाद भगवान श्री राम और लक्ष्मण के साथ सीता राम जानकी मार्ग ( SH-72) छावनी पास सड़क मार्ग से अयोध्या की ओर कूच किया।
बाबा मोछेस्वर नाथ मंदिर
यह बस्ती से 25 किलोमीटर दूरी पर स्थित लालगंज थाना क्षेत्र के जगन्नाथपुर ग्राम सभा में पड़ता है। यहां पर एक शिव मंदिर है जो भगवान राम के समय के प्रसिद्ध ऋषि महर्षि उद्दयालक के द्वारा स्थापित किया गया था और यह उनकी तपोभूमि है साथ ही यहां पर तीन नदियों (मनवर,कुआनो तथा सरस्वती)का संगम होने के कारण हर वर्ष मार्च या अप्रैल के महीने में पाँच दिवसीय विशाल मेले का आयोजन किया जाता है और भारी संख्या में लोग इसमें भाग लेते हैं। इस मेले का सबसे प्रसिद्ध चीज देशी केला है और यहां हर वर्ष लाखों रुपये की केलों का कारोबार होता है।
छावनी बाजार
छावनी बाजार जिला मुख्यालय से लगभग 40 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। छावनी बाजार 1858 ई. के दौरान स्वतंत्रता सेनानियों का प्रमुख शरण स्थान रहा है। यह स्थान शहीदो के पीपल के वृक्ष के लिए भी प्रसिद्ध है। इसी जगह पर ब्रिटिश सरकार ने जनरल फोर्ट की मृत्यु के पश्चात् कार्रवाई में 500 जवानों को फांसी पर लटका दिया था।
संत रविदास वन विहार:
संत रविदास वन विहार (राष्ट्रीय वन चेतना केन्द्र) कुआनो नदी के तट पर स्थित है। यह वन विहार जिला मुख्यालय से केवल एक किलोमीटर की दूरी पर स्थित गणेशपुर गांव के मार्ग पर है। यहां पर एक आकर्षक बाल उद्यान और झील स्थित है। इस बाल उद्यान और झील की स्थापना सरकार द्वार पिकनिक स्थल के रूप में की गई है। वन विहार के दोनों तरफ से कुवाना नदी का स्पर्श इस जगह की खूबसूरती को और अधिक बढ़ा देता है। संत रविदास वन विहार स्थित झील में बोटिंग का मजा भी लिया जा सकता है। सामान्यत: अवकाश के दौरान और रविवार के दिन अन्य दिनों की तुलना में काफी भीड़ रहती है।
भदेश्वर नाथ:
यह कुआनो नदी के तट पर, जिला मुख्यालय से लगभग 6 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। भद्रेश्वर नाथ भगवान शिव को समर्पित मंदिर है। माना जाता है कि इस मंदिर की स्थापना रावण ने की थी। प्रत्येक वर्ष शिवरात्रि के अवसर पर यहां मेले का आयोजन किया जाता है। काफी संख्या में लोग इस मेले में सम्मिलित होते है।
मखौडा:
मखौडा जिला मुख्यालय के पश्चिम में लगभग 57 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह स्थान रामायण काल से ही काफी प्रसिद्ध है। राजा दशरथ ने इस जगह पर पुत्रेस्ठी यज्ञ किया था। जिससे भगवन राम के उदभव का कारण स्थल यही स्थान कहा जाता है। मखौडा कौशल महाजनपद का एक हिस्सा था।
श्रृंगीनारी:
अयोध्या धाम से लगभग 30 किमी की दूरी पर स्थित ऋषि श्रृंगी का आश्रम व तपोस्थली। यहाँ पर माता जी और श्रीहनुमानजी का पावन मन्दिर स्थित है जो क्षेत्रवासियों की अगाध श्रद्धा का केन्द्र है। वर्ष में विशेष रूप से ज्येष्ठ मास के बड़े मंगलवार को विशाल मेला लगता है।
धनोहरी:
बस्ती मुख्यालय से 35 किलोमीटर पश्चिम सीमा पर स्थित धनोहरी गांव पंडित श्री राजित राम पाठक जी (डिप्टी कमिश्नर ऑफ इनकम टैक्स)1850 के कारण महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थान रखता है। जिनकी हवेली आज भी इस गांव में "आस्था निकुंज सेवाश्रमhttps://www.google.com/maps/place//data=!4m2!3m1!1s0x3990cbecd4f80093:0x93eb0438b0a76131?utm_source=mstt_1 आस्था निकुंज सेवाश्रम आस्था निकुंज सेवाश्रम hi-US 2020-08-28" के नाम से स्थित है। जिसकी स्थापना उन्होने अपने एकलौते सुपुत्र श्री त्रिलोकीनाथ जी के आकस्मिक देहावसान के उपरांत किया था। "आस्था निकुंज सेवाश्रम" पंडित श्री राजित राम पाठक जी के छोटे भाई पंडित श्री शिव सेवक पाठक के संरक्षण में समाजिक सेवा में सदैव तत्पर रहता है। यह सेवाश्रम एक अतुलनीय 'वसुधैव कुटुंबकम' का उदाहरण है। यह स्थान एक विशेष प्रकार की मानसिक शांति का अनुभूति कराता है।
बेहिल नाथ मंदिर: बनकटी विकास खंड के बस्ती शहरसे सोलहवें किमी पर स्थित बेहिलनाथ मंदिर प्राचीन कालीन है। कहा जाता है कि यह बौद्ध काल का मंदिर है। अष्टकोणीय अर्घा में स्थापित शिवलिंग अपने आप में अनूठा है। इस स्थान पर प्राचीन टीले हैं जिनकी खुदाई हो तो यहां का संपन्न इतिहास के बारे में पता चलेगा।
थालेश्वरनाथ मंदिर: बनकटी से तीन किलोमीटर उत्तर थाल्हापार गांव में स्थित यह मंदिर प्राचीन कालीन है। गांव से पंद्रह मीटर ऊचाई पर स्थित यह मंदिर पर्यटन विभाग की सूची में दर्ज है तथा यहां पर्यटकों के ठहरने के लिए सरकार की ओर से चार कमरे भी बनाए गए हैं।
लोढ़वा बाबा शिवमंदिर : भानपुर तहसील के बडोखर बाजार में स्थित इस मंदिर पर शिवरात्रि के दिन विशाल मेला लगता है।
कणर मंदिर: बस्ती चीनी मिल के पार्श्व में स्थित यह शिवमंदिर भी प्राचीनतम मंदिरों में शुमार है
समय माता का मंदिर: यह मंदिर भानपुर तहसील से सोनहा मार्ग की तरफ १.५ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है
धिरौली बाबू :
धिरौली बाबू बस्ती जिले का एक एतिहासिक गांव है। यह मुख्यालय से पश्चिम में छावनी बाजार से सिर्फ ६ किलोमीटर दूर और अमोढ़ा रियासत से 4 किमी दूर घाघरा नदी के तट पर स्थित है। घिरौलीबाबू निवासी कुलवंत सिंह, हरिपाल सिंह, बलवीर सिह, रिसाल सिंह, रघुवीर सिंह, सुखवंत सिह, रामदीन सिंह रामगढ़ गांव में अंग्रेजों का मुकाबला करने की रणनीति बनाने के लिए 17 अप्रैल 1858 को बुलायी गयी बैठक में शामिल थे। इन सभी को अंग्रेज सेना ने पकड़ के छावनी के पीपल के वृक्ष पर फासी पे लटका दिया। घिरौलीबाबू के क्रांतिकारियों ने घाघरा नदी में नौसेना का निरीक्षण करने आये अंग्रेज अफसर को पकड़ के मार दिया था किन्तु उसकी पत्नी को छोड़ दिया, जिसकी सुचना मिलते ही गोरखपुर के जिलाधिकारी ने पूरे ग्राम को जला देने और भूमि जब्त करने का ऑर्डर दे दिया। आज भी धिरौली बाबू में कुलवंत सिंह एवम रिसाल सिंह के वंशज रणजीत सिंह, कृष्ण कुमार सिंह एवम हरिपाल सिंह एवं रामदीन सिंह के वंशज रहते हैं।
"उमरिया"
यह बस्ती के माझा क्षेत्र मे सरयू नदी के किनारे है जो बाबा राम निहाल दास जी की तपोभूमि है।यहाँ हर मंगलवार एक भब्य मेला लगता है।
नगर बाजार:
जिला मुख्यालय से लगभग आठ किलोमीटर की दूरी पर स्थित नगर एक छोटा सा गांव है। नगर गांव की पश्चिम दिशा में विशाल झील चंदू तल स्थित है। यह मछली पकड़ने और निशानेबाज़ी करने के लिए प्रसिद्ध है। इसके अलावा यह गांव गौतम बुद्ध के जन्म स्थल के रूप में भी जाना जाता है। चौदहवीं शताब्दी में यह स्थान गौतम राजाओं का जिला मुख्यालय बन गया था। उस समय का प्राचीन दुर्ग आज भी यहां देखा जा सकता है। जिला मुख्यालय से 16 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इसके पूर्व में चन्दो ताल है
अगौना:
अगौना जिला मुख्यालय मार्ग में श्रीराम-जानकी मार्ग पर बसा हुआ गांव है। हिन्दी भाषा के स्तम्भ, प्रसिद्ध साहित्यकार स्व. राम चन्द्र शुक्ल जी की यह जन्म भूमि है।
बराह छतर:
बराह छतर ज़िला मुख्यालय से पश्चिम में लगभग 15 किमी की दूरी पर कुवांना नदी के तट पर स्थित है। यह जगह मुख्य रूप से बराह मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। बराह छतर लोकप्रिय पौराणिक पुस्तकों में वियाग्रपुरी रूप में जाना जाता है। इसके अलावा बराह को भगवान शिव की नगरी के नाम से भी जाना जाता है। यह अति प्राचीन कोलिय नगर है जो बुद्ध की मां महामाया के पिता सुप्रबुद्ध की राजधानी है अगर इस स्थल की खुदाई की जाये तो इतिहास सामने आयेगा ,यहां महामाया अनेकों नाम से पूजी गयी है महामाया के गर्भ का प्रतीक हाथी मूर्ति और भगवान बुद्ध के जन्म का प्रतीक सफेद कमल (कोईयां फूल) ,चुनरी ,धार प्राचीन मुख्य चढावा है यहां महामाया कीर्तन दलितो द्वारा नवरात्रिःपूर्णिमा मे गाया जाता है पास ही मे बुद्ध के गृह त्याग का प्रतीक घोडे की मूर्ति है जहां खीर चढाया जाता है दलित महामाया को ही पूजते है और लक्ष्मी मानते है
माता मरही मंदिर:
बस्ती अंबेडकर नगर मुख्क्य मार्ग पर बेलाड़ी चौराहा से 15 किमी सोंधिया घाट के आगे सोनहा ग्राम सभा की ऐलिया गांव में माता मरही का अति प्राचीन मंदिर जिले के सुदूर स्थित जनमानस की आस्था का केन्द्र है।
चंदो ताल:
चंदो ताल जिला मुख्यालय से आठ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। माना जाता है कि प्राचीन समय में इस जगह को चन्द्र नगर के नाम से जाना जाता था। कुछ समय पश्चात् यह जगह प्राकृतिक रूप से एक झील के रूप में बदल गई और इस जगह को चंदो ताल के नाम से जाना जाने लगा। यह झील पांच किलोमीटर लम्बी और चार किलोमीटर चौड़ी है। माना जाता है कि इस झील के आस-पास की जगह से मछुवारों व कुछ अन्य लोगों को प्राचीन समय के धातु के बने आभूषण और ऐतिहासिक अवशेष प्राप्त हुए थे। इसके अलावा इस झील में राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय पक्षियों की अनेक प्रजातियां भी देखी जा सकती है। ये ताल नगर बाजार से पूर्व में सेमरा चींगन गांव तक पहुंचा हुआ है
पकरी भीखी:
यह गांव अग्रहरि एवं गर्ग जातियों का एक समूह है, जिनसे पाँच गांव का उदय हुआ - पकरी भीखी, जिनवा, बाँसापार, पचानू, आमा। पकरी भीखी का नाम भीखी बाबा के नाम का अंश है। बस्ती जिले से १५ किलोमीटर कि दूरी पर उत्तर दिशा में नेपाल बार्डर को जाने वाली सड़क पर स्थित है। एक तरफ से तालाब और दूसरी तरफ दूर तक फैले हुए खेत।
महादेवा मंदिर :
बस्ती जिले से 20 किलोमीटर पश्चिम दिशा में कुवानो नदी के घाट पार एक विशाल बरगद के निचे महादेव का मंदिर है। प्रति वर्ष शिवरात्रि के पावन पर्व पर विशाल मेला लगता है। इस दिन चारो तरफ से बहुत से लोग अपनी मनोकामना के साथ महादेव का दर्शन करते हैं। इस मंदिर का इतिहास बहुत ही पुराना है। किवदन्ती है कि देवरहाबाबा बाबा का कुछ दिनों तक यहाँ धर्मस्थली रही है
मनिकौरा कला
यह बस्ती जिले का एक मुख्य गांव है यहां समग्र ब्राह्मणों का निवास है यह मुंडरवा से महादेवा मार्ग पर मध्य में स्थित है यहां रुद्र महा यज्ञ का विशेष आयोजन किया जाता है पूरे भारत से संतो का जमावड़ा प्रतिवर्ष नवंबर माह में लगता है इस गांव में उमाशंकर त्रिपाठी का निवास स्थान है
बोलचाल भाषा
बस्ती जनपद की प्रमुख भाषा हिन्दी के साथ अवधी भी है.
राजनीति
राम प्रसाद चौधरी यहां के कद्दावर नेता माने जाते हैं।जो पूर्व में उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री रहे है। कई बार विधायक रहे हैं। 2024 में समाजवादी पार्टी से लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र 61बस्ती से सांसद चुने गए है।https://doi.org/10.1786/541122430563 Foreign-born in self-employment in some OECD countries, 1999 and 2004 doi.org 2025-03-26
डॉ आलोक रंजन वर्मा जो वर्तमान समय कांग्रेस पार्टी से जुड़कर सक्रिय राजनीति की भूमिका निभा रहे हैं । इन्होंने 2022 में बस्ती सदर विधानसभा सीट बसपा के टिकट पर विधानसभा चुनाव लड़ा था ।
महेंद्र नाथ यादव, वर्तमान में बस्ती सदर के विधायक हैं व समाजवादी पार्टी के ज़िलाध्यक्ष भी हैं । https://www-myneta-info.translate.goog/uttarpradesh2022/candidate.php?candidate_id=4213&_x_tr_sl=en&_x_tr_tl=hi&_x_tr_hl=hi&_x_tr_pto=tc Mahendra Nath Yadav(Samajwadi Party(SP)):Constituency- BASTI SADAR(BASTI) - Affidavit Information of Candidate: www-myneta-info.translate.goog 2026-05-14
इन्हें भी देखें
बस्ती, उत्तर प्रदेश
उत्तर प्रदेश
उत्तर प्रदेश के जिले
सन्दर्भ
श्रेणी:उत्तर प्रदेश के जिले