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मिताहार
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मिताहार (= मित + आहार ; अर्थात, कम खाना) , भोजन की मात्रा से सम्बन्धित योग की एक संकल्पना है। यह दस यमों में से एक है। मिताहार की चर्चा ३० से अधिक ग्रन्थों में हुई है, जैसे शाण्डिल्य उपनिषद, गीता, दशकुमारचरित तथा हठयोग प्रदीपिका आदि।
हठयोगप्रदीपिका (१.५७) में कहा गया है-
ब्रह्मचारी मिताहारी त्यागी योगपरायणः ।
अब्दादूर्ध्वं भवेद्सिद्धो नात्र कार्या विछारणा ॥
इसी प्रकार, दर्शनोपनिषद में कहा गया है-
अल्पमृष्टाशनाभ्यां च चतुर्थांशावशेषकम् ।
तस्माद्योगानुगुण्येन भोजनं मितभोजनम् ॥ १९॥ https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%A6%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B6%E0%A4%A8_%E0%A4%89%E0%A4%AA%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%B7%E0%A4%A6%E0%A5%8D/%E0%A4%96%E0%A4%A3%E0%A5%8D%E0%A4%A1%E0%A4%83_%E0%A5%A7 जाबालदर्शन उपनिषद्/खण्डः १ - विकिस्रोतः sa.wikisource.org}}
अर्थ : जो अल्प हो, मृष्ट (सुपाच्य) हो और खाने के बाद पेट का चतुर्थ भाग शेष रखता हो, ऐसा 'मिताहार' योगी के अनुकूल है।
'मिताहार' से जुड़े कुछ शुरुआती विचार तैत्तिरीय उपनिषद में मिलते हैं, जो कई श्लोकों में स्वस्थ जीवन के लिए भोजन के महत्व, जीवन चक्र के साथ-साथ शरीर में इसकी भूमिका और स्वयं (ब्रह्म, आत्मन, आत्मा) पर इसके प्रभाव की चर्चा करता है।The Taittiriya-upanishad स्टाइल्स (Stiles) का कहना है कि यह उपनिषद'' इस बात पर प्रकाश डालता है कि भोजन से ही जीवन उत्पन्न होता है, भोजन से ही यह कायम रहता है और जीवन के चले जाने पर यह भोजन में ही लीन हो जाता है। Ayurvedic yoga therapy
सन्दर्भ
इन्हें भी देखें
अहिंसा
सत्य
अस्तेय
ब्रह्मचर्य
क्षमा
धृति
दया
आर्जव
शौच
अक्रोध
दान
श्रेणी:योग
श्रेणी:हिन्दू दर्शन