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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

फलदीपिका

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फलदीपिका, मन्त्रेश्वर द्वार रचित भारतीय ज्योतिष का एक प्रमुख ग्रन्थ है। यह संस्कृत में है जिसमें २८ अध्याय तथा कुल ८६५ श्लोक हैं। इसमें मानव जीवन के प्रत्येक पहलू के ज्योतिषीय पक्ष पर विचार किया गया है। अपने मूल रूप में यह ग्रन्थ ग्रन्थ नामक प्राचीन भारतीय लिपि में ही उपलब्ध था और दक्षिण भारत में ही प्रचलित और प्रचारित था। १९२५ के आसपास यह ग्रन्थ सर्वप्रथम नागरी लिपि में कलकाता से प्रकाशित हुआ। फिर तमिल, तेलगु आदि दक्षिण भारतीय भाषाओं में इसके अनुवाद उपलब्ध हुए। इस ग्रन्थ के कतिपय श्लोक वैद्यनाथ कृत जातकपारिजात से यथावत उद्धृत हैं। जातकपारिजात के रचयिता वेङ्कटाद्रि के पुत्र श्री वैद्यनाथ का जीवनकाल 14वीं शताब्दी में था। इस ग्रन्थ में जातक विषयों पर एक नये दृष्टिकोण का साक्षात्कार होता है जो अन्य ग्रन्थों से थोड़ा भिन्न है। रोगचिन्ता अध्याय रोग का विचार (1) रोगभाव (षष्ठ भाव ) में स्थित ग्रह से, (2) अष्टम और द्वादश भावस्थ ग्रह से और (3) षष्ठेश और षष्ठेश से संयुक्त ग्रहों से करना चाहिए दो अथवा तीन प्रकार से यदि एक ही रोग निर्दिष्ट हो तो वह रोग कहना चाहिए II१II (1) पित्त की विकृति (2) तीव्र ज्वर (3) शरीर में जलन (4) अपस्मार (मृगी) (5) ह्र्दयरोग (6) नेत्रपीड़ा (7) शत्रुभय (8) चर्मरोग (9) अस्थिरत्रती (Bone T.B.) (10) काष्ट, अग्नि, अस्त्र, और विष से आघात (11) पुत्र – स्त्री को कष्ट (12) चतुष्पद, चोर और सर्प से भय तथा (13) राजा, धर्मराज (यम) और रूद्र कोप से भय आदि सूर्यदोष से होते है II२II (1) निद्रा सम्बन्धी विकार (अतिनिद्रा अथवा निद्राभाव), (2) आलस्य, (3) कफविकृति, (4) अतिसार, (5) फोड़ा (कर्बकल जैसा घातक फोड़ा), (6) शीतज्वर (मलेरिया, टायफायड आदि), (7) सींग वाले पशु अथवा जल में रहने वाले जीव (मगर आदि से) भय, (8) मन्दाग्नि, (9) अरुचि (10) स्त्रीजन्य व्याधि , (11) कामला रोग (12) मानसिक श्रान्ति, (13) रक्तविकार, (14) जल से भय तथा (15) बालग्रह, दुर्गा, किनिर, यम, सर्प और यक्षिणी आदि के कोप से भय आदि चंद्रमा के दूषित होने से होते है II३II (1) अत्यधिक प्यास (2) रक्त विकार (3) पित्तज ज्वर (4) अग्नि, विष और शास्त्राघात का भय (5) कुष्ठरोग (6) नेत्र – विकार (7) गुल्मरोग (उदर स्फोट, अल्सर आदि) (8) अपस्मार (मृगी) (9) मज्जा सम्बन्धी विकार (10) शारीरिक रूक्षता (11) पमिका (Psoriasis) (12) अगंविकृति (13) राजा, शत्रु और मित्र से उत्पीड़न (14) भाई, पुत्र, शत्रु और मित्रों से विवाद-कलह (15) गन्धर्व आदि दुष्टात्माओं से कष्ट तथा (16) शरीर के उपरी भाग में (फेफड़े, गले, मुख, नेत्र, कान कि बीमारी आदि जातक को मंगल के दूषित होने से प्राप्त होता है II४II (1) मानसिक भ्रान्ति (विभ्रम) (2) वाणीदोष (3) नेत्र, कण्ठ और नासिका में विकार (4) ज्वर (5) वात-पित्त‌-कफ के विकार जनित व्याधि (6) विष-सेवन से रोग (7) चर्मरोग (8) पाण्डुरोग (9) दु:स्वप्न (10) विचच्रिका, पमिका (Psoriasis) (11) अग्नि में गिरने का भय (12) बंधन और कठोर व्यवहार से श्रांति (13) गंधर्वादी कुटिल आत्माओं से कष्ट आदि बुध के कारण होते है II५II (1) गुल्मरोग (2) अग्नि-विकृति (आंत की विकृति) जन्य ज्वर (3) शोकजन्य व्याधियां (4) मूर्छा (ये सभी व्याधियां कफ के असंतुलन से उत्पन्न होते है) (5) कर्ण-विकार (6) मोहग्रस्तता, देवस्थान सम्बन्धी विवाद से कष्ट (7) ब्राह्मण-शाप से कष्ट (8) यक्ष, किन्नर, विद्याध्रादी द्वारा उत्पीड़न तथा (9) विद्वानों और गुरुजनों के प्रति किये गए दुव्र्यवहार-जनित व्याधियों से कष्ट – ये सभी ब्रहस्पति के दूषित होने पर जातक को प्राप्त होते है II६II शुक्र के दूषण से (1) पाण्डुरोग (2) वात-कफविकार जन्य व्याधियों (3) नेत्र-विकार, (4) मूत्र-विकार (मूत्र का अधिक आना या उसमे अवरोध) (5) प्रमेह (6) जननेनिद्रिय सम्बन्धी विकार (7) मूत्रकृच्छ (8) मैथुन में असमर्थता (9) वीर्यस्त्राव या शीघ्रपतन (10) अधिक मैथुन से शारीरिक कन्तिहीनता (11) सूखणड़ी (क्षय) (12) योगिनी, यक्षणी आदि से उत्पीड़न तथा (13) परमप्रिये मित्र से मैत्री भंग आदि दोष होते है II७II शनि के दूषण से (1) वात-कफ विकार जन्य व्यधियां (2) पद्वैक्ल्य (पक्षाघात या चोट आदि के कारण) (3) विपित (4) थकान, तन्द्रा (5) भ्रान्ति (6) कुक्षिरोग (7) अन्तःशूल (माम्रिक आघात या हिर्त्शूल) (8) सेवकों का विनाश (9) पसली में कष्ट (10) स्त्री पुत्रादि को कष्ट (11) अंग -वैकल्य (अंग - भंग हो जाना) (12) माम्रिक वेदना (13) व्रक्ष (काष्ठ) या पत्थर से आघात तथा (14) पिशाचादि से उत्पीड़न आदि जातक को भोगने होते है II८II राहु के विकार से (1) हर्ताप (2) कुष्ठ (3) बौद्धिक विभ्रम (विवेक्शुन्यता) (4) विषजन्य व्याधि (5) पैरों में रोग (6) स्त्री-पुत्रादि को कष्ट तथा (7) पिशाच एवं पनन्गादी से भय होता है. केतु के विकार से (1) ब्राह्मण और क्षत्रियों के विरोध से कष्ट, (2) शत्रुजन्य भय होता है. गुलिक के प्रकोप से प्रेतबाधा, विषभय, दैहिक पीडन और किसी निकट सम्बन्धी की मृत्यु से अशौच होता है II९II सन्दर्भ बाहरी कड़ियाँ फलदीपिका (संस्कृत विकिस्रोत) फलदीपिका (हिन्दी व्याख्याकार : गोपेश कुमार ओझा) फलदीपिका (संस्कृत डॉक्युमेन्ट्स) MANTRESWARA'S PHALADEEPIKA ( English Translation, Commentary and a nnotation by Dr . G. S. Kapoor) श्रेणी:भारतीय ज्योतिष श्रेणी:संस्कृत ग्रन्थ