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रामेश्वर मंदिर (पिथौरागढ़)

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रामेश्वर मंदिर (पिथौरागढ़) Rameshwar Mandir Tampatra 1695.png राजा उद्योत चंद द्वारा सन् 1695 में रामेश्वर मंदिर को दिया गया ऐतिहासिक ताम्रपत्र शिव, राम उत्तराखण्ड पिथौरागढ़ 29 32 41 N 80 07 28 E inline रामेश्वर मंदिर उत्तराखण्ड के पिथौरागढ़ जिले में स्थित एक बहुत ही पुराना और प्रसिद्ध मंदिर है। यह मंदिर पिथौरागढ़, चम्पावत और अल्मोड़ा जिलों की सीमाओं के पास, सरयू और पूर्वी रामगंगा नदी के पवित्र संगम (पनार) पर बना हुआ है। पुराने समय की मान्यताओं और धार्मिक महत्व के कारण लोग इसे कुमाऊं क्षेत्र का एक पवित्र धाम मानते हैं। अब इस संगम तट पर आने वाले भक्तों को भगवान शिव और भगवान श्रीराम, दोनों के एक साथ दर्शन करने का मौका मिलता है। पौराणिक कथाएं और महत्व भगवान राम से संबंध: पुरानी मान्यताओं के अनुसार, इस मंदिर को त्रेतायुग में खुद भगवान श्रीराम ने स्थापित किया था "Pithoragarh: भगवान राम ने बनाया था रामेश्वर मंदिर, यहीं सीखी थी धनुर्विद्या!", News18 हिंदी, 29 November 2022.। ऐसा माना जाता है कि भगवान राम ने यहीं पर अपने गुरु महर्षि वशिष्ठ से अस्त्र-शस्त्र और धनुर्विद्या सीखी थी। श्रीराम ने अपने अवतार काल के अंतिम समय में इसी संगम पर प्राकृतिक रूप से बने शिवलिंग की पूजा की थी, जिसके कारण इस जगह का नाम रामेश्वर पड़ा। स्कन्द पुराण में जिक्र: महर्षि वेद व्यास द्वारा लिखे गए स्कन्द पुराण के मानस खंड में इस मंदिर के बारे में खुलकर बताया गया है। पुराणों के अनुसार, यहाँ पूजा करने का फल काशी विश्वनाथ से 10 गुना और सेतुबंध रामेश्वरम से 100 गुना ज्यादा मिलता है। प्राकृतिक शिवलिंग: मंदिर के मुख्य गर्भगृह (अंदर वाले कमरे) में एक प्राकृतिक रूप से बना हुआ शिवलिंग स्थापित है। भौगोलिक स्थिति (रास्ता और जगह) यह धाम पिथौरागढ़ मुख्य शहर से लगभग 40 किलोमीटर दूर है। यह मंदिर मानसरोवर झील से निकलने वाली पवित्र सरयू नदी और भगवान परशुराम द्वारा खोजी गई पूर्वी रामगंगा नदी के संगम (पनार) के किनारे बसा है। इस संगम पर नहाना हरिद्वार में नहाने जितना ही पुण्य देने वाला माना जाता है। पुराना इतिहास और ताम्रपत्र रामेश्वर मंदिर का ऐतिहासिक महत्व कुमाऊं के चंद राजाओं के समय से रहा है। इसके पक्के सबूत मंदिर से मिले पुराने 'रामेश्वर ताम्रपत्र' (शाके 1617 और शाके 1711) से मिलते हैं रामेश्वर ताम्रपत्र (हिन्दी रूपान्तरण अभिलेख)। राजा रुद्रचंद्र का संबंध: ताम्रपत्र के अनुसार, सीटीवाढी (सीटीडी) क्षेत्र में 1 ज्यूला जमीन पहले से ही चन्द वंश के राजा रुद्रचंद्र ने मंदिर को दान दी थी, जिसे बाद के राजाओं ने भी वैसा ही बनाए रखा । राजा उद्योत चंद का योगदान (सन् 1695): चन्द राजवंश के राजा उद्योत चंद ने शाके 1617 (सन् 1695) में रामेश्वर मंदिर को कुल 5 ज्यूला जमीन दान (गुंठ भूमि) दी थी और यहाँ की पूजा-व्यवस्था को ठीक किया था । राजा महेंद्र चंद का योगदान (सन् 1789): चन्द वंश के आखिरी राजा श्री महेंद्र चंद ने शाके 1711 (सन् 1789) में सूर्य ग्रहण के मौके पर मंदिर के पुजारियों (वर्मदेव, मणीराम, हरि और जैभद्र मागो ज्यूलिया) को चार मासा जमीन दान की थी। उन्होंने मंदिर में रोज पूजा करने और अखंड दीपक जलाने की पक्की व्यवस्था की थी । रोज की पूजा और भोग की व्यवस्था पुराने ताम्रपत्र के अनुसार, चंद राजाओं ने मंदिर को रोज चलाने के लिए कड़े नियम और पैसों का बजट तय किया था : रोज का भोग: हर दिन 2 तानी चावल का भोग और 6 मुठ्ठी दाल चढ़ाने का नियम था। पूजा का सामान: रोज की पूजा के लिए 2 मुठ्ठी अक्षत (चावल), 10 पैसे का घी, और अखंड दीये के लिए 12 पैसे का तेल तय था। धूप और बाकी सामान: पूरे साल के लिए 5 पैसे का गुग्गुल (धूप), बत्ती बनाने के लिए 8 पैसे का कपड़ा, भोग के लिए 24 पैसे का घी और रोज नाप के अनुसार नमक देने का नियम राजा ने बनाया था। श्रीराम मंदिर (2024) का नया निर्माण पुराने समय से इस संगम पर मुख्य रूप से केवल शिव मंदिर ही था। परिसर में भगवान श्रीराम के एक अलग मंदिर की कमी को देखते हुए हाल ही में यहाँ नया मंदिर बनाया गया है। निर्माण का समय: इस नए Ram मंदिर को बनाने का काम साल 2023 से 2024 के बीच पूरा हुआ। प्राण-प्रतिष्ठा: मंदिर के अंदर भगवान श्रीराम की मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा 22 जनवरी 2024 को की गई। बनाने वाले: इस मंदिर का सुंदर निर्माण अल्मोड़ा के रहने वाले 84 साल के रामभक्त और कुमाऊँनी रामायण को लिखने वाले डॉ. विश्वम्भर विशन दत्त जोशी "शैलज" और मुख्य पुजारी आनंद बल्लभ जोशी की कोशिशों, संकल्प और सहयोग से पूरा हुआ। मंदिर के व्यवस्थापक और परंपराएं समय: मंदिर के दरवाजे रोज सुबह 5:00 बजे खुलते हैं और शाम को 7:00 बजे की आरती के बाद बंद होते हैं। मुख्य पुजारी: मंदिर के पुराने और पारंपरिक मुख्य पुजारी मेलडुंगरी के जोशी परिवार के लोग हैं। वर्तमान में आनंद बल्लभ जोशी इसके मुख्य पुजारी हैं, जो यहाँ की रोज की पूजा-पाठ और धार्मिक कामों को संभालते हैं। व्यवस्थापक: मंदिर के व्यवस्थापक के रूप में महेश गिरी जी यहाँ की बाकी व्यवस्थाओं को देखते हैं। धार्मिक काम: यह जगह पिथौरागढ़, चम्पावत और अल्मोड़ा के लोगों के लिए जनेऊ संस्कार (यज्ञोपवीत), देव डांगरों के पवित्र स्नान और अंतिम संस्कार (शवदाह) का एक बड़ा केंद्र है। संदर्भ श्रेणी:उत्तराखंड के हिन्दू मंदिर श्रेणी:पिथौरागढ़ जिला श्रेणी:शिव मंदिर श्रेणी:राम मंदिर