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अकबर
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अकबरاكبر बादशाहग़ाज़ीLal 1999 67 : "It may be recalled that as an adolescent, Akbar had earned the title of Ghazi by beheading the defenseless infidel Himu. Under Akbar and Jahangir 'five or six hundred thousand human beings were killed,' says emperor Jahangir" शहंशाह-ए-हिन्द Govardhan. Akbar With Lion and Calf ca. 1630, Metmuseum (cropped).jpg 11 फ़रवरी 1556 – 27 अक्टूबर 1605 14 फ़रवरी 1556 हुमायूँहेमू जहाँगीर मुग़ल राजवंश हुमायूँ नवाब हमीदा बानो बेगम साहिबा रुक़ाइय्या बेगम, सलीमा सुल्तान और मरियम उज़-ज़मानी 15 अक्टूबर 1542 अमरकोट, अमरकोट राज्य 27 अक्टूबर 1605 फ़तेहपुर सीकरी, आगरा सूबा, मुग़ल साम्राज्य India सिकंदरा, आगरा, भारत अबुल-फ़तह जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर अकबर, गोवर्धन द्वारा चित्रित (1630) मुग़ल सम्राट
अकबरfa ak.baɾ (जलाल-उद-दीन मुहम्मद अकबर,Ballhatchet Kenneth A. 31 March 2023 Akbar https://www.britannica.com/biography/Akbar live https://web.archive.org/web/20230525120830/https://www.britannica.com/biography/Akbar 25 May 2023 28 May 2023 Encyclopædia Britannica en 1542 10 15 ybirth – 1605 10 27 y),online Akbar I 2014 Lehmann F. https://www.iranicaonline.org/articles/akbar-i-mughal-india 29 May 2023 none Beveridge Volume I 1907 139–140 none 2014 Akbar I World Encyclopedia Oxford University Press https://www.oxfordreference.com/display/10.1093/acref/9780199546091.001.0001/acref-9780199546091-e-209 29 May 2023 2004 online 10.1093/acref/9780199546091.001.0001 978-0-19-954609-1 150655825 https://web.archive.org/web/20230922030109/https://www.oxfordreference.com/display/10.1093/acref/9780199546091.001.0001/acref-9780199546091-e-209 22 September 2023 live subscription जिन्हें अकबर महान के नाम से भी जाना जाता है,Syed 2011 404 तीसरे मुग़ल सम्राट थे, जिन्होंने 1556 से 1605 तक शासन किया। अकबर ने अपने पिता हुमायूँ के उत्तराधिकारी के रूप में, बैरम ख़ान के संरक्षण में सिंहासन संभाला। बैरम ख़ान ने युवा सम्राट को भारतीय उपमहाद्वीप में मुग़ल क्षेत्रों का विस्तार और सुदृढ़ीकरण करने में सहायता की। उन्हें व्यापक रूप से महानतम मुग़ल सम्राटों में से एक माना जाता है।https://archive.org/details/TheMughalThrone/page/n41/mode/1up?view=theater&q=Akbar The Saga of the Great Mughals 9781932705546 19 May 2024 Early Abraham 2000 Sterling Publishers Pvt.
अकबर अपने पितृवंश के माध्यम से तैमूर और चंगेज़ ख़ान के वंशज थे।Smith 1917 9–10Baumer Christoph Christoph Baumer The History of Central Asia: The Age of Islam and the Mongols 2018 Bloomsbury Publishing 47 अकबर ने सैन्य, राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक साधनों के माध्यम से धीरे-धीरे मुग़ल साम्राज्य का विस्तार किया, जिससे उसका क्षेत्र भारतीय उपमहाद्वीप के अधिकांश भाग तक फैल गया।Beveridge Volume III 1907Shrivant Sole Sanjay Ganpatrao Birajdar Vishwanath Jalaluddin Muhammad Akbar: The Great Mughal Emperor International Journal of Research in Social Sciences & Humanities 3 3 2013 2249-4642 https://ijrssh.com/admin/upload/03%20SOLE%20SANJAY%20SHRIVANT.pdf उनकी सैन्य सफलताओं और शासन के सिद्धांतों को समझने की क्षमता ने उनके द्वारा विस्तारित साम्राज्य के सुदृढ़ीकरण और स्थिरीकरण में योगदान दिया।Smith 1917 93
सैन्य विस्तार के अलावा, अकबर ने राजपूत शासकों को नियुक्तियों और वैवाहिक गठबंधनों के माध्यम से मुग़ल दरबार में शामिल करके मुग़ल शासन को भी सुदृढ़ किया।https://books.google.com/books?id=EsMVDAAAQBAJ&dq=Mughal+Rajput+marriage+became+common&pg=PA475 The Oxford Handbook of Global Religions 475 OUP 2006 978-0-19-976-764-9 Mark Juergensmeyer अकबर के समय से ही स्थानीय राजपूत हिंदू शासकों को दरबारी पदों और वैवाहिक संबंधों के माध्यम से मुग़ल शासक वर्ग में शामिल किया जाने लगा था। राजपूत राजकुमारी कछवाहा, मलिका-ए-हिन्दुस्तान मरियम उज़-ज़मानी, उनकी प्रमुख और प्रिय पत्नी से उनका विवाह,Hindu Shah Muhammad Qasim Gulshan-I-Ibrahimi 2 1569–1612 143 https://archive.org/details/HistoryOfTheRiseOfTheMahomedanPowerInIndiaVolume1/HistoryOfTheRiseOfTheMahomedanPowerInIndia-Volume-1/page/n579/mode/2up?q=143 इसके कुछ ही समय बाद, प्रिय सुल्ताना, जो उस समय गर्भवती थीं, 17 रबी-उल-अव्वल 997 हिजरी, बुधवार के दिन, एक पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम सलीम रखा गया। none Mehta Jaswant Lal Advanced Study in the History of Medieval India Sterling Publishers Pvt. Ltd 1900 978-81-207-1015-3 222 https://books.google.com/books?id=-TsMl0vSc0gC&pg=PG189 अकबर अपनी राजपूत पत्नी के आकर्षण और गुणों से प्रभावित था; उसने उसके प्रति सच्चा प्रेम विकसित किया और उसे प्रमुख पत्नी का दर्जा प्रदान किया। ... सलीम (बाद में जहाँगीर), जो सिंहासन का उत्तराधिकारी था, इसी विवाह से 30 अगस्त 1569 को जन्मा था। none ने उसे हिंदू कुलीन वर्ग के साथ अधिक घनिष्ठ संबंध स्थापित करने में सहायता की और राजपूतों के साथ उसके संबंधों पर महत्वपूर्ण राजनीतिक प्रभाव डाला।Beveridge Henry The Akbarnama of Abu'l Fazl 2 1907 Royal Asiatic Society https://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.55649/page/n249/mode/1upHavell 1918 461Havell 1918 463 : "राजा बिहारी मल की पुत्री को उसके मुस्लिम नाम मरियम ज़मानी से जाना जाता था। उसका और उसके भाई का दरबार में सदैव बहुत प्रभाव रहा। मरियम अकबर के पुत्र और उत्तराधिकारी राजकुमार सलीम की माता थीं, जो बाद में जहाँगीर के नाम से जाने गए।" उनके पुत्र जहाँगीर अगले मुग़ल सम्राट बने और उन्हें अपनी माता के माध्यम से राजपूत वंशावली विरासत में मिली।India in the Persianate Age 1000–1765 https://books.google.com/books?id=aIF6DwAAQBAJ&dq=akbar+born+in+rajput&pg=PP179 257 Richard M. Eaton University of California Press 2019 978-0-520-32512-8 मुग़ल संस्कृति में राजपूत संस्थाओं के प्रसार को आंशिक रूप से मुग़ल हरम में राजपूत महिलाओं और मुग़ल परिवारों में राजपूत युवकों को शामिल किए जाने से समझा जा सकता है, जिसकी शुरुआत अकबर के शासन के शुरुआती दशकों में हुई थी। शाही हरम में राजपूत महिलाओं से जन्मे बच्चों को मुग़ल राजवंश का पूर्ण सदस्य माना जाता था और वे सिंहासन के उत्तराधिकारी बनने के योग्य थे। इसका अर्थ था कि जहाँगीर के पितामह हुमायूँ थे, वहीं उनके मातामह कछवाहा राजपूत वंश के नेता राजा भारमल थे... इस प्रकार जहाँगीर जैविक रूप से आधे राजपूत थे।Chaudhary S. N. Roy Restoration of Split Milk Gyan Publishing House 2011 77 978-81-212-1046-1 none जहाँगीर की माता एक धर्मपरायण हिंदू राजकुमारी थीं, जो अकबर की सबसे प्रिय पत्नी थीं।Ahloowalia B. S. Invasion of the Genes: Genetic Heritage of India Strategic Book Publishing 2009 130 978-1-60860-691-7 noneSafdar Khan 2021 186 : "मुग़ल सम्राट अकबर (1542–1605) की सबसे प्रभावशाली महारानी और सम्राट जहाँगीर की माता सुंदर महारानी मरियम-उज़-ज़मानी थीं, जिन्हें आमतौर पर जोधा बाई के नाम से जाना जाता है ... अकबर ने अपनी प्रिय और सबसे अधिक प्रेम की जाने वाली पत्नी को रावी नदी पर स्थित ख़िज़री दरवाज़े में व्यापार और हज यात्रियों के लिए जहाज़ बनाने की अनुमति दी।" none
जीवन परिचय
thumb|right|150px|अकबर का चित्र
नाम
अकबर का जन्म पूर्णिमा के दिन हुआ था इसलिए उनका नाम बदरुद्दीन मोहम्मद अकबर रखा गया था। बद्र का अर्थ होता है पूर्ण चंद्रमा और अकबर उनके नाना शेख अली अकबर जामी के नाम से लिया गया था। कहा जाता है कि काबुल पर विजय मिलने के बाद उनके पिता हुमायूँ ने बुरी नज़र से बचने के लिए अकबर की जन्म तिथि एवं नाम बदल दिए थे।The Commentary of Father Monserrate, S.J.: On his Journey to the Court of Akbar फादर मॉन्सर्रेट की टिप्पणी : एस॰जे॰, अकबर के न्यायालय की उनकी यात्रा एशियन एड्युकेशनल सर्विसेज़ https://books.google.co.in/books?redir_esc=y&id=_tENAAAAIAAJ ५७ हॉयलैंड, जे॰एस॰; बैनर्जी एस॰एन॰ 1922 8120608070 किवदंती यह भी है कि भारत की जनता ने उनके सफल एवं कुशल शासन के लिए अकबर नाम से सम्मानित किया था। अरबी भाषा में अकबर शब्द का अर्थ "महान" या बड़ा होता है।
आरम्भिक जीवन
अकबर का जन्म राजपूत शासक राणा अमरसाल के महल उमेरकोट, सिंध (वर्तमान पाकिस्तान) में २३ नवंबर, १५४२ (हिजरी अनुसार रज्जब, ९४९ के चौथे दिन) हुआ था। यहां बादशाह हुमायुं अपनी हाल की विवाहिता बेगम हमीदा बानो बेगम के साथ शरण लिये हुए थे। इस पुत्र का नाम हुमायुं ने एक बार स्वप्न में सुनाई दिये के अनुसार जलालुद्दीन मोहम्मद रखा।घाग १०: बर्थ ऑफ अकबर https://web.archive.org/web/20100629053135/http://www.columbia.edu/itc/mealac/pritchett/00litlinks/gulbadan/part10.html 29 जून 2010 हुमायुंनामा, कोलंबिया विश्वविद्यालय बाबर का वंश तैमूर और मंगोल नेता चंगेज खां से था यानि उसके वंशज तैमूर लंग के खानदान से थे और मातृपक्ष का संबंध चंगेज खां से था। इस प्रकार अकबर की धमनियों में एशिया की दो प्रसिद्ध जातियों, तुर्क और मंगोल के रक्त का सम्मिश्रण था।
thumb|left|लड़कपन में अकबर
हुमायूँ को पश्तून नेता शेरशाह सूरी के कारण फारस में अज्ञातवास बिताना पड़ रहा था।बैनर्जी, एस.के हुमायुं बादशाह किन्तु अकबर को वह अपने संग नहीं ले गया वरन रीवां (वर्तमान मध्य प्रदेश) के राज्य के एक ग्राम मुकुंदपुर में छोड़ दिया था। अकबर की वहां के राजकुमार राम सिंह प्रथम से, जो आगे चलकर रीवां का राजा बना, के संग गहरी मित्रता हो गयी थी। ये एक साथ ही पले और बढ़े और आजीवन मित्र रहे। कालांतर में अकबर सफ़ावी साम्राज्य (वर्तमान अफ़गानिस्तान का भाग) में अपने एक चाचा मिर्ज़ा अस्कारी के यहां रहने लगा। पहले वह कुछ दिनों कंधार में और फिर १५४५ से काबुल में रहा। हुमायूँ की अपने छोटे भाइयों से बराबर ठनी ही रही इसलिये चाचा लोगों के यहाँ अकबर की स्थिति बंदी से कुछ ही अच्छी थी। यद्यपि सभी उसके साथ अच्छा व्यवहार करते थे और शायद दुलार प्यार कुछ ज़्यादा ही होता था। किंतु अकबर पढ़ लिख नहीं सका वह केवल सैन्य शिक्षा ले सका। उसका काफी समय आखेट, दौड़ व द्वंद्व, कुश्ती आदि में बीता, तथा शिक्षा में उसकी रुचि नहीं रही। जब तक अकबर आठ वर्ष का हुआ, जन्म से लेकर अब तक उसके सभी वर्ष भारी अस्थिरता में निकले थे जिसके कारण उसकी शिक्षा-दीक्षा का सही प्रबंध नहीं हो पाया था। अब हुमायूं का ध्यान इस ओर भी गया। लगभग नवम्बर, +--9-9 में उसने अकबर की शिक्षा प्रारंभ करने के लिए काबुल में एक आयोजन किया। किंतु ऐन मौके पर अकबर के खो जाने पर वह समारोह दूसरे दिन सम्पन्न हुआ। मुल्ला जादा मुल्ला असमुद्दीन अब्राहीम को अकबर का शिक्षक नियुक्त किया गया। मगर मुल्ला असमुद्दीन अक्षम सिद्ध हुए। तब यह कार्य पहले मौलाना बामजीद को सौंपा गया, मगर जब उन्हें भी सफलता नहीं मिली तो मौलाना अब्दुल कादिर को यह काम सौंपा गया। मगर कोई भी शिक्षक अकबर को शिक्षित करने में सफल न हुआ। असल में, पढ़ने-लिखने में अकबर की रुचि नहीं थी, उसकी रुचि कबूतर बाजी, घुड़सवारी और कुत्ते पालने में अधिक थी। किन्तु ज्ञानोपार्जन में उसकी रुचि सदा से ही थी। कहा जाता है, कि जब वह सोने जाता था, एक व्यक्ति उसे कुछ पढ़ कर सुनाता रह्ता था।फ़ज़्ल, अबुल अकबरनामा, खण्ड १ समय के साथ अकबर एक परिपक्व और समझदार शासक के रूप में उभरा, जिसे कला, स्थापत्य, संगीत और साहित्य में गहरी रुचि रहीं।
राजतिलक
शेरशाह सूरी के पुत्र इस्लाम शाह के उत्तराधिकार के विवादों से उत्पन्न अराजकता का लाभ उठा कर हुमायूँ ने १५५५ में दिल्ली पर पुनः अधिकार कर लिया। इसमें उसकी सेना में एक अच्छा भाग फारसी सहयोगी ताहमस्प प्रथम का रहा। इसके कुछ माह बाद ही ४८ वर्ष की आयु में ही हुमायूँ का आकस्मिक निधन अपने पुस्तकालय की सीढ़ी से भारी नशे की हालात में गिरने के कारण हो गया।द रेन ऑफ हुमायूँ https://web.archive.org/web/20100923084238/http://islamicart.com/library/empires/india/humayun.html 23 सितंबर 2010 । इस्लामिक आर्ट। एम्परर हुमायुं https://web.archive.org/web/20111007023907/http://www.indiasite.com/delhi/history/humayun.html 7 अक्तूबर 2011 । इण्डियासाइट.कॉम। अभिगमन तिथि: २६ सिरंबर, २०१० तब अकबर के संरक्षक बैरम खां ने साम्राज्य के हित में इस मृत्यु को कुछ समय के लिये छुपाये रखा और अकबर को उत्तराधिकार हेतु तैयार किया। १४ फ़रवरी, १५५६ को अकबर का राजतिलक हुआ। ये सब मुगल साम्राज्य से दिल्ली की गद्दी पर अधिकार की वापसी के लिये सिकंदर शाह सूरी से चल रहे युद्ध के दौरान ही हुआ। १३ वर्षीय अकबर का कलनौर, पंजाब में सुनहरे वस्त्र तथा एक गहरे रंग की पगड़ी में एक नवनिर्मित मंच पर राजतिलक हुआ। ये मंच आज भी बना हुआ है।३० मई २००८ http://punjabgovt.nic.in/government/gurdas1.GIF गुरदास पंजाब सरकार]] https://web.archive.org/web/20080527210721/http://punjabgovt.nic.in/government/gurdas1.GIF 27 मई 2008 deadइतिहास https://web.archive.org/web/20050802074716/http://gurdaspur.nic.in/html/profile.htm#history 2 अगस्त 2005 गुरुदासपुर जिला आधिकारिक जालस्थल. उसे फारसी भाषा में सम्राट के लिये शब्द शहंशाह से पुकारा गया। वयस्क होने तक उसका राज्य बैरम खां के संरक्षण में चला।चंद्रा २००७ २२६स्मिथ २००२ ३३७
राज्य का विस्तार
खोये हुए राज्य को पुनः प्राप्त करने के लिये अकबर के पिता हुमायूँ के अनवरत प्रयत्न अन्ततः सफल हुए और वह सन् १५५५ में हिंदुस्तान पहुँच सका किंतु अगले ही वर्ष सन् १५५६ में राजधानी दिल्ली में उसकी मृत्यु हो गई और गुरदासपुर के कलनौर नामक स्थान पर १४ वर्ष की आयु में अकबर का राजतिलक हुआ। अकबर का संरक्षक बैराम खान को नियुक्त किया गया जिसका प्रभाव उस पर १५६० तक रहा। तत्कालीन मुगल राज्य केवल काबुल से दिल्ली तक ही फैला हुआ था। इसके साथ ही अनेक समस्याएं भी सिर उठाये खड़ी थीं। १५६३ में शम्सुद्दीन अतका खान की हत्या पर उभरा जन आक्रोश, १५६४-६५ के बीच उज़बेक विद्रोह और १५६६-६७ में मिर्ज़ा भाइयों का विद्रोह भी था, किंतु अकबर ने बड़ी कुशलता से इन समस्याओं को हल कर लिया। अपनी कल्पनाशीलता से उसने अपने सामन्तों की संख्या बढ़ाई।कौन कहता है – अकबर महान था ! अकबर – एक परिचय https://web.archive.org/web/20101125132915/http://sdelectgy.jagranjunction.com/2010/06/30/%E0%A4%95%E0%A5%8C%E0%A4%A8-%E0%A4%95%E0%A4%B9%E0%A4%A4%E0%A4%BE-%E0%A4%B9%E0%A5%88-%E0%A4%85%E0%A4%95%E0%A4%AC%E0%A4%B0-%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%A8-%E0%A4%A5%E0%A4%BE-%E0%A4%85%E0%A4%95/ 25 नवंबर 2010 । जागरण जंक्शन। ३० जून २०१०। श्रीवास्तव, डी.के इसी बीच १५६६ में महाम अंका नामक उसकी धाय के बनवाये मदरसे (वर्तमान पुराने किले परिसर में) से शहर लौटते हुए अकबर पर तीर से एक जानलेवा हमला हुआ, जिसे अकबर ने अपनी फुर्ती से बचा लिया, हालांकि उसकी बांह में गहरा घाव हुआ। इस घटना के बाद अकबर की प्रशसन शैली में कुछ बदलाव आया जिसके तहत उसने शासन की पूर्ण बागडोर अपने हाथ में ले ली। इसके फौरन बाद ही हेमु के नेतृत्व में अफगान सेना पुनः संगठित होकर उसके सम्मुख चुनौती बनकर खड़ी थी। अपने शासन के आरंभिक काल में ही अकबर यह समझ गया कि सूरी वंश को समाप्त किए बिना वह चैन से शासन नहीं कर सकेगा। इसलिए वह सूरी वंश के सबसे शक्तिशाली शासक सिकंदर शाह सूरी पर आक्रमण करने पंजाब चल पड़ा।
दिल्ली की सत्ता-बदल
thumb|right|250px|अकबर के समय मुग़ल साम्राज्य
दिल्ली का शासन उसने मुग़ल सेनापति तारदी बैग खान को सौंप दिया। सिकंदर शाह सूरी अकबर के लिए बहुत बड़ा प्रतिरोध साबित नहीं हुआ। कुछ प्रदेशो में तो अकबर के पहुँचने से पहले ही उसकी सेना पीछे हट जाती थी। अकबर की अनुपस्थिति में हेमू विक्रमादित्य ने दिल्ली और आगरा पर आक्रमण कर विजय प्राप्त की। ६ अक्तूबर १५५६ को हेमु ने स्वयं को भारत का महाराजा घोषित कर दिया। इसी के साथ दिल्ली में हिंदू राज्य की पुनः स्थापना हुई।
सत्ता की वापसी
दिल्ली की पराजय का समाचार जब अकबर को मिला तो उसने तुरन्त ही बैरम खान से परामर्श कर के दिल्ली की तरफ़ कूच करने का इरादा बना लिया। अकबर के सलाहकारो ने उसे काबुल की शरण में जाने की सलाह दी। अकबर और हेमु की सेना के बीच पानीपत में युद्ध हुआ। यह युद्ध पानीपत का द्वितीय युद्ध के नाम से प्रसिद्ध है। संख्या में कम होते हुए भी अकबर ने इस युद्ध में विजय प्राप्त की। इस विजय से अकबर को १५०० हाथी मिले जो मनकोट के हमले में सिकंदर शाह सूरी के विरुद्ध काम आए। सिकंदर शाह सूरी ने आत्मसमर्पण कर दिया और अकबर ने उसे प्राणदान दे दिया।
चहुँओर विस्तार
दिल्ली पर पुनः अधिकार जमाने के बाद अकबर ने अपने राज्य का विस्तार करना शुरू किया और मालवा को १५६२ में, गुजरात को १५७२ में, बंगाल को १५७४ में, काबुल को १५८१ में, कश्मीर को १५८६ में और खानदेश को १६०१ में मुग़ल साम्राज्य के अधीन कर लिया। अकबर ने इन राज्यों में एक एक राज्यपाल नियुक्त किया। अकबर यह नहीं चाहता था की मुग़ल साम्राज्य का केन्द्र दिल्ली जैसे दूरस्थ शहर में हो; इसलिए उसने यह निर्णय लिया की मुग़ल राजधानी को फतेहपुर सीकरी ले जाया जाए जो साम्राज्य के मध्य में थी। कुछ ही समय के बाद अकबर को राजधानी फतेहपुर सीकरी से हटानी पड़ी। कहा जाता है कि पानी की कमी इसका प्रमुख कारण था। फतेहपुर सीकरी के बाद अकबर ने एक चलित दरबार बनाया जो कि साम्राज्य भर में घूमता रहता था इस प्रकार साम्राज्य के सभी कोनो पर उचित ध्यान देना सम्भव हुआ। सन १५८५ में उत्तर पश्चिमी राज्य के सुचारू राज पालन के लिए अकबर ने लाहौर को राजधानी बनाया। अपनी मृत्यु के पूर्व अकबर ने सन १५९९ में वापस आगरा को राजधानी बनाया और अन्त तक यहीं से शासन संभाला।
प्रशासन
thumb|120px|left|मुगल ध्वज
सन् १५६० में अकबर ने स्वयं सत्ता संभाल ली और अपने संरक्षक बैरम खां को निकाल बाहर किया। अब अकबर के अपने हाथों में सत्ता थी लेकिन अनेक कठिनाइयाँ भी थीं। जैसे - शम्सुद्दीन अतका खान की हत्या पर उभरा जन आक्रोश (१५६३), उज़बेक विद्रोह (१५६४-६५) और मिर्ज़ा भाइयों का विद्रोह (१५६६-६७) किंतु अकबर ने बड़ी कुशलता से इन समस्याओं को हल कर लिया। अपनी कल्पनाशीलता से उसने अपने सामन्तों की संख्या बढ़ाई। सन् १५६२ में आमेर के शासक से उसने समझौता किया - इस प्रकार राजपूत राजा भी उसकी ओर हो गये। इसी प्रकार उसने ईरान से आने वालों को भी बड़ी सहायता दी। भारतीय मुसलमानों को भी उसने अपने कुशल व्यवहार से अपनी ओर कर लिया। धार्मिक सहिष्णुता का उसने अनोखा परिचय दिया - हिन्दू तीर्थ स्थानों पर लगा कर जज़िया हटा लिया गया (सन् १५६३)। इससे पूरे राज्यवासियों को अनुभव हो गया कि वह एक परिवर्तित नीति अपनाने में सक्षम है। इसके अतिरिक्त उसने जबर्दस्ती युद्धबंदियो का धर्म बदलवाना भी बंद करवा दिया।
मुद्रा
thumb|तत्कालीन चाँदी की मुद्रा
अकबर ने अपने शासनकाल में ताँबें, चाँदी एवं सोनें की मुद्राएँ प्रचलित की। इन मुद्राओं के पृष्ठ भाग में सुंदर इस्लामिक छपाई हुआ करती थी। अकबर ने अपने काल की मुद्राओ में कई बदलाव किए। उसने एक खुली टकसाल व्यवस्था की शुरुआत की जिसके अन्दर कोई भी व्यक्ति अगर टकसाल शुल्क देने में सक्षम था तो वह किसी दूसरी मुद्रा अथवा सोने से अकबर की मुद्रा को परिवर्तित कर सकता था। अकबर चाहता था कि उसके पूरे साम्राज्य में समान मुद्रा चले।श्रीवास्तव एवं आलम (२००८) | श्रीवास्तव, ए॰एल & आलम, मुज़फ़्फ़र (२००८). भारत. ब्रिटैन्निया विश्वकोश
राजधानी स्थानांतरण
पानीपत का द्वितीय युद्ध होने के बाद हेमू को मारकर दिल्ली पर अकबर ने पुनः अधिकार किया। इसके बाद उसने अपने राज्य का विस्तार करना शुरू किया और मालवा को १५६२ में, गुजरात को १५७२ में, बंगाल को १५७४ में, काबुल को १५८१ में, कश्मीर को १५८६ में और खानदेश(वर्तमान बुढ़हानपुर, महाराष्ट्र का भाग) को १६०१ में मुग़ल साम्राज्य के अधीन कर लिया। अकबर ने इन राज्यों में प्रशासन संभालने हेतु एक-एक राज्यपाल नियुक्त किया। उसे राज संभालने के लिये दिल्ली कई स्थानों से दूर लगा और ये प्रतीत हुआ कि इससे प्रशासन में समस्या आ सकती है, अतः उसने निर्णय लिया की मुग़ल राजधानी को आगरा के निकट फतेहपुर सीकरी ले जाया जाएकौन कहता है – अकबर महान था ! १५. अगर फतेहपुर सिकरी का निर्माण अकबर ने कराया तो इस नाम का उल्लेख अकबर के पहले के इतिहासों में कैसे है ? https://web.archive.org/web/20101109215212/http://sdelectgy.jagranjunction.com/2010/06/28/%E0%A4%95%E0%A5%8C%E0%A4%A8-%E0%A4%95%E0%A4%B9%E0%A4%A4%E0%A4%BE-%E0%A4%B9%E0%A5%88-%E0%A4%85%E0%A4%95%E0%A4%AC%E0%A4%B0-%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%A8-%E0%A4%A5%E0%A4%BE-%E0%A5%A7%E0%A5%AB/ 9 नवंबर 2010 । जागरण जंक्शन। श्रीवास्तव, डी.के. जो साम्राज्य के लगभग मध्य में थी। एक पुराने बसे ग्राम सीकरी पर अकबर ने नया शहर बनवाया जिसे अपनी जीत यानि फतह की खुशी में फतेहाबाद या फतेहपुर नाम दिया गया। जल्दी ही इसे पूरे वर्तमान नाम फतेहपुर सीकरी से बुलाया जाने लगा। यहां के अधिकांश निर्माण उन १४ वर्षों के ही हैं, जिनमें अकबर ने यहां निवास किया। शहर में शाही उद्यान, आरामगाहें, सामंतों व दरबारियों के लिये आवास तथा बच्चों के लिये मदरसे बनवाये गए। ब्लेयर और ब्लूम के अनुसार शहर के अंदर इमारतें दो प्रमुख प्रकार की हैं- सेवा इमारतें, जैसे कारवांसेरी, टकसाल, निर्माणियां, बड़ा बाज़ार (चहर सूक) जहां दक्षिण-पश्चिम/उत्तर पूर्व अक्ष के लम्बवत निर्माण हुए हैं और दूसरा शाही भाग, जिसमें भारत की सबसे बड़ी सामूहिक मस्जिद है, साथ ही आवासीय तथा प्रशासकीय इमारते हैं जिसे दौलतखाना कहते हैं। ये पहाड़ी से कुछ कोण पर स्थित हैं तथा किबला के साथ एक कोण बनाती हैं।
किन्तु ये निर्णय सही सिद्ध नहीं हुआ और कुछ ही समय के बाद अकबर को राजधानी फतेहपुर सीकरी से हटानी पड़ी। इसके पीछे पानी की कमी प्रमुख कारण था। फतेहपुर सीकरी के बाद अकबर ने एक चलित दरबार की रचना की जो पूरे साम्राज्य में घूमता रहता था और इस प्रकार साम्राज्य के सभी स्थानों पर उचित ध्यान देना संभव हुआ। बाद में उसने सन १५८५ में उत्तर पश्चिमी भाग के लिए लाहौर को राजधानी बनाया। मृत्यु के पूर्व अकबर ने सन १५९९ में राजधानी वापस आगरा बनायी और अन्त तक यहीं से शासन संभाला।
thumb|left|120px|अमर सिंह द्वार, आगरा का किला
आगरा शहर का नया नाम दिया गया अकबराबाद जो साम्राज्य की सबसे बड़ा शहर बना। शहर का मुख्य भाग यमुना नदी के पश्चिमी तट पर बसा था। यहां बरसात के पानी की निकासी की अच्छी नालियां-नालों से परिपूर्ण व्यवस्था बनायी गई। लोधी साम्राज्य द्वारा बनवायी गई गारे-मिट्टी से बनी नगर की पुरानी चारदीवारी को तोड़कर १५६५ में नयी बलुआ पत्थर की दीवार बनवायी गई। अंग्रेज़ इतिहासकार युगल ब्लेयर एवं ब्लूम के अनुसार इस लाल दीवार के कारण ही इसका नाम लाल किला पड़ा। वे आगे लिखते हैं कि यह किला पिछले किले के नक्शे पर ही कुछ अर्धवृत्ताकार बना था। शहर की ओर से इसे एक दोहरी सुरक्षा दीवार घेरे है, जिसके बाहर गहरी खाई बनी है। इस दोहरी दीवार में उत्तर में दिल्ली गेट व दक्षिण में अमर सिंह द्वार बने हैं। ये दोनों द्वार अपने धनुषाकार मेहराब-रूपी आलों व बुर्जों तथा लाल व सफ़ेद संगमर्मर पर नीली ग्लेज़्ड टाइलों द्वारा अलंकरण से ही पहचाने जाते हैं। वर्तमान किला अकबर के पौत्र शाहजहां द्वारा बनवाया हुआ है। इसमें दक्षिणी ओर जहांगीरी महल और अकबर महल हैं।द रेन ऑफ अकबर https://web.archive.org/web/20101124010123/http://islamicart.com/library/empires/india/akbar.html 24 नवंबर 2010 । इस्लामिक आर्ट।
नीतियां
विवाह संबंध
thumb|upright|महाराणा प्रताप
आंबेर के कछवाहा राजपूत राज भारमल ने अकबर के दरबार में अपने राज्य संभालने के कुछ समय बाद ही प्रवेश पाया था। इन्होंने अपनी राजकुमारी हरखा बाई का विवाह अकबर से करवाना स्वीकार किया।सरकार १९८४ ३६चंद्रा २००७ २४२-२४३ विवाहोपरांत मुस्लिम बनी और मरियम-उज़-ज़मानी कहलायी। उसे राजपूत परिवार ने सदा के लिये त्याग दिया और विवाह के बाद वो कभी आमेर वापस नहीं गयी। उसे विवाह के बाद आगरा या दिल्ली में कोई महत्त्वपूर्ण स्थान भी नहीं मिला था, बल्कि भरतपुर जिले का एक छोटा सा गाँव मिला था।नाथ १९८२ ३९७ उसकी मृत्यु १६२३ में हुई थी। उसके पुत्र जहांगीर द्वारा उसके सम्मान में लाहौर में एक मस्जिद बनवायी गई थी।नाथ १९८२ ५२ भारमल को अकबर के दरबार में ऊंचा स्थान मिला था और उसके बाद उसके पुत्र भगवंत दास और पौत्र मानसिंह भी दरबार के ऊंचे सामन्त बने रहे।चंद्रा २००७ २४३
हिन्दू राजकुमारियों को मुस्लिम राजाओं से विवाह में संबंध बनाने के प्रकरण अकबर के समय से पूर्व काफी हुए थे, किन्तु अधिकांश विवाहों के बाद दोनों परिवारों के आपसी संबंध अच्छे नहीं रहे और न ही राजकुमारियां कभी वापस लौट कर घर आयीं।सरकार १९८४ ३७ हालांकि अकबर ने इस मामले को पिछले प्रकरणों से अलग रूप दिया, जहां उन रानियों के भाइयों या पिताओं को पुत्रियों या बहनों के विवाहोपरांत अकबर के मुस्लिम ससुराल वालों जैसा ही सम्मान मिला करता था, सिवाय उनके संग खाना खाने और प्रार्थना करने के। उन राजपूतों को अकबर के दरबार में अच्छे स्थान मिले थे। सभी ने उन्हें वैसे ही अपनाया था सिवाय कुछ रूढ़िवादी परिवारों को छोड़कर, जिन्होंने इसे अपमान के रूप में देखा था।
अन्य राजपूर रजवाड़ों ने भी अकबर के संग वैवाहिक संबंध बनाये थे, किन्तु विवाह संबंध बनाने की कोई शर्त नहीं थी। दो प्रमुख राजपूत वंश, मेवाड़ के शिशोदिया और रणथंभौर के हाढ़ा वंश इन संबंधों से सदा ही हटते रहे। अकबर के एक प्रसिद्ध दरबारी राजा मानसिंह ने अकबर की ओर से एक हाढ़ा राजा सुर्जन हाढ़ा के पास एक संबंध प्रस्ताव भी लेकर गये, जिसे सुर्जन सिंह ने इस शर्त पर स्वीकार्य किया कि वे अपनी किसी पुत्री का विवाह अकबर के संग नहीं करेंगे। अन्ततः कोई वैवाहिक संबंध नहीं हुए किन्तु सुर्जन को गढ़-कटंग का अधिभार सौंप कर सम्मानित किया गया। अन्य कई राजपूत सामन्तों को भी अपने राजाओं का पुत्रियों को मुगलों को विवाह के नाम पर देना अच्छा नहीं लगता था। गढ़ सिवान के राठौर कल्याणदास ने मोटा राजा राव उदयसिंह और जहांगीर को मारने की धमकी भी दी थी, क्योंकि उदयसिंह ने अपनी पुत्री जगत गोसाई का विवाह अकबर के पुत्र जहांगीर से करने का निश्चय किया था। अकबर ने ये ज्ञान होने पर शाही फौजों को कल्याणदास पर आक्रमण हेतु भेज दिया। कल्याणदास उस सेना के संग युद्ध में काम आया और उसकी स्त्रियों ने जौहर कर लिया।आलम, मुज़फ़्फ़र; सुब्रह्मण्यम, संजय १७७ द मुगल स्टेट, १५२६-१७५० १९९८ ऑक्स्फोर्ड विश्वविद्यालय प्रेस 9780195639056
इन संबंधों का राजनीतिक प्रभाव महत्त्वपूर्ण था। हालांकि कुछ राजपूत स्त्रियों ने अकबर के हरम में प्रवेश लेने पर इस्लाम स्वीकार किया, फिर भी उन्हें पूर्ण धार्मिक स्वतंत्रता थी, साथ ही उनके सगे-संबंधियों को जो हिन्दू ही थे; दरबार में उच्च-स्थान भी मिले थे। इनके द्वारा जनसाधारण की ध्वनि अकबर के दरबार तक पहुँचा करती थी। दरबार के हिन्दू और मुस्लिम दरबारियों के बीच सम्पर्क बढ़ने से आपसी विचारों का आदान-प्रदान हुआ और दोनों धर्मों में संभाव की प्रगति हुई। इससे अगली पीढ़ी में दोनों रक्तों का संगम था जिसने दोनों सम्प्रदायों के बीच सौहार्द को भी बढ़ावा दिया। परिणामस्वरूप राजपूत मुगलों के सर्वाधिक शक्तिशाली सहायक बने, राजपूत सैन्याधिकारियों ने मुगल सेना में रहकर अनेक युद्ध किये तथा जीते। इनमें गुजरात का १५७२ का अभियान भी था।सरकार १९८४ ३८-४० अकबर की धार्मिक सहिष्णुता की नीति ने शाही प्रशासन में सभी के लिये नौकरियों और रोजगार के अवसर खोल दिये थे। इसके कारण प्रशासन और भी दृढ़ होता चला गया।सरकार १९८४ ३८
कामुकता
तत्कालीन समाज में वेश्यावृति को सम्राट का संरक्षण प्रदान था। उसकी एक बहुत बड़ी हरम थी जिसमें बहुत सी स्त्रियाँ थीं। इनमें अधिकांश स्त्रियों को बलपूर्वक अपहृत करवा कर वहां रखा हुआ था। तब कहा जाता है कि अकबर के कुछ लोग जिस सुन्दर स्त्री को सती होते देखते थे, बलपूर्वक जाकर सती होने से रोक देते व उसे सम्राट की आज्ञा बताते तथा उस स्त्री को हरम में डाल दिया जाता था। हालांकि इस प्रकरण को दरबारी इतिहासकारों ने कुछ इस ढंग से कहा है कि इस प्रकार बादशाह सलामत ने सती प्रथा का विरोध किया व उन अबला स्त्रियों को संरक्षण दिया। अपनी जीवनी में अकबर ने स्वयं लिखा है– यदि मुझे पहले ही यह बुधिमत्ता जागृत हो जाती तो मैं अपनी सल्तनत की किसी भी स्त्री का अपहरण कर अपने हरम में नहीं लाता।आईने अकबरी, भाग ३, पृष्ठ ३७८ इस बात से यह तो स्पष्ट ही हो जाता है कि वह सुन्दरियों का अपहरण करवाता था। इसके अलावा अपहरण न करवाने वाली बात की निरर्थकता भी इस तथ्य से ज्ञात होती है कि न तो अकबर के समय में और न ही उसके उतराधिकारियो के समय में हरम बंद हुई थी।
आईने अकबरी के अनुसार अब्दुल कादिर बदायूंनी कहते हैं कि बेगमें, कुलीन, दरबारियो की पत्नियां अथवा अन्य स्त्रियां जब कभी बादशाह की सेवा में पेश होने की इच्छा करती हैं तो उन्हें पहले अपने इच्छा की सूचना देकर उत्तर की प्रतीक्षा करनी पड़ती है; जिन्हें यदि योग्य समझा जाता है तो हरम में प्रवेश की अनुमति दी जाती है।आइने अकबरी, पृ-१५ अकबर अपनी प्रजा को बाध्य किया करता था की वह अपने घर की स्त्रियों का नग्न प्रदर्शन सामूहिक रूप से आयोजित करे जिसे अकबर ने खुदारोज (प्रमोद दिवस) नाम दिया हुआ था। इस उत्सव के पीछे अकबर का एकमात्र उदेश्य सुन्दरियों को अपने हरम के लिए चुनना था।राजस्थान का इतिहास। कर्नल टॉड। पृ.२७४-२७५। गोंडवाना की रानी दुर्गावती पर भी अकबर की कुदृष्टि थी। उसने रानी को प्राप्त करने के लिए उसके राज्य पर आक्रमण कर दिया। युद्ध के दौरान वीरांगना ने अनुभव किया कि उसे मारने की नहीं वरन बंदी बनाने का प्रयास किया जा रहा है, तो उसने वहीं आत्महत्या कर ली। तब अकबर ने उसकी बहन और पुत्रबधू को बलपूर्वक अपने हरम में डाल दिया। अकबर ने यह प्रथा भी चलाई थी कि उसके पराजित शत्रु अपने परिवार एवं परिचारिका वर्ग में से चुनी हुई महिलायें उसके हरम में भेजे।कौन कहता है – अकबर महान था ! १०. क्या ऐसा कामुक एवं पतित बादशाह अकबर महान है ! https://web.archive.org/web/20101108225232/http://sdelectgy.jagranjunction.com/2010/06/25/%E0%A4%95%E0%A5%8C%E0%A4%A8-%E0%A4%95%E0%A4%B9%E0%A4%A4%E0%A4%BE-%E0%A4%B9%E0%A5%88-%E0%A4%85%E0%A4%95%E0%A4%AC%E0%A4%B0-%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%A8-%E0%A4%A5%E0%A4%BE-%E0%A5%A7%E0%A5%A6/ 8 नवंबर 2010 । जागरण जंक्शन। श्रीवास्तव, डी.के।
पुर्तगालियों से संबंध
१५५६ में अकबर के गद्दी लेने के समय, पुर्तगालियों ने महाद्वीप के पश्चिमी तट पर बहुत से दुर्ग व निर्माणियाँ (फैक्ट्रियाँ) लगा ली थीं और बड़े स्तर पर उस क्षेत्र में नौवहन और सागरीय व्यापार नियन्त्रित करने लगे थे। इस उपनिवेशवाद के चलते अन्य सभी व्यापारी संस्थाओं को पुर्तगालियों की शर्तों के अधीण ही रहना पढ़ता था, जिस पर उस समय के शासकों व व्यापारियों को आपत्ति होने लगीं थीं।हबीब १९९७ २५६ मुगल साम्राज्य ने अकबर के राजतिलक के बाद पहला निशाना गुजरात को बनाया और सागर तट पर प्रथम विजय पायी १५७२ में, किन्तु पुर्तगालियों की शक्ति को ध्यान में रखते हुए पहले कुछ वर्षों तक उनसे मात्र फारस की खाड़ी क्षेत्र में यात्रा करने हेतु कर्ताज़ नामक पास लिये जाते रहे।हबीब १९९७ २५६-२५७ १५७२ में सूरत के अधिग्रहण के समय मुगलों और पुर्तगालियों की प्रथम भेंट हुई और पुर्तगालियों को मुगलों की असली शक्ति का अनुमान हुआ और फलतः उन्होंने युद्ध के बजाय नीति से काम लेना उचित समझा व पुर्तगाली राज्यपाल ने अकबर के निर्देश पर उसे एक राजदूत के द्वारा सन्धि प्रस्ताव भेजा। अकबर ने उस क्षेत्र से अपने हरम के व अन्य मुस्लिम लोगों द्वारा मक्का को हज की यात्रा को सुरक्षित करने की दृष्टि से प्रस्ताव स्वीकार कर लिया।हबीब १९९७ २५९ १५७३ में अकबर ने अपने गुजरात के प्रशासनिक अधिकारियों को एक फरमान जारी किया, जिसमें निकटवर्त्ती दमण में पुर्तगालियों को शांति से रहने दिये जाने का आदेश दिया था। इसके बदले में पुर्तगालियों ने अकबर के परिवार के लिये हज को जाने हेतु पास जारी किये थे।हबीब १९९७ २६०
तुर्कों से संबंध
thumb|हेजाज़
१५७६ में में अकबर ने याह्या सलेह के नेतृत्व में अपने हरम के अनेक सदस्यों सहित हाजियों का एक बड़ा जत्था हज को भेजा। ये जत्था दो पोतों में सूरत से जेद्दाह बंदरगाह पर १५७७ में पहुँचा और मक्का और मदीना को अग्रसर हुआ।मूसवी २००८ २४६ १५७७ से १५८० के बीच चार और कारवां हज को रवाना हुआ, जिनके साथ मक्का व मदीना के लोगों के लिये भेंटें व गरीबों के लिये सदके थे। ये यात्री समाज के आर्थिक रूप से निचले वर्ग के थे और इनके जाने से उन शहरों पर आर्थिक भार बढ़ा।ऑट्टोमन कोर्ट क्रॉनिक्लर्स मुहिम्मे दफ़्तर्लेरी, खण्ड ३२, पृ.२९२ फ़रमान ७४० शाबान ९८६ १५७८खान, इक्तिदार आलम अकबर एण्ड हिज़ एज https://archive.org/details/akbarhisage0000unse नॉर्दर्न बुक सेण्टर १९९९ 9788172111083 २१८ तब तुर्क प्रशासन ने इनसे घर लौट जाने का निवेदन किया, जिस पर हरम की स्त्रियां तैयार न हुईं। काफी विवाद के बाद उन्हें विवश होकर लौटना पढ़ा। अदन के राज्यपाल को १५८० में आये यात्रियों की बड़ी संख्या देखकर बढ़ा रोष हुआ और उसने लौटते हुए मुगलों का यथासंभव अपमान भी किया। अक्तूबर २००९ इन प्रकरणों के कारण अकबर को हाजियों की यात्राओं पर रोक लगानी पड़ी। १५८४ के बाद अकबर ने यमन के साम्राज्य के अधीनस्थ अदन के बंदरगाह पर पुर्तगालियों की मदद से चढ़ाई करने की योजना बनायी।अक्तूबर २००९ पुर्तगालियों से इस बारे में योजना बनाने हेतु एक मुगल दूत गोआ में अक्तूबर १५८४ से स्थायी रूप से तैनात किया गया। १५८७ में एक पुर्तगाली टुकड़ी ने यमन पर आक्रमण भी किया किन्तु तुर्क नौसेना द्वारा हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद मुगल-पुर्तगाली गठबंधन को भी धक्का पहुँचा क्योंकि मुगल जागीरदारों द्वारा जंज़ीरा में पुर्तगालियों पर लगातार दबाव डाला जा रहा था।ऑट्टोमन कोर्ट क्रॉनिक्लर्स मुहिम्मे दफ़्तर्लेरी, खण्ड ६२, पृ.२०५ फ़रमान ४५७ रबी उल अव्वल ९९६ १५८८
धर्म
अकबर एक मुसलमान था, पर दूसरे धर्म एवं सम्प्रदायों के लिए भी उसके मन में आदर था। जैसे-जैसे अकबर की आयु बढ़ती गई वैसे-वैसे उसकी धर्म के प्रति रुचि बढ़ने लगी। उसे विशेषकर हिंदू धर्म के प्रति अपने लगाव के लिए जाना जाता हैं। उसने अपने पूर्वजो से विपरीत कई हिंदू राजकुमारियों से शादी की। इसके अलावा अकबर ने अपने राज्य में हिन्दुओ को विभिन्न राजसी पदों पर भी आसीन किया जो कि किसी भी भूतपूर्व मुस्लिम शासक ने नहीं किया था। वह यह जान गया था कि भारत में लम्बे समय तक राज करने के लिए उसे यहाँ के मूल निवासियों को उचित एवं बराबरी का स्थान देना चाहिये।
हिन्दू धर्म पर प्रभाव
thumb|right|200px|अकबर इबादत-खाने में ईसाई धर्माप्रचारकों के साथ, १६०५ ईस्वी
हिन्दुओं पर लगे जज़िया १५६२ में अकबर ने हटा दिया, किंतु १५७५ में मुस्लिम नेताओं के विरोध के कारण वापस लगाना पड़ा,डे, उपेन्द्र नाथ १९७२ मुंशीराम मनोहरलाल द मुगल गवर्न्मेंट, ए.डी. १५५६-१७०७ १३४ हालांकि उसने बाद में नीतिपूर्वक वापस हटा लिया। जज़िया कर गरीब हिन्दुओं को गरीबी से विवश होकर इस्लाम की शरण लेने के लिए लगाया जाता था। यह मुस्लिम लोगों पर नहीं लगाया जाता था।दासगुप्ता, अजीत कुमार १९९३ राउटलेज 0415061954 हिस्ट्री ऑफ इंडियन इकॉनोमिक थॉट https://archive.org/details/historyofindiane0000dasg ४५ इस कर के कारण बहुत सी गरीब हिन्दू जनसंख्या पर बोझ पड़ता था, जिससे विवश हो कर वे इस्लाम कबूल कर लिया करते थे। फिरोज़ शाह तुगलक ने बताया है, कि कैसे जज़िया द्वारा इस्लाम का प्रसार हुआ था।हिन्दुओं पर लगे कर, अकबर काल में
अकबर द्वारा जज़िया और हिन्दू तीर्थों पर लगे कर हटाने के सामयिक निर्णयों का हिन्दुओं पर कुछ खास प्रभाव नहीं पड़ा, क्योंकि इससे उन्हें कुछ खास लाभ नहीं हुआ, क्योंकि ये कुछ अन्तराल बाद वापस लगा दिए गए।खान, इक्तिदार आलम १९६८ जर्नल ऑफ रॉयल एशियाटिक सोसाइटी १९६८ सं.१ २९-३६ अकबर ने बहुत से हिन्दुओं को उनकी इच्छा के विरुद्ध भी इस्लाम ग्रहण करवाया थाHabib 1997 84 इसके अलावा उसने बहुत से हिन्दू तीर्थ स्थानों के नाम भी इस्लामी किए, जैसे १५८३ में प्रयागराज को इलाहाबादकॉन्डर, जोसियाह २८२ द मॉडर्न ट्रैवलर: ए पॉपुलर डिस्क्रिप्शन १८२८ आर एच टिम्स किया गया।डीफहोल्ट्स, मार्गारेट; डीफ़होल्ट्स, ग्लेन; आचार्य, क्वेन्टाइन ८७ द वे वी वर: एन्ग्लो-इण्डियन क्रॉनिकल्स २००६ कैल्कटा तिलजल्लाह रिलीफ़ इंका.isbn=0975463934 अकबर के शासनकाल में ही उसके एक सिपहसालार हुसैन खान तुक्रिया ने हिन्दुओं को बलपूर्वक भेदभाव दर्शक बिल्लेहरबंस मुखिया द मुगल्स ऑफ इण्डिया https://archive.org/details/mughalsofindia0000mukh_n7o4 ब्लैकवेल प्रकाशन 9780631185550 १५३ २००४ उनके कंधों और बांहों पर लगाने को विवश किया था। निज्जर, बख्शीश सिंह १२८ पंजाब- अंडर द ग्रेट मुगल्स, १५२६-१७०७ १९६८ थाकर
ज्वालामुखी मन्दिर के संबंध में एक कथा काफी प्रचलित है। यह १५४२ से १६०५ के मध्य का ही होगा तभी अकबर दिल्ली का राजा था। ध्यानुभक्त माता जोतावाली का परम भक्त था। एक बार देवी के दर्शन के लिए वह अपने गाँववासियो के साथ ज्वालाजी के लिए निकला। जब उसका काफिला दिल्ली से गुजरा तो मुगल बादशाह अकबर के सिपाहियों ने उसे रोक लिया और राजा अकबर के दरबार में पेश किया। अकबर ने जब ध्यानु से पूछा कि वह अपने गाँववासियों के साथ कहां जा रहा है तो उत्तर में ध्यानु ने कहा वह जोतावाली के दर्शनो के लिए जा रहे है। अकबर ने कहा तेरी माँ में क्या शक्ति है ? और वह क्या-क्या कर सकती है ? तब ध्यानु ने कहा वह तो पूरे संसार की रक्षा करने वाली हैं। ऐसा कोई भी कार्य नहीं है जो वह नहीं कर सकती है। अकबर ने ध्यानु के घोड़े का सर कटवा दिया और कहा कि अगर तेरी माँ में शक्ति है तो घोड़े के सर को जोड़कर उसे जीवित कर दें। यह वचन सुनकर ध्यानु देवी की स्तुति करने लगा और अपना सिर काट कर माता को भेट के रूप में प्रदान किया। माता की शक्ति से घोड़े का सर जुड गया। इस प्रकार अकबर को देवी की शक्ति का एहसास हुआ। बादशाह अकबर ने देवी के मन्दिर में सोने का छत्र भी चढाया। किन्तु उसके मन में अभिमान हो गया कि वो सोने का छत्र चढाने लाया है, तो माता ने उसके हाथ से छत्र को गिरवा दिया और उसे एक अजीब (नई) धातु का बना दिया जो आज तक एक रहस्य है। यह छत्र आज भी मन्दिर में मौजूद है।
इतिहासकार दशरथ शर्मा बताते हैं, कि हम अकबर को उसके दरबार के इतिहास और वर्णनों जैसे अकबरनामा, आदि के अनुसार महान कहते हैं।पालीवाल, डॉ॰डी एल (शिक्षा) महाराणा प्रताप स्मृति ग्रंथ साहित्य संस्थान राजस्थान विद्यापीठ १८२ यदि कोई अन्य उल्लेखनीय कार्यों की ओर देखे, जैसे दलपत विलास, तब स्पष्ट हो जाएगा कि अकबर अपने हिन्दू सामंतों से कितना अभद्र व्यवहार किया करता था।पालीवाल, डॉ॰डी एल (शिक्षा) महाराणा प्रताप स्मृति ग्रंथ साहित्य संस्थान राजस्थान विद्यापीठ १८३ अकबर के नवरत्न राजा मानसिंह द्वारा विश्वनाथ मंदिर के निर्माण को अकबर की अनुमति के बाद किए जाने के कारण हिन्दुओं ने उस मंदिर में जाने का बहिष्कार कर दिया। कारण साफ था, कि राजा मानसिंह के परिवार के अकबर से वैवाहिक संबंध थे।उदयकुमार, एस पी ९९ प्रेज़ेन्टिंग द पास्ट: एंक्शियस हिस्ट्री एण्ड एन्क्शियंट फ्यूचर इन हिन्दुत्व इंडिया https://archive.org/details/presentingpastan0000uday २००५ ग्रीनवुड प्रकाशन गृह 0275972097 अकबर के हिन्दू सामंत उसकी अनुमति के बगैर मंदिर निर्माण तक नहीं करा सकते थे। बंगाल में राजा मानसिंह ने एक मंदिर का निर्माण बिना अनुमति के आरंभ किया, तो अकबर ने पता चलने पर उसे रुकवा दिया और १५९५ में उसे मस्जिद में बदलने के आदेश दिए।फ़ोर्ब्स, जेराल्डिन; टॉम्लिसन, बी आर ७३ द न्यू कॅम्ब्रिज हिस्ट्री ऑफ़ इण्डिया https://archive.org/details/architectureofmu0000ashe २००५ कॅम्ब्रिज युनिवर्सिटी प्रेस 0521267285
|200px|thumb|left|अकबर का मकबरा, सिकंदरा
अकबर के लिए आक्रोश की हद एक घटना से पता चलती है। हिन्दू किसानों के एक नेता राजा राम ने अकबर के मकबरे, सिकंदरा, आगरा को लूटने का प्रयास किया, जिसे स्थानीय फ़ौजदार, मीर अबुल फजल ने असफल कर दिया। इसके कुछ ही समय बाद १६८८ में राजा राम सिकंदरा में दोबारा प्रकट हुआ महाजन, वी डी; १६८ हिस्ट्री ऑफ मेडीवियल इण्डिया एस चांद 8121903645 और शाइस्ता खां के आने में विलंब का फायदा उठाते हुए, उसने मकबरे पर दोबारा सेंध लगाई और बहुत से बहुमूल्य सामान, जैसे सोने, चाँदी, बहुमूल्य कालीन, चिराग, इत्यादि लूट लिए, तथा जो ले जा नहीं सका, उन्हें बर्बाद कर गया। राजा राम और उसके आदमियों ने अकबर की अस्थियों को खोद कर निकाल लिया एवं जला कर भस्म कर दिया, जो कि मुस्लिमों के लिए घोर अपमान का विषय था। मनुसी, निक्कालाओ; जॉन मर्रे मोगोर, स्टोरिया १९०७ ३१९
हिंदु धर्म से लगाव
बाद के वर्षों में अकबर को अन्य धर्मों के प्रति भी आकर्षण हुआ। अकबर का हिंदू धर्म के प्रति लगाव केवल मुग़ल साम्राज्य को ठोस बनाने के ही लिए नहीं था वरन उसकी हिंदू धर्म में व्यक्तिगत रुचि थी। हिंदू धर्म के अलावा अकबर को शिया इस्लाम एवं ईसाई धर्म में भी रुचि थी। ईसाई धर्म के मूलभूत सिद्धांत जानने के लिए उसने एक बार एक पुर्तगाली ईसाई धर्म प्रचारक को गोआ से बुला भेजा था। अकबर ने दरबार में एक विशेष जगह बनवाई थी जिसे इबादत-खाना (प्रार्थना-स्थल) कहा जाता था, जहाँ वह विभिन्न धर्मगुरुओं एवं प्रचारकों से धार्मिक चर्चाएं किया करता था। उसका यह दूसरे धर्मों का अन्वेषण कुछ मुस्लिम कट्टरपंथी लोगों के लिए असहनीय था। उन्हे लगने लगा था कि अकबर अपने धर्म से भटक रहा है। इन बातों में कुछ सच्चाई भी थी, अकबर ने कई बार रुढ़िवादी इस्लाम से हट कर भी कुछ फैसले लिए, यहाँ तक कि १५८२ में उसने एक नये सम्प्रदाय की ही शुरुआत कर दी जिसे दीन-ए-इलाही यानी ईश्वर का धर्म कहा गया।
सुलह-ए-कुल
thumb|left|अकबर के मकबरे का प्रवेशद्वार
|200px|thumb|फतेहपुर सीकरी का बुलन्द दरवाज़ा
दीन ए इलाही
दीन-ए-इलाही नाम से अकबर ने १५८२ मेंभारतीय इतिहास और विश्व में महत्वपूर्ण तिथियाँजून 2020 InternetArchiveBot । भारत विकास द्वार एक नया धर्म बनाया जिसमें सभी धर्मो के मूल तत्वों को डाला, इसमे प्रमुखतः हिंदू एवं इस्लाम धर्म थे।जलाल उद्दीन मोहम्मद अकबर। सक्सेस मंत्रा। अरविन्द शुक्ला। १५ अक्तूबर इनके अलावा पारसी, जैन एवं ईसाई धर्म के मूल विचारों को भी सम्मिलित किया। हालांकि इस धर्म के प्रचार के लिए उसने कुछ अधिक उद्योग नहीं किये केवल अपने विश्वस्त लोगो को ही इसमे सम्मिलित किया। कहा जाता हैं कि अकबर के अलावा केवल राजा बीरबल ही मृत्यु तक इस के अनुयायी थे। दबेस्तान-ए-मजहब के अनुसार अकबर के पश्चात केवल १९ लोगो ने इस धर्म को अपनाया।http://www.britannica.com/eb/article-9030480/Din-i-Ilahi दीन-ए-इलाही ब्रितानिका ज्ञानकोश 31 जनवरी 2009 https://web.archive.org/web/20080514090902/http://www.britannica.com/eb/article-9030480/Din-i-Ilahi 14 मई 2008 live भारतीय परिप्रेक्ष्य में धर्मनिरपेक्षता https://web.archive.org/web/20100531005936/http://www.srijangatha.com/Alekh3_2k10 31 मई 2010 । कृ्ष्ण कुमार यादव। ३ मार्च २०१०। पोर्ट ब्लेयर कालांतर में अकबर ने एक नए पंचांग की रचना की जिसमें कि उसने एक ईश्वरीय संवत को आरम्भ किया जो उसके ही राज्याभिषेक के दिन से प्रारम्भ होता था। उसने तत्कालीन सिक्कों के पीछे ‘‘अल्लाह-ओ-अकबर’’ लिखवाया जो अनेकार्थी शब्द था।दीन-ए-इलाही। ब्रज डिस्कवरी अकबर का शाब्दिक अर्थ है "महान" और ‘‘अल्लाह-ओ-अकबर’’ शब्द के दो अर्थ हो सकते थे "अल्लाह महान हैं " या "अकबर ही अल्लाह हैं"।http://www.ucalgary.ca/applied_history/tutor/islam/empires/mughals/akbar.html महान इस्लामिक साम्राज्यों का उदय (मुग़ल साम्राज्य : अकबर) 31 जनवरी 2009 https://web.archive.org/web/20090407041624/http://www.ucalgary.ca/applied_history/tutor/islam/empires/mughals/akbar.html 7 अप्रैल 2009 dead https://web.archive.org/web/20090407041624/http://www.ucalgary.ca/applied_history/tutor/islam/empires/mughals/akbar.html 7 अप्रैल 2009 दीन-ए-इलाही सही मायनो में धर्म न होकर एक आचार संहिता के समान था। इसमे भोग, घमंड, निंदा करना या दोष लगाना वर्जित थे एवं इन्हे पाप कहा गया। दया, विचारशीलता और संयम इसके आधार स्तम्भ थे।अकबर महान https://web.archive.org/web/20100814095147/http://pustak.org/bs/home.php?bookid=3982 14 अगस्त 2010। धरमपाल बारिया। मनोज पब्लिकेशन। अप्रैल ०२, २००५।ISBN 81-8133-613-5|
यह तर्क दिया गया है कि दीन-ए-इलैही का एक नया धर्म होने का सिद्धांत गलत धारणा है, जो कि बाद में ब्रिटिश इतिहासकारों द्वारा अबुल फजल के कार्यों के गलत अनुवाद के कारण पैदा हुआ था। हालांकि, यह भी स्वीकार किया जाता है कि सुलह-ए-कुल की नीति,https://scroll.in/article/855307/why-do-indians-celebrate-rulers-like-tipu-and-shivaji-but-not-the-greatest-of-them-all-akbar Tipu Jayanti debate: Akbar is the hero India should really celebrate 2 दिसंबर 2017 https://web.archive.org/web/20181231111755/https://scroll.in/article/855307/why-do-indians-celebrate-rulers-like-tipu-and-shivaji-but-not-the-greatest-of-them-all-akbar 31 दिसंबर 2018 dead जिसमें दीन-ई-इलैही का सार था, अकबर ने केवल धार्मिक उद्देश्यों के लिए नहीं बल्कि सामान्य शाही प्रशासनिक नीति का एक भाग के रूप में अपनाया था। इसने अकबर की धार्मिक सहानुभूति की नीति का आधार बनाया। 1605 में अकबर की मौत के समय उनके मुस्लिम विषयों में असंतोष का कोई संकेत नहीं था, और अब्दुल हक जैसे एक धर्मशास्त्री की धारणा थी कि निकट संबंध बने रहे।
र्वधर्म मैत्री सुलह-ए-कुल सूफियों का मूल सिद्धांत रहा है। प्रसिद्ध सूफी शायर रूमी के पास एक व्यक्ति आया और कहने लगा- एक मुसलमान एक ईसाई से सहमत नहीं होता और ईसाई यहूदी से। फिर आप सभी धर्मो से कैसे सहमत हैं? रूमी ने हंसकर जवाब दिया- मैं आपसे भी सहमत हूं। सूफी संत ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती ने सुलह-ए-कुल का सिद्धांत दिया, जिसे अकबर ने प्रतिपादित किया।
अकबर के नवरत्न
thumb|130px|राजा बीरबल
अकबर के नवरत्न
निरक्षर होते हुई भी अकबर को कलाकारों एवं बुद्धिजीवियो से विशेष प्रेम था। उसके इसी प्रेम के कारण अकबर के दरबार में नौ (९) अति गुणवान दरबारी थे जिन्हें अकबर के नवरत्न के नाम से भी जाना जाता है।अकबर के नवरत्न कौन थे? https://web.archive.org/web/20120128104626/http://jindgikipaathshala.blogspot.com/2009/02/blog-post_1368.html 28 जनवरी 2012 ज़िंगगी की पाठशाला। भावेश। २ फ़रवर्री, २०१०अकबर के नवरत्न https://web.archive.org/web/20171226161541/http://hi.brajdiscovery.org/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%95%E0%A4%AC%E0%A4%B0_%E0%A4%95%E0%A5%87_%E0%A4%A8%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A8 26 दिसंबर 2017 । ब्रज डिस्कवरी
अबुल फजल (१५५१ - १६०२) ने अकबर के काल को कलमबद्ध किया था। उसने अकबरनामा की भी रचना की थी। इसने ही आइन-ए-अकबरी भी रचा था।
फैजी (१५४७ - १५९५) अबुल फजल का भाई था। वह फारसी में कविता करता था। राजा अकबर ने उसे अपने बेटे के गणित शिक्षक के पद पर नियुक्त किया था।
मिंया तानसेन अकबर के दरबार में गायक थे। वह कविता भी लिखा करते थे।
राजा बीरबल (१५२८ - १५८३) दरबार के विदूषक और अकबर के सलाहकार थे। ये परम बुद्धिमान कहे जाते हैं। इनके अकबर के संग किस्से आज भी कहे जाते हैं।
राजा टोडरमल अकबर के वित्त मंत्री थे। इन्होंने विश्व की प्रथम भूमि लेखा जोखा एवं मापन प्रणाली तैयार की थी।
राजा मान सिंह आम्बेर (जयपुर) के कच्छवाहा राजपूत राजा थे। वह अकबर की सेना के प्रधान सेनापति थे।
अब्दुल रहीम खान-ऐ-खाना एक कवि थे और अकबर के संरक्षक बैरम खान के बेटे थे।
फकीर अजिओं-दिन अकबर के सलाहकार थे।
मुल्लाह दो पिअज़ा अकबर के सलाहकार थे।
फिल्म एवं साहित्य में
अकबर का व्यक्तित्व बहुचर्चित रहा है। इसलिए भारतीय साहित्य एवं सिनेमा ने अकबर से प्रेरित कई पात्र रचे गए हैं।
२००८ में आशुतोष गोवरिकर निर्देशित फिल्म जोधा अकबर में अकबर एवं उनकी पत्नी की कहानी को दर्शाया गया है। अकबर एवं जोधा बाई का पात्र क्रमशः ऋतिक रोशन एवं ऐश्वर्या राय ने निभाया है।
१९६० में बनी फिल्म मुग़ल-ए-आज़म भारतीय सिनेमा की एक लोकप्रिय फिल्म है। इसमें अकबर का पात्र पृथ्वीराज कपूर ने निभाया था। इस फिल्म में अकबर के पुत्र सलीम की प्रेम कथा और उस कारण से पिता पुत्र में पैदा हुए द्वंद को दर्शाया गया है। सलीम की भूमिका दिलीप कुमार एवं अनारकली की भूमिका मधुबाला ने निभायी थी।
१९९० में जी टीवी ने अकबर-बीरबल नाम से एक धारावाहिक प्रसारित किया था जिसमें अकबर का पात्र हिंदी अभिनेता विक्रम गोखले ने निभाया था।
नब्बे के दशक में संजय खान कृत धारावाहिक अकबर दी ग्रेट दूरदर्शन पर प्रदर्शित किया गया था।
प्रसिद्ध अंग्रेजी साहित्यकार सलमान रुशदी के उपन्यास दी एन्चैन्ट्रेस ऑफ़ फ्लोरेंस (अंग्रेज़ी:The Enchantress of Florence) में अकबर एक मुख्य पात्र है।http://www.guardian.co.uk/books/2008/mar/29/fiction.salmanrushdie एन्चैन्ट्रेस ऑफ़ फ्लोरेंस की समीक्षा 10 जून 2009 https://web.archive.org/web/20090322033309/http://www.guardian.co.uk/books/2008/mar/29/fiction.salmanrushdie 22 मार्च 2009 live
मुग़ल सम्राटों का कालक्रम
इन्हें भी देखें
मुगल-ए-आज़म (1960 फ़िल्म)
जोधा अकबर (2008 फ़िल्म)
अकबर का मकबरा
अकबर के नवरत्न
अकबरनामा
सन्दर्भ
30em
बाहरी कड़ियाँ
Akbar, Jellaladin Mahommed
जोधा-अकबर (फिल्म)जून 2020 InternetArchiveBot अकबर के उत्थान की कहानी
अकबर महान पुस्तक देखें
मुगल वंश १५ अक्तूबर १५४२ २७ अक्तूबर १६०५
हुमायुं
मुगल सम्राट १५५६-१६०५
जहांगीर
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