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घोसी जनजाति
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हिन्दू घोसी हिन्दू घोषी
घोसी या गोसी, उत्तर भारत मे पाया जाने वाली एक मुस्लिम जाति है।Kumar Suresh Singh Amir Hasan Baqr Raza Rizvi J. C. Das, Anthropological Survey of India People of India: Uttar Pradesh http://books.google.com/books?id=bBdWAAAAYAAJ 1 June 2011 2005 Anthropological Survey of India 978-81-7304-114-3 542–545 घोसी का शाब्दिक अर्थ है - गो सेवक( गोपालक/ अहीर) घोसी का तत्सम घोष शब्द है जो कि वैदिक शब्द गोष= वैदिक ऋचाओं में विद्यमान गोष:शब्द लौकिक संस्कृत को घोष शब का ही पूर्व रूप ही है। जिसका अर्थ होता है - गायों का पालन करने वाला / अथवा गोसेवा करने वाला" गोपाल-
ऋग्वेद के दशम मण्डल के (95) वें सूक्त की सम्पूर्ण (18) ऋचाऐं " पुरूरवा और उर्वशी के संवाद रूप में है। जिसमें पुरूरवा के विशेषण गोष ( घोष- गोप) तथा गोपीथ- हैं । अत: पुरुरवा एक गो- पालक सम्राट् भी था।
इषुर्न श्रिय इषुधेरसना गोषाः शतसा न रंहिः ।
गोषा -गां सनोति सेवयति सन् (षण् ) धातु विट् प्रत्यय। अर्थात् --जो गाय की सेवा करता है वह गोष: है। । गोदातरि “गोषा इन्द्रीनृषामसि” “ शर्म्मन् दिविष्याम पार्य्ये गोषतमाः”
ऋग्वेद- ६।३३ ।५। अत्र “घरूपेत्यादि” पाणिनि- सूत्र गोषा शब्दस्य तमपि परे ह्रस्वः ।
गोषन् (गोष:)गां सनोति सन--विच् । “सनोतेरनः” पा० नान्तस्य नित्यषत्वनिषेधेऽपि पूर्वपदात् वा षत्वम् । गोदातरि “शंसामि गोषणो नपात्” (ऋग्वेद ४ । ३२ । २२ ।)
गोष: = गां सनोति (सेवयति) सन् (षण् धातु =संभक्तौ/भक्ति/दाने च) +विट् ङा । सनोतेरनः” पा० षत्वम् । अर्थात "गो शब्द में षन् धातु का "ष" रूप शेष रहने पर(गो+षन्)= गोष: शब्द बना - जिसका अर्थ है । गो सेवक अथवा गोपालक।
उपर्युक्त ऋचाओं में गोषन् तथा गोषा शब्द गोसेवक के वाचक हैं। लौकिक भाषा में यही घोष रूप में यादवों की गोपालन वृत्ति को सूचित करने लगा ।
यह लोग दुधारू पशुओं को चराने व दुग्ध विक्रय का कार्य करते हैं।
सन्दर्भ
( ऋग्वेद-10/95/3)
श्रेणी:मुस्लिम