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कोणार्क सूर्य मंदिर

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कोणार्क सूर्य मंदिर हिन्दू धर्म Konark Sun Temple - Eastern Corner View.jpg 280px कोणार्क सूर्य मंदिर का दृश्य कोणार्क सूर्य मन्दिर का पूर्वी कोने से विहंगम दृश्य India Odisha yes ओडिशा (भारत) में कोणार्क सूर्य मंदिर की अवस्थिति 19 53 15 N 86 5 41 E inline,title dms सूर्य कोणार्क पुरी ओडिशा चन्द्रभागा मेला, कोणार्क नृत्य महोत्सव भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) कलिंग वास्तुकला (रथ शैली) राजा नरसिंहदेव प्रथम लगभग 1250 ई. संरक्षित स्मारक 10.62 ha acre on पूर्व बलुआ पत्थर, खोंडालाइट और क्लोराइट https://odishatourism.gov.in WHS कोणार्क सूर्य मंदिर सांस्कृतिक (i), (iii), (vi) 246 1984 MANI राष्ट्रीय महत्व का स्मारक N-OR-63 संग्रह मंडल ओडिशा कोणार्क सूर्य मंदिर भारत के ओडिशा राज्य के पुरी जिले में समुद्र तट पर, पुरी शहर से लगभग 35 किलोमीटर (22 मील) उत्तर-पूर्व में स्थित कोणार्क कस्बे में एक 13वीं शताब्दी (लगभग 1250 ई.) का ऐतिहासिक सूर्य मंदिर है।https://whc.unesco.org/en/list/246/ Sun Temple, Konârak UNESCO World Heritage Centre UNESCO World Heritage Centre en 2026-05-13 इस मंदिर के निर्माण का श्रेय पूर्वी गंगवंश के शासक प्रथम नरसिंह देव को दिया जाता है। सन् 1984 में यूनेस्को ने इसके स्थापत्य और ऐतिहासिक महत्व को देखते हुए इसे विश्व धरोहर स्थल के रूप में मान्यता दी थी। पौराणिक महत्त्व यह मन्दिर मुख्य रूप से सूर्य देव को समर्पित है, जिन्हें स्थानीय स्तर पर 'बिरंचि-नारायण' के नाम से भी जाना जाता था। इसी कारण प्राचीन काल में इस क्षेत्र को 'अर्क-क्षेत्र' (अर्क = सूर्य) या 'पद्म-क्षेत्र' कहा जाता था।https://www.google.co.in/books/edition/Sri_Jagannath_Puri_Hindi/t3zlEAAAQBAJ?hl=en&gbpv=1&dq=%E0%A4%AA%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%AE-%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A5%87%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0&pg=PA12&printsec=frontcover Sri Jagannath Puri (Hindi) Dasa Sarvasakshi 2018-01-01 Golden Age Media Private Limited 978-81-935795-0-3 hi इस स्थान का महत्व हिंदू पौराणिक कथाओं, विशेषकर साम्ब पुराण और भविष्य पुराण में विस्तार से वर्णित है। इन कथाओं के अनुसार, श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब को एक श्राप के कारण कुष्ठ रोग हो गया था। अपनी रोगमुक्ति के लिए साम्ब ने मित्रवन में चंद्रभागा नदी के सागर संगम (वर्तमान कोणार्क) पर बारह वर्षों तक कठोर तपस्या करके सूर्य देव को प्रसन्न किया था।Kapila Vatsyayan The Square and the Circle of the Indian Arts https://www.google.co.in/books/edition/The_Square_and_the_Circle_of_the_Indian/vwLJc3pBzzUC?hl=en&gbpv=0 1997 Abhinav Publications 978-81-7017-362-5 69 मान्यता है कि सूर्यदेव की कृपा से साम्ब पूरी तरह रोगमुक्त हो गए, जिसके पश्चात् उन्होंने कृतज्ञता स्वरूप सूर्य भगवान का एक मन्दिर बनवाने का निश्चय किया। कथा के अनुसार, चंद्रभागा नदी में स्नान करते समय साम्ब को सूर्यदेव की एक मूर्ति प्राप्त हुई। कहा जाता है कि इस मूर्ति का निर्माण देवशिल्पी विश्वकर्मा ने स्वयं सूर्यदेव के तेज से किया था। साम्ब ने इस पवित्र मूर्ति को मित्रवन में स्थापित किया, और तब से कोणार्क का यह स्थान एक प्रमुख तीर्थस्थल के रूप में विख्यात हो गया।Mitra 1968 3 550px|center|thumb|कोणार्क मन्दिर का विहंगम दृश्य इतिहास thumb|left|250px|कोणार्क में सूक्ष्म पाषाण कला, जो 13वीं शताब्दी के ओडिशा के वैभव को दर्शाती है। ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार, कोणार्क सूर्य मंदिर का निर्माण पूर्वी गंगवंश के शासक नरसिंहदेव प्रथम (शासनकाल: 1238–1264 ई.) के शासनकाल के दौरान लगभग 1250 ई. में करवाया गया था। मंदिर के निर्माण का सबसे प्रामाणिक विवरण 'बाया चकाड़ा' नामक प्राचीन ओडिया दस्तावेज़ से प्राप्त होता है। ताड़ के पत्तों पर लिखे इस दस्तावेज़ में मंदिर के निर्माण कार्य और इसमें लगे 12 वर्षों का विस्तृत लेखा-जोखा मौजूद है। इसी दस्तावेज़ से निर्माण रसद का एक रोचक तथ्य भी सामने आता है कि भारी पत्थरों को ढोने के लिए चंद्रभागा नदी की एक सहायक जलधारा का उपयोग किया गया था, जिसे 'पाथर बुहा नाला' कहा जाता था। कारीगर इसी नाले के किनारे पत्थरों को तराशते थे और नावों या बेड़ों के ज़रिए उन्हें सीधे निर्माण स्थल तक भेजते थे।http://archive.org/details/newlightonsuntem0000alic new light on the sun temple of konarka Alice boner sadasiva rath sarma 1972 chowkhamba sanskrit series office Internet Archive मंदिर के मूल और पूर्ण स्वरूप का ऐतिहासिक साक्ष्य एक प्राचीन ताड़पत्र पांडुलिपि से भी मिलता है। खुर्दा के राजा पुरुषोत्तम देव द्वारा 1610 ई. में 'करणी लिपि' में तैयार किया गया 23 पृष्ठों का यह रेखाचित्र एकमात्र ऐसा ऐतिहासिक प्रमाण है, जो दर्शाता है कि ढहने से पहले मंदिर अपने पूर्ण स्वरूप (अरुण स्तंभ सहित) में कैसा दिखता था।Boner Alice New Light on the Sun Temple of Koṇārka 1972 Chowkhamba Sanskrit Series 40-42 यद्यपि कुछ पुराने मतों में यह अनुमान लगाया गया था कि राजा की अकाल मृत्यु के कारण मंदिर का निर्माण कार्य अधूरा रह गया था और यही इसके ध्वंस का कारण बना, परंतु आधुनिक ऐतिहासिक शोध और साक्ष्य इस मत का समर्थन नहीं करते हैं।Mitra 1968 5-8 पुरी के 'मादला पांजी' और 1278 ई. के ताम्रपत्रों के विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि नरसिंहदेव प्रथम ने लंबे समय तक शासन किया और उनके समय में मंदिर न केवल पूर्ण हुआ, बल्कि वहां नियमित पूजा-अर्चना भी होती थी।Burton Stein David Arnold A History of India https://books.google.com/books?id=QY4zdTDwMAQC 2010 John Wiley & Sons 978-1-4443-2351-1 211-212 स्थापत्य विज्ञान और इंजीनियरिंग thumb|250px|मुख्य मंदिर तीन मंडपों में बना था। इनमें से दो मण्डप ढह चुके हैं। कोणार्क शब्द दो शब्दों 'कोण' और 'अर्क' के मेल से बना है। अर्क का अर्थ 'सूर्य' होता है, जबकि कोण से अभिप्राय कोने या किनारे से है। इस सूर्य मंदिर का निर्माण लाल बलुआ पत्थर, खोंडालाइट और क्लोराइट पत्थरों से हुआ है। कलिंग वास्तुकला और खगोलीय सूर्यघड़ी left Plan-temple-konarak.png 210 Plan of Sun Temple of Konark, Orissa, India - HU version.svg 120 (बाएँ) मंदिर का मूलरूप तथा वर्तमान अवशेष (हल्के पीले में) ; (दाएँ) मंदिर का आधार (प्लान) यह मंदिर कलिंग वास्तुकला की 'रथ शैली' में निर्मित है।George Michell The Hindu Temple: An Introduction to Its Meaning and Forms https://archive.org/details/hindutempleintro0000mich 1988 University of Chicago Press 978-0-226-53230-1 144 सम्पूर्ण मंदिर स्थल को सूर्य देव के एक विशाल रथ के रूप में उकेरा गया है। इस रथ में 12 जोड़ी नक्काशीदार पहिए लगे हैं, जिन्हें सात घोड़ों द्वारा खींचते हुए दर्शाया गया है। वर्तमान में इन सातों में से केवल एक ही घोड़ा शेष बचा है। मंदिर के आधार पर बने ये 24 पहिए केवल सजावटी नहीं हैं, बल्कि यह एक सटीक खगोलीय सूर्यघड़ी के रूप में कार्य करते हैं। प्रत्येक पहिए में 8 चौड़ी तीलियाँ होती हैं, जो एक दिन के 8 'प्रहर' को दर्शाती हैं। यह प्राचीन भारतीय खगोल विज्ञान की उस अभूतपूर्व सटीकता को प्रमाणित करता है जिसके ज़रिए उस दौर में परछाई से मिनटों तक का समय मापा जाता था। इसके अतिरिक्त, वास्तुकला में विशाल पत्थरों को जोड़ने के लिए उन्नत लौह तकनीक का प्रयोग किया गया था, जो 13वीं सदी के भारतीय इंजीनियरों की वैज्ञानिक गहराई को दर्शाता है।George Michell The Hindu Temple: An Introduction to Its Meaning and Forms https://books.google.com/books?id=ajgImLs62gwC 1988 University of Chicago Press 978-0-226-53230-1 144 मंदिर की संरचना और सहायक मंदिर मूल रूप से मंदिर की संरचना तीन मंडपों में विभाजित थी। मुख्य गर्भगृह का विमान (शिखर) ऐतिहासिक रूप से लगभग 229 फीट (70 मीटर) ऊँचा था, जो अब ढह चुका है। वर्तमान में जो मुख्य संरचना शेष खड़ी है, वह 128 फीट (39 मीटर) ऊँचा 'जगमोहन' (दर्शक कक्ष) है। 'नट मंदिर' इसके सामने उसी अक्ष पर स्थित एक अलग संरचना है। मुख्य मंदिर के अतिरिक्त, इस प्रांगण में दो अत्यंत महत्वपूर्ण सहायक मंदिर भी स्थित हैं: मायादेवी मंदिर: यह मुख्य मंदिर के ठीक पश्चिम में स्थित है। यह 11वीं सदी का पुराना मंदिर है जो कोणार्क के वर्तमान मंदिर से भी प्राचीन माना जाता है।Mitra 1968 20-22 वैष्णव मंदिर: वर्ष 1956 की पुरातात्विक खुदाई में ईंटों से निर्मित इस मंदिर की खोज हुई थी, जिसमें बलराम और वराह की मूर्तियां प्राप्त हुई हैं। यह प्रमाणित करता है कि यहाँ सूर्य पूजा के साथ वैष्णववाद को भी समान महत्व प्राप्त था।Mitra 1968 24-25 मूर्तिकला की विशिष्टताएँ thumb|right|250px|कोणार्क सूर्य मंदिर की 13वीं शताब्दी की पाषाण नक्काशी। मंदिर परिसर में सूर्य भगवान की तीन विशिष्ट पाषाण प्रतिमाएं स्थापित हैं, जो दिन के अलग-अलग समय और हिंदू त्रिमूर्ति का प्रतिनिधित्व करती हैं: प्रातःकालीन सूर्य (ब्रह्मा - सृष्टिकर्ता के रूप में) मध्याह्न सूर्य (शिव - संहारकर्ता के रूप में) संध्याकालीन सूर्य (विष्णु - पालनकर्ता के रूप में) इन मूर्तियों की सबसे बड़ी ऐतिहासिक विशेषता इनका 'उदीच्यवेश' (उत्तरी पोशाक) है। इन मूर्तियों में सूर्य देव को पारसी या ईरानी शैली के जूते पहने हुए दिखाया गया है, जो प्राचीन भारत की सूर्य पूजा की परंपरा पर मध्य-एशियाई और बाहरी प्रभावों को स्पष्ट रूप से दर्शाता है।Thomas E. Donaldson Konark https://archive.org/details/konark0000dona 2003 Oxford University Press 978-0195664898 35 thumb|left|250px|कोणार्क में कामुक मुद्राओं की एक पाषाण शिल्प कृति इसके अतिरिक्त, पूरे मंदिर की बाहरी दीवारों, आधार और पहियों पर 13वीं शताब्दी की पाषाण नक्काशी उकेरी गई है। यह मंदिर अपनी कामुक मुद्राओं वाली शिल्पाकृतियों के लिए भी जाना जाता है, जो मुख्यतः जगमोहन के द्वितीय स्तर पर उकेरी गई हैं। इन मूर्तियों को वास्तुकला और तांत्रिक मान्यताओं की दृष्टि से मानव जीवन तथा सृजन के प्रतीक के रूप में देखा जाता है।George Michell The Hindu Temple: An Introduction to Its Meaning and Forms https://books.google.com/books?id=ajgImLs62gwC 1988 University of Chicago Press 978-0-226-53230-1 145 ध्वंस के कारण कोणार्क सूर्य मंदिर के मुख्य विमान (शिखर) के ध्वंस के कारणों को मुख्य रूप से तीन श्रेणियों में विभाजित किया जाता है: 1. प्राकृतिक कारण वास्तुशिल्प के भारीपन के साथ-साथ प्राकृतिक क्षरण इसके पतन का एक बड़ा कारण बना। मंदिर मुख्य रूप से 'खोंडालाइट' पत्थरों से बना था, जो समय के साथ मौसम की मार नहीं झेल सके। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के अनुसार, समुद्र की नम और खारी हवाओं के प्रभाव से पत्थरों को जोड़ने वाली लोहे की पट्टियों में गंभीर रूप से जंग लग गया, जिससे 70 मीटर ऊँची इस विशाल संरचना का संतुलन बिगड़ गया और वह भरभरा कर गिर गई।Mitra 1968 10-12 2. ऐतिहासिक आक्रमण मंदिर के आंशिक ध्वंस का एक प्रमुख ऐतिहासिक कारण बंगाल के सुल्तान के सेनापति 'कालापहाड़' का आक्रमण माना जाता है। 1568 ई. में ओडिशा पर आक्रमण के दौरान कालापहाड़ ने कोणार्क मंदिर की 'दधिनौति' (केन्द्रीय मेहराब शिला) को विस्थापित कर दिया था। मुख्य शिला हटने के कारण मंदिर का शिखर अत्यंत कमजोर हो गया और कालांतर में तेज तूफानों के कारण ढह गया। 3. चुंबक का मिथक (लोककथा) ध्वंस को लेकर एक अत्यधिक प्रचलित मिथक यह भी है कि मंदिर के मुख्य शिखर पर एक विशाल चुंबक लगा था, जिसके चुंबकीय प्रभाव से मंदिर के गर्भगृह में मुख्य सूर्य प्रतिमा हवा में तैरती रहती थी। किंवदंती है कि विदेशी नाविकों ने अपने जहाजों के दिशा-सूचक यंत्रों को बचाने के लिए इस चुंबक को निकाल लिया, जिससे मंदिर का संतुलन बिगड़ा और वह ढह गया। हालाँकि, आधुनिक पुरातात्विक शोधों में स्पष्ट किया गया है कि यह केवल एक किंवदंती है और ऐसे किसी भी चुम्बकीय पत्थर या तैरती मूर्ति का कोई वैज्ञानिक या ऐतिहासिक आधार नहीं है। लोककथाएँ (धर्मपाद का बलिदान) thumb|right|250px|कोणार्क सूर्य मंदिर का सम्मुख दृश्य (2006) कोणार्क सूर्य मंदिर के निर्माण से ओडिशा की एक बहुत ही प्रसिद्ध और भावुक लोककथा जुड़ी है। मान्यता है कि गंग वंश के शासक नरसिंहदेव प्रथम के आदेश पर 1,200 कारीगरों के दल को मंदिर शिखर पर अंतिम केन्द्रीय शिला स्थापित करने में कठिनाई आ रही थी। इसका समाधान मुख्य वास्तुकार बिसु महाराणा के 12 वर्षीय पुत्र धर्मपाद ने किया। कथा के अनुसार, समय पर कार्य पूर्ण न कर पाने वाले अन्य 1,200 कारीगरों को राजा के संभावित मृत्युदंड से बचाने के लिए, धर्मपाद ने उसी रात मंदिर के शिखर से चंद्रभागा नदी में कूदकर अपने प्राणों की आहुति दे दी। हालाँकि, यह विशुद्ध रूप से एक स्थानीय लोककथा है और इसका कोई ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है। पूजा-अर्चना में बाधाएँ और मूल मूर्ति की स्थिति 1568 ई. के पश्चात् ओडिशा में हुए राजनीतिक परिवर्तनों और आक्रमणों के कारण हिंदू मंदिरों की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंताएँ उत्पन्न हो गई थीं।http://orissagov.nic.in/e-magazine/Orissareview/jun2004/englishpdf/gloom.pdf Gloom and Bloom: The Case of Jagannath Temple orissagov.nic.in https://web.archive.org/web/20090410033805/http://orissagov.nic.in/e-magazine/Orissareview/jun2004/englishpdf/gloom.pdf 10 अप्रैल 2009 en इस अस्थिरता के दौरान, कोणार्क के पुजारियों ने सूर्य देव की प्रधान मूर्ति को हटाकर वर्षों तक रेत में छिपाए रखा। मंदिर के मुख्य गर्भगृह की 13वीं सदी की मूल सूर्य प्रतिमा खोई या नष्ट नहीं हुई है, हालाँकि इसके वर्तमान स्थान को लेकर दो प्रबल ऐतिहासिक मत हैं: 1. राष्ट्रीय संग्रहालय का मत: पुरातात्विक सर्वेक्षणों के अनुसार, यह मूल प्रतिमा वर्तमान में नई दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय में पूरी तरह सुरक्षित रखी गई है। पुरातात्विक अभिलेखों के अनुसार इस पाषाण प्रतिमा की वास्तविक ऊँचाई 189.2 सेंटीमीटर (लगभग 6.2 फीट) है।Surya (Sun god), Eastern Ganga, 13th century A.D. Konark, Orissa https://www.wisdomlib.org/gallery/new-delhi-museum-various-sculptures/8636 New Delhi Museum Gallery 13 May 2026 2. जगन्नाथ मंदिर का मत: पुरी के 'मादला पांजी' के अभिलेखों के आधार पर कुछ इतिहासकारों का यह भी मानना है कि 1626 ई. में खुर्दा के तत्कालीन राजा नरसिंह देव ने मूल प्रतिमा को सुरक्षित रूप से पुरी के जगन्नाथ मंदिर परिसर में स्थानांतरित कर दिया था। प्रधान मूर्ति के हटने के बाद कोणार्क में सूर्य वंदना और दैनिक पूजा-अर्चना पूरी तरह से बंद हो गई। तीर्थयात्रियों का आगमन रुक जाने और तटीय क्षेत्रों में समुद्री डाकुओं के हमलों के कारण कोणार्क का बंदरगाह भी निष्क्रिय हो गया। धीरे-धीरे यह समृद्ध नगर जनशून्य होकर घने जंगलों से घिर गया।Mitra 1968 12 कालान्तर में, खुर्दा के राजा ने कोणार्क की मुखशाला के सामने स्थित 'नवग्रह पाट' को हटवा दिया था। हालाँकि, यह विशाल पट्टिका नष्ट नहीं हुई, बल्कि वर्तमान में इसे मुख्य मंदिर परिसर के ठीक बाहर एक अलग 'नवग्रह मंदिर' में स्थापित कर दिया गया है, जहाँ आज भी श्रद्धालु इसकी नियमित रूप से पूजा-अर्चना करते हैं।Mitra 1968 14-15 18वीं शताब्दी के मराठा काल के दौरान पुरी के मंदिर की चहारदीवारी के निर्माण में कोणार्क के पत्थरों का बड़े पैमाने पर उपयोग किया गया। 1779 ई. के आसपास, एक मराठा साधु 'ब्रह्मचारी गोसाईं' के निर्देश पर कोणार्क मंदिर के ठीक सामने लगे 33 फीट 8 इंच ऊंचे एकाश्म क्लोराइट पत्थर के 'अरुण स्तंभ' को वहाँ से हटा लिया गया। बाद में इसे पुरी ले जाकर जगन्नाथ मंदिर के सिंहद्वार के सामने स्थापित कर दिया गया, जहाँ वह आज भी शान से खड़ा है।Thomas E. Donaldson Konark https://archive.org/details/konark0000dona 2003 Oxford University Press 978-0195664898 29 18वीं शताब्दी के अंत तक कोणार्क अपना सारा वैभव खो चुका था और यह विशाल मंदिर परिसर पूरी तरह से वनस्पतियों से ढक गया, जहाँ मानवीय गतिविधियाँ लगभग समाप्त हो गई थीं। कोणार्क सूर्य मंदिर का ऐतिहासिक संरक्षण अभियान 123 वर्षों बाद रेत निष्कासन कोणार्क सूर्य मंदिर के जगमोहन (सभा-मंडप) से 123 वर्षों बाद रेत निकालने का ऐतिहासिक कार्य 19 अप्रैल 2026 (अक्षय तृतीया) को आरंभ किया गया।Odisha: ASI starts sand removal at Konark Sun Temple's 'Jagamohan' after a century https://www.hindustantimes.com/india-news/odisha-asi-starts-sand-removal-at-konark-sun-temple-s-jagamohan-after-a-century-101776961147130.html Hindustan Times 2026-04-23 2026-08-15 यह अभियान भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा विश्व धरोहर स्थल की संरचनात्मक स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए चलाया जा रहा है। 1901-1903 के दौरान ब्रिटिश इंजीनियरों ने जगमोहन के ढहने के खतरे को देखते हुए इसे रेत और पत्थरों से भरकर सभी द्वार स्थायी रूप से बंद कर दिए थे।ASI begins drilling into Konark Sun Temple to remove 100-year-old British-era sand https://indianexpress.com/article/india/asi-begins-drilling-into-konark-sun-temple-to-remove-100-year-old-british-era-sand-10650982/ The Indian Express 2026-04-23 2026-08-15 वैज्ञानिक पद्धति और तकनीक यह अभियान अत्यंत सतर्कता और वैज्ञानिक पद्धति से किया जा रहा है। ASI ने जगमोहन की पश्चिमी दीवार पर 6x5 फीट का मार्ग बनाने के लिए 'ज़ीरो-वाइब्रेशन डायमंड कोर ड्रिलिंग' तकनीक का उपयोग किया है, जिससे 800 वर्ष पुरानी संरचना को कोई झटका न लगे।What lies within? https://timesofindia.indiatimes.com/city/bhubaneswar/what-lies-within/articleshow/131001394.cms The Times of India 2026-05-10 2026-08-15 इस परियोजना में आईआईटी मद्रास के विशेषज्ञ संरचनात्मक स्थिरता की निगरानी कर रहे हैं। दिसंबर 2025 में दो कोर ड्रिलिंग के माध्यम से लिए गए पत्थर और रेत के नमूनों की प्रयोगशाला जांच की गई थी। रेत निकालने के लिए 9 मीटर लंबी घोड़े की नाल के आकार की लौह सुरंग (horseshoe-shaped iron tunnel) बनाई जाएगी, जिसमें ट्रॉली ट्रैक और गैन्ट्री लगाए जाएंगे। रोबोटिक ट्रॉलियों के माध्यम से रेत, पत्थर के ब्लॉक और मलबे को चरणबद्ध तरीके से बाहर निकाला जाएगा। संरक्षण का दीर्घकालिक इतिहास रेत निष्कासन की यह परियोजना लगभग 22 वर्षों की योजना और तकनीकी अध्ययन का परिणाम है, जिसमें लेजर माप, एंडोस्कोपिक इमेजिंग और नमूनों का परीक्षण शामिल था। इस प्रक्रिया में लगभग 30 इंजीनियरों, पुरातत्वविदों और संरक्षण विशेषज्ञों की टीमें शामिल हैं, जो शून्य-कंपन उपकरणों का उपयोग कर रही हैं। ASI के अनुसार, 1950 के दशक में तत्कालीन महानिदेशक देबाला मित्रा द्वारा भी संरचना में छेद करने का प्रयास किया गया था, जिसमें वर्षा जल के रिसाव से खोंडालाइट पत्थरों को नुकसान पहुँचने की बात सामने आई थी। यह अभियान यूनेस्को के विश्व धरोहर दिशानिर्देशों के अनुरूप किया जा रहा है, जिसमें स्मारक की प्रामाणिकता और अखंडता बनाए रखने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।Sand Removal From Konark Sun Temple In Odisha Soon https://odishabytes.com/sand-removal-from-konark-sun-temple-in-odisha-soon-deputy-cm/ Odisha Bytes 2026-05-07 2026-08-15 ASI अधिकारियों के अनुसार, रेत निकालने की प्रक्रिया अत्यंत संवेदनशील है और इसमें कई महीने लग सकते हैं। सांस्कृतिक प्रभाव Q6428828 कोणार्क सूर्य मंदिर की अद्वितीय वास्तुकला और उत्कृष्ट पाषाण नक्काशी ने सदियों से साहित्यकारों, विचारकों और कलाकारों को गहराई से प्रेरित किया है। मंदिर की अद्भुत पाषाण कला से प्रभावित होकर नोबेल पुरस्कार विजेता महान कवि व नाटककार रवीन्द्र नाथ टैगोर ने लिखा था: > "कोणार्क जहां पत्थरों की भाषा मनुष्य की भाषा से श्रेष्ठतर है।" कोणार्क नृत्य महोत्सव एवं सैंड आर्ट फेस्टिवल: मंदिर की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक प्रासंगिकता को वैश्विक पटल पर जीवंत रखने के लिए, वर्ष 1989 से ओडिशा पर्यटन विभाग और ओडिसी रिसर्च सेंटर के संयुक्त तत्वावधान में प्रतिवर्ष 1 से 5 दिसंबर तक यहाँ 'कोणार्क नृत्य महोत्सव' का आयोजन किया जाता है।Konark Dance Festival mesmerises everyone https://www.aajtak.in/india/story/Konark-Dance-Festival-mesmerise-everyone-112051-2011-12-02 Aaj Tak 2 December 2011 hi यह महोत्सव मंदिर के 'मुक्तकाश रंगमंच' में आयोजित किया जाता है, जहाँ भव्य कोणार्क सूर्य मंदिर पृष्ठभूमि के रूप में स्थित होता है। इस महोत्सव में देश-विदेश के विख्यात कलाकार ओडिसी, भरतनाट्यम, कथक, कुचीपुड़ी, मणिपुरी और मोहिनीअट्टम जैसे शास्त्रीय नृत्यों की मंत्रमुग्ध कर देने वाली प्रस्तुतियां देते हैं।Konark dance, sand art festivals inaugurated by CM Naveen Patnaik https://www.newindianexpress.com/states/odisha/2023/Dec/02/konark-dancesand-art-festivals-inaugurated-by-cmnaveen-patnaik-2638091.html The New Indian Express 2 December 2023 en नृत्य महोत्सव के साथ-साथ कोणार्क के निकट स्थित चंद्रभागा समुद्र तट पर 'अंतर्राष्ट्रीय सैंड आर्ट फेस्टिवल' का भी आयोजन किया जाता है, जहाँ दुनियाभर के रेत-कलाकार अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करते हैं। ये आयोजन कोणार्क को न केवल एक पुरातात्विक स्थल, बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक केंद्र के रूप में भी स्थापित करते हैं।International Sand Art Festival https://odishatourism.gov.in/content/tourism/en/discover/about-odisha/events-of-odisha/International-Sand-Art-Festival.html Odisha Tourism Archive 13 May 2026 23 दिसंबर 2019 https://web.archive.org/web/20191223143010/https://odishatourism.gov.in/content/tourism/en/discover/about-odisha/events-of-odisha/International-Sand-Art-Festival.html dead कोणार्क की इस भव्य विरासत को राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित करने के लिए, भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने जनवरी 2018 में 'चॉकलेट ब्राउन' रंग का ₹10 का नया नोट जारी किया था। इस नोट के पिछले हिस्से पर देश की सांस्कृतिक विरासत के प्रतीक के रूप में कोणार्क चक्र का सुंदर रूपांकन किया गया है।https://paisaboltahai.rbi.org.in/rupees-ten.aspx Reserve Bank of India - Homepage paisaboltahai.rbi.org.in 2026-05-13 चित्र दीर्घा इन्हें भी देखें जगन्नाथ मंदिर, पुरी सूर्य देव ग्रंथ सूची http://archive.org/details/konarak00mitr Archaeological Survey of India Mitra Debala 1968 Archaeological Survey of India Public Resource 978-81-87780-11-3 सन्दर्भ बाहरी कड़ियाँ सूर्य मंदिरों की खोज में (गूगल पुस्तक ; लेखक - डॉ श्याम सिंह 'शशि') कोणार्क मंदिर के चित्र बीबीसी हिन्दी पर युनेस्को विश्व धरोहर सूची पर कोणार्क मंदिर भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग के जालस्थल पर विश्व धरोहर स्थलों की चित्र दीर्घा 360° पैनोग्राफिक चित्र भी सम्मिलित हैं। कोणार्क सूर्य मंदिर – मंदिर एवं नृत्य महोत्सव के वीडियो सम्मिलित हैं। सैकरेड डेस्टिनेशन्स पर कोणार्क सूर्य मंदिर- चित्र एवं जानकारी yes श्रेणी:सूर्य मंदिर श्रेणी:भारत में पुरातात्विक स्थल श्रेणी:ओडिशा में पर्यटन श्रेणी:ओडिशा में हिन्दू मंदिर