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गवरी
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जुलाई 2018 Manu jain
thumb|गवरी
मेवाड़ क्षेत्र में किया जाने वाला गवरी नृत्य भील जनजाति का प्रसिद्ध नृत्य है। गवरी नृत्य केवल एक नृत्य ही नहीं, बल्कि एक लोक नाट्य (Folk Drama) है जिसमें नृत्य, संगीत, अभिनय और कथा सभी का मेल होता है।https://www.youtube.com/watch?v=JEjD-9yktsg
यह एक तरह का धार्मिक अनुष्ठान भी है जो भगवान शिव और देवी पार्वती (गवरी) की पूजा से जुड़ा हुआ है। इस में मांदल और थाली के प्रयोग के कारण इसे राई नृत्य के नाम से जाना जाता है। इसे केवल पुरुषों के द्वारा किया जाता है।
मुख्य विशेषताएँ:
समय और अवधि:
यह नृत्य सावन-भाद्रपद माह (अगस्त-सितंबर) में शुरू होता है। इसका आयोजन रक्षाबंधन के दूसरे दिन से शुरू होता है। यह 40 दिनों तक चलने वाला एक लंबा उत्सव है। इस दौरान कलाकार गाँव-गाँव घूमकर प्रदर्शन करते हैं।
यह मुख्यतः उदयपुर मेवाड़ और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में रक्षाबंधन से जिसे लोक भाषा में गड़ावण या कपड़े पहनना कहा जाता है से प्रारंभ होकर ४० दिनों बाद विसर्जन तक, लोक भाषा में वळावण तक, आदिवासी जनजाति भील समुदाय के पुरुष पात्रों द्वारा किया जाने वाला लोक नृत्य हैं।
पौराणिक कथा:
इस नृत्य नाट्य की कहानी भगवान शिव और देवी पार्वती के जीवन पर आधारित है।
इसमें शिव के गणों (जैसे भैरव) और राक्षसों (जैसे देवताओं का दुश्मन 'राक्षस बका') के बीच युद्ध का अभिनय किया जाता है, जिसमें अंत में अच्छाई की बुराई पर जीत होती है।
वेशभूषा और मुखौटे:
यह गवरी नृत्य की सबसे खास बात है। सभी पुरुष कलाकार बेहद रंगीन और भव्य वेशभूषा पहनते हैं।
वे लकड़ी के बड़े-बड़े और रंगीन मुखौटे पहनते हैं, जो विभिन्न पात्रों (शिव, पार्वती, भैरव, राक्षस, जानवर आदि) को दर्शाते हैं।
कलाकारों के पैरों में घुंघरू बंधे होते हैं, जिनकी ध्वनि नृत्य की लय को और बढ़ा देती है।
नृत्य शैली:
नृत्य बहुत ऊर्जावान और तेज़ लय वाला होता है।
नृत्य के दौरान कलाकार घूम-घूमकर, कूदकर और तेज़ गति से कदम ताल करके युद्ध के दृश्यों का अभिनय करते हैं।
संगीत और वाद्ययंत्र:
नृत्य की थाप ढोल, मांदल और थाली जैसे वाद्ययंत्रों से दी जाती है।
संगीत बहुत ही मंत्रमुग्ध कर देने वाला और रोमांचकारी होता है। वादन संवाद, प्रस्तुतिकरण और लोक-संस्कृति के प्रतीकों में मेवाड़ की गवरी निराली है। गवरी का उदभव शिव-भस्मासुर की कथा से माना जाता है। इसमें भील संस्कृति की प्रमुखता रहती है। यह पर्व आदिवासी जाती पर पौराणिक तथा सामाजिक प्रभाव की अभिव्यक्ति है। गवरी में मात्र पुरुष पात्र होते हैं। इसके खेलों में नरसि मेहता, गणपति, खाडलिया भूत, काना-गुजरी, जोगी , लाखा बणजारा,नटनी इत्यादि के खेल होते हैैं।
नृत्य में हास्यास्पद रूप के खेल भी शामिल हैं जिनमें नाथु भाया नामक पात्र द्वारा वैवाहिक जीवन और पति-पत्नि की नौक जौक को हास्यात्मक रूप से दिखाया जाता हैं।
इसमें कान्हजी महाराज (भगवान कृष्ण), मनसुखा (कृष्ण के मित्र) की राधा और गोपियों के साथ की गई लीलाओं का नाट्य रूपांतरण भी शामिल होता हैं।
नृत्य में वड़ला (वटवृक्ष) का खेल होता हैं इसमें राजा और वरजु कांजरी जिसे देवी या नटनी का रूप माना जाता हैं मुख्य पात्र होते हैं, इसमें पेड़ों की महत्ता और भाई-बहन के प्रेम को दर्शाया जाता हैं।
नृत्य में भियावड़ या हटिया के खेल में चंड-मुंड और माता काली के बीच हुए युद्ध का दृश्य होता हैं।
नृत्य में पुराने समय में लूटेरों के आतंक और व्यापारियों के साहस, वीरता और बलिदान को मुख्य पात्रों गोमा मीणा (लूटेरा) और लाखा बंजारा (व्यापारी) के रूप में दिखाया जाता हैं।
गवरी में माता आदिशक्ति के अनेक रूपों को दिखाया जाता हैं मुख्य माता अंबा और उनके सिंह का खेल दिखाया जाता है।
पात्र
गवरी में चार तरह के पात्र होते हैं- देवता, मनुष्य, राक्षस और पशु।
मनुष्य पात्र
बुढ़िया (भगवान शिव)
रई (मां पार्वती)
कुटकड़िया
कंजर-कंजरी
गोमा मीणा (लूटेरा)
लाखा बंजारा (व्यापारी) बणजारी
दाणी
नट
खेतूडी
शंकरिया
कालबेलिया
कान-गूजरी कान्हजी महाराज (भगवान कृष्ण), मनसुखा (कृष्ण के मित्र)
भोपा
फत्ता-फत्ती
भियावड़ या हटिया
राजा और वरजु कांजरी
नाथु भाया
दानव पात्र
गवरी के दानव पात्र क्रूर तथा दूसरों को कष्ट देने वाले होते हैं। इनके सिर पर सींग तथा चेहरा भयानक होता है।
बुढ़िया : गवरी का मुख्य पात्र होता है। यह शिव और भस्मासुर का प्रतीक होता ।
पशु पात्र
गवरी में कई पशु पात्र भी होते हैं। जैसे शेर, भालू, सियार आदि। ये हिंसक नहीं होते हैं।
गवरी नृत्य का महत्व:
सांस्कृतिक महत्व: यह राजस्थान की भील जनजाति की सांस्कृतिक पहचान का एक अभिन्न अंग है। यह उनके इतिहास, मिथकों और विश्वासों को जीवित रखता है।
धार्मिक महत्व: इसे एक व्रत की तरह माना जाता है। मान्यता है कि इसके माध्यम से देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त होता है और गाँव में सुख-शांति आती है।
सामाजिक महत्व: यह 40 दिनों का उत्सव समुदाय में एकता और सामूहिक पहचान की भावना को मजबूत करता है।
राजस्थान के मेवाड़ क्षेत्र के गांवों और आसपास के क्षेत्रों में यह नृत्य, प्रत्येक गांव की गौरख्या माता (मां गौरी) की आज्ञा और आदेशानुसार प्रतिवर्ष या विभिन्न वर्षों के अंतराल में आयोजित किया जाता हैं। ४० दिनों तक प्रतिदिन अलग-अलग गांवों और क्षेत्रों में गवरी नृत्य किया जाता हैं। गवरी नृत्य मात्र नृत्य नहीं होकर धार्मिक भावनाओं और जनमानस की आस्था से जुड़ा हुआ नृत्य हैं।
इन्हें भी देखें
नवम्बर 2023
श्रेणी:नृत्य
श्रेणी:लोकनाट्य