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411 समाचार
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नारद पुराण

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नारद पुराण 150px नारद पुराण वेदव्यास भारत संस्कृत पुराण विष्णु भक्ति हिन्दू धार्मिक ग्रन्थ २२,००० श्लोक नारद पुराण या 'नारदीय पुराण' अट्ठारह महापुराणों में से एक पुराण है। यह स्वयं महर्षि नारद के मुख से कहा गया एक वैष्णव पुराण है।नारद क none महर्षि व्यास द्वारा लिपिबद्ध किए गए १८ पुराणों में से एक है। नारदपुराण में शिक्षा, कल्प, व्याकरण, ज्योतिष (तथा गणित), और छन्द-शास्त्रों का विशद वर्णन तथा भगवान की उपासना का विस्तृत वर्णन है। यह पुराण इस दृष्टि से काफी महत्त्वपूर्ण है कि इसमें अठारह पुराणों की अनुक्रमणिका दी गई है। इस पुराण के विषय में कहा जाता है कि इसका श्रवण करने से पापी व्यक्ति भी पापमुक्त हो जाते हैं। पापियों का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि जो व्यक्ति ब्रह्महत्या का दोषी है, मदिरापान करता है, मांस भक्षण करता है, वेश्यागमन करता हे, तामसिक भोजन खाता है तथा चोरी करता है; वह पापी है। इस पुराण का प्रतिपाद्य विषय विष्णुभक्ति है। संरचना प्रारंभ में यह २५,००० श्लोकों का संग्रह था लेकिन वर्तमान में उपलब्ध संस्करण में केवल २२,००० श्लोक ही उपलब्ध है।http://www.neelkanthdhaam.org/napu.html Indore Festivals 9 मार्च 2008 एचटीएमएल neelkanthdhaam अंग्रेज़ी https://web.archive.org/web/20071230005813/http://www.neelkanthdhaam.org/napu.html 30 दिसंबर 2007 dead नारद पुराण दो भागों में विभक्त है- पूर्व भाग और उत्तर भाग। पहले भाग में चार अध्याय हैं जिसमें सुत और शौनक का संवाद है, ब्रह्मांड की उत्पत्ति, विलय, शुकदेव का जन्म, मंत्रोच्चार की शिक्षा, पूजा के कर्मकांड, विभिन्न मासों में पड़ने वाले विभिन्न व्रतों के अनुष्ठानों की विधि और फल दिए गए हैं। दूसरे भाग में भगवान विष्णु के अनेक अवतारों की कथाएँ हैं।http://pushtikul.com/topic.asp?CAT_ID=7&FORUM_ID=1&Forum_Title=%3Cb%3EDisscuss+it+all.+%3C%2Fb%3E&TOPIC_ID=1343&Topic_Title=Sage+Narada&whichpage=1 संत नारद 9 मार्च 2008 एएसपी पुष्टिकुल अंग्रेज़ी https://web.archive.org/web/20060213214042/http://pushtikul.com/topic.asp?TOPIC_ID=1343&FORUM_ID=1&CAT_ID=7&Topic_Title=Sage+Narada&Forum_Title=%3Cb%3EDisscuss+it+all%2E+%3C%2Fb%3E&whichpage=1 13 फ़रवरी 2006 dead पूर्व भाग पूर्व भाग में १२५ अध्याय हैं।नारद पुराण https://web.archive.org/web/20100714005124/http://bhagwan.hpage.com/%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A6_%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A3_76742733.html 14 जुलाई 2010 । भगवान होमपेज इस भाग में ज्ञान के विविध सोपानों का सांगोपांग वर्णन प्राप्त होता है। ऐतिहासिक गाथाएं, गोपनीय धार्मिक अनुष्ठान, धर्म का स्वरूप, भक्ति का महत्त्व दर्शाने वाली विचित्र और विलक्षण कथाएं, व्याकरण, निरूक्त, ज्योतिष, मन्त्र विज्ञान, बारह महीनों की व्रत-तिथियों के साथ जुड़ी कथाएं, एकादशी व्रत माहात्म्य, गंगा माहात्म्य तथा ब्रह्मा के मानस पुत्रों-सनक, सनन्दन, सनातन, सनत्कुमार आदि का नारद से संवाद का विस्तृत, अलौकिक और महत्त्वपूर्ण आख्यान इसमें प्राप्त होता है। अठारह पुराणों की सूची और उनके मन्त्रों की संख्या का उल्लेख भी इस भाग में संकलित है। उत्तर भाग उत्तर भाग में बयासी अध्याय सम्मिलित हैं। इस भाग में महर्षि वसिष्ठ और ऋषि मान्धाता की व्याख्या प्राप्त होती है। यहां वेदों के छह अंगों का विश्लेषण है। ये अंग हैं- शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरूक्त, छंद और ज्योतिष। शिक्षा शिक्षा के अंतर्गत मुख्य रूप से स्वर, वर्ण आदि के उच्चारण की विधि का विवेचन है। मन्त्रों की तान, राग, स्वर, ग्राम और मूर्च्छता आदि के लक्षण, मन्त्रों के ऋषि, छंद एवं देवताओं का परिचय तथा गणेश पूजा का विधान इसमें बताया जाता है। कल्प कल्प में हवन एवं यज्ञादि अनुष्ठानों के सम्बंध में चर्चा की गई है। इसके अतिरिक्त चौदह मन्वन्तर का एक काल या ४ लाख ३२ हजार वर्ष होते हैं। यह ब्रह्मा का एक दिन कहलाता है। अर्थात् काल गणना का उल्लेख तथा विवेचन भी किया जाता है। व्याकरण व्याकरण में शब्दों के रूप तथा उनकी सिद्धि आदि का पूरा विवेचन किया गया है। निरुक्त इसमें शब्दों के निर्वाचन पर विचार किया जाता है। शब्दों के रूढ़ यौगिक और योगारूढ़ स्वरूप को इसमें समझाया गया है। ज्योतिष ज्योतिष के अन्तर्गत गणित अर्थात् सिद्धान्त भाग, जातक अर्थात् होरा स्कंध अथवा ग्रह-नक्षत्रों का फल, ग्रहों की गति, सूर्य संक्रमण आदि विषयों का ज्ञान आता है। छंद छंद के अन्तर्गत वैदिक और लौकिक छंदों के लक्षणों आदि का वर्णन किया जाता है। इन छन्दों को वेदों का चरण कहा गया है, क्योंकि इनके बिना वेदों की गति नहीं है। छंदों के बिना वेदों की ऋचाओं का सस्वर पाठ नहीं हो सकता। इसीलिए वेदों को 'छान्दस' भी कहा जाता है। वैदिक छन्दों में गायत्री, शम्बरी और अतिशम्बरी आदि भेद होते हैं, जबकि लौकिक छन्दों में 'मात्रिक' और 'वार्णिक' भेद हैं। भारतीय गुरुकुलों अथवा आश्रमों में शिष्यों को चौदह विद्याएं सिखाई जाती थीं- चार वेद, छह वेदांग, पुराण, इतिहास, न्याय और धर्म शास्त्र। सामग्री अतिथि को देवता के समान माना गया है। अतिथि का स्वागत देवार्चन समझकर ही करना चाहिए। वर्णों और आश्रमों का महत्त्व प्रतिपादित करते हुए यह पुराण ब्राह्मण को चारों वर्णों में सर्वश्रेष्ठ मानता है। उनसे भेंट होने पर सदैव उनका नमन करना चाहिए। क्षत्रिय का कार्य ब्राह्मणों की रक्षा करना है तथा वैश्य का कार्य ब्राह्मणों का भरण-पोषण और उनकी इच्छाओं की पूर्ति करना है। दण्ड-विधान, विवाह तथा अन्य सभी कर्मकाण्डों में ब्राह्मणों को छूट और शूद्रों को कठोर दण्ड देने की बात कही गई है। आश्रम व्यवस्था के अंतर्गत ब्रह्मचर्य का कठोरता से पालन करने तथा गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने वालों को अन्य तीनों आश्रमों (ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ और संन्यास) में विचरण करने वालों का ध्यान रखने की बात कही गई है। इस पुराण में गंगावतरण का प्रसंग और गंगा के किनारे स्थित तीर्थों का महत्त्व विस्तार से वर्णित किया गया है। सूर्यवंशी राजा बाहु का पुत्र सगर था। विमाता द्वारा विष दिए जाने पर ही उसका नाम 'सगर' पड़ा था। सगर द्वारा शक और यवन जातियों से युद्ध का वर्णन भी इस पुराण में मिलता है। सगर वंश में ही भगीरथ हुए थे। उनके प्रयास से गंगा स्वर्ग से पृथ्वी पर आई थीं। इसीलिए गंगा को 'भागीरथी' भी कहते हैं। पुराण में विष्णु की पूजा के साथ-साथ राम की पूजा का भी विधान प्राप्त होता है। हनुमान और कृष्णोपासना की विधियां भी बताई गई हैं। काली और शिव की पूजा के मन्त्र भी दिए गए हैं। किन्तु प्रमुख रूप से यह वैष्णव पुराण ही है। इस पुराण के अन्त में गोहत्या और देव निन्दा को जघन्य पाप मानते हुए कहा गया है कि 'नारद पुराण' का पाठ ऐसे लोगों के सम्मुख कदापि नहीं करना चाहिए। नारदपुराण में गणित वेदों के सभी प्रमुख छः अंगों का वर्णन नारद पुराण में किया गया है। इसमें छः वेदांगों को इस प्रकार प्रस्तुत किया गया है-https://www.jstor.org/stable/pdf/24655423.pdf?seq=1#page_scan_tab_contents THE MATHEMATICAL SECTION OF THE "NĀRADAPURĀṆA" 9 मार्च 2017 https://web.archive.org/web/20170312034055/https://www.jstor.org/stable/pdf/24655423.pdf?seq=1#page_scan_tab_contents 12 मार्च 2017 live शिक्षा -- अध्याय ५० कल्प -- अध्याय ५१ व्याकरण -- अध्याय ५२ निरुक्त -- अध्याय ५३ ज्योतिष -- अध्याय ५४, ५५, ५६ छन्द -- अध्याय ५७ ज्योतिष के अन्तर्गत सामग्री का प्रस्तुतीकरण इस प्रकार किया गया है- अध्याय ५४ - गणित १ से १२कख - परिचय १२गघ से ६०कख - गणित ६०गघ से १८७ - गणितीय खगोलिकी अध्याय ५५ - जातक अध्याय ५६ - संहिता निम्नलिखित श्लोक को देखिये- समांकघातो वर्गः स्यात्‌ तमेवाहुः कृतिं बुधाः। अन्त्यात्तु विषमात्त्यक्त्वा कृतिं मूलं न्यसेत्पृथक्‌ ॥१६॥ द्विगुणेनामुना भक्ते फलं मूले न्यसेत्‌ क्रमात्‌। तत्कृतिं च त्यजेद्विप्र मूलेन विभजेत्‌ पुनः ॥१७॥ एवं मुहुर्वर्गमूलं जायते च मुनीश्वर। ( अर्थ - दो समान अंकों के गुणनफल को वर्ग कहा गया है, विद्वान्‌ पुरुष उसी को कृति कहते हैं। वर्गमूल जानने के लिये दाहिने अंक से लेकर बायें अंक तक अर्थात्‌ आदि से अन्त तक विषम और सम का चिह्न कर देना चाहिये। खड़ी रेखा को विषम का चिह्न और पड़ी रेखा को सम का चिह्न माना गया है। अन्तिम विषम में जितने वर्ग घट सकें उतने घटा देना चाहिये। उस वर्ग का मूल लेना और उसे पृथक्‌ रख देना चाहिये ॥१६॥ फिर द्विगुणित मूल सम अंक में भाग दें और जो लब्धि आवे उसका वर्ग विषम में घटा दें, फिर उसे दूना करके पंक्ति में रख दें। मुनीश्वर! इस प्रकार बार-बार करने से पंक्ति का आधा वर्गमूल होता है ॥१७ . १ / २॥) नारदपुराण में वास्तु नारद पुराण के संहिता स्कन्ध में वास्तुशास्त्र से संबंधित नियम दिये गये हैं और उसकी महत्ता पर प्रकाश डाल गया है। दिशाओं में वर्ग और वर्गेश का विस्तृत उल्लेख किया गया है। घर के धन ऋण, आय नक्षत्र, और वार और अंश साधन का ज्ञान दिया गया है। इसमें वास्तुपुरुष को भू-शैय्या पर शयन करने वाला, और गृह को धन-धान्य से समृद्ध करने वाला कहकर सम्बोधित किया गया है- वास्तुपुरुष नमस्तेऽस्तु भूशय्यानिरत प्रभो। मद्गृहं धनधान्यादिसमृद्धं कुरू सर्वदा॥ ( अर्थ: ‘‘भूमि शय्या पर शयन करने वाले वास्तु पुरूष् ! आपको मेरा नमस्कार है। प्रभो ! आप मेरे घर को धन-धान्य आदि से समृद्ध कीजिये’’ ) इस पुराण में वर्णित वास्तुशात्र से जुडी़ कुछ बातें इस प्रकार हैं - जहाँ घर बनाना हो उस भूमि की उचित प्रकार से जांच कर लेना उपयुक्त होता है। घर बनाने की भूमि को जांचने की एक विधि यह है कि जिस स्थान पर घर बनाना होता है वहां जमीन को कोहनी से कनिष्ठा अंगुली तक के बराबर खोद कर कुण्ड बनाएं और फिर उसे उसी मिट्टी से भरें, यदि मिट्टी बच जाती है तो यह शुभ संकेत देती है। यदि मिट्टी भरने पर कुछ भी अंश नहीं बचे और उस पर उसे भरने के लिए अलग से मिट्टी की आवश्यकता हो तो यह स्थिति अच्छी नहीं मानी गई है। यदि मिट्टी जितनी निकाली गई थी उतनी ही अच्छे से उस कुंड में समा जाए तो यह स्थिति सामान्य मानी गई है। घर बनाने के लिए मार्गशीर्ष, फाल्गुन, माघ, श्रावण और कार्तिक माह अच्छे कहे गए हैं। घर पर कांटेदार पौधे या वृक्ष नहीं होने चाहिए। सन्दर्भ टीका टिप्पणी    क.    नारद क noneनारदोक्तम् पुराणं तु नारदीयं प्रयच्छते। बाहरी कड़ियाँ नारदपुराणम् (संस्कृत विकिस्रोत) श्रीनारदपुराण (हिन्दी अर्थ सहित) नारद पुराण नारद पुराण का पाठ THE MATHEMATICAL SECTION OF THE "NĀRADAPURĀṆA" नारदपुराण में ज्योतिष https://web.archive.org/web/20220523021637/http://www.jyotisham.in/2017/11/blog-post_23.html 23 मई 2022 अतिरिक्त पठन संक्षिप्त नारदपुराण http://pustak.org:4300/bs/home.php?bookid=6126 सजिल्द ०१ २००८ मार्च गीताप्रेस गोरखपुर हिन्दी ISBN 81-293-0181-4 6126 ७५२ जून 2020 InternetArchiveBot कुमार विनय नारद पुराण http://pustak.org/bs/home.php?bookid=3579 अजिल्द ०३ २०१० मई ०३ २००४ मार्च डायमंड पॉकेट बुक्स नई दिल्ली हिन्दी ISBN 81-288-0680-7 3579 १४० https://web.archive.org/web/20100813154953/http://pustak.org/bs/home.php?bookid=3579 13 अगस्त 2010 dead श्रेणी:पुराण श्रेणी:हिन्दू धार्मिक ग्रन्थ