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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

सारस्वथ ब्राह्मण के त्योहार

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परिचय चित्रापुर सारस्वत ब्राह्मण हिन्दू धर्म के अत्यधिक त्योहारों को मनातें हैं। वे त्योहारों को हिन्दु पंचांग के अनुसार मनाते हैं। वे हर त्योहार के अनुसार विशिष्ट रूप से भोजन को तैयार करते हैं। वे हर एक त्योहार को अलग अन्दाज़ में मनाते हैं। मनाए जाने वाले त्योहार के दिवस चैत्र शुध्द प्रतिपादा (गुड़ी पड़वा) चैत्र शुध्द नवमी (श्री राम नवमी) चैत्र पुर्णिमा (हनुमान जयंती) वैशाखा शुध्द त्रितिया (अक्षय त्रितिया) ज्येष्टा पूर्णिमा (वट पूर्णिमा) आषाड़ शुध्द एकादशी (आषाड़ी) आषाड़ पूर्णिमा श्रावण शुध्द पंचमी (नाग पंचमी) श्रावण पूर्णिमा (नारली पूर्णिमा) श्रावण वाध्या अष्ठमी (गोकुलाष्टमी) भध्रपादा शुध्द त्रितिय भध्रपादा शुध्द चतुर्थी ऋषि पंचमी (भध्रपादा शुध्द पंचमी) भध्रपादा शुध्द अष्ठमी अनंत शुध्द चतुर्दशी म्हाळ पक्षा नवरात्री (महानवमी) अश्विज पौर्णिमा (कोजागिरी पूर्णिमा) अश्विज (वाध्या) त्रयोदशी से कार्तिक शुध्द द्वितीय कार्तिक शुध्द एकादशी कार्तिक शुध्द द्वादशी मार्गशीर्ष शुध्द शष्ठि (कुक्के शष्ठि / छंपा शष्ठि) मार्गशीर्ष पूर्णिमा (श्री दत्तात्रेय जयंती) मकर संक्रान्ति मघा शुध्द पंचमी मघा शुध्द सप्तमी (रथ सप्तमी) मघा वाध्य चतुर्दशी (महाशिवरात्रि) फाल्गुन पूर्णिमा उपर्युक्त कुछ त्योहारों कि रीतियाँ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (गुड़ी पड़वा) पंचांग के अनुसार नया साल का शुरूवात चैत्र माह से होता है। उसी माह में गुड़ी पड़वा मनाया जाता हैं। गुड़ी पड़वा को उगादि/युगादि/पनवार पूजा जैसे नामों से भी जाना जाता हैं। इस दिन का प्रारंभ चित्रापुर सारस्वथ ब्राह्मण घर में मंगल मूर्थी यानि भगवान गणपति और अपने-अपने घर के कुल-देवता (घर के देवता) को स्मरण करते हुए, एक शुभ वर्ष का आगमन, पूजा-पाठ से करते हैं। नये कपड़ों को पहनते हैं। घर के स्त्रियाँ विशेष भोजन तैयार करते हैं जैसे खीर, मड्गने-जो चन्ना दाल, काजू, चावल, नारियल का दूध, गूड़ से बनाया गया पदार्थ है ; उपकरि (सब्जी) जो तिंड़ोरा और काजू से बनाया गया पदार्थ है और सुक्के जो नवलकोल या आलू से बनाया जात है। शक्कर अथवा गुड़ और घी में भूना हुआ नीम का एक चूर्णित मिश्रण को आरती के बाद भगवान को अर्पित करते हुए दूसरों को बांटा जाता है जो बीमारियों को सीमित रखने में मदद करता है और तात्त्विकता के अनुसार जीवन में खुशियाँ और विपत्ति के पलों को सामना करने के लिए तैयार करता है।Rasachandrika-Saraswat Cookery Book,Saraswat Mahila Samaj(Bombay),p.220 चित्रापुर सारस्वथ ब्राह्मण शाम होने पर चित्रापुर मठ को जाते है, वहाँ के एक पुजारी पंचांग से उस नया वर्ष का बरसात, लाभ, आदि और राशि के अनुसार वर्ष का भविष्य को घोषण करते है। पूजा के बाद प्रसाद के रूप में गुड़, कली मिर्च और इलायची से बनाया हुआ पानक को लोगों को बाँटा जाता है। उसके बाद श्री भवानिशंकर को पूजा करते हैं। उसके बाद लोगों को पनवार खिलाई जाती हैं।http://www.gsbkonkani.net/fastandfestivals.htm https://web.archive.org/web/20130928054020/http://gsbkonkani.net/fastandfestivals.htm 28 सितंबर 2013 Fasts and Festivals-The New Year पनवार, केरळ के त्योहार में बने जाने वाले ओणम सध्या भोजन के समजात है जिसमें काजु, पनस, तरबूज; मूंग दाल, चन्ना दाल के कोसंबरी; शकरकंद, काजु, या चन्ना का उपकरी; कच्चा आम कि चटनी, आदि को पत्रावली या केले के पत्तों पर परोसते हैं। भध्रपादा शुध्द त्रितिय thumb|गौरी पूजा के नैवेद्य और वाय्णthumb|गौरी पूजा के दिन बनाए गए खाद्य घर के सुवासिनी स्त्रियाँ और बालिकाएँ इस दिन पर स्वर्ण गौरी देवी को पूजा-पाठ अर्पित करते हैं। ५ नारियल हर सुवासिनी के लिए और २ नारियल बालिकाएँ के लिए टोकरी में अलंकृत करके रखा जाता है। उन नारियल का उपयोग किया जाता है जिनका शेन्ड़ि न हो या निकाल दिया गया हो। नारियल को साफ करके, हल्दी पानी में डुबोकर, धोकर उन पर चाक के द्वारा रेखाएँ खींची जाता है। नारियल के दो आँखों पर काला काजल का तिलक और तीसरी आँख पर सिंदुर की तिलक लगाई जाती है। ईख, सुपारी, पान, केले, भिंगार (पूगी के फूल), ककड़ी, भिंडी, आदि सुवासिनी के टोकरी में जलते हुए तेल के दिये, वाय्ण डोरी, कले कँगन, कंधी, छोटा काजल क डिब्बा और कुंकुम आदि के साथ रखते है।Rasachandrika-Saraswat Cookery Book,Saraswat Mahila Samaj(Bombay),p.223 तीन नारियलों को विशेष रूप से धोई जाती है, उनको हल्दी के पानी में धोकर, काजल और सिंदुर का समस्त तिलक लगाई जाती है। एक भगवान शिव और दुसरा श्री गणेश के प्रतीक होते है। यह सब कार्य घर के सुवासिनी स्त्रियाँ करते है जब वाय्ण तैयार करते है। स्वर्ण गौरी के प्रति नैवेद्य करने के लिए वाराई के या गेहूँ का आटा के पाथोलियाँ, ककड़ी का खीर (ककड़ी को पीसकर नमक के बिना गुड़ के साथ मिलाई जाती है), ककड़ी का कोच्चोळी, हरी पत्तेदार सब्जियों का पाँच प्रकार के उपकरी नमक के बिना तैयार किया जाता है। गौरी पूजा तथा नैवेद्य के बाद वाय्ण को सुवासिनियों में बाँटा जाता है। भध्रपादा शुध्द चतुर्थी इस दिन भगवान गणेश का मिट्टी का मूर्ति को बाहर से लाया जाता है या घर में जो मूर्ति पूजा के लिए रखा हुआ है उसी का उपयोग किया जाता है। खोट्टे, मड़गणे, चक्ली (आटा को सानने समय पानी के बदले में दुध का उपयोग किया जाता है), गुड़ के लड्डू, करनज्य (नैव्रयों), मोदक, पंचाखाद्य आदि को भगवान गणेश को नैवेद्य का पेशकश की जाती है। आलू का सुखा भाजी (सुक्के), ककड़ी़ क कोच्चोळी, पत्रोड़े, पत्रोड़े (आलुकी) भाजी, करेला और अंबाड़ी़ का घश्शी, करेला के पकोड़ा़, आदि को तैयार किया जाता है। अंत में श्री गणेश जी के मूर्ति को मोदक का आरती किया जाता है। इस मूर्ती को विसर्जन के समय फल चड़ाया जाता है, विसर्जन आरती के बाद धूम-धाम से मूर्ति का विसर्जन किया जाता है।Rasachandrika-Saraswat Cookery Book,Saraswat Mahila Samaj(Bombay),p.224 अश्विज (वाध्या) त्रयोदशी से कार्तिक शुध्द द्वितीय दीपावली चार दीन का त्योहार है : धन त्रयोदशी नरक चतुर्दशी और लक्ष्मी पूजा बली प्रतिपादा भाऊ बीज धन त्रयोदशी इस शुभ दिन पर सोना, चांदी और धन की पूजा किया जाता है। संध्याकाल को साफ किए गए बर्तन में पानी को भरा जाता है (पुराने दिनों में जलाशयों को पूजा किया करते थे)। उन बर्तन को गेंदा-झनदु फूल और तोरन को बांधकर अलंकृत किया जाता है। इस दिन पर मिठा पोहा को बांटा जाता है, अगरबत्तियों को जलाया जाता है और आरती किया जाता है।Rasachandrika-Saraswat Cookery Book,Saraswat Mahila Samaj(Bombay),p.227 नरक चतुर्दशी पौ फटने से पहले तेल स्नान किया जाता है। नहाने के वक्त नरकासुर के जैसे रक्त को अनुकरण करने के लिए तेल में कुमकुम को मिलाकर माथे पर लगाई जाती है। नहाने के बाद करीट नामक तरकारी को पैरों के नीचे पीस दिया जाता है और उसके बीज को मूह में डाली जाती है। बाद में पोहा के साथ गुड़ को मिलाकर नाश्ता किया जाता है। सामान्य रूप से दिवाली के समय अनरस, बूंदि लड्डु, चिवडा आदि जैसे खास आहार को भी बनाई जाती हैं। मध्याह्न-भोजन के लिए कुछ मिठाई को भी बनाई जाती है। शाम होती ही घर के प्रवेश-द्वार और स्नान-घर के द्वार पर तेल के दिये को दीपोत्सवा मनाने के लिए कम से कम तीन दिन के लिए जलाई जाती है। लक्ष्मी पूजा अमवस्या के दिन पर घर में कलश स्थापन करके लक्ष्मी माता कि पूजा की जाती है और नैवेद्य भी चढ़ाया जाती है। शाम को पाँच या साथ सुवासिनियों को हल्दी-कुमकुम दिया जाता है। उसी दिन कलश का विसर्जन किया जाता है और उसी नारियल का मीठा बनाई जाती है। बली प्रतिपादा कार्तिक शुध्द प्रतिपादा के दिवस पर गायों को गो-पूजा की जाती है (इस लिए क्योंकि मवेशी को भारत में अनेक सदियों से धन के समान मानी जा रही है) और बली चक्रवर्ती एवं भगवान श्री कृष्ण (दोनों भी गोरू के रक्षक थे) को भी पूजा अर्पित की जाती है। खोपरा, गुड़ और पोहा तथा केलों को घर के गौ को (उन्हें तेल स्नान दिलाने के बाद) अर्पित किया जाता है। गौ को फूलों कि माला से पूजा होने समय या पूजा के बाद अलंकृत की जाती है। भाऊ बीज इस शुभ दिन पर बहने अपने भाइयों को भोजन के लिए निमंत्रण देते है और उनके प्रिय खाद्य को तैयार करते है। हमारे संस्कृति के अनुसार तेल स्नान के बाद, बहने अपने भाइयों का आरती करते है अन्द बदले में इस अवसर पर बहनों को उनके भाईयों से उपहार मिलती है। सन्दर्भ