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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

केवलान्वयी

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केवलान्वयी, न्यायदर्शन में एक प्रकार का विशेष अनुमान है। यहाँ हेतु, साध्य के साथ सर्वदा सत्तात्मक रूप से ही संबद्ध रहता है। न्यायदर्शन के अनुसार व्याप्ति दो प्रकार से हो सकती है- अन्वयमुखेन तथा व्यतिरेकमुखेन। अन्वय का अर्थ है- तत्सत्त्वे तत्सत्ता अर्थात् किसी वस्तु के होने पर किसी वस्तु की स्थिति, जैसे धूम के रहने पर अग्नि की स्थिति। व्यतिरेक व्याप्ति वहाँ होती है जहाँ हेतु तथा साध्य का संबंध निषेधमुखेन सिद्ध होता है। केवलान्वयी अनुमान केवल प्रथम व्याप्ति के ऊपर ही आधारित रहता है। यथा: समस्त ज्ञेय पदार्थ अभिधेय होते हैं (प्रतिज्ञा), घट एक पदार्थ है (हेतुवाक्य), ''अतएव घट अभिधेय है (निगम)। ज्ञेय का अर्थ है ज्ञान का विषय होना। (अर्थात् वह पदार्थ जिसे हम जान सकते हैं)। अभिधेय का अर्थ है अभिधा (या संज्ञा) का विषय होना अर्थात् वह पदार्थ जिसे हम कोई नाम दे सकते हैं। जगत् का यह नियम है कि ज्ञानविषय होते ही पदार्थ का कोई न कोई नाम अवश्यमेव दिया जाता है। यह व्याप्ति सत्तात्मक रूप से ही सिद्ध की जा सकती है, निषेधमुखेन नहीं, क्योंकि कोई भी ऐसा पदार्थ नहीं हैै जिसको नाम न दिया जा सके। अर्थात् अभिधेयाभाव को हम ज्ञेयभाव के साथ दृष्टांत के अभाव में कथमपि संबद्ध नहीं सिद्ध कर सकते। इसलिये ऊपरवाला निगमन केवल अन्वयव्याप्ति के आधार पर ही सिद्ध किया जा सकता है। इसीलिये ये अनुमान केपलान्वयी कहलाता है। सन्दर्भ श्रेणी:भारतीय दर्शन