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तुरही (वाद्य यंत्र)
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तुरही एक पीतल का वाद्य यंत्र है, जिसका उपयोग शास्त्रीय संगीत में होता है। इसमें उच्च स्वर की गुणवत्ता वाले तुरही से लेकर बास तुरही तक शामिल हैं, जो मानक बी ♭ या सी तुरही से एक सप्तक नीचे होता है। इसका स्वर उज्ज्वल और गूंजपूर्ण होता है।
== प्रकार ==
तुरही के कई प्रकार होते हैं, घरेलू तुरही (वाद्य यंत्र), जिसकी बी ♭ स्वर होती है और इसकी नलिका की लंबाई लगभग 1.48 मीटर (4 फ़ीट 10 इंच) होती है। कॉर्नेट तुरही के समान होता है, लेकिन इसमें शंक्वाकार छिद्र होता है, जबकि तुरही में बेलनाकार छिद्र होता है। इसके अतिरिक्त, कॉर्नेट की नलिका को मोड़ने का तरीका भी अलग होता है। शुरुआती तुरही में नलिका की लंबाई को बदलने का कोई साधन नहीं था, लेकिन आधुनिक उपकरणों में स्वर को बदलने के लिए तीन या कभी-कभी चार सुई होते हैं। अधिकांश तुरही में सुई के समान वाल्व होते हैं, जबकि कुछ में घुमावदार वाल्व होते हैं। घुमावदार वाल्व वाले तुरही का उपयोग विशेष रूप से जर्मन और जर्मन शैली के ऑर्केस्ट्रा में अधिक होता है।
== ऐतिहासिक पृष्ठभूमि ==
तुरही जैसे उपकरणों का प्राचीन उपयोग युद्ध और शिकार में संकेत प्रेषण के लिए किया जाता था, जिसके प्रमाण दूसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व से मिलते हैं। इन्हें 14वीं सदी के अंत या 15वीं सदी की शुरुआत में संगीत वाद्ययंत्र के रूप में उपयोग करना शुरू किया गया। इसका विकास संगीत और संचार के क्षेत्र में महत्वपूर्ण रहा।
== उपयोग ==
तुरही का उपयोग पारंपरिक रूप से संगीतकला में ऑर्केस्ट्रा, कॉन्सर्ट बैंड, सामुहिक संगीत के रूप में होता है। इस लोकप्रिय वाद्य यंत्र का प्रयोग स्कूल बैंड में भी होता है। इसकी ध्वनि मुखपत्र में होंठों को कंपन करके उत्पन्न होती है। इसका उज्ज्वल स्वर इसे विभिन्न संगीत शैलियों में अद्वितीय बनाता है।
== संदर्भ ==