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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

सखाराम गणेश देउस्कर

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सखाराम गणेश देउस्कर (17 दिसम्बर 1869 - 23 नवम्बर 1912) क्रांतिकारी लेखक, इतिहासकार तथा पत्रकार थे। वे भारतीय जन-जागरण के ऐसे विचारक थे जिनके चिंतन और लेखन में स्थानीयता और अखिल बांग्ला तथा चिंतन-मनन का क्षेत्र इतिहास, अर्थशास्त्र, समाज एवं साहित्य था। देउस्कर भारतीय जनजागरण के ऐसे विचारक थे जिनके चिंतन और लेखन में स्थानीयता और अखिल भारतीयता का अद्भुत संगम था। वे महाराष्ट्र और बंगाल के नवजागरण के बीच सेतु के समान हैं। उनका प्रेरणा-स्रोत महाराष्ट्र है, पर वे लिखते बांग्ला में हैं। अपने मूल से अटटू लगाव और वर्तमान से गहरे जुड़ाव का संकेत उनके देउस्कर नाम में दिखाई देता है, जो 'देउस' और ' करौं ' के योग से बना है। अंगूठाकार|The funeral of Sri Ganesh Sakharam Deuskar विचारक, पत्रकार और लेखक सखाराम गणेश देउस्कर भारतीय नवजागरण के प्रमुख निर्माताओं में से एक थे। मराठी मूल के लेकिन बंगाली परिवेश में जन्मे और पले-बढ़े देउस्कर ने महाराष्ट्र और बंगाल के नवजागरण के बीच सेतु की तरह काम किया। अरविंद घोष ने लिखा है कि 'स्वराज्य' शब्द के पहले प्रयोग का श्रेय देउस्कर को ही जाता है। पत्रकार के तौर पर जीवन की शुरुआत करने वाले देउस्कर की इतिहास, साहित्य और राजनीति में विशेष रूप से रुचि थी। उन्होंने बांग्ला की अधिकांश क्रांतिकारी पत्रिकाओं में सतत लेखन किया। देउस्कर की जिस एक रचना ने नवजागरण काल के प्रबुद्धवर्ग को सर्वाधिक प्रभावित किया, वह थी 1904 में प्रकाशित कृति 'देशेर कथा'। इसका हिंदी-अनुवाद 'देश की बात' (1910) नाम से हुआ। विलियम डिग्बी, दादाभाई नौरोजी और रमेश चंद्र दत्त ने भारतीय अर्थव्यवस्था के जिस विदेशी शोषण के बारे में लिखा था, सखाराम देउस्कर ने मुख्यतः उसी आधार पर इस ऐतिहासिक कृति की रचना की। हिंदुस्तान के उद्योग-धंधों की बर्बादी का चित्रण करती देउस्कर की यह कृति ब्रिटिश साम्राज्यवाद की जंजीरों में जकड़ी और शोषण के तले जीती-मरती भारतीय जनता के रुदन का दस्तावेज़ है। जीवन परिचय सखाराम गणेश देउस्कर का जन्म 17 दिसम्बर 1869 को देवघर के पास 'करौं' नामक गांव में हुआ था, जो अब झारखंड राज्य में है। मराठी मूल के देउस्कर के पूर्वज महाराष्ट्र के रायगड ज़िले में छत्रपती शिवाजी महाराज के अलिबाग नामक किले के निकट देउस गाँव के निवासी थे। 18वीं सदी में मराठा शक्ति के विस्तार के समय उनके पूर्वज महाराष्ट्र के देउस गांव से आकर करौं में बस गए थे। पाँच साल की अवस्था में माँ का देहांत हो जाने के बाद बालक सखाराम का पालन-पोषण उनकी विद्यानुरागिनी बुआ के पास हुआ जो मराठी साहित्य से भली भाँति परिचित थीं। उनके जतन, उपदेश और परिश्रम ने सखाराम में मराठी साहित्य के प्रति प्रेम उत्पन्न किया। बचपन में वेदों के अध्ययन के साथ ही सखाराम ने बंगाली भाषा भी सीखी। इतिहास उनका प्रिय विषय था। सखाराम गणेश देउस्कर बाल गंगाधर तिलक को अपना राजनीतिक गुरु मानते थे। सखाराम गणेश देउस्कर ने सन् 1891 में देवघर के आर. मित्र हाई स्कूल से मैट्रिक की परीक्षा पास की और सन् 1893 से इसी स्कूल में शिक्षक नियुक्त हो गए। यहीं वे राजनारायण बसु के संपर्क में आए और अध्यापन के साथ-साथ एक ओर अपनी सामाजिक-राजनीतिक दृष्टि का विकास करते रहे। दूसरी ओर उसकी अभिव्यक्ति के लिए बांग्ला की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में राजनीति, सामाजिक और साहित्यिक विषयों पर लेख भी लिखते रहे। सन् 1894 में देवघर में हार्ड नाम का एक अंग्रेज मजिस्ट्रेट था। उसके अन्याय और अत्याचार से जनता परेशान थी। देउस्कर ने उसके विरुद्ध कलकत्ता से प्रकाशित होनेवाले हितवादी नामक पत्र में कई लेख लिखे, जिसके परिणामस्वरूप हार्ड ने देउस्कर को स्कूल की नौकरी से निकालने की धमकी दी। उसके बाद देउस्कर जी ने अध्यापक की नौकरी छोड़ दी और कलकत्ता जाकर हितवादी अखबार में प्रूफ रीडर के रूप में काम करने लगे। कुछ समय बाद अपनी असाधारण प्रतिभा और परिश्रम की क्षमता के आधार पर वे हितवादी के संपादक बना दिए गए। लेकिन सन् 1907 में सूरत के कांग्रेस अधिवेशन में जब कांग्रेस का गरम दल और नरम दल में विभाजन हुआ तो हितवादी के मालिक ने देउस्कर से गरम दल और तिलक के विरुद्ध हितवादी में संपादकीय लेख लिखने के लिए कहा। सखाराम तिलक के राजनीतिक विचारों से एकता अनुभव करते थे, इसलिए उन्होंने तिलक के विरुद्ध संपादकीय लेख लिखने से मना कर दिया। परिणामस्वरूप उन्हें हितवादी के संपादक पद से त्यागपत्र देना पड़ा। इसके बाद वे कलकत्ता के ही राष्ट्रीय शिक्षा परिषद् के विद्यालय में बांग्ला भाषा तथा भारतीय इतिहास के शिक्षक के पद पर नियुक्त हुए। लेकिन सन् 1910 में जब राष्ट्रीय शिक्षा परिषद् के प्रबंधकगण उन्हें सशंकित दृष्टि से देखने लगे। ऐसी स्थिति में सखाराम ने शिक्षक पद से भी त्यागपत्र दे दिया। बाद में हितवादी के प्रबंधकों ने उनसे पुन: संपादक बनने का अनुरोध किया तो देउस्कर ने उसे स्वीकार कर लिया। कुछ लोगों के लिए त्याग और संघर्ष जीवन के आदर्श होते हैं, लेकिन सखाराम गणेश देउस्कर की पूरी जिंदगी त्याग और संघर्ष के ताने-बाने से बनी हुई थी। स्वराज्य और स्वतंत्रता का यह योद्धा जीवन भर अपने विचारों के लिए कठिन संघर्ष करता दिखाई देता है। उनका पारिवारिक जीवन भी निरंतर संकटों और संघर्षों के बीच बीता। जब वे पांच वर्ष के थे तभी उनकी माता का देहांत हो गया, इसलिए उनका पालन-पोषण उनकी विधवा बुआ के हाथों हुआ जिन्होंने सखाराम को मराठी साहित्य की शिक्षा दी। जब ‘देशेर कथा’ को लोकप्रियता के कारण देउस्कर ख्याति के शिखर पर थे, तभी एक ओर उनकी दो पुस्तकों पर सरकारी प्रतिबंध लगा तो दूसरी ओर उनकी पत्नी और एकमात्र पुत्र का निधन हुआ। सन् 1910 के अंतिम दिनों में इन सब आघातों से आहत होकर सखाराम गणेश देउस्कर अपने गांव करौं लौट आए और वहीं रहने लगे। उनको कुल 43 वर्ष का ही जीवन मिला था। 23 नवम्बर 1912 को यह प्रकाश-पुंज सदा के लिए बुझ गया। दुनिया की अधिकांश महान प्रतिभाएं अपने आलोक से लोक को चकित करती हुई इसी तरह अल्पायु में ही दुनिया से विदा हो गई हैं। कृतियाँ सखाराम गणेश देउस्कर भारतीय नवजागरण के अन्य निर्माताओं की तरह एक निर्भीक पत्रकार और मौलिक विचारक थे। उनके संपूर्ण चिंतन और लेखन की बुनियादी चिंता देश की पूर्ण स्वाधीनता थी। श्री अरविंद ने लिखा है कि स्वराज्य शब्द का पहला प्रयोग ‘देशेर कथा’ के लेखक सखाराम गणेश देउस्कर ने किया। 1 देउस्कर ने पत्रकार के रूप में लेखन की शुरुआत की थी। वे बांग्ला के अधिकांश क्रांतिकारी पत्रिकाओं में लेख लिखते थे। युगांतर पत्रिका के वे नियमित लेखक थे। युगांतर के अलावा उन्होंने साहित्य, भारती, धरनी, साहित्य-संहिता, प्रदीप, बंग-दर्शन, आर्यावर्त्त, वेद व्यास, प्रतिभा आदि पत्रिकाओं में भारत के इतिहास, संस्कृति, साहित्य आदि से संबंधित बहुत सारे लेख लिखे, जिनका उद्देश्य भारतीय जनता को अपने अतीत और वर्तमान का ज्ञान कराना था। इतिहास, साहित्य और राजनीति उनके प्रिय विषय थे। सखाराम गणेश देउस्कर के ग्रंथों और निबंधों की सूची बहुत लंबी है। डॉ॰ प्रभुनारायण विद्यार्थी ने एक लेख में देउस्कर की रचनाओं का ब्योरा प्रस्तुत किया है। उनके प्रमुख ग्रंथ है महामति रानाडे (1901), झासीर राजकुमार (1901), बाजीराव (1902), आनन्दी बाई (1903), शिवाजीर महत्व (1903), शिवाजीर शिक्षा (1904), शिवाजी (1906), देशेर कथा (1904), देशेर कथा (परिशिष्ट) (1907), कृषकेर सर्वनाश (1904), तिलकेर मोकद्दमा ओ संक्षिप्त जीवन चरित (1908), आदि। इन पुस्तकों के साथ-साथ इतिहास, धर्म, संस्कृति और मराठी साहित्य से संबंधित उनके लेख अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। देशेर कथा (देश की बात) देशेर कथा सन् 1904 में ‘देशेर कथा’ शीर्षक से प्रकाशित उनकी बांग्ला पुस्तक ब्रिटिश साम्राज्य में गुलामी की जंजीरों में जकड़ी और शोषण की यातना में जीती-जागती भारतीय जनता के चीत्कार का दस्तावेज है। मात्र पांच वर्षों में इसके पांच संस्करण की तेरह हजार प्रतियों के प्रकाशन की सूचना से भयभीत अंग्रेज़ों ने सन् 1910 में इस पुस्तक पर पाबंदी लगा दी। भारतीय अर्थव्यवस्था को तबाह करने के लिए यहां की कृषि व्यवस्था कारीगरी और उद्योग-धंधों को तहस-नहस करने और भारतीय नागरिक के संबंध में अवमानना भरे वाक्यों का व्यवहार करने की घटनाओं का प्रामाणिक चित्र यहां उपस्थित है। इस पुस्तक का हिन्दी अनुवाद 'देश की बात' नाम से बाबूराव विष्णु पराड़कर ने लगभग शताब्दीभर पूर्व किया। पहली बार सन् 1908 में मुंबई से तथा उसका परिवर्द्धित संस्करण सन् 1910 में कलकत्ता से प्रकाशित हुआ। सन्दर्भ सखाराम गणेश देउस्कर, देशेर कथा (बांग्ला) भूमिका माधव प्रसाद मिश्र, देश की बात का मुखबंध, बंबई, 1908, पृ.6-7 महादेव प्रसाद साहा, देशेर कथा (बांग्ला), संपादकेर निवेदन; कलकत्ता, 1970, पृ. 4 माधव प्रसाद मिश्र, देश की बात : मुखबंध पृ. 5 महादेव साहा, देशेर कथा (बांग्ला) संपादकेर निवेदन, पृ. 5 सत्यभक्त, भारत में कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना, मथुरा, पृ. 26 श्री नारायण चतुर्वेदी आधुनिक हिन्दी का आदिकाल (1957-1908) पृ. 212 बाहरी कड़ियाँ