Skip to main content

  | मौसम…

411 समाचार
Public archive edition · Attributed source reporting with original dates · AI drafts are excluded

411 REFERENCE · Wikipedia

शालभंजिका

Reference material by Wikipedia contributors. This retains its source identity and is not 411 news reporting.

शालभंजिका स्त्री की मूर्ति जिसमें स्त्री का विशेष शैली में चित्रण हो, जैसे किसी वृक्ष के नीचे उसकी एक डाली को पकड़े स्त्री की मूर्ति। 'शालभंजिका' का शाब्दिक अर्थ है - 'साल वृक्ष की डाली को तोड़ती हुई'। इन्हें 'मदनिका' और 'शिलाबालिका' भी कहते हैं। श्रेणी:भारतीय शिल्पशास्त्र का इतिहास शालभंजिका पत्थरों से बनी एक महिला की दुर्लभ व विशिष्ट संरचना है, जो त्रिभंग मुद्रा में खड़ी है। ऐसा कहा जाता है कि ग्यारसपुर में पाई गई यह मूर्तियां 8वीं से 9वीं शताब्दी के बीच की है। इस उत्कृष्ट मूर्ति के बारे में कहा जाता है कि यह जंगल की देवी की है। शालभंजिका शब्द की उत्पत्ति संस्कृत से हुई है, जिसका अर्थ होता है ‘साल वृक्ष की टेहनी को तोड़ना।’ फिलहाल शालभंजिका को ग्वालियर के पुरातात्विक संग्रहालय में सुरक्षित रखा गया है। इस मूर्ति की खूबसूरती बेजोड़ हैं। जंगल की देवी समझी जाने वाली यह महिला अपने शरीर को तीन तरह से मोड़कर दुर्लभ अवस्था में है। शरीर में इतने खिचाव के बावजूद भी उनके चेहरे पर सुंदर भाव दिखाई देते हैं। कुछ आलोचक कहते हैं कि शालभंजिका का बौद्ध धर्म से घनिष्ठ संबंध है। इस मत का आधार यह है कि रानी माया ने इस मुद्रा में गौतम बुद्ध को एक साल वृक्ष के नीचे जन्म दिया था। कुछ आलोचकों का यह भी कहना है कि शालभंजिका एक पुरानी देवी है, जिसका संबंध प्रजनन से है। शालभंजिका का छोटा रूप हिंडोला तोरण पर भी देखा जा सकता है। कवि अभिराजराजेन्द्रमिश्रमहोदय ने स्व गलज्जलिका(गजल) ग्रन्थ शालभञ्जिका मे कहा है - ■ शालभञ्जिका कं प्रतीक्षते प्रोषितकान्तम् वासकसज्जा शालभञ्जिका??१ स्थिरमुद्रया कमात्मनायकम् समुद्वीक्षते शालभञ्जिका??२ कस्य नियोगाद्धसति न स्फुटम् स्मितवदनेयं शालभञ्जिका??३ कियच्चिरं स्तम्भावलम्बिता जडीभविष्यति शालभञ्जिका ।।४ धिक् स्थपतिं तं येन निर्मिता निश्चेष्टा किल शालभञ्जिका ।।५ जीवनदा पश्यतां जनानाम् स्वयमजीविता शालभञ्जिका?? ६ को नु भणतु, कं कं कथं कथम् स्ववशीकुरुते शालभञ्जिका ।।७ सन्ततपरिवर्तिनि संसारे कूटस्थेयं शालभञ्जिका ।।८ स्थास्यत्युत्कण्ठितैव नित्यम् हन्त षोडशी शालभञ्जिका ।।६ सुखितेयं दुःखिताऽथवा खलु को नु वेद भुवि, शालभञ्जिका??२०