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एंथ्राक्स
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thumb|right|300px|ऐन्थ्रैक्स का जीवाणु
एंथ्रेक्स एक खतरनाक एवं जानलेवा रोग है। यह मानव एवं पशु दोंनो को संक्रमित करता है। इसका कारण बेसिलस एंथ्रासीस नामक जीवाणु है। यह बीमारी भेड़ों में अधिक पाई जाती है। एंथ्रैक्स का प्रसार गरम और आर्द्र दिनों में जीवाणुओं के माध्यम से होता है। एंथ्रैक्स एक जूनोटिक बीमारी है, जिसका मतलब है कि यह जानवरों से मनुष्यों तक प्रसारित हो सकती है। एंथ्रैक्स रोग को मुख्य रूप से स्प्लीनिक फीवर, ऊन छानने वाले की बीमारी (Wool Sorter's Disease ) , चमड़े की पोर्टर की बीमारी (Hide Porter's Disease ) , गिल्टी बीमारी के रूप में जाना जाता है, और इसे जहरी बुखार भी कहा जाता है। एंथ्रैक्स के पराक्रमी रूप की पहचान मृत्यु के बाद होती है, जिसमें प्राकृतिक छिद्रॉ से (मुँह, योनि, गुदा, और नाक) से काला झागदार खून निकलता है। एंथ्रैक्स संक्रमित जानवरों में मौत मुख्य रूप से गुर्दे के विफलता और सेप्टिकेमिक शॉक के कारण होती है। एंथ्रैक्स संक्रमित जानवरों की पोस्ट-मार्टम परीक्षा वायुमंडलीय जैविक स्पोर्स के कारण नहीं की जाती है। https://www.therajasthanexpress.com/2024/03/what-is-anthrax-disease-anthrax-causes-symptoms-management.html "Exploring Anthrax: Causes, Symptoms, and Management of Anthrax Disease" 2024-03-24 The Rajasthan Express en 2024-03-25इस रोग के खिलाफ कार्य करने वाला वैक्सीन हैं एवं प्रतिजैविक भी उपलब्ध हैं। बींसवा सदी को आने तक इस रोग ने एशिया, यूरोप और उत्तरी अमेरिका में लाखों पशुओं एवं मनुष्यों को प्रतिवर्ष मारा। सर्वप्रथम फ्रांसीसी वैज्ञानिक लुई पाश्चर ने इसके पहले प्रभावी वैक्सीन का निर्माण किया।
यह बैक्टिरिया संक्रामक नहीं है और मुख्य रूप से जानवरों में फैलता है, फिर भी खाने–पीने से ले कर सांस के साथ इसके स्पॊर हमारे शरीर में पहुँच कर अंकुरित हो सकते हैं। यहाँ तक कि हमारी त्वचा में भी यदि कोई घाव है तो वहाँ भी ये अंकुरित हो सकते हैं और कुछ ही समय में इस बीमारी के जानलेवा लक्षण उत्पन्न हो सकते हैं। खाने–पीने के साथ एंथ्रैक्स के स्पॊर्स हमारे आहार नाल मे पहुँच कर मितली, खूनी उल्टी, खूनी दस्त, पेट दर्द आदि के लक्षण उत्पन्न करते हैं। २५ से ६० प्रतिशत लोगों की मृत्यु भी हो जाती है। त्वचा पर इसका प्रभाव छोटे–छोटे उभारों के रूप में दीखता है जो शीघ्र ही फोड़े का रूप ले लेता है जिससे पानी के समान पतला पीव बहता रहता है। प्रारंभिक लक्षणों के समय इसका निदान सिप्रोफ्लॉक्सेसिन नामक एंटीबॉयोटिक द्वारा किया जा सकता है परंतु बाद में केवल इस बैक्टिरिया को नष्ट किया जा सकता है, इस बीमारी के लक्षणों को नहीं।https://www.cdc.gov/anthrax/basics/index.html What is Anthrax? CDC 2022-02-16 www.cdc.gov en-us 2024-03-25
परिचय
ऐंथ्राक्स विशेषकर वनस्पतिभोजी जंतुओं का रोग है और उनके पश्चात् उन मनुष्यों को हो जाता है जो इस रोग से ग्रस्त पशुओं के सपंर्क में रहते हैं या चमड़े अथवा खाल का काम करते हैं। पास्चर (Pasteur) ने सबसे पहले पशुओं में इसी रोग के प्रति रोगक्षमता उत्पन्न की थी। जीवाणु प्राय: भोजन के साथ शरीर में प्रवेश करने के पश्चात् रक्त या अन्य ऊतकों में बढ़ते हैं। प्लीहा की वृद्धि हो जाती है और प्राय: १२ से ४८ घंटे में रोगी की मृत्यु हो जाती है।
मनुष्य में रोग के निम्नलिखित रूप पाए जाते हैं:
१. त्वगीय रूप– यह रूप कसाई, चमड़े को कमानेवाले और ब्रश बनाने का काम करनेवालों में पाया जाता है। संक्रमण के पश्चात् ऊतकों का एक पिंड बन जाता है, जिसके बीच में रक्ताधिक्य होता है और गलन भी होती है। इस रूप में मृत्यु कम होती है।
२. फुफ्फुसीय रूप– इसको ऊन का काम करनेवालों का रोग (ऊल सार्टर्स डिज़ीज़) भी कहा जाता है। इस रोग में स्थान स्थान पर फुफ्फुस गलने लगता है। रोग के इस रूप में मृत्यु अधिक होती है।
३. आंत्रीय रूप – रोग के जीवाणु भोजन के साथ आंत्र में पहुँचते हैं। यदि संक्रमण के रक्त में पहुँचने के कारण रक्तवूतिता (सेप्टिसीमिया) उत्पन्न हो जाती है तो मृत्यु निश्चित है। रोग का निदान आक्रांत ऊतकों, में, या रक्त में, जीवाणुओं के दिखाई पड़ने से ही किया जा सकता है। ऐंथ्राक्स दंडाणुओं को साधारणतया ऐंथ्राक्स ही कहा जाता है। ये दंडाणु ग्रामधन वातापेक्षी समूह के हैं, जिसके सदस्य स्पोर बनाते हैं। ये जीवाणु अण्वीक्षक द्वारा देखने से सीधे दंड के समान दिखाई देते हैं। इनके सिरे कटे से होते हैं। जीवाणुओं का संवर्धन करने पर स्पोर उत्पन्न होते हैं, किंतु पशु के शरीर में ये नहीं उत्पन्न होते। इनपर एक आवरण बन जाता है। इस जीवाणु को इसी प्रकार के अन्य कई समानरूप जीवाणुओं से भिन्न करना पड़ता है। ऐंथ्राक्स जीवाणु सभी जंतुओं के लिए रोगोत्पादक हैं। गिनीपिग और चूहे के चर्म को तनिक सा खुरच देने पर वे संक्रमित हो जाते हैं। रोगरोध के लिए इन जीवाणुओं से एक वैक्सीन तैयार की जाती है। चिकित्सा के लिए इनसे तैयार किया हुआ ऐंटीसीरम और सल्फ़ोनैमाइड ओषधियाँ उपयोगी हैं। मरे हुए जंतु को या तो जला देना चाहिए या गढ़े में चूना बिछाकर और मृत पशु के ऊपर भी अच्छी तरह चूना छिड़कर गाड़ देना चाहिए।Anthrax 2024-03-25 https://en.wikipedia.org/w/index.php?title=Anthrax&oldid=1215453232 Wikipedia en 2024-03-25
इन्हें भी देखें
रेबीज के लक्षण
जूनोटिक रोग
पशुओं में होने वाले जीवाणु जनित रोग
संदर्भ सूची :
श्रेणी:रोग
श्रेणी:पशुजन्यरोग