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411 समाचार
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कथासरित्सागर

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thumb|कथासरित्सागर के 16वीं शताब्दी के एक संस्करण का एक पन्ना कथासरित्सागर, संस्कृत कथा साहित्य का शिरोमणि ग्रंथ है। इसकी रचना कश्मीर में सोमदेव ने त्रिगर्त अथवा कुल्लू कांगड़ा के राजा की पुत्री, कश्मीर के राजा अनन्त की रानी सूर्यमती के मनोविनोदार्थ 1063 ई और 1082 ई. के मध्य संस्कृत में की। कथासरित्सागर गुणाढ्य की बृहत्कथा का सबसे अच्छा, बड़ा और सरस रूपान्तरण है। वास्तविक अर्थों में इसे भारतीय कथा परम्परा का 'महाकोश' और भारतीय कहानी एवं जातीय विरासत का सबसे अच्छा प्रतिनिधि माना जा सकता है। मिथक, इतिहास यथार्थ, फैंटेसी, सचाई, इन्द्रजाल आदि का अनूठा संगम इन कथाओं में है। ईसा लेकर मध्यकाल तक की भारतीय परंपराओं और सांस्कृतिक धाराओं के इस दस्तावेज में तांत्रिक अनुष्ठानों, प्राकेतर घटनाओं तथा गंधर्व, किन्नर, विद्याधर आदि दिव्य योनि के प्राणियों के बारे में ढेरों कथाएं हैं। साथ ही मनोविज्ञान सत्य, हमारी सामाजिक-आर्थिक स्थितियों तथा धार्मिक आस्थाओं की छवि और विक्रमादित्य, बैताल पचीसी, सिंहासन बत्तीसी, किस्सा तोता मैना आदि कई कथाचक्रों का समावेश भी इसमें हैं। कथासरित्सागर में 21,388 पद्य हैं और इसे 124 तरंगों में बाँटा गया है। इसका एक दूसरा संस्करण भी प्राप्त है जिसमें 18 लंबक हैं। लंबक का मूल संस्कृत रूप 'लंभक' था। विवाह द्वारा स्त्री की प्राप्ति "लंभ" कहलाती थी और उसी की कथा के लिए लंभक शब्द प्रयुक्त होता था। इसीलिए रत्नप्रभा लंबक, मदनमंचुका लंबक, सूर्यप्रभा लंबक आदि अलग-अलग कथाओं के आधार पर विभिन्न शीर्षक दिए गए होंगे। मूल स्रोत कथासरित्सागर गुणाढ्यकृत बड्डकहा (बृहत्कथा) पर आधृत है जो पैशाची भाषा में थी। महाकवि सोमदेव ने स्वयं कथासरित्सागर के आरम्भ में कहा है : मैं बृहत्कथा के सार का संग्रह कर रहा हूँ। बड्डाकहा की रचना गुणाढय ने सातवाहन राजाओं के शासनकाल में की थी जिनका समय ईसा की प्रथम द्वितीय शती के लगभग माना जाता है। आंध्र-सातवाहनयुग में भारतीय व्यापार उन्नति के चरम शिखर पर था। स्थल तथा जल मार्गो पर अनेक सार्थवाह नौकाएँ और पोतसमूह दिन-रात चलते थे। अतः व्यापारियों और उनके सहकर्मियों के मनोरंजनार्थ, देश-देशांतर-भ्रमण में प्राप्त अनुभवों के आधार पर अनेक कथाओं की रचना स्वाभाविक थी। गुणाढय ने सार्थो, नाविकों और सांयात्रिक व्यापारियों में प्रचलित विविध कथाओं को अपनी विलक्षण प्रतिभा से गुंफित कर, बड्डकहा के रूप में प्रस्तुत कर दिया था। मूल बड्डकहा अब प्राप्य नहीं है, परन्तु इसके जो दो रूपांतर बने, उनमें चार अब तक प्राप्त हैं। इनमें सबसे पुराना बुधस्वामीकृत बृहत्कथा श्लोकसंग्रह है। यह संस्कृत में है और इसका प्रणयन, एक मत से, लगभग ईसा की पाँचवीं शती में तथा दूसरे मत से, आठवीं अथवा नवीं शती में हुआ। मूलतः इसमें 28 सर्ग तथा 4,539 श्लोक थे किंतु अब यह खंडशः प्राप्त है। इसके कर्ता बुधस्वामी ने बृहत्कथा को गुप्तकालीन स्वर्णयुग की संस्कृति के अनुरूप ढालने का यत्न किया है। बृहत्कथा श्लोकसंग्रह को विद्वान् बृहत्कथा की नेपाली वाचना मानते हैं किन्तु इसका केवल हस्तलेख ही नेपाल में मिला है, अन्य कोई नेपाली प्रभाव इसमें दिखाई नहीं पड़ता। बृहत्कथा के मूल रूप का अनुमान लगाने के लिए संघदासगणि द्वारा रचित वसुदेव हिंडी का प्राप्त होना महत्वपूर्ण घटना है। इसकी रचना भी बृहत्कथा श्लोकसंग्रह के प्रायः साथ ही या संभवतः 100 वर्ष के भीतर हुई। वसुदेव हिंड्डी का आधार भी यद्यपि बृहत्कथा ही है, तो भी ग्रंथ के ठाट और उद्देश्य में काफी फेरबदल कर दिया गया है। बृहत्कथा मात्र लौकिक कामकथा थी जिसमें वत्सराज उदयन के पुत्र नरवाहनदत्त के विभिन्न विवाहों के आख्यान थे, लेकिन वसुदेव हिंडी में जैन धर्म संबंधी अनेक प्रसंग सम्मिलित करके, उसे धर्मकथा का रूप दे दिया गया है। इतना ही नहीं, इसका नायक नरवाहनदत्त न होकर, अंधक वृष्णि वंश के प्रसिद्ध पुरुष वसुदेव हैं। "हिंडी" शब्द का अर्थ 'पर्यटन' अथवा 'परिभ्रमण' है। वसुदेव हिंडी में 29 लंबक हैं और महाराष्ट्री प्राकृत भाषा में गद्य शैली के माध्यम से लगभग 11,000 श्लोक प्रमाण की सामग्री में वसुदेव के 100 वर्ष के परिभ्रमण का वृत्तांत है जिसमें वे 29 विवाह करते हैं। सब कुछ मिलाकर लगता है कि वसुदेव हिंडी बृहत्कथा का पर्याप्त प्राचीन रूपांतर है। वसुदेव हिंडी के अनंतर क्षेमेंद्र कृत बृहत्कथामंजरी का स्थान है। क्षेमेंद्र कश्मीरनरेश अनन्त (1029-1064) की सभा के सभासद् थे। उनका मूल नाम व्यासदास था। रामायणमञ्जरी, भारतमञ्जरी, अवदानकल्पलता, कलाविलास, देशोपदेश, नर्ममाला और समयमातृका नामक ग्रंथों में क्षेमेंद्र की प्रतिभा का उत्कृष्ट रूप मिलता है। क्षेमेन्द्रकृत बृहत्कथामञ्जरी में 18 लंबक हैं और उनके नाम भी सोमदेव के लंबकों से मिलते हैं। इसमें लगभग 7,540 श्लोक हैं और लेखक ने शब्दलाघव के माध्यम से संक्षेप में सुरुचिपूर्ण प्रेमकथाएँ प्रस्तुत की हैं जिनका मूलाधार बृहत्कथा की कहानियाँ ही हैं। center|thumb|700px|बृहद्कथा के विभिन्न संस्करणों (रूपों) में सम्भावित सम्बन्ध कथासरित्सागर के लंबक एवं कथानक कथासरित्सागर लम्बक संख्या लम्बक तरंग श्लोक संख्या 1 कथापीठ (भूमिका) 1-8 818 2 कथामुख (परिचय) 9-14 871 3 लावणक 15-20 1198 4 नरवाहनदत्तजनन (नरवाहनदत्त का जन्म) 21-23 501 5 चतुर्दारिका (चार पत्नियाँ) 24-26 818 6 मदनमञ्चुका 27-34 1544 7 रत्नप्रभा 35-43 1421 8 सूर्यप्रभा 44-50 115 9 अलङ्कारवती 51-56 4929 10 शक्तियशस्‌ 57-66 1120 11 वेला 67 220 12 शशांकवती 68-103 993 13 मदिरावती 104 624 14 पञ्च 105-108 1628 15 महाभिषेक 109-110 1739 16 सुरतमञ्जरी 111-113 2128 17 पद्मावती 114-119 301 18 विषमशील 120-124 420 कथासरित्सागर में प्रथम लंबक 'कथापीठ', द्वितीय लंबक 'कथामुख', तृतीय 'लावणक', चतुर्थ लंबक नरवाहनदत्त का जन्म, पंंचम चतुर्दारिका, षष्ठ सूर्यप्रभा, सप्तम् मदनमंचुका, अष्टम वेला, नवम् शशांकवती, दशम् विषमशील, एकादश मदिरावती, द्वादश पद्मावती, त्रयोदश पंच, चतुर्दश रत्नप्रभा, पंचदश अलंकारवती, षष्ठदश शक्तियशस्‌, सप्तदश महाभिषेक, अष्टदश सुरतमंजरी है। कथासरित्सागर में पहला लंबक कथापीठ है। गुणाढ्य कवि संबंधी कथानक उसका विषय है जिसमें पार्वती के शाप से शिव का गण पुष्पदंत वररुचि कात्यायन के रूप में जन्म लेता है और उसका भाई माल्यवान् गुणाढ्य के नाम से उत्पन्न होता है। वररुचि विंध्यपर्वतमाला में काणभूति नामक पिशाच को शंकर द्वारा पार्वती को सुनाई गई सात कथाएँ सुनाता है। गुणाढ्य काणभूति से उक्त कथाएँ सुनकर बृहत्कथा की रचना करता है, जिसके छह भाग आग में नष्ट हो जाते हैं और केवल सातवाँ भाग ही शेष बचता है, जिसके आधार पर कथासरित्सागर की रचना की जाती है। दूसरा लंबक कथामुख और तीसरा लावणक है जिसमें वत्सराज उदयन, उसकी रानी वासवदत्ता, मंत्री यौगंधरायण, पद्मावती आदि की कथाएँ हैं। चौथे लंबक में नरवाहनदत्त का जन्म है। इसके आगे संपूर्ण ग्रंथ का मुख्य नायक वही है। शेष चतुर्दारिका, मदनमंचुका, रत्नप्रभा, सूर्यप्रभा, अलंकारवती, शक्तियशस्, वेला, शशांकवती, मदिरावती, पंच, महाभिषेक, सुरतमंजरी, पद्मावती तथा विषमशील इत्यादि लंबकों में नरवाहनदत्त के साहसिक कृत्यों, यात्राओं, विवाहों आदि की रोमांचक कथाएँ हैं जिनमें अद्भुत कन्याओं और उनके साहसी प्रेमियों, राजाओं तथा नगरों, राजतंत्र एवं षड्यंत्र, जादू और टोने, छल एवं कपट, हत्या और युद्ध, रक्तपायी वेताल, पिशाच, यक्ष और प्रेत, पशुपक्षियों की सच्ची और गढ़ी हुई कहानियाँ एवं भिखमंगे, साधु, पियक्कड़, जुआरी, वेश्या, विट तथा कुट्टनी आदि की विविध कहानियाँ संकलित हैं। इतना ही नहीं, वेताल पंचविंशति या बेताल पच्चीसी की 25 कहानियाँ तथा पंचतंत्र की भी अनेक कहानियाँ इसमें मिल जाती हैं। सी.एच. टानी और एन.एम. पेंजर ने कथासरित्सागर का एक प्रामाणिक अंग्रेजी अनुवाद (1924-28 ई.) 10 भागों में दि ओशन ऑव स्टोरी नाम से प्रकाशित करवाया है जिसमें अनेक पादटिप्पणियों तथा निबंधों के माध्यम से भारतीय कथाओं एवं कथानक रूढ़ियों पर बहुमूल्य सामग्री जुटाई गई है। कथासरित्सागर पर विद्वानों के विचार फ़्रेंच विद्वान् लोकात ने गुणाढय एवं बृहत्कथा नामक अपनी पुस्तक (1908 ई में प्रकाशित) में लिखा है : अपने दो काश्मीरी रूपांतरों (कथासरित्सागर और बृहत्कथामंजरी) में गुणाढय की मूल बृहत्कथा अत्यंत भ्रष्ट एवं अव्यवस्थित रूप में उपलब्ध है। इन ग्रंथों में अनेक स्थलों पर मूल ग्रंथ का संक्षिप्त सारोद्धार कर दिया गया है और इनमें मूल ग्रंथ के कई अंश छोड़ भी दिए गए हैं एवं कितने ही नए अंश प्रक्षेप रूप में जोड़ दिए गए हैं। इस तरह मूल ग्रंथ की वस्तु और आयोजना में बेढंगे फेरफार हो गए। फलस्वरूप, इन काश्मीरी कृतियों में कई प्रकार की असंगतियाँ आ गई और जोड़े हुए अंशों के कारण मूल ग्रंथ का स्वरूप पर्याप्त भ्रष्ट हो गया। इस स्थिति में बुधस्वामी के ग्रंथ में वस्तु की आयोजना द्वारा मूल प्राचीन बृहत्कथा का सच्चा चित्र प्राप्त होता है। किंतु खेद है कि यह चित्र पूरा नहीं है, क्योंकि बुधस्वामी के ग्रंथ का केवल चतुर्थांश ही उपलब्ध है। इसलिए केवल उसी अंश का काश्मीरी कृतियों के साथ तुलनात्मक मिलान शक्य है। कहा जा सकता है कि सोमदेव ने सरल और अकृत्रिम रहते हुए आकर्षक एवं सुंदर रूप में कथासरित्सागर के माध्यम से अनेक कथाएँ प्रस्तुत की हैं जो निश्चित ही भारतीय मनीषा का एक अन्यतम उदाहरण है। कथासरित्सागर का आधुनिक सन्दर्भ में पुनर्लेखन इस कालजयी रचना का आकर्षण आधुनिक कथाकारों के लिए भी बहुत प्रबल है। हिन्दी के प्रतिष्ठित कथाकार कृष्ण बलदेव वैद ने कथासरित्सागर की कुछ प्रसिद्ध कथाओं का अपने ढंग से पुनर्लेखन करते हुए इस प्राचीन कथा को आधुनिक जमा पहनाने की साहसिक पहल भी की है। 'बदचलन बीवियों का द्वीप' और 'बोधित्सव की बीवी' उनकी इसी तरह की रचनाएं हैं। इन्हें भी देखें बृहत्कथा बृहत्कथाश्लोकसंग्रहः बृहत्कथामञ्जरी पंचतंत्र हितोपदेश बेताल पच्चीसी सिंहासन बत्तीसी बाहरी कडियाँ कथासरित्सागरः (संस्कृत विकिस्रोत पर) कथासरित्सागर कथासरित्सागर की कथाएँ (हिन्दी में / गद्य कोश) कथासरित्सागर की कथाएँ (हिन्दी में / हिन्दी समय) कथासरित्सागर - एक सांस्कृतिक अध्ययन श्रेणी:साहित्य श्रेणी:संस्कृत श्रेणी:कहानी