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स्कोपस सिद्धांत

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स्कोपस सिद्धांत (जर्मनः Skopostheorie) अनुवाद अध्ययन के क्षेत्र में एक अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत है। यह इस मूल विचार पर आधारित है कि अनुवाद केवल भाषाई रूपांतरण नहीं है, बल्कि एक उद्देश्यपूर्ण कार्य होता है, और उसी उद्देश्य के आधार पर यह निर्धारित किया जाता है कि अनुवाद के लिए कौन-सी रणनीति अपनाई जाए।Du Xiaoyan 2012 A brief introduction of Skopos Theory Theory and Practice in Language Studies 2 10 2189–2193 10.4304/tpls.2.10.2189-2193 1799-2591 free https://www.academypublication.com/issues/past/tpls/vol02/10/27.pdf इस दृष्टिकोण के अनुसार अनुवाद प्रक्रिया में 'उद्देश्य' का विशेष महत्व होता है। यह उद्देश्यपरकता अनुवाद के दिशानिर्देशों तथा नियमों के माध्यम से स्पष्ट होती है। ये सभी तत्व मिलकर अनुवादक को यह समझने में सहायता करते हैं कि उसे किस प्रकार का लक्ष्य-पाठ तैयार करना है। संक्षिप्त परिचय पृष्ठभूमि यह सिद्धांत पहली बार 1978 में भाषाविद् हांस जोसेफ वर्मीयर द्वारा जर्मन पत्रिका Lebende Sprachen में प्रकाशित एक लेख के माध्यम से प्रस्तुत किया गया थाVermeer Hans Josef 1978 Ein Rahmen für eine allgemeine Translationstheorie Lebende Sprachen 23 3 10.1515/les.1978.23.3.99 0023-9909 62754751 जेम्स स्ट्रैटन होम्स द्वारा 1972 में प्रस्तुत अनुवाद अध्ययन के मानचित्र की अवधारणा को आगे बढ़ाते हुए, स्कोपस सिद्धांत जर्मन कार्यात्मकतावादी अनुवाद सिद्धांतTranslating as a purposeful activity: Functionalist approaches explained Nord Christiane Routledge 2018 9781351189347 2nd London के चार प्रमुख दृष्टिकोणों का केंद्र बन गया। ये दृष्टिकोण विशेष रूप से बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में विकसित हुए और उन्होंने अनुवाद को समझने के तरीके में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन किया। ये सभी दृष्टिकोण अनुवाद अध्ययन के विद्वानों द्वारा स्कोपस सिद्धांत के विकास में दिए गए योगदान का हिस्सा थे, जिन्हें चार चरणों में विभाजित किया गया है: कैथरीना राइस की कार्यात्मक श्रेणी, 1971 Translation criticism, the potentials and limitations: Categories and criteria for translation quality assessment Reiß Katharina Routledge (E. F. Rhodes, trans.) 2014 978-1-317-64206-0 London, U.K. 878405702 हांस वर्मीयर का स्कोपस सिद्धांत, 1978 जस्टा-होल्ज़ मंटारी का अनुवादात्मक कार्रवाई का सिद्धांत, 1981 Translatorisches Handeln : Theorie und Methode Holz-Mänttäri, Justa. 1984 Suomalainen Tiedeakatemia 978-9514104916 Helsinki 12977182 क्रिस्टियान नोर्ड का 'कार्य और निष्ठा' का सिद्धांत, 1997 Nord Christiane 2016 Function + Loyalty: Theology meets Skopos Open Theology 2 1 566–580 10.1515/opth-2016-0045 2300-6579 free परिभाषा ‘स्कोपस’ (ग्रीक: σκοπός) एक ग्रीक शब्द है, जिसका अर्थ है ‘उद्देश्य’। अनुवाद अध्ययन के संदर्भ में यह एक तकनीकी शब्द के रूप में प्रयुक्त होता है, जिसे हांस वर्मीयर ने प्रस्तुत किया था। यह शब्द किसी अनुवाद के उद्देश्य को व्यक्त करता है। जिसके आधार पर अनुवाद की दिशा तय होती है। पॉल कुसमौल ने स्कोपस सिद्धांत को इस प्रकार स्पष्ट किया है "कार्यात्मक दृष्टिकोण का स्कोपोस सिद्धान्त के साथ एक बड़ा गहरा संबंध है। अनुवाद का कार्य लक्ष्य पाठकों के ज्ञान, अपेक्षाओं, मूल्यों और मानदंडों पर निर्भर करता है, जो पुनः उस स्थिति और संस्कृति से प्रभावित होते हैं जिसमें पाठक मौजूद होते हैं। ये कारक निर्धारित करते हैं कि स्रोत पाठ या उसके किसी भाग के प्रकार्य को पूरी तरह संरक्षित किया जाए या कुछ संशोधित किया जाए या कि उसे पूरी तरह बदल दिया जाए।"Kussmaul, P. (1997). Training the translator. Amsterdam: John Benjamins Publishing Co. 9781556196904 इस दृष्टिकोण से स्पष्ट होता है कि अनुवाद एक लचीली और संदर्भ-आधारित प्रक्रिया है, जिसमें उद्देश्य के अनुसार बदलाव आवश्यक हो सकते हैं। वर्मीयर के अनुसार अनुवाद में उद्देश्य (स्कोपस) के तीन प्रमुख प्रकार माने जा सकते हैं।पहला, वह सामान्य उद्देश्य होता है जिसमें अनुवादक अनुवाद को आय के लिए पेशे के रूप में अपनाता है। दूसरा, लक्ष्य-पाठ का संप्रेषणात्मक उद्देश्य होता है, जो किसी विशेष परिस्थिति में पाठकों के लिए निर्धारित किया जाता है, जैसे उन्हें जानकारी देना या किसी विषय के बारे में निर्देश प्रदान करना। तीसरा, अनुवाद की रणनीति या पद्धति से जुड़ा उद्देश्य होता है, जिसमें यह तय किया जाता है कि अनुवाद किस प्रकार किया जाए। उदाहरण के लिए, स्रोत भाषा की संरचनात्मक विशेषताओं को प्रदर्शित करना। स्कोपस सिद्धांत में 'स्कोपस' शब्द दूसरे प्रकार के उद्देश्य को संदर्भित करता है। इस सिद्धांत के अनुसार स्रोत-पाठ को लक्ष्य संस्कृति के लिए "सूचना के प्रस्ताव" के रूप में देखा जाता है और इस विचार को रचनावादी बोध सिद्धांतों के एक प्रत्यक्ष परिणाम के रूप में देखा जाता है।https://archive.org/details/doubtsdirections00gamb Doubts and Directions in Translation Studies: Selected Contributions from the EST Congress, Lisbon 2004 Gambier Yves Shlesinger Miriam Stolze Radegundis 2007 John Benjamins Publishing 9789027216809 Amsterdam 32 limited मंशा स्कोपस सिद्धांत को वर्मीयर द्वारा उस अंतर को दूर करने के उद्देश्य से विकसित किया गया था, जो पूर्व में प्रचलित और व्यापक रूप से स्वीकृत समतुल्यता सिद्धांत में सिद्धांत और व्यवहार के बीच विद्यमान था। इस प्रयास में Hans Vermeer ने अनुवाद की ऐसी पद्धति विकसित करने का प्रयत्न किया, जो केवल भाषावैज्ञानिक स्तर तक सीमित न रहे, बल्कि उससे आगे बढ़कर अनुवाद को एक व्यापक दृष्टिकोण प्रदान करे। इसके परिणामस्वरूप, उन्होंने अनुवाद को उन पारंपरिक और लंबे समय से चले आ रहे द्वंद्वों से आगे ले जाने का प्रयास किया, जैसे-“स्वतंत्र बनाम निष्ठापूर्ण अनुवाद”, “गत्यात्मक बनाम औपचारिक समतुल्यता”, तथा “कुशल व्याख्याकार बनाम शाब्दिक अनुवादक” आदि। जो पूर्वकालीन अनुवाद सिद्धांतों में निहित प्रमुख समस्याएँ थीं। लक्ष्य और लक्षित वर्ग स्कोपस सिद्धांत अनुवादकों के लिए एक व्यापक रूपरेखा प्रस्तुत करता है, जो अनुवाद को पारंपरिक, स्थिर भाषावैज्ञानिक श्रेणियों, विशेषतः अनुवाद-परिवर्तनों की कठोर वर्गीकरण पद्धति, से आगे ले जाने का संकेत देता है।https://archive.org/details/introducingtrans00mund_0 Introducing translation studies : Theories and applications Munday Jeremy Routledge 2001 978-0415-58489-0 Abingdon, Oxon Jeremy Munday registration पूर्ववर्ती अनुवाद सिद्धांतों के विपरीत, जो कि सूक्ष्म स्तर पर भाषाविज्ञान और समतुल्यता-आधारित अनुवाद पर केंद्रित थे, स्कोपस सिद्धांत में ‘ट्रांसलेटम’ (अनूदित पाठ) के लिए स्रोत-पाठ के साथ कार्यात्मक समतुल्यता बनाए रखना अनिवार्य नहीं माना जाता। इस सिद्धांत में मुख्य जोर अनुवादात्मक क्रिया के उद्देश्य पर दिया जाता है, न कि स्रोत-पाठ के साथ पूर्ण समानता स्थापित करने पर।Trisnawati Ika Kana 2014 Skopos theory: A practical approach in the translation process Englisia Journal 1 2 10.22373/ej.v1i2.186 2527-6484 free श्रेणी:सिद्धान्त श्रेणी:अनुवाद अध्ययन सैद्धांतिक ढांचा क्रिया सिद्धांत वर्मीयर के अनुसार, क्रिया सिद्धांत स्कोपस सिद्धांत का आधार है। क्योंकि प्रत्येक क्रिया किसी न किसी उद्देश्य से निर्देशित होती है। क्रिया को "कार्य करने की क्रिया" के रूप में परिभाषित किया गया है, जिसका अर्थ है जानबूझकर (इच्छा से) दुनिया (प्रकृति) में परिवर्तन लाना या रोकना। चूंकि अनुवाद एक प्रकार की अनुवादात्मक क्रिया है जिसमें उद्देश्यपूर्ण संचार (या परस्पर क्रिया, यदि यह दो या अधिक पक्षों को प्रभावित करती है) और स्थानांतरण शामिल होता है, इसलिए इसके साथ एक उद्देश्य जुड़ा होना चाहिए। वर्मीयर ने स्कोपस सिद्धांत को क्रिया सिद्धांत के रूप में समझाने के लिए कई सिद्धांत प्रस्तुत किए। इनमें यह दावा भी शामिल है कि क्रिया का स्कोपस(उद्देश्य) ही इच्छित लक्ष्य को प्राप्त करने की रणनीति निर्धारित करता है।Reflections on Translation Theory: Selected papers 1993 - 2014 Chesterman Andrew 2017-04-26 John Benjamins Publishing Company 9789027258786 Amsterdam 58 अन्य विद्वानों का मानना है कि सामग्री के अनुवाद के दौरान संदर्भगत कारकों को भी ध्यान में रखना आवश्यक है, जैसे पाठक की संस्कृति और वह ग्राहक जिसने अनुवाद का कार्य प्रारंभ किया है।Routledge Encyclopedia of Translation Studies https://archive.org/details/routledgeencyclo0000unse_o9f9 Baker Mona 2001 Routledge 0415093805 Oxon, UK 235 हालांकि,क्रिया सिद्धांत का दायरा स्कोपस सिद्धांत की तुलना में अधिक व्यापक है।https://archive.org/details/translationstudi00duar_849 Translation Studies at the Interface of Disciplines Duarte João Ferreira Rosa Alexandra Assis Seruya Teresa 2006 John Benjamins Publishing 9027216762 Amsterdam 16 limited अनुवाद निर्देश ग्राहक द्वारा अनुवादक को एक अनुवाद निर्देश दिया जाना जरूरी हो जाता है, ताकि वह अनुवाद के उद्देश्य को समझ सके और उसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर अनुवाद की रणनीति निर्धारित कर सके।Nord Christiane 2006 Translating as a purposeful activity: a prospective approach TEFLIN Journal 17 2 131–143 उस अनुवाद कार्य को कैसे पूरा किया जाए, यह अनुवादक को इसके निर्देश देता है।Jensen, M. N. (2009). Professional translators’ establishment of Skopos - A ‘brief’ study (Unpublished master’s thesis). Aarhus School of Business, Aarhus University, Denmark. आयोग को निम्नलिखित बिंदुओं पर यथासंभव विस्तृत जानकारी देनी चाहिए (1) लक्ष्य, अर्थात् आयोग के उद्देश्य का एक विवरण (2) वे शर्तें जिनके तहत इच्छित लक्ष्य प्राप्त किया जाना चाहिए (स्वाभाविक रूप से समय सीमा और शुल्क जैसे व्यावहारिक मामलों सहित) ।https://archive.org/details/translationstudi00venu The Translation Studies Reader Vermeer Hans Josef Routledge 2000 978-0203446621 Venuti Lawrence London & New York 221–232 Skopos and commission in translation action limited ग्राहक उद्देश्य के बारे में यथासंभव अधिक से अधिक जानकारी प्रदान करेगा, जिसमें लक्षित व्यक्तियों, समय, स्थान, अवसर और अभीष्ट संचार के माध्यम तथा पाठ के उद्देश्यित कार्य का स्पष्टीकरण शामिल होगा”। लिखित या मौखिक रूप से इन जानकारियों को बताकर अनुवाद निर्देशों को स्पष्ट किया जाता है।Jensen, M. N. (2009). Professional translators’ establishment of Skopos - A ‘brief’ study (Unpublished master’s thesis). Aarhus School of Business, Aarhus University, Denmark. हालांकि, जब ग्राहक अंतरसांस्कृतिक संचार से अपरिचित होने के कारण स्पष्ट और विस्तृत अनुवाद निर्देश नहीं देता है, तो अनुवादक को बातचीत करके मार्गदर्शन देना चाहिए कि मूल पाठ का अनुवाद किया जाना है या नहीं और उद्देश्य(स्कोपस) को प्राप्त करने के लिए किस प्रकार के लक्ष्य पाठ की आवश्यकता है। +अनुवाद निर्देश का एक उदाहरणपरियोजना का नाम: कंपनी की वेबसाइट का अनुवाद उद्देश्य (Skopos): अंग्रेज़ी वेबसाइट को हिंदी में अनुवाद करके भारतीय ग्राहकों तक पहुँच बढ़ाना स्रोत भाषा: अंग्रेज़ी लक्ष्य भाषा: हिंदी लक्ष्य पाठक (Target Audience): भारत के सामान्य उपभोक्ता (18–45 वर्ष) अनुवाद शैली: सरल, स्पष्ट और आकर्षक भाषा तकनीकी शब्दों को आसान हिंदी में समझाया जाए विशेष निर्देश: ब्रांड नाम का अनुवाद न करें, सांस्कृतिक संदर्भों को भारतीय संदर्भ के अनुसार अनुकूलित करें, बहुत जटिल वाक्यों को छोटे वाक्यों में बदलें इन अनुवाद निर्देशों से अनुवादक यह समझ सकता है कि उसका ग्राहक, अपना बाजार भारत में फैलाना चाहता है। उसके लक्ष्य में हिन्दी समझने वाले युवा और वयस्क ग्राहक हैं। वह उनके लिए आसान भाषा और सांस्कृतिक संदर्भों का देशीकरण चाहता है। इन्हें समझकर अनुवादक लक्ष्य पाठ के उद्देश्य(स्कोपस) को जान पाएगा और उसी हिसाब से अनुवाद की यथोचित रणनीति का चुनाव करेगा। संस्कृति वर्मीयर रीति रिवाजों और परंपराओं को किसी संस्कृति की प्रमुख विशेषता मानते हैं और अनुवाद को संस्कृतियों की तुलना के रूप में देखते हैं। इस "तुलना" में, स्रोत संस्कृति के ज्ञान की व्याख्या अनुवादक के पास उपलब्ध स्रोत संस्कृति से संबंधित उसके सांस्कृतिक ज्ञान के माध्यम से की जाती है। यह "तुलना" आंतरिक या बाहरी दृष्टिकोण से की जा रही है या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि अनुवादक अपनी ही भाषा और संस्कृति में अनुवाद कर रहा है या उससे अनुवाद कर रहा है। संस्कृतियों और भाषाओं को प्रणालियों के रूप में और निम्न स्तर की इकाइयों को उसके तत्वों के रूप में मानते हुए, जब एक तत्व को एक प्रणाली से दूसरी प्रणाली में स्थानांतरित किया जाता है, तो उसका मूल्य बदल जाता है क्योंकि अब वह नई प्रणाली के तत्वों से जुड़ जाता है। इसका अर्थ है कि स्रोत पाठ से लक्ष्य पाठ में स्थानांतरण करते समय कुछ संदर्भों में परिवर्तन उचित होते हैं, बशर्ते स्थानांतरित तत्व लक्ष्य संस्कृति में उतनी ही पारंपरिकता रखता हो, जितनी मूल तत्व स्रोत संस्कृति में रखता था।Towards a general theory of translational action: Skopos Theory explained Reiß Katharina Vermeer Hans Josef Routledge 2014 9781905763955 1st London इसके अतिरिक्त, अनुवाद का उद्देश्य(स्कोपस) अनुवाद निर्देश द्वारा निर्धारित किया जाता है, जिसे "अंतरसांस्कृतिक संचालक" भी कहा जाता है। इस प्रकार, यह स्पष्ट होता है कि यद्यपि स्कोपस सिद्धांत अधिक लक्ष्य-उन्मुख है,फिर भी स्रोत और लक्ष्य भाषाओं के सांस्कृतिक पहलू महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐतिहासिक विकास वर्मीयर और राइस स्कोपस सिद्धांत (एक अवधारणा के रूप में) को बाद में अनुवाद के क्षेत्र में विभिन्न शिक्षाविदों द्वारा और विकसित किया गया, जिससे इसका विकास को चार चरणों में विभाजित किया गया इनमें से दो को बाद में संयोजित किया गया, जिससे आधुनिक स्कोपस सिद्धांत की शुरुआत मानी जा सकती है। Grundlegung einer allgemeinen Translationstheorie Reiß Katharina Vermeer Hans J. 1984 Niemeyer 9783111351919 Tübingen, Baden-Württemberg, Germany 10.1515/9783111351919 विशेष रूप से, सामान्य स्कोपस सिद्धांत और कैथरीना राइस के कार्यात्मक श्रेणी मॉडल Translation criticism, the potentials and limitations : categories and criteria for translation quality assessment Reiß Katharina St. Jerome Pub. (E.F. Rhodes, trans.) 1971 978-1900650267 Manchester, U.K. 45260990 के संयोजन ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह मॉडल उनके संयुक्त लेखों (1984 और 1991) में प्रस्तुत किया गया। Skopos theory https://archive.org/details/routledgeencyclo0000unse_o9f9 Schäffner Christina Routledge Baker, Mona. 1998 978-0415093804 London 35758187 इस संयुक्त दृष्टिकोण ने ऐसे सामान्य कारकों (general factors) को निकालने की अनुमति दी, जो अनुवाद प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं, भले ही वे अलग-अलग संस्कृतियों और/या भाषाओं में भिन्न रूप में प्रकट होते हों। इन उपर्युक्त कारकों को विशेष सिद्धांतों से लगातार जोड़ा जा सकता है, जिसके परिणामस्वरूप यह दृष्टिकोण अधिक कार्यात्मक और लक्ष्य-उन्मुख बन गया। इस ढांचे के अंतर्गत, सफल अनुवाद करने के लिए अनुवाद के पीछे के तर्क और लक्ष्य-पाठ के कार्य का ज्ञान, अनुवादक के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। मूलतः, स्कोपस सिद्धांत उन समतुल्यता-आधारित अनुवाद सिद्धांतों को अस्वीकार करता है जो स्रोत-पाठ, स्रोत-पाठ के लेखक के उद्देश्य, या पाठकों पर उसके प्रभाव को अनुवाद के अंतिम निर्धारक मानते हैं।https://dilmanj.com/hans-vermeer-skopos-theory-translation/ Hans Vermeer Skopos Theory of translation Zeynalzadeh Poorya 2018-02-15 Dilmanj en-US 2019-04-11 11 अप्रैल 2019 https://web.archive.org/web/20190411100731/https://dilmanj.com/hans-vermeer-skopos-theory-translation/ dead इसके बजाय, स्कोपस सिद्धांत यह प्रस्तावित करता है कि अनुवाद के केंद्र में लक्ष्य संस्कृति और लक्ष्य भाषा होनी चाहिए, जिसमें स्रोत पाठ का प्रस्तुतीकरण किया जाता है। साथ ही, पाठकों पर उसका प्रभाव और मूल लेखक का उद्देश्य महत्वपूर्ण निर्धारक होते हैं, न कि केवल स्रोत-भाषा के प्रभाव और उद्देश्य। निर्देश और नियम निर्देश राइस और वर्मीयर द्वारा स्कोपस सिद्धांत के विकास से, स्कोपस सिद्धांत को नियंत्रित करने वाले तीन मुख्य नियमों के आधार पर छह निर्देश उभरे। ये 6 निर्देश इस प्रकार हैं:1. किसी अनूदित पाठ का निर्धारण उसके स्कोपस द्वारा किया जाता है। 2.अनूदित पाठ लक्ष्य भाषा और लक्ष्य संस्कृति में सूचना की एक प्रस्तुति है,जो स्रोत भाषा और स्रोत संस्कृति में उपलब्ध सूचना की प्रस्तुति के संबंध में होती है। 3.अनूदित पाठ सूचना की ऐसी प्रस्तुति प्रारंभ नहीं करता जिसे स्पष्ट रूप से उलटा किया जा सके। 4.अनूदित पाठ आंतरिक रूप से सुसंगत होना चाहिए। 5. अनूदित पाठ स्रोत पाठ के साथ सुसंगत होना चाहिए। 6. उपरोक्त पाँचों नियम पदानुक्रम में व्यवस्थित हैं, जिनमें स्कोपस नियम प्रमुख स्थान रखता है।पहला और प्रमुख निर्देश यह बताता है कि किसी भी अनुवाद निर्देश में लक्ष्य पाठ अंततः अनुवादात्मक क्रिया पर निर्भर करता है। दूसरा निर्देश स्रोत पाठ और लक्ष्य पाठ के बीच उनके अपने भाषाई और सांस्कृतिक संदर्भों में उनके कार्यों के महत्व पर प्रकाश डालता है। परिणामस्वरूप, अनुवादक, अनूदित पाठ तैयार करने के उद्देश्य से इस अंतरसांस्कृतिक संचार में प्रमुख भूमिका निभाता है। तीसरा निर्देश यह बताता है कि स्रोत संस्कृति में अनूदित पाठ का कार्य आवश्यक नहीं कि स्रोत संस्कृति में उसके कार्य के समान हो, जिससे इसकी अपरिवर्तनीयता पर जोर दिया जाता है। चौथा और पाँचवाँ निर्देश, सामान्य स्कोपस नियमों को दोहराते हैं, जो क्रिया की सफलता और सूचना के सम्प्रेषणके मूल्यांकन के तरीके से संबंधित हैं। इनमें से पहला सुसंगतता नियम से संबंधित है, जो पाठ की आंतरिक संगति से जुड़ा होता है, जबकि दूसरा निष्ठा नियम से संबंधित है, जो स्रोत-पाठ के साथ अंतर-पाठीय संगति पर आधारित होता है। नियम स्कोपस सिद्धांत के तीन मुख्य नियम जो छह अंतर्निहित निर्देश को शामिल करते हैं, वे हैंः Proceedings of the 2016 International Conference on Economy, Management and Education Technology Zhang Lili 2016 Atlantis Press 9789462521933 Paris, France Study of Business English Translation Based on the Three Rules of Skopos Theory 10.2991/icemet-16.2016.264 free1. स्कोपस का नियम 2. सुसंगति का नियम 3. निष्ठा का नियमतीसरा नियम अर्थात निष्ठा का नियम, दूसरे नियम, कोहेरेन्स (सुसंगति) के नियम के अधीन है, और यह सुसंगतता नियम आगे स्कोपस नियम के अधीन होता है। स्कोपस का नियम अनुवाद की प्रक्रिया में पालन किया जाने वाला पहला और सबसे महत्वपूर्ण नियम समग्र अनुवादात्मक क्रिया का उद्देश्य होता है, जिसे इस रूप में भी समझा जा सकता है कि "साध्य ही साधनों को उचित ठहराता है"। वर्मीयर द्वारा परिभाषित और नॉर्ड द्वारा अनूदित स्कोपस नियम कहता है कि अनुवाद की प्रक्रिया में पालन करने का पहला नियम एक समग्र अनुवाद कार्रवाई का उद्देश्य है, जिसकी व्याख्या "अंत साधनों को उचित ठहराता है" के रूप में भी की जा सकती है। जैसा कि वर्मीर द्वारा परिभाषित और नोर्ड द्वारा अनुवादित, स्कोपोस नियम में कहा गया हैःप्रत्येक पाठ एक विशिष्ट उद्देश्य के लिए निर्मित होता है और उसे इस उद्देश्य की पूर्ति करनी चाहिए। स्कोपस नियम इस प्रकार है: अनुवाद/व्याख्या/बोलना/लिखना इस प्रकार करें कि आपका पाठ/अनुवाद उस स्थिति में और उन लोगों के लिए उपयुक्त हो जो इसका उपयोग करना चाहते हैं और ठीक उसी तरह से कार्य कर सके जैसा वे चाहते हैं। Translating as a purposeful activity: Functionalist approaches explained Nord St. Jerome Publishing 1997 9781900650021 1 Manchester, United Kingdomयह अन्य सामाजिक-सांस्कृतिक परंपराओं और पूर्ववर्ती अनुवाद सिद्धांतों में देखी गई स्रोत पाठ की ओर उन्मुखता को पूर्वधारणा के रूप में स्वीकार करता है। इसके बजाय, स्कोपस सिद्धांत एक शीर्ष से निचले(top-down) दृष्टिकोण पर जोर देता है, जो लक्ष्य पाठ के महत्व को रेखांकित करता है।Mohatlane Edwin J. 2013 The end justifies the means: A functionalist approach to translation Journal of Communication 4 2 79–88 10.1080/0976691x.2013.11884810 0976-691X सुसंगतता का नियम दूसरा नियम, अर्थात सुसंगतता का नियम अनुवादकों के लिए यह आवश्यक करता है कि प्रत्येक लक्ष्य-पाठ लक्ष्य-भाषा की संस्कृति के संदर्भ में इस प्रकार अर्थपूर्ण और संगत हो कि उसके पाठक उसे सहज रूप से समझ सकें। Christiane Nord के शब्दों में, यह नियम इस प्रकार व्यक्त किया गया है: दूसरा नियम, सुसंगतता नियम, अनुवादकों के लिए यह आवश्यकता लागू करता है कि किसी भी लक्षित पाठ को लक्षित भाषा की लक्षित संस्कृति के अनुसार समझ में आना चाहिए ताकि प्राप्तकर्ता इसे समझ सकें। जैसा कि नोर्ड से उद्धृत किया गया है, यह नियम कहता हैःकोई अनुवाद इस अर्थ में स्वीकार्य होना चाहिए कि यह ग्रहणकर्ता की स्थिति के अनुरूप हो।Translating as a purposeful activity: Functionalist approaches explained Nord Christiane Routledge 2018 9781351189347 2nd Londonनॉर्ड ने आगे विस्तार से बताया कि:एक संवादात्मक बातचीत को तभी सफल माना जा सकता है जब ग्रहणकर्ता उसे अपनी स्थिति के अनुरूप पर्याप्त रूप से सुसंगत समझें। दूसरे शब्दों में, इस नियम के अनुसार, सार्थक अनुवाद तैयार करने के लिए लक्ष्य पाठकों, उनकी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि तथा उनकी सामाजिक परिस्थितियों - इन सभी को प्रमुख निर्धारक कारकों के रूप में ध्यान में रखा जाना आवश्यक है। इससे पाठ की विषयवस्तु में निहित अर्थ को उक्त ग्रहणकर्ताओं तक सटीक और प्रभावी ढंग से संप्रेषित किया जा सकेगा। अतः, इस व्याख्या के अंतर्गत, अंतर-पाठगत सुसंगतता यह निर्धारित करती है कि किसी अनुवाद को तभी उपयुक्त माना जाएगा जब ग्रहणकर्ता(लक्ष्य पाठक) पाठ को समझ सकें और उसे संप्रेषणीय स्थिति तथा सांस्कृतिक संदर्भ के अनुरूप सुसंगत रूप में व्याख्यायित कर सकें। निष्ठा का नियम तीसरा नियम यह कहता है कि लक्ष्य पाठ और स्रोत पाठ के बीच संबंध बना रहना चाहिए, क्योंकि अनुवाद उसी जानकारी पर आधारित होता है जो मूल पाठ में दी गई होती है। इसके अनुसार, लक्ष्य पाठ का स्वरूप अनुवादक की स्रोत पाठ की व्याख्या और अनुवाद के उद्देश्य, दोनों के आधार पर निर्धारित होता है। यह तीसरा नियम कहता हैः लक्ष्य पाठ का संबंधित स्रोत पाठ के साथ किसी प्रकार का संबंध जरूर होना चाहिए। संदर्भ