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411 समाचार
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काण्टीय नीतिशास्त्र

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साँचा:Immanuel Kant काण्टीय नीतिशास्त्र का सन्दर्भ एक कर्तव्यवैज्ञानिक नीतिशास्त्रीय सिद्धान्त से हैं, जिसका सम्बन्ध जर्मन दार्शनिक इमानुएल काण्ट से हैं। जिसको जर्मन दार्शनिक इमानुएल काण्ट ने प्रस्तुत किया था। यह सिद्धांत यूरोपीय ज्ञानोदय युग ( 18 वी सदी) के परिणाम स्वरुप विकसित हुआ था, यह इस दृष्टिकोण पर आधारित है कि आंतरिक रूप से एक शुभ संकल्प ही शुभ कार्य है;एक कार्य केवल तभी शुभ हो सकता है यदि उसके पीछ सिद्धांत हो- कि नैतिक नियमो का पालन एक कर्तव्य कि तरह किया जाये। कांट के नैतिक नियमो की संरचना का केंद्र बिंदु निरपवाद कर्तव्यादेश (categorical imperative) है जो कि सभी मनुष्यो पर सामान रूप से लागू होता है उनके हितो और इच्छाओ पर ध्यान दिए बिना। कांट ने निरपवाद कर्तव्यादेशो को विभिन्न तरीको से सूत्रबद्ध किया है। उनके सर्वभौमिकता के सिद्धांत क़े अनुसार, कोई भी कृत्य तभी अनुज्ञेय है जब कि बिना किसी विरोधाभास क़े सभी लोगो द्वारा इसे लागू किया जाना संभव हो सके। अगर विरोधाभास उत्पन होता है तो यह अरस्तु की गैर-विरोधाभास की अवधरणा के नियम का उललंघन करेगा जो यह निर्धारित करती है की उचित कार्य विरोधाभास का कारण नहीं बन सकते है। कांट का मानवता का सूत्रबद्धीकरण निरपवाद कर्तव्यादेशो का दूसरा खंड (अंश) है जो बताता हैं कि अपने प्रयोजन के लिए मनुष्यो को कभी दूसरो को केवल साधन साधने मात्र के लिए व्यवहार नहीं करना चाहिए परन्तु जैसा वह स्वयं के प्रति चाहते है वैसा ही दुसरो के प्रति करना चाहिए। स्वायत्तता का सूत्रीकारण निष्कर्ष निकलता है कि तर्कसंगत (बौद्धिक) कारक नैतिक नियमो से अपनी इच्छानुसार बंधे हुए होते है जबकि अंत का साम्राज्य( किंगडम ऑफ़ एंड्स) मे कांट की संकल्पना है है-लोग वैसा व्यवहार करते है जैसे की उनके कार्यो के सिद्धांत विधि द्वारा किसी कल्पित साम्राज्य(hypothetical kingdom) के लिए स्थापित कर दिये गए हो। कांट ने पूर्ण कर्तव्यो और अपर्ण कर्तव्यों (pefect duties & imperfect duties) मे भेद भी किया है। एक पूर्ण कर्तव्य है जैसे कि कभी झूठ न बोलने का कर्त्तव्य, हमेशा सच को धारण करे रखना; एक अपूर्ण कर्त्तव्य है जैसे की दान करने का कर्त्तव्य जिसे किसी विशेष समय और स्थान के अनुसार लागू किया जा सकता है। अमेरिकी दर्शनशास्त्री लुईस पॉज़मैन (Louis Pojman) ने उद्घृत किया कि पिटिज्म ([Pietism]),राजनितिक दर्शनशास्त्री जीन-जक्क़ुएस रूसो (Jean-Jacques Rousseau), तर्कवाद और अनुभववाद के मध्य की आधुनिक बहस और प्राकृतिक विधि के प्रभाव ने कांट की नैतिकता के विकास को प्रभावित किया है। दूसरे दर्शनशास्त्रीयो का मत है कि कांट कि नैतिकता को उनके माता-पिता और उनके शिक्षक मार्टिन नटजन (Martin Knutzen) से प्रभावित है काण्टीय नैतिकता से प्रभवित लोगो में दार्शनिक दार्शनिक जुर्गन हबर्मास (Jürgen Habermas),राजनीतिक दार्शनिक जॉन राल्स (John Rawls),और मनोविश्लेषक जैक्स लेकन (Jacques Lacan) शामिल हैं। जर्मन दार्शनिक जार्ज विल्हेम फ्रेड्रिक हेगेल (Georg Wilhelm Friedrich Hegell) ने कांट की आलोचना इस आधार पर कि है की कांट की द्वारा अपने नैतिक सिद्धांत मे निर्णय को प्रभावित करने वाले कारको का विशिष्ट विवरण नहीं दिया गया है तथा मानव प्रकृति को छोड़ दिया गया है। जर्मन दर्शनशास्त्री आर्थर शोपेनहावर (Arthur Schopenhauer) ने तर्क दिया की नैतिकता का उद्देश्य यह वर्णन करना है कि लोगो का व्यवहर कैसा होना चाहिए तथा कांट के सिद्धांत का आदेशत्मक होने की कारण उनकी आलोचना कि। माइकल स्टॉकर (Michael Stocker) का तर्क है कि कर्तव्य को अभिनय मात्र से दर्शाने से दूसरी नैतिक अभिप्रेरणा क्षीण हो सकती है जैसे कि मित्रता, जबकि मर्सिया बैरन (Marcia Baron) ने यह तर्क देकर इस सिद्धांत का बचाव किया है कि कर्तव्य अन्य प्रेरणा को क्षीण नहीं करते है। कैथोलिक गिरजाघर ने ईसाई नैतिकता (Christian ethics) को गुण नैतिकता के अधिक संगत बताया है तथा कांट की नैतिकता को ईसाई नैतिकता के विरोधाभासी बता कर इसकी आलोचना की है। यह दावा की सभी मनुष्य अपनी गरिमा और सम्मान के कारण स्वायत्तशासी है मतलब की चिकित्सकीय पेशेवरों को किसी भी व्यक्ति पर उनके उपचार के लिए खुश होना चाहिए और उनका उपचार केवल इसलिए नहीं करना चाइये की वह समाज के लिए उपयोगी है। यौन नैतिकता के प्रति कांट का दृष्टिकोण इस विचार से साथ उभरा की मानवो का उपयोग केवल साधन साधने मात्र के लिए नहीं होना चाहिए यौन गतिविधियों की और जाने पर उन्होंने कुछ यौन प्रथाओ को निंदनीय और अपमान जनक बताया उदाहरणता: विवाहेतर यौन संबंध। नारीवादी दार्शनिको ने काण्टीय नीतिशस्त्र का उपयोग वेश्यावृत्ति और रतिचित्रण जैसे प्रथाओं की निंदा करने के लिए किया है क्योकि वे महिलाओ का उपयोग केवल साधन मात्र के लिए करते है। कांट इसमें विश्वास करते थे कि क्योकि जानवर तर्कसंगत(बुद्धि संपन्न) नहीं है इसलिए सिवाए कुछ अप्रत्यक्ष कर्त्यव्यो को छोड़कर हमारे कर्तव्य उनके प्रति नहीं हो सकते जैस उनके प्रति क्रूरता ना करके अनैतिक स्वाभाव को विकसित नहीं करना। कांट ने अपने नीतिशास्त्र मे झूठ को एक उदाहरण स्वरुप प्रस्तुत किया है और बताया है कि हमारा पूर्ण कर्त्तव्य है कि हमें हमेशा सच बोलना चाहिए भले ही ऐसा प्रतित हो कि सच बोलने कि अपेक्षा झूठ बोलने पर बेहतर परिणाम प्राप्त होंगे इस स्थिति मे भी हमे हमेश सत्य को धारण करे रहना चाहिए == रुपरेखा == यधपि कांट के सभी कार्यो ने उनकी नैतिकता के सिद्धांत को विकसित किया है यह बहुत स्पष्ट रूप से उनके द्वारा रचित पुस्तके नैतिकता के आध्यात्मिक तत्वों का आधार (Groundwork of the Metaphysic of Morals), व्यवहारिक कारणो कि समीक्षा (Critique of Practical Reason) और नैतिकता के आध्यात्मिक तत्व (Metaphysics of Morals) मे परिभषित है। ज्ञानोदय परंपरा का भाग होने पर कांट कि नैतिकता का सिद्धांत इस विचार पर आधरित है कि लोगो का व्यवहार किस तरह का होना चाहिये, इसका निर्धारण करने के लिए उसके पीछे छुपे हुए कारणो का उपयोग किया जाना चाहिये। इसके लिए उन्होंने कोई विशिष्ट कार्यवाही का निर्धारण नहीं लिया, पर निर्देशित किया कि लोगो का व्यवहार कैसा हो इसके लिए वयवहार के पीछे क्या कारण होना चाहिये इसका उपयोग किया जाना चाहिए। === शुभ संकल्प और कर्तव्य === अपने सयुंक्त कार्यो से कांट ने कर्तव्यों की अवधरणा द्वारा नैतिक कानून के आधारो का निर्माण किया| कांट ने अपने नैतिक सिद्धांत की शुरुआत इस तर्क के साथ कि-केवल वही गुण (धर्माचरण) जो पूर्ण रूप से शुभ हो एक शुभ संकल्प हो सकता है। कोई दूसरा गुण इसका स्थान नहीं ले सकता क्योकि अन्य आचरणों का उपयोग अनैतिक प्रयोजनों को प्राप्त करने कि लिए किया जा सकता है (उदाहरणता अगर वफ़ादरी का गुण यदि बुरे व्यक्ति के प्रति किया जाये तो वह एक अच्छा गुण नहीं हो सकता)। एक शुभ संकल्प की विशेषता होती कि वह हमेशा नैतिक मूल्यों को बनाये रखता है भले ही वह अपने नैतिक उद्देश्यों कि पूर्ति करने मे विफल हो जाये। कांट ने मन है कि शुभ संकल्प ही एक नैतिक सिद्धांत है जो कि अन्य गुणो के नैतिक परिणामो की प्राप्ति कि लिए स्वतंत्रता पूर्वक अंगीकार किया जा सकता है। कांट के लिए संकल्प कि अपेक्षा शुभ संकल्प एक व्यापक अवधारणा है जो कि कर्तव्यों का प्रतिनिधित्व करता है। एक संकल्प जो कर्तव्यों का प्रतिनिधित्व करता है उस संकल्प से अलग है जो की नैतिक नियमो को बनये रखने के लिए बाधाओं पर काबू पता है। इसी प्रकार एक कर्त्तव्यनिष्ठ संकल्प शुभ संकल्प का एक विशिष्ट मामला है जो कि प्रतिकूल परिस्थितियों मे दृश्य होता है। कांट का तर्क कि केवल केवल कर्तव्यों के सम्बन्ध मे किये गए कार्यो का नैतिक मूल्य है। किन्तु यह नहीं कह सकते कि केवल कर्तव्यों के अनुसरण के लिए किये गये कृत्य निरर्थक है( यह अभी भी समर्थन एवं प्रोत्साहन योग्य है)। पर यह यह विशेष सम्मान उन कृत्यो को दिया जाता है जो कर्तव्यों से बाहर जाकर किये जाते है। कांट कि कर्तव्यों कि अवधारणा ये नहीं है कि लोग अपने कर्तव्यों को अनिच्छापूर्वक करते है। हालांकि कर्त्तव्य प्रायः लोगो को उनके रूचि के विरुद्ध कार्य करने कि लिए प्रेरित करते है, यह उन कर्ताओ की इच्छाशक्ति से आता है जो नैतिक नियमो को बनाये रखने कि आकांक्षा रखते है। अतः कर्ता अपने कर्तव्यों के प्रति कार्य करता है क्योकि तर्कसंगत प्रोत्साहन का उसकी रूचि से अधिक महत्त्व होता है। कांट बाहरी तोर से लगाये कर्तव्यों कि रूप मे सामान्य नैतिक धारणा से आगे बढ़ना चाहते थे जो कि स्वायत्ता की नैतिकता को प्रस्तुत करे एवं जिसे तर्कसंगत कारको द्वारा स्वतंत्र रूप से पहचाना गया हो और बनाया गया हो। ==== पूर्ण एवं अपूर्ण कर्तव्य ==== निरपवाद कर्तव्यादेश को लागू करने पर कर्तव्य उत्पन्न होते है क्योकि उनको पालन करने मे विफल होने का परिणाम या तो विचारो मे विरोधाभास या संकल्पो मे विरोधाभास उत्पन्न होना है। कर्तव्यों को दो वर्गो मे विभाजित किया गया है जिसमे पहला पूर्ण कर्तव्य तथा दूसरा अपूर्ण कर्तव्य है। एक पूर्ण कर्तव्य है कि हमेश सत्य को धारण करे रखना अतः कभी झूठ नहीं बोलना चाहिए क्योकि सत्य बोलना हमारा पूर्ण कर्तव्य है। एक अपूर्ण कर्तव्य लचीलेपन कि अनुमति देता है उपकार करना एक अपूर्ण कर्तव्य है क्योकि हम हर समय उपकार करने के लिए बाध्य नही होते है। लेकिन समय और स्थान के अनुसार इसे लगू कर सकते है। कांट का विश्वास था कि अपूर्ण कर्तव्यो कि अपेक्षा पूर्ण कर्तव्य अधिक महत्वपूर्ण है। यदि इन कर्तव्यों के मध्य विरोधाभास उत्पन्न होता है तो पूर्ण कर्तव्यों का पालन करना चहिये। === निरपवाद कर्तव्यादेश === कांट कि नैतिकता का प्रथम सूत्रीकरण निरपवाद कर्तव्यादेश है, जिससे इन्होने चार और सूत्र प्राप्त किये है। कांट ने निरपवाद कर्त्तव्यादेश और अभ्युगत आदेश (hypothetical imperatives) के बीच भेद बताया है एक अभ्युगत आदेश वह है जिसे हमे अपनी इच्छाओ की पुर्ति के लिये पालन करना चाहिये। चिकित्सक के पास जाना एक अभ्युगत आदेश है क्योकि हैं हम इसका पालन करने के लिए तभी बाध्य है जबकि हम स्वास्थ लाभ चाहते है| निरपवाद कर्तव्यादेश हमारी इच्छाओं के विरुद्ध कार्य करने कि लिए बाध्य करता है; सभी का यह कर्त्तव्य है की कभी झूठ न बोले चाहे कोई भी परिस्थिति हो और यहाँ तक की ऐसा करने की अगर हमारी रूचि तो तब भी नहीं। यह निरपवाद कर्तव्यादेश नैतिक रूप से बाध्यकारी है क्योकि वे कर्ता के बारे मे किसी आकस्मिक तथ्यों पर आधारित ना होकर किसी कारण पर आधारित होते है| यह अभ्युगत आदेश के विपरीत होते है जो कि हमे तभी तक बाध्य करते है जब तक कि हम ऐसे समाज का हिस्सा होते है जिसके प्रति हमारे कर्तव्य है। हम निरपवाद करतावदेशो को नहीं त्याग सकते क्योकि हम बुद्धिमत कारणो को नहीं त्याग सकते; एक तर्कसंगत कर्ता होने के नाते हमे तर्कसंगत होने का कर्त्तव्य प्राप्त होता है इसलिए तर्कसंगत नैतिक सिद्धांत सभी सभी तर्कसंगत कर्ताओ पर हर समय लागू रहते है। ==== सार्वभौमिकता ==== कांट के निरपवाद कर्त्तव्यादेशो का पहला सूत्रीकरण सार्वभौमिकता है। कार्य का इस सिद्धांत के अनुसार होना की उस नियम पर आचरण करो जिसके माध्यम से तुम इच्छा कर सको की वह एक सार्वभौमिक आदेश बन जाये। कांट की लिए जब कोई इस नियम या सिद्दांत की अनुसार कार्य करता है, तो कार्य करता है तो कार्य केवल तभी उचित है, यदि वह इस सिद्धांत के अनुकूल है जो अनुमति देता है की वही कार्य सार्वभौमिक होगा जिसका पालन सभी के द्वारा करना संभव हो सके। यह सिद्धांत इस परीक्षा मे विफल हो जायेगा यदि वह सार्वभौमिक रूप से या तो अवधारणा मे विरोधाभास या संकल्पो मे विरोधाभास उत्पन्न करता है। अवधारणओं मे विरोधाभास उत्पन्न होता है जबकि किसी सिद्धांत को सार्वभौमिक होना था वह समझ को रोक दे "क्योकि सिद्धांत आवश्यक रूप से खुद को नष्ट कर देगा जैसे ही वह सार्वभौमिक कानून बन जाता है"। जैसे की उदाहरण के लिए वचन का पालन ना करना यह सिद्धांत अनुज्ञेय हो जाये और सार्वभौमिक हो जाये तो कोई भी किसी के वचन पर विश्वास नहीं करेगा और वचन का विचार पूरी तरह से व्यर्थ हो जायेगा और यह सिद्धांत अपने आप में विरोधाभास उत्पन्न कर देगा क्योकि इसकी सार्वभौमिकता वचन की सार्थकता को रोक देगी। यह सिद्धांत नैतिक भी नहीं होगा क्योकि इसे तार्किक रूप से सार्वभौमिक लागू किया जाना असंभव है- क्योकि हम ऐसी दुनिया की कल्पना नहीं कर सकते जहा कियह सिद्धांत सार्वभौमिक हो जाये। यह सिद्धांत तब भी अनैतिक हो जाता है जबकि वह संकल्पो के सार्वभौमिक होने पर उनमे विरोधाभास उत्पन्न करता है इसका मतलब तार्किक विरोधाभास से नहीं है। परन्तु जब कि कोई भी बुद्धिजीवी यह नहीं चाहता हो कि यह सिद्धांत सार्वभौमिक हो तथा राज्यों के मामलो की अगुवाई करे। जूलिया ड्राइवर ने उदाहरण देकर तर्क दिया है की सिद्धांत " मै दान नहीं करूँगा" संकल्पो मे विरोधाभास उत्पन्न करेगा जबकि वह सार्वभौमिक हो जाये, क्योकि ऐसी दुनिया जहाँ कोई भी दान ना देता हो वह उस व्यक्ति के लिए अप्रिय होगी जो कि इस सिद्धांत के अनुसार कार्य करता हो। कांट का मानना था कि नैतिकता का कारण उद्देश्य है जैसे कि भौतिक नियम भौतिक कार्यो के लिए आवश्यक है (उदाहरण- सेब का जमीन पर गुरुत्वाकर्षण के कारण गिरता है) वैसे तर्कसंगत नियमो को उद्देश्य तर्कसंगत कार्य का करना है उन्होंने आगे विश्वास किया कि पूरी तरह से तर्कसंगत व्यक्ति को पूरी तरह से नैतिक भी होना चाहिए क्योकि पूरी तरह से तर्कसंगत व्यक्ति पाता है कि तर्कसंगत रूप से क्या करना आवश्यक है। क्योकि मानव पूरी तरह से तार्किक नहीं है (वे आंशिक रूप से सहज ज्ञान से कार्य करते है), कांट का मानना था कि मनुष्यो की अपनी आत्मपरक इच्छाये तर्कसंगत नियमो के अनुरूप होनी चाहिए जिसे इन्होने अनुरूपात्मक दायित्व (conformity obligation) की संज्ञा दी। कांट ने तर्क किया कि कारणो की विधि का उद्देश्य प्राथमिक है जो की तर्कसंगत प्राणियों मे बाहरी रूप से विद्धमान है जैसे की भौतिक नियम भोति प्राणियों से पहले मौजूद है इसलिए कांट के अनुसार तार्किक नैतिकता सार्वभौमिक है और इसे परिस्थितियों के अनुसार बदला नहीं जा सकता है। ==== मानवता अपने उद्देश्य के रूप मे ==== कांट के निरपवाद कर्तव्यदेश का दूसरा सूत्रीकरण है कि मानवो से इस तरह बर्ताव करना जैसे की हम स्वयं के प्रति चाहते है। इस भांति आचरण करो जिससे अपने तथा प्रत्येक अन्य व्यक्ति के व्यक्तित्व मे निहित मानवता को सदा एक ही समय साध्य के रूप मे प्रयोग करो कभी एक साधन के रूप मे नहीं कांट ने तर्क दिया कि तार्किक प्राणियों से कभी केवल अपने साधन साधने मात्र के लिए बर्ताव नहीं किया जा सकता, उनके साथ वैसा ही बर्ताव किया जाना चाहिए जैसा के अंत मे हम स्वयं के प्रति चाहते है क्योकि यह आवश्यक है कि उनके स्वयं के तर्कसंगत मूलभावो को सामान रूप से सम्मान दिया जाना चाहिए। कांट ने दावा किया है कि कारण नैतिकता को प्रेरित करते है तथा यह मांग करते है कि हम मनुष्यो सहित अन्य सभी प्राणियों की कारण के रूप मे मूलभावनाओ का सम्मान करे। एक तर्कसंगत प्राणी इससे सहमत नहीं हो सकता उसे साधन साधने मात्र के लिए प्रयुक्त किया जाये इसलिए उन्हें हमेशा साध्य के रूप मई बर्ताव किया जाना चाहिए| कांट ने तर्क देकर बताया की नैतिक दायित्व एक तर्कसंगत आवश्यकता है जो तर्कसंगत संकल्प है वह नैतिक रूप से सही है क्योकि सभी तर्कसंगत कारक तार्किक रूप से साध्य हो जायेंगे पर केवल साधन होना मात्र होना पसंद नहीं करेंगे अतः यह नैतिक रूप से अनिवार्य है कि हम इस तरह बर्ताव करे। इसका मतलब यह नहीं है कि हम मानवो को कभी एक साधन के रूप मई उपयोग नहीं कर सकते परन्तु जब हम ऐसा करते है तो हम से व्यवहार परिणात्मक रूप से हमारे प्रति भी करते है। ==== स्वायत्ता का नियम ==== कांट का स्वयत्ता का नियम इस विचार को व्यक्त करता है कि कोई कर्ता बाहरी प्रभाव की बजाये अपने तर्कसंगत इच्छा के कारण निरपवाद कर्त्यवादेशो का पालन करने के लिए बाध्य होता है। कांट का मानना था कि किसी भी अन्य हित को पूरा करने कि इच्छा से प्रेरित कोई नैतिक कानून निरपवाद कर्तव्यदेशो से इंकार कर देगा तथा यह तर्क देगा कि नैतिक कानून केवल तर्कसंगत संकल्प से उत्पन्न होना चाहिए। इस सिद्धांत कि मांग है कि लोगो को स्वायत्ता के कार्य करने के लिए दूसरो के अधिकारों को पहचानने कि आवश्यकता है इसका मतलब है कि नैतिक कानून सार्वभौमिक होना चाहिए यदि वह एक व्यक्ति कि आवश्यकता है तो सभी व्यक्तियों की भी वही आवश्यकता हो। ==== किंगडम ऑफ़ एंड ==== कांट के निरपवाद कर्तव्यादेशो का एक और सूत्रीकरण किंगडम ऑफ़ एंड है। एक तर्कसंगत प्राणी को हमेशा दिए गये नियमो से खुद को या तो किंगडम ऑफ़ एंड के सदस्य या संप्रभु के रूप मे मानना चाहिए जो कि इच्छाओ की स्वतंत्रता से संभव है। इस सूत्रीकरण के लिए आवश्यक है कि कार्य को ऐसा समझा जाना चाहिए जैसे कि उसका सिद्धांत किसी काल्पनिक साम्राज्य के लिए कानून प्रदान करना है जिन्हे कि तर्कसंगत कारको का एक समुदाय कानून के रूप मे स्वीकार करेगा| इस समुदाय मे प्रत्येक व्यक्ति यह सिद्धांत स्वीकार करेगा कि किसी व्यक्ति को केवल साधन मात्र के लिए उपयोग किये बिना भी उन्हें संचालित किया जा सकता है। हलाकि किंगडम ऑफ़ एंड एक आदर्श है— अन्य लोगो के कार्यो और प्राकृत घटनयओ से यह सुनिश्चित होता है कि अच्छे आशय से होने वाले कार्य से कभी कभी नुकसान दायक परिणाम उत्पन्न होते है अतः हमें इस आदर्श साम्राज्य के व्यवस्थापक के रूप मे कार्य करने कि आवश्यकता है। == काण्टीय नीतिशास्त्र पर प्रभाव == अमांडा और खेथानी 2018 ने कांट कि नैतिकता पर चार मजबूत प्रभावों का सुझाव दिया है। पहला लूथरवाद पंथ पिटिज्म है जिसकी सदस्यता कांट के माता पिता ने ली थी। पिटिज्म ने ईमानदारी और नैतिक जीवन को अाधिकारित मत कि अपेक्षा अधिक महत्व दिया, तथा भावनाओ कि तर्कसंगतता से अधिक चिंता की। कांट का विश्वास था की तर्कसंगतता आवश्यक है परन्तु यह नैतिकता तथा शुभ संकल्प से सम्बंधित होनी चाहिए। दूसरा राजनैतिक दार्शनिक जीन-जक्क़ुएस रूसो है जिनकी रचना सामाजिक अनुबंध (the social contract) ने मानवो के मौलिक मूल्यों पर कांट के दृष्टिकोण को प्रभवित किया। पॉज़मैन ने कांट की नैतिकता को प्रभावित करने मे समकालीन नैतिक बहस को उल्लेख किया है। कांट के अनुभववाद की अपेक्षा तर्कसंगतता का पक्ष लिया है जिसका मतलब उन्होंने नैतिकता को मानवीय इच्छाओ पर आधारित होनी के बजाये ज्ञान के रूप मे देखा। पोजमान के अनुसार- प्राकतिक विधि(यह विश्वास कि नैतिक नियम प्रकृति द्वारा नियत किये जाते है) और अंतर्ज्ञान ( यह विश्वास कि मनुष्य उद्देश्यात्मक नैतिक यथार्थता के बारे में सहज ज्ञान से जानते है) भी कांट के लिए प्रभावशाली थे। कांट कि जीवनी लेखक मैनफ्रेड कुह्न (Manfred Kuhn ) ने सुझाव दिया कि कांट के माता पिता की कड़ी मेहनत, ईमानदारी, निर्मलता और स्वावलंबन ने उनके लिए एक उदाहरण स्थापित किया तथा पिटिज्म की अपेक्षा उन्हें अधिक प्रभावित किया। स्टैनफोर्ड इनसाइक्लोपीडिया ऑफ़ फिलोसोफी में माइकल रोहल्फ़ ने सुझाव दिया कि कांट अपने शिक्षक मार्टिन नुटजन (Martin Knutzen) से प्रभावित थे जिन्होंने कांट का परिचय अंग्रेज भौतिक विज्ञानी आइजक न्यूटन के काम से कराया था तथा जो स्वंय क्रिस्चियन वुल्फ [(https://web.archive.org/web/20180530181605/https://en.wikipedia.org/wiki/Christian_Wolff_%28philosopher%29 Christian Wolff)] और जॉन लॉक (John Locke) से प्रभावित थे। == काण्टीय नैतिकता का महत्व == === कांटियन नैतिकता से प्रभावित === ==== जुर्गन हबर्मस ==== जर्मन दार्शनिक जुर्गन हबर्मस ने व्याख्यान नैतिकता के सिद्धांत को प्रस्तावित किया है तथा यह दवा करते है कि यह काण्टीय नीतिशस्त्र कि संतति है। उन्होंने प्रस्तावित किया कि कार्यवाही उसमे शामिल लोगो के मध्य संचार पर आधारित होने चाहिए जिसमे कि किसी प्रकार कि जबरदस्ती या धोखेबाज़ी को अस्वीकार कर उनके हितो और इरादे पर चर्चा कि जाये ताकि वह सभी के द्वारा समझा जा सके। हबर्मस विश्वास करते है कि पक्षकारो के मध्य अनुबंध एक नैतिक निर्णय तक पहुंचने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है,काण्टीय नैतिकता कि भांति व्याख्यान नैतिकता एक ज्ञानात्मक नैतिक सिद्धांत है जिसमे माना जाता है कि सत्य और असत्यता को नैतिक प्रस्तावों के लिए उत्तरदायी ठहराया जा सकता है। यह एक नियम और प्रस्तावित करता है कि नैतिक कार्यो को सार्वभौमिक होना चाहिए जिससे नैतिक क्रियाओ का निर्धारण और प्रस्तावन किया जा सके जो कि कांट कि नैतिकता के ही सामान है। हबर्मस का तर्क है कि उनका नैतिक सिद्धांत कांट की नैतिकता का सुधरा हुआ रूप है। इन्होने कांट की नैतिकता के द्वैतवादी ढांचे को खारिज किया है। कांट ने प्रतीयमान संसार, जिसे मनुष्यो द्वारा महसूस और अनुभव किया जा सकता है और आध्यात्मिक दुनिया जहाँ की मनुष्यो का पहुंचना संभव नहीं है, में भेद किया है। यह द्विभाजन कांट के लिया आवश्यक था क्योकि यह मानव कर्ताओ की स्वायत्ता की व्याख्या कर सकता है यधपि मनुष्य प्रतीयमान संसार से बंधे है उनके कार्य बोध्गम्ये दुनिया में मुक्त है। हबर्मस के अनुसार नैतिकता संवाद से उत्पन्न होती है जो उनकी स्वतंत्रता की बजाय तर्कसंगत और जरुरतो के अनुसार आवश्यक होती है। ==== जान रॉल्स ==== राजनैतिक दार्शनिक जॉन राल्स का सामाजिक संविदा का सिद्धांत एवं उनकी रचना न्याय का सिद्धांत( A theory of justice) का विकास, कांट की नैतिकता से प्रभावित था। रॉल्स ने तर्क दिया कि एक न्याय संगत समाज को अपनी न्याय संगती प्राप्त करने के लिए निष्कपट होना होगा। उन्होंने समाज के अस्तित्व से पहले कल्पित आवश्यकताओ को महत्त्व दिया जिनको समाज ने सुव्यवस्थित किया यह मूल स्थिति है| इसे अज्ञान के परदे का स्थान लेना चाहिए, जहाँ कि कोई भी समाज में अपने स्थिति नहीं जनता वहाँ लोगो को अपने हितो के प्रति झुकाव था बेहतर परिणाम प्राप्त करने से रोका जायेगा। रॉल्स के न्यायिक सिद्धांत का शेष भाग विश्वास करता है कि व्यक्ति स्वतंत्र, सामान, और नैतिक है उन्होंने माना सभी मनुष्य कुछ सीमा मे तर्कसंगति और बुद्धिमत्ता रखते है जिसे इन्होने नैतिकता के घटक के रूप मे देखा और इनके अधिकारियो को सामान न्याय का अधिकारी बताया। रॉल्स ने कांट के द्वैतवाद को अधिकांशता खारिज किया और तर्क किया कि एक बार पुनः निर्माण के बाद काण्टीय नीतिशस्त्र इसके बिना भी पूर्ण है उन्होंने इसे न्याय के सिद्धांत के लक्ष्यो मे से एक के रूप मे वर्णित किया। ==== जैक्स लेकन ==== फ़्रांसिसी मनोविश्लेषक जैक्स लेकन (Jacques Lacan) ने मनोविश्लेषण की नैतिकता (The Ethics of Psychoanalysis) और कांट एवीक साडे (Kant avec Sade) पर कार्यो द्वारा मनोविश्लेषण को काण्टीय नैतिकता के साथ जोड़ा और कांट की तुलन मार्क्विस डी साडे (Marquis de Sade) से की। लेकन ने तर्क दिया कि सड़े का आनन्दातिरेख (jouissance) का सिद्धांत यौन सुख का अनुगमन नैतिक रूप से कांट के मानदंडों द्वारा स्वीकार्य है क्योकि यह सार्वभौमिक हो सकता है। उन्होंने प्रस्तावित किया कि कांट ने मानव स्वतंत्रता को नैतिक नियमो के लिए महत्वपूर्ण बताया है जबकि साडे ने आगे तर्क किया कि मानव स्वतंत्रता केवल आनन्दातिरेख के सिद्धांत द्वारा पूरी तरह महसूस कि जा सकती है। === आधुनिक काण्टीय नीतिशास्त्री === ==== ओनेरा ओ'नील ==== ओनेरा ओ'नील (Onora O'Neill) हार्वर्ड विश्वविद्यालय मे जॉन राल्स के अधीन अध्ययनरत रही एक आधुनिक काण्टीय नीतिशस्त्री है जो कि सामाजिक न्याय मुद्दों के लिए काण्टीय दृश्टिकोण का समर्थन करती है। ओ'नील का तर्क है कि सामाजिक न्याय की एक सफल काण्टीय व्याख्या को किसी भी निराधार आदर्शीकरण या मान्यता पर भरोसा नहीं करना चाहिए। उन्होंने ध्यान दिया कि दार्शिनिकों ने पहले कांट द्वारा मानवो को स्वायत प्राणियों, बिना किसी सामाजिक सन्दर्भ और और जीवन लक्ष्यों के आदर्श रूप मे प्रस्तुत करने पर उन पर आरोप लगाये है। हलाकि वह कहती है कि कांट की नैतिकता को इस आदर्शीकरण के बिना भी पढ़ा जा सकता है। ओ' नील ने हर हर मनुष्यो से जुड़े सिद्धांतो के बजाये कारणो का व्यवहारिक और मनुष्यो द्वारा उपयोग किये जाने कि कांट की अवधरणा को वरीयता दी है। कांट की परिकल्पना निर्णय लेने का साधन है जिसका मतलब कि हमारे द्वारा अपनाये गये सिद्धांतो को रोकने मे केवल एक विचार सक्षम है कि क्या यह सिद्धांत सभी मनुष्यो द्वारा अपनाया जा सकता है। अगर हमारी इच्छा यह नही है कि यह विशिष्ट सिद्धांत सभी के द्वारा अपनाया जाये तो हम उन्हें इसे अपनाने के लिए कारण नही दे सकते। कारणो का उपयोग करने और अन्य लोगो से तर्क करने हमें उस सिद्धांत को अस्वीकार करना होगा जिसे कि सार्वभौमिक रूप से अपनाया नही जा सकता है। इस प्रकार मानवी स्वायत्ता के आदर्शवादी दृश्टिकोण को अपनाये बिना कांट के सार्वभौमिकता के सूत्रीकरण तक पहुंची। सार्वभौमिकता के इस तंत्र कि आवश्यकता यह नही है कि हम सभी सार्वभौमिक सिद्धांत को अपनाये परनतु केवल स्वंय को उन सिद्धांतो को अपनाने से रोकना है जो हम नही चाहते कि दूसरे उन्हें अपनाये। काण्टीय नैतिकता के इस आदर्श से ओ'नील ने न्याय के सिद्धांत को विकसित करना शुरू करती है। वह तर्क देती है कि धोखे और जबरदस्ती जैसे कुछ सिद्धांतो को अस्वीकार करने से बुनयादी धारणाओ के लिये एक प्रारंभिक बिंदु मिलता है जिससे वह तर्क देती है कि मनुष्यो के लिये और अधिक दृढ़ संकल्पित होना, समानता या स्वतंत्रता के सिद्धांत की अत्यधिक मांग हो सकती ऐसे कई कार्य और संस्थान है जो की गैर-सर्वभौमिक सिद्धांतों पर विश्वास करते है जैसे की अत्याचार। ==== मर्सिया बैरन ==== दार्शनिक माइकल स्टॉकर ने अपने शोध पत्र आधुनिक नैतिक सिद्धांतो का मनोभाजन (The Schizophrenia of Modern Ethical Theories) मे काण्टीय नैतिकता (और सभी आधुनिक नैतिक सिद्धांत) को यह तर्क देकर चुनौती दी है की कर्तव्यो से किये गये कार्य मे स्पष्ट नैतिकता की कमी है। उन्होंने स्मिथ का उदाहरण दिया है जो की अस्पताल मे अपने मित्र से कर्तव्य होने के कारण मिलने जाता है ना कि दोस्ती के कारण उन्होंने तर्क किया कि इस यात्रा मे कुछ नैतिक कमी लग रही है क्योकि यह गलत सन्देश से प्रेरित है। मर्सिया बैरन ने इस तथ्य पर काण्टीय नैतिकता का समर्थन करने का प्रयास किया है। कई कारणो को प्रस्तुत करने के बाद हम पाते है कि कर्तव्यो से बाहर काम करना आपत्तिजनक है उन्होंने तर्क किया कि समस्याये केवल तब उत्पन्न होती है जब लोग गलत समझते है कि उनका कर्तव्य क्या है। कर्तव्यो से बाहर कार्य करना आंतरिक रूप से गलत नही है पर अनैतिक परिणाम तब उत्पन्न होते है जब जब लोग गलत समझते है कि वह क्या करने के लिए बाध्य है। कर्तव्यो को भावहीन और अव्यक्तिगत रूप मे नही देखा जाना चाहिए किसी का कर्त्तव्य अपने चरित्र को विकसित करना या अपने व्यक्तिगत सम्बन्धो मे सुधार करने का हो सकता है। बैरन ने आगे तर्क दिया है कि कर्तव्यो को द्वितीयक उद्देश्य के रूप मे देखा जाना चाहिए यानि कि एक ऐसा उद्देश्य जो किसी परिस्थिति को नियंत्रित और निर्धारित करता है कि क्या किया जाना चाहिए। उन्होंने तर्क दिया कि यह इस प्रकार देखा गया कि कर्तव्य ना तो किसी के कार्य मे नैसर्गिक झुकाव मे आभाव को प्रदर्शित करते है ना ही उन उद्देश्यों और भावनाओ को क्षीण करते है जो दोस्ती (स्नेह) के लिए आवश्यक है। बैरन के लिए कर्तव्यो द्वारा शासित होने का मतलब यह नही है कि कर्त्तव्य के विचार हमेशा कार्य के मार्गदर्शक होते है। एक जिम्मेदार नैतिक कर्त्ता को नैतिक प्रश्नो मे रूचि लेनी चाहिए जैसे कि चरित्र का प्रश्न। इन्हे नैतिक कर्त्ता को कर्तव्य से कार्य करने के लिए मार्गदर्शित करना चाहिए। === काण्टीय नीतिशास्त्र के आलोचक === ==== जी.डब्लू.एफ़ हेगल ==== जर्मन दार्शनिक जी.डब्लू.एफ़ हेगल ने काण्टीय नैतिकता कि दो प्रमुख आलोचनाये प्रस्तुत कि है। उन्होंने पहला तर्क दिया कि काण्टीय नीतिशास्त्र लोगो को क्या करना चाहिये इस बारे मे कोई विशिष्ट जानकारी प्रदान नही करता क्योकि कांट का नैतिक नियम पूरी तरह से गैर विरोधाभसी सिद्धांत (principle of non-contradiction) है। उन्होंने तर्क दिया कि कांट कि नैतिकता मे तत्वों की कमी है इसलिए यह नैतिकता का सर्वोच्च सिद्धांत नही बन सकता। इस बिंदु को स्पस्ट करने के लिए हेगल और उनके अनुयायियो ने कई प्रश्नो को प्रस्तुत किया जिनमे सार्वभौमिक कानून का सिद्धांत या सही उत्तर नही देता या तो स्पष्ट रूप से गलत जबाब देता है। हेगल ने कांट का दूसरे व्यक्तियों के धन पर भरोसा करने करने का उदाहरण का उपयोग करते हर तर्क दिया है कि कांट का सार्वभौमिकता का सिद्धांत यह निर्धरित नही कर सकता है कि क्या सम्पति का एक सामाजिक तंत्र नैतिक रूप से उचित विचार है या नही क्योकि प्रत्येक जबाब विरोधाभासो को लागू कर सकता है। उन्होंने गरीबो कि मदद करने के उदाहरण का भी उपयोग किया- यदि सभी ने गरीबो कि मदद की मदद करने के लिए कोई गरीब बाकी नही रह जायेगा इसलिए उपकारिता सार्वभौमिक होने पर असंभव हो जाएगी जो कांट के मॉडल के अनुसार इसे अनैतिक बना देती है। हेगल की दूसरी आलोचना यह थी कि कांट की नैतिकता मनुष्यो को कारण और कामना के बीच आंतरिक संघर्ष के लिए मजबूर करती है। हेगल के अनुसार अपनी कामनाओ को दबाना और इसे कारणो के अधीनस्थ करना मनुष्यो के लिए अस्वाभाविक है। इसका मतलब यह है कि स्वा-हित और नैतिकता के मध्य तनाव को सम्बोधित किये बिना कांट की नैतिकता मनुष्य को नैतिक होने के लिये कोई कारण नही दी सकती। ==== आर्थर शोपेनहावर ==== जर्मन दार्शनिक आर्थर शोपेनहावर ने कांट की धरणा की आलोचना की आलोचना करते हुई कहा है की नैतिकता को चिंता करनी चाहिए कि कि आवश्यक रूप से किया जाना चाहिए। वह जोर देकर कहते है कि नैतिकता का पैमाना वास्तव में क्या होता है उसे समझने एवं व्याख्या करने का प्रयास करना चाहिए जबकि कांट ने एक आदर्श दुनिया में क्या किया जाना चाहिए इसका एक आदर्श संस्करण प्रस्तुत किया है। शोपेनहउर ने तर्क दिया कि नैतिकता को व्यवहारिक होना चाहिए और उन निष्कर्षो पर पहुचना चाहिए जो वास्तविक दुनिया में काम कर सके एवं इस रूप में प्रस्तुत हो कि वह दुनिया कि समस्यायो का समाधान करने में सक्षम हो। शोपेनहउर को सौन्दर्यशास्त्र ने सामान रूप से आकर्षित किया उन्होंने तर्क देते हुए कहा कि दोनों मामलो मे आदेशात्मक नियम अनुशासन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा नहीं है क्योकि उनका मानना था कि गुणो को सिखाया नहीं जा सकता। एक व्यक्ति या तो सदाचारी (गुणयुक्त) होगा या नहीं। वह अप्राप्य सार्वभौमिक कानून को प्रस्तुत करने कि बजाय, नैतिकता की विशिष्ट अवस्था में ढला हुआ होगा जो लोगो के व्यवहार को मार्गदर्शित तथा नियंत्रित करेगा| ==== फ्रेडरिक नीत्शे ==== दार्शनिक फ्रेडरिक नीत्शे ने ईसाई और काण्टीय नीतिशस्त्र पर विशेष ध्यान देने के साथ सभी समकालीन नैतिक प्रणालियों की आलोचना की। उन्होंने तर्क दिया की सभी आधुनिक नैतिक प्राणालिया दो समस्याग्रस्त विशेषताओं को साँझा करती है पहला वे मानवता की प्रकृति के बारे मे आध्यात्मिक दावा करती है जिसे की व्यवस्था जिसमे कोई मानक शक्ति है, के लिए अनिवार्य स्वीकार किया जाना चाहिए। और दूसरा यह व्यवस्था अक्सर दूसरो के ऊपर कुछ लोगो के हितो को लाभ देती है यधपि नीत्शे की प्रारंभिक आपत्ति यह नहीं है की मानवता के बारे में आध्यात्मिक दावे असमर्थनीय है( उन्होंने उन नैतिक सिद्धांतो का भी विरोध किया जो इस तरह के दावों को नहीं करते) उनके दो मुख्य लक्ष्य काण्टीयवाद और ईसाईयत (ईसाई धर्म) जो आध्यात्मिक नैतिक दावों को करते है इसलिए नीत्शे की आलोचना में प्रमुख रूप से प्रदर्शित होते है। नीत्शे ने कांट की नैतिकता के मौलिक घटको को अस्वीकार कर दिया है विशेष रूप से उनका तर्क की नैतिक, ईश्वर और अनैतिकता को कारणो के माध्यम से दिखाया जा सकता है। नीत्शे ने नैतिक अंतर्ज्ञान के उपयोग पर संदेह डाला जिसे की जिसे की कांट ने अपनी नैतिकता की नींव के रूप में इस्तेमाल किया है उन्होंने तर्क दिया की इसका नैतिकता मे कोई मानक बल नहीं है। उन्होंने इसके अतिरिक्त कांट के नैतिक मनोविज्ञान जैसे संकल्प और विशुद्ध कारण की महत्वपूर्ण अवधरणाओं को क्षीण करने का प्रयास किया है। कांट की तरह नीत्शे ने स्वयत्ता की अवधरणा को विकसित किया है हलाकि उन्होंने कांट के इस विचार को ख़ारिज कर दिया की हमारी स्वायत्ता का मूल्यांकन करने के लिए हमे दूसरो की स्वायत्ता का सम्मान करने की आवश्यकता है। नीत्शे का नैतिक मनोविज्ञान प्रकृतिवादी अध्ययन दवरा कांट की इच्छा और कारण की अवधारणा के विपरीत पता है। काण्टीय ढांचे के तहत कारण इच्छा के लिए मौलिक रूप से अलग उद्देश्य है क्योकि इसमें परिस्थितियों के पीछे खड़े रहने तथा स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता होती है। नीत्शे ने स्वंय हमारी सामाजिक संरचना की विभिन्न प्रेरणाओं एवं प्रवृत्ति के विचार को प्रकट किया। इस प्रकार जब ऐसा प्रतीत होता है की हमारी बुध्दि ने हमरी वासना के विरुद्ध निर्णय लिए है तो वास्तव मे यह हमारी वैकल्पिक वासना होती है दो दूसरी के ऊपर प्रभाव जमा लेती है। बुद्धि के विरोध मे वृत्ति की कांट की अवधारणा के यह सीधे विपरीत है बजाय यह सिर्फ एक और वृत्ति है। इस प्रकार यह परिस्थितियों के पीछे खड़े रहने और निर्णय लेने मे सक्षम नहीं है। निर्णय को स्वंय बने सबसे शक्तिशाली कामना दवरा निर्धरित किया जा सकता है। काण्टीय समालोचको ने तर्क दिया है की नीत्शे के व्यवहारिक दर्शन को काण्टीय भावना के पीछे खड़े रहने के लिए स्वंय सक्षम अस्तित्व की आवश्यकता है एक व्यक्ति अपने लिए स्वंय मूल्य बनता है जो की नीत्शे के दर्शन का मुख्य विचार है। उसे स्वयं को एकीकृत कर्ता के रूप मे समझने मे सक्षम होना चाहिए। यहाँ तक की यदि कर्ता अपनी कामना से प्रभावित होता है तो उसे उन्हें स्वंय के रूप मे ही मानना चाहिए जो की स्वायत्ता की नीत्शे की अवधारणा को कमजोर करती है। ==== जॉन स्टुअर्ट मिल ==== उपयोगितावादी दार्शनिक जॉन स्टुअर्ट मिल ने कांट की आलोचना नैतिक नियमो को नैतिक अंतर्ज्ञान के द्वारा न्यायोचित नहीं ठहराने को लेकर की है जो की उपयोगितावादी सिद्धांत पर आधारित है (अधिकतम लोगो ले लिए अधिकतम सुख की मांग की जानी चाहिए)। मिल ने तर्क दिया की कांट की नैतिकता यह व्याख्या नहीं करती की कुछ क्रियाये उपयोगितावाद की चिन्ताकर्षण किये बिना गलत क्यों है। नैतिकता के आधार पर मिल का मानना था की कांट के कारणो पर विश्वास की अपेक्षा उनका उपयोगितावाद का सिद्धांत अंतर्ज्ञान का एक मजबूत आधार है और यह बेहतर तरह से स्पष्ट कर सकता है की कुछ कार्य सही या गलत क्यों है| ==== गुण नीतिशास्त्र ==== गुण नीतिशास्त्र नैतिक सिद्धांत का एक रूप है जो की विशिष्ट कार्यो की अपेक्षा कर्ता के चरित्र पर जोर देता है। इसके कई समर्थको ने नैतिकता के लिए कांट के कर्तव्य वैज्ञानिक दृष्टिकोण की आलोचना की है। एलिजावेथ एंनसकोम्ब (Elizabeth Anscombe) ने कानूनो के लिये उनके जूनून और दायित्व के लिये काण्टीयनैतिकता सहित आधुनिक नैतिकताओ की आलोचना की है साथ ही उन्होंने तर्क किया है की सार्वभौमिक नैतिक सिद्धांत पर भरोसा करने वाले कानून बहुत कठोर है। एंनसकोम्ब ने सुजाव दिया क्योकि नैतिक कानून, नैतिक विधि बनाने वाले मे अंतनिहित होता है अतः यह आधुनिक धर्मनिरपेक्ष समाज मे अप्रसांगिक है। अलास्डेयर मैकइन्टीयर (https://en.wikipedia.org/wiki/Alasdair_MacIntyreAlasdair MacIntyre) ने अपनी रचना गुणो के बाद (After virtue) मे कांट की सार्वभौमिकता के सूत्रीकरण, के आलोचना करते हुए तर्क दिया है कि विभिन्न तुच्छा और अनैतिक सिद्धांत इसकी परीक्षा मे सफल हो सकते है जैसे कि अपने पूरे जीवन मे सभी वादो को पूरा करना सिवाए एक को छोड़कर। उन्होंने इसके अतिरिक्त कांट के मानवता के सूत्रीकरण 'मानवता अपने उद्देश्य के रूप मे' को चुनौती दी और कहा कांट ने दूसरो को साधन के रूप में व्यवहार ना करने का कोई कारण नहीं दिया है। यह सिद्धांत कि मुझे छोड़कर सभी को एक साधन के रूप मे मानना यधपि कदाचित अनैतिक है पर सार्वभौमिक हो सकता है। बनार्ड विलियम्स (Bernard Williams) तर्क करते है कि मनुष्यो के चरित्र के सरकारण द्वारा कांट ने मनुष्यो और नैतिकता को गलत ढंग से प्रस्तुत किया है। फिलिप फुट (Philippa Foot) ने विश्लेषणात्मक दर्शन द्वारा गुण की उपेक्षा के लिये जिम्मेदार दार्शनिको के एक समूह में से एक के रूप मे कांट की पहचान की है। रोमन कैथलिक पादरी सरवार पिंकेर्स (Servais Pinckaers) ने कांट की नैतिकता की अपेक्षा ईसाई नैतिकत को अरस्तु की गुण नैतिकता के अधिक करीब माना। उन्होंने गुण नीतिशास्त्र को 'उत्कृष्टता के लिये स्वतंत्रता' के रूप मे प्रस्तुत किया जिसकी मान्यता है किसी के गुण को विकसित करने के लिये स्वतंत्रता प्रकृति के अनुसार कार्य करती है। प्रारम्भ मे इसके लिये निम्नलिखित नियमो की आवश्यकता होती है लेकिन आशय यह है की कर्ता सदाचरिता विकसित करे और प्रसन्नता पूर्वक कार्य करे। यह उपेक्षा के स्वतंत्रता के विपरीत है जिसका सम्बन्ध पिंकेर्स ने विलियम ओक्क्हम (William Ockham ) के साथ बताया था तथा कांट के साथ तुलना की। इस विचार के अनुसार स्वतंत्रता प्रकृति के विरुद्ध स्थापित की जाती है मुक्त क्रियाये वे है जो जूनून या भावनाओ से ग्रस्त होकर निर्धारित नहीं की जाती। किसी कर्ता के गुण में विकास या प्रगति नहीं होती केवल आदत का निर्माण होता है। यह कांट के नैतिक दृश्टिकोण के करीब है क्योकि कांट के स्वायत्ता की धारणा की अपेक्षा है की कर्ता केवल अपनी भावनाओ से निर्देशित नहीं होते है और यह पिंकेर्स की ईसाई नैतिकता की संकल्पना के साथ विषमता स्थापित करता है।. ==== स्वायत्ता ==== एलिजावेथ एनसकोम्ब(Elizabeth Anscombe) सहित कई दार्शनिक जीन बेथके ऐल्शतेन (Jean Bethke Elshtain) सरवास पिंकेर्स(Servais Pinckaers),आईरिस मर्डोक(Iris Murdoch) और कैथोलिक सारसंग्रह सभी ने सुझाव दिया है कि स्वायत्ता पर आधारित कांट कि नैतिक संकल्पना इसके दोहरे दावे कि मानव नैतिकता के सह विधायक है और नैतिकता एक प्राथमिकता है के विरोधाभासी है। वे तर्क करते है कि अगर कुछ सार्वभौमिक रूप से प्राथमिक है (यानी अवलोकन से पहले अपरिवर्तनीय रूप से मौजूद) तो यह मनुष्यो पर निर्भर नहीं हो सकता है जो कि सदा से अस्तित्व मे नहीं रहे है। दूसरी और अगर मनुष्य वास्तव मे नैतिकता का निर्माण करते है तो वह इससे निष्पक्ष भाव द्वारा बाध्य नहीं है क्योकि वह हमेशा इसे परिवर्तित करने के लिये स्वतंत्र होते है। यह आपत्ति कांट के विचारो को लेकर गलत फहमी पर आधरित प्रतीत है क्योकि कांट ने तर्क दिया की नैतिकता एक तर्कसंगत संकल्प ( निरपवाद कर्तव्यादेश से सम्बंधित एक अबधारणा, एक अनिवार्यता जो किसी भी तर्कसंगत प्राणी का खुद के लिये संकल्प) की अवधरणा पर निर्भर है। यह किसी भी प्राणी की विशिष्ट आकस्मिक इच्छा पर आधारित नहीं है ना ही विशेष मानवीय इच्छाओ पर इसलिए इसका अर्थ यह नहीं है कि कांट ने नैतिकता को उस पर निर्भर बताया है जो सदा से अस्तित्व मे नहीं है इसके अतिरिक्त जिस भाव मे हमारी इच्छा कानून के अधीन होती है वह ठीक है यदि हमरी इच्छा तर्कसंगत है इसलिए हमें इच्छा कानून कि रीती के अनुसार ही करनी चाहिए अर्थात इच्छा नैतिक नैतिक निर्णयों के अनुसार ही करनी चाहिए जो स्वंय सहित सभी तर्कसंगत प्राणियों पर लागू होती है।| इसे पद 'स्वायत्ता' शब्द को इसके यूनानी मूल Autonomos की पद व्याख्या कर आसानी से समझा जा सकता है: auto(स्वयं)+nomos(नियम या कानून)। अर्थात कांट के अनुसार एक स्वयत्त संकल्प केवल वह नहीं है जो केवल स्वंय की इच्छाओ की पूर्ति करता है किन्तु जो की एक वैध संकल्प है अर्थात जो सार्वभौमिकता के सिद्धांत के अनुरूप है एवं जिसकी पहचान कांत ने कारण के साथ की है। विडम्बना से एक दूसरे प्रचलन में अपरिवर्तनीय विचार के अनुसार संकल्प हूबहू उस प्रकार की शक्ति है जिसको ऐल्शटेन (Elshtain) ने उनकी नैतिक अधिकारिता के आधार पर ईश्वर से सम्बंधित किया है, और वह इसे देवी आदेश सिद्धांत के एक न्यून स्वैछिक प्रारूप पर इसे आज्ञा देती है जो की नैतिकता और ईश्वरीय इच्छा दोनों को आकस्मिक बना देगा। कांत का सिद्धांत स्वयत्ता के दूसरे दृष्टिकोण के बजाय पहले का एक संस्करण है इसलिए न तो ईश्वर और ना ही कोई मानव प्राधिकारी जिसमे देववश मानवीय संसथान भी सम्मलित है अपने नैतिक सिद्धांत मे कोई विशिष्ट प्रामाणिक भूमिका निभाते है। कांत और ऐल्शटेन दोनों इस विचार से सहमत है की ईश्वर के पास अपनी इच्छा के अनुरूप नियम बनाने के लिए करणो के अपरिवर्तनीय तथ्य, नैतिक सत्य सहित के अतिरिक्त की अन्य विकल्प नहीं है। मनुष्यो के पास ऐसा विकल्प होता है परन्तु भिन्न प्रकार से नैतिकता के साथ उनका सम्बन्ध वैसा ही होता है जिसे की ईश्वर का; वे नैतिक तथ्यों को पहचान सकते है परन्तु इच्छा के आकस्मिक कृत्यों के माध्यम से अपनी सहमति निर्धारित नहीं करते है। == अनुप्रयोग == === चिकित्सीय नैतिकता === कांट का विश्वास था मनुष्यो में कारण के प्रति सहभागी होने की क्षमता नैतिकता का आधार होनी चाहिए और यही वो क्षमता है जो मनुष्यो को नैतिक रूप से महत्वपूर्ण बनाती है इसलिए उनका मानना था की सभी मनुष्य को समान गरिमा और सम्मान का अधिकारी होना चाहिए। मार्गरेट ईटन (Margaret Eaton) का तर्क है कि नैतिकता के अनुसार एक चिकित्सकीय पेशेवर को स्वंय के व्यवसाय को किसी अन्य व्यक्ति पर इस्तेमाल करने पर प्रसन्न होना चाहिए,तब भी जब वह स्वंय रोगी हों। उदाहरण के लिए, एक शोधकर्ता जो रोगियों पर बिना उनकी जानकरी के परीक्षण करने की कामना रखता है ऐसा करने पर सभी शोधकर्ताओं के लिए प्रसन्न होना चाहिए। उनका तर्क है कांट की स्वायत्ता की आवश्यकता का अर्थ यह होगा कि एक रोगी को उपचार के विषय मे 'पूर्णतः सूचित निर्णय' लेने मे सक्षम होना चाहिए, अनभिज्ञ रोगियों पर परीक्षण करना इसे अनैतिक बनाता है| चिकित्सीय अनुसंधान को रोगियों के प्रति सम्मान से प्रेरित होना चाहिए। इसलिए उन्हें सभी तथ्यों के बारे मे सूचित किया जाना चाहिए तब भी जब कि रोगी को निवारक सलाह दी जाये। जेरेमी सुगर्मन (Jeremy Sugarman) ने तर्क किया है कि कांट के स्वायत्ता के सूत्रीकरण कि आवश्यकता है कि रोगियों का उपयोग केवल समाज के लाभ के लिए नहीं किया जाना चाहिए पर उन्हें हमेशा अपने लक्ष्यों सहित एक तर्क संगत प्राणी के रूप मे माना जाना चाहिए। हारून हिंकले (Aaron Hinkley) व्याख्या करते है कि काण्टीय स्पस्टीकरण कि आवश्यकता है कि उन विकल्पों का सम्मान करना जिन पर तर्कसंगिता के साथ पहुँचे हो ना कि वह विकल्प जिन पर मूर्खतापूर्ण या अयुक्तियुक्त माध्यमों से पहुँचे हो| उनका तर्क है कि इसमे कुछ भिन्नता है कि एक पूर्णतः तर्कसंगत कर्ता क्या चुनाव करेगा और वास्तव में एक रोगी क्या चुनता है यह भिन्नता एक अयुक्तियुक्त व्यक्तिगत विशिष्टता के परिणाम स्वरुप उत्पन्न होती है। यधपि एक काण्टीय चिकित्सक को रोगी से झूठ बोलना या बाध्य नहीं करना चाहिए लेकिन हिंकले का सुझाव है कि पैतृकवाद के कुछ रूप जैसे उन जानकारियों को दबा कर रखना जो कि गैर-तर्कसंगत प्रतिक्रियाओं को प्रेरित कर सकती है स्वीकार्य हो सकते है। सुसान फेलमैन(Susan Feldman) ने अपनी रचना 'कैसे गर्भावस्था और गर्भपात का उपचार काण्टीय नैतिकता द्वारा करना चाहिए '( How Kantian Ethics Should Treat Pregnancy and Abortion) मे तर्क किया है कि काण्टीय नीतिशास्त्र के अनुसार गर्भपात का बचाव किया जाना चाहिए। उन्होंने प्रस्तावित किया कि एक महिला को एक सम्मानित स्वयात्त व्यक्ति जिसका कि आपने शरीर पर पूर्ण नियंत्रण है के रूप मे माना जाना चाहिए जैसा कि कांट ने सुझाव दिया था। उनका मानना है कि कांट कि नैतिकता मे महिलाओं का स्वतंत्र चुनाव प्रधानतम होगा, गर्भपात का निर्णय माँ कि आवश्यकता है। डीन हेरिस (Dean Harris) ने ध्यान दिया कि यदि गर्भपात कि चर्चा मे काण्टीय नैतिकता का उपयोग किया जाना है तो यह तय किया जाना चाहिए कि भ्रूण स्वयात्त व्यक्ति है या नहीं। काण्टीय नीतिशास्त्री कार्ल कोहेन (Carl Cohen) का तर्क है कि आम और तर्कसंगत प्रजातीयो मे तर्कसंगतता या सहभगिता होने कि क्षमता मनुष्यो और जड़ वस्तुओ या तर्कहीन जीवधरियो के मध्य प्रासंगिक भेद है। कोहेन का मानना है कि यहाँ तक कि जब मनुष्य उम्र (जैसे कि शिशु या भ्रूण) या मानसिक अक्षमता के कारण तर्कसंगत नहीं होते तब भी कर्त्ता उनसे वैसा वयवहार करने के लिए बाध्य होते है जैसा वह स्वंय के प्रति चाहते है,जो कि समतुल्य है कि तर्कसंगत व्यस्क जैसे कि माँ के जो कि गर्भपात कि इच्छा रखती है। === यौन नैतिकता === कांट ने मनुष्यो को आत्म-रक्षण,नस्ल-रक्षण,आंनद-रक्षण कि पाशविक इच्छाओ के अधीन माना। उन्होंने तर्क दिया कि मानवो का कर्तव्य है कि वह आत्महत्या, यौनह्रास शराबीपन सहित उन मसलो से दूर रहे जो स्वंय को हानि पहुँचाये या अपक्षीपन कराये। इसने कांट को यौन सम्भोग को अपमानजनक मानाने के लिए प्रेरित किया क्योकि यह मनुष्यो को आन्नद कि वस्तु मे बदल देता है। उन्होंने केवल विवाह के अंतर्गत सम्भोग को स्वीकार्य किया जिसे उन्होंने "केवल पशु संध" के रूप मे माना। उनका मानना था कि हस्तमैथुन आत्महत्या से भी बदतर है जो कि मनुष्य का स्तर पशु से भी निचे गिरा देता है उन्होंने तर्क दिया कि बलात्कार का दंड पुंसत्वहरण और पशुगमन का दंड समाज से बहिष्कृत होना चाहिये| नारीवादी दार्शनिक कैथरीन मैककिन्नन (Catharine MacKinnon) ने तर्क दिया कि कई समकालीन प्रथाओ को कांट के मानको से अनैतिक समझा जायेगा क्योकि वे महिलाओ का अमानुषीकरण करती है। यौन उत्पीड़न वैश्यावृत्ति और रतिचित्रण पर वह तर्क देती है की यह महिलाओ को कर्म विषयक बनाती है और यह मानव स्वायत्ता के कांट के मानको को पूरा नहीं करती है वाणिज्यिक सम्भोग की आलोचना दोनों पक्षों को वस्तु मे बदलने (केवल साधन मात्र के लिए उपयोग) के लिए की गई है। पारस्परिक सहमति समस्याग्रस्त है क्योकि सहमति में लोग स्वंय को कर्म बिषयक बनाते है। एलन सोबल (Alan Soble) ने विख्यात किया है कि अधिक उदारवादी काण्टीय नीतिशस्त्रियो का मानना है कि अन्य प्रासंगिक कारणो के आधार पर महिलाओ कि सहमति रतिचित्रण और वैश्यावृत्ति में उनकी भागेदारी को सही साबित कर सकती है। === पशुओ के प्रति नैतिकता === क्योकि एक नैतिक रोगी होने के आधार पर कांट ने तर्कसंगतता देखी-एक नैतिक विचार के कारण उनका मानना था कि जानवरो के पास कोई नैतिक अधिकार नहीं है। कांट के अनुसार जानवर तर्कसंगत नहीं है इस आधार पर कोई उनके प्रति अनैतिक व्यव्हार नहीं कर सकता। हलाकि उन्होंने इसमें विश्वास नहीं किया कि हमारे जानवरो के प्रति कोई कोई कर्तव्य है, कांट ने विश्वास किया कि जानवरो के प्रति क्रूर होना गलत है क्योकि हमारा व्यवहार मनुष्यो के प्रति हमारे नजरिये को प्रभवित कर सकता है। अगर हम जानवरो को नुकसान पहुंचाने के आदि हो जाते है तो इस बात कि अधिक सम्भावना है कि हम मनुष्यो को नुकसान पहुँचता हुआ देखना स्वीकार्य कर ले। नीतिशस्त्री टॉम रेगन (Tom Regan) ने तीन प्रमुख बिन्दुओ के आधार पर कांट का जानवरो का नैतिक मूल्याँकन को अस्वीकृत कर दिया,पहला उन्होंने कांट का दावा अस्वीकार किया कि जानवर आत्म-जागरूक नहीं है। उनके बाद उन्होंने कांट के उस दावे को चुनौती दी जो बताता है कि जानवरो में कोई आंतरिक नैतिक मूल्य नहीं है क्योकि वे नैतिक निर्णय नहीं ले सकते। रेगन ने तर्क दिया कि यदि नैतिक मूल्यो का निर्धारण निर्णय लेने कि क्षमता से होता है तो हमे वो मनुष्यो जो कि नैतिक विचार करने में असमर्थ है,को सामान रूप से अनावश्यक नैतिक कारण मानना चाहिए। रेगन ने अंततः तर्क दिया कि कांट का दावा कि जानवर केवल एक साधन के रूप में विधमान है निराधार है यह तथ्य कि जानवरो के पास जीवन है जो अच्छी तरह या बुरी तरह गुज़र सकता है सुझाव देता है कि मानवो के तरह उनके पास भी अपने उद्देश्य होते है। === झूठ === कांट का मानना था कि निरपवाद कर्तव्यादेश हमे सिद्धांत प्रदान करते है कि हमे किसी भी परिस्थिति मे झूठ नहीं बोलना चाहिए, भले ही हम अच्छे परिणामो को लाने का प्रयास कर रहे हो, जैसे किसी हत्यारे से झूठ बोलना ताकि वो अपने इच्छित शिकार को ढूढ़ने से परावृत हो सके। कांट ने तर्क दिया कि हम पूरी तरह से नहीं जानते है कि किसी क्रिया के क्या परिणाम होंगे, नतीजा अप्रत्याशित रूप से हानिकारक भी हो सकता है। इसलिए हमे ज्ञात गलत 'झूठ' से बचने का कार्य करना चाहिए बजाय कि एक संभावित गलत से बचने के। यदि हानिकारक परिणाम उत्पन्न होते है तो हम निर्दोष है क्योकि हमने अपने कर्तव्यानुसार कार्य किया है। जूलिया ड्राइवर (Julia driver) तर्क करती है कि यदि हमने अपने सिद्धन्तो को भिन्न प्रकार से सूत्रित कर चुनते है तो शायद ही कोई समस्या उत्पन्न हो यह सिद्धांत 'मै निर्दोष का जीवन बचाने के लिए झूठ बोलूंगा' सार्वभौमिक हो सकता है। हलाकि यह नया सिद्धांत अब भी हत्यारे जिसे हमे ऐसा करने से बचाने का कर्तव्य है, को साधन मात्र के रूप मे देख सकता है। इस प्रकार हमे अब भी कांट के उदाहरण मे हत्यारे को सच बताने कि आवश्यकता हो सकती है। == सन्दर्भ == == ग्रन्थसूची == Atwell, John (1986). 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