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गत्यात्मक समतुल्यता और औपचारिक समतुल्यता
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अनुवाद क्रिया में गत्यात्मक समतुल्यता और औपचारिक समतुल्यता के बीच का अंतर, पारदर्शिता और निष्ठा के बीच का अंतर है-अर्थात एक ओर स्रोत पाठ के अर्थ पर ज़ोर होता है तो दूसरी ओर उसकी शाब्दिक संरचना पर।
गत्यात्मक समतुल्यता और औपचारिक-समतुल्यता का यह अंतर मूल रूप से यूजीन नाइडा द्वारा बाइबल के अनुवाद के संबंध में प्रस्तावित किया गया था।
यह सिद्धांत अनुवादकों को यह निर्णय लेने में सहायता करता है कि उन्हें मूल पाठ के अर्थ पर अधिक ध्यान देना चाहिए या उसकी संरचना और शैली पर।
सिद्धांत और व्यवहार
अनुवाद में समतुल्यता
अनुवाद के संदर्भ में समतुल्यता का सिद्धांत मूल रूप से यूजीन नाइडा द्वारा बाइबल के अनुवाद के संबंध में प्रस्तावित किया गया था। स्रोत भाषा का मूल पाठ और लक्ष्य भाषा का अनूदित पाठ और लक्ष्य भाषा का अनूदित पाठ पूर्ण रूप से एक जैसे नहीं होते। इसलिए अनुवादक को लक्ष्य भाषा के अर्थ को स्रोत भाषा के अर्थ के मूल गुण से यथासंभव निकट बनाए रखना पड़ता है। अर्थ की इस निकटतम सादृश्यता को समतुल्यता की संज्ञा दी गई है।अनुवाद विज्ञान की भूमिका गोस्वामी कृष्ण कुमार राजकमल प्रकाशन 2012 9788126722013 नई दिल्ली 57 समतुल्यता का सिद्धांत
समतुल्यता के प्रकार
अनुवादों के बहुआयामी और बहुस्तरीय रूप को ध्यान में रखते हुए नाइडा ने दो समतुल्य बताए ; एक, रूपपरक समतुल्यता, जिसमें कथ्य के रूप और मन्तव्य पर ध्यान दिया जाता है। दूसरा, गत्यात्मक समतुल्यता जिसमें इस बात पर ध्यान दिया जाता है कि स्रोत भाषा के पाठ और लक्ष्य भाषा के पाठ को हृदयंगम करने वाले पाठक पर क्या प्रभाव पड़ता है? चेक विद्वान अंतोन पोपोविच ने व्यापक स्तर पर समतुल्यता का वर्गीकरण चार आधारों पर किया है : भाषापरक, रूपावलीपरक, शैलीपरक और विन्यासक्रमागत।अनुवाद विज्ञान
सिद्धांत और अनुप्रयोग गोस्वामी कृष्ण कुमार हिन्दी माध्यम कार्यान्वय निदेशालय, दिल्ली विश्वविद्यालय 1993 9789380172798 नगेन्द्र नई दिल्ली 62
अनुवाद क्रिया में गत्यात्मक समतुल्यता और औपचारिक समतुल्यता के बीच का अंतर, पारदर्शिता और निष्ठा के बीच का अंतर है-अर्थात एक ओर स्रोत पाठ के अर्थ पर ज़ोर होता है तो दूसरी ओर उसकी शाब्दिक संरचना पर।Dynamic and formal equivalence 2025-12-28 https://en.wikipedia.org/w/index.php?title=Dynamic_and_formal_equivalence&oldid=1329956124 Wikipedia en 2026-04-13
यह सिद्धांत अनुवादकों को यह निर्णय लेने में सहायता करता है कि उन्हें मूल पाठ के अर्थ पर अधिक ध्यान देना चाहिए या उसकी संरचना और शैली पर।
चूंकि कार्यात्मक समतुल्यता व्याकरणिक संरचना के सख्त पालन के बजाय लक्ष्य भाषा में अधिक स्वाभाविक अभिव्यक्ति को प्राथमिकता देती है, इसलिए इसका उपयोग कभी-कभी तब किया जाता है जब किसी पाठ की व्याकरणिक संरचना को बरकरार रखना उतना महत्वपूर्ण न हो, जितना कि उसकी पठनीयता को बनाए रखना।Dynamic and formal equivalence 2025-12-28 https://en.wikipedia.org/w/index.php?title=Dynamic_and_formal_equivalence&oldid=1329956124 Wikipedia en 2026-04-13
औपचारिक समतुल्यता अक्सर एक आदर्श लक्ष्य ही होती है, क्योंकि कई बार एक भाषा मे किसी विचार के लिए ऐसा शब्द होता है जिसका दूसरी भाषा में उसके समकक्ष शब्द नहीं मिलता। ऐसे में अनुवादक अधिक गत्यात्मक अनुवाद का सहारा लेता है या उस विचार को व्यक्त करने के लिए लक्ष्य भाषा में नया शब्द गढ़ता है (कभी-कभी स्रोत भाषा से शब्द लेकर)।
जितना अधिक स्रोत भाषा और लक्ष्य भाषा में अंतर होता है, उतना ही शाब्दिक अनुवाद को समझना कठिन हो जाता है- जब तक कि लक्ष्य भाषा में शब्दों को थोड़ा संशोधित न किया जाए। दूसरी ओर, औपचारिक समतुल्यता उन पाठकों के लिए उपयोगी हो सकती है जो स्रोत भाषा से परिचित हैं। इससे वे समझ सकते हैं कि मूल पाठ में अर्थ किस तरह व्यक्त किया गया है। इसमें अक्सर मुहावरों, अलंकारों (जैसे हिब्रू बाइबिल की कायास्टिक संरचनाएँ) और शब्द-चयन को यथावत रखा जाता है, ताकि मूल जानकारी सुरक्षित रहे और अर्थ की सूक्ष्म बारीकियाँ भी स्पष्ट हो सकें।Dynamic and formal equivalence 2025-12-28 https://en.wikipedia.org/w/index.php?title=Dynamic_and_formal_equivalence&oldid=1329956124 Wikipedia en 2026-04-13
अनुवाद के तरीके
"औपचारिक-समतुल्यता" का दृष्टिकोण स्रोत भाषा के शाब्दिक विवरण और व्याकरणिक संरचना के प्रति निष्ठा पर जोर देता है, जबकि "गत्यात्मक समतुल्यता 'लक्ष्य भाषा के लिए अधिक स्वाभाविक अनुवाद प्रदान करने की हिमायती है।
यूजीन नाइडा के अनुसार गत्यात्मक समतुल्यता किसी अनुवाद का वह गुण है जिसमें मूल पाठ के संदेश को लक्ष्य भाषा(receptor लैंग्वेज) में इस तरह से स्थानांतरित किया जाता है कि लक्ष्य पाठक (receptor) की प्रतिक्रिया अनिवार्य रूप से मूल पाठक की प्रतिक्रिया के समान होती है।The theory and practice of translation https://archive.org/details/theorypracticeof0000nida Nida Eugene A. Leiden, E.J. Brill 1969 9789004065505 इसका लक्ष्य यह है कि दोनों भाषाओं के पाठक पाठ के अर्थ को समान रूप से समझ पाएं।
बाद के वर्षों में, नाइडा ने "गत्यात्मक समतुल्यता 'शब्द से दूरी बना ली और कार्यात्मक समतुल्यता को प्राथमिकता दी।Let the words be written: the lasting influence of Eugene A. Nida p. 51 Philip C. Stine2004 "That probably would not have happened if it hadn't been for Nida's ideas" (Charles Taber, interview with author, 21 Oct. 2000).7 Translation and religion: holy untranslatable? p91 Lynne Long2005The History of the Reina-Valera 1960 Spanish Bible p98 Calvin George2004 "190 "कार्यात्मक समतुल्यता" शब्द सिर्फ यही नहीं बताता कि यह समतुल्यता स्रोत संस्कृति में स्रोत पाठ के कार्य और लक्ष्य संस्कृति में अनुवादित पाठ के कार्य के बीच है, बल्कि यह भी बताता है कि उस "कार्य" को पाठ के एक गुण के रूप में देखा जा सकता है। विभिन्न संस्कृतियों में लोग किस तरह से परस्पर व्यवहार करते हैं, इसके साथ कार्यात्मक समतुल्यता को जोड़ना संभव है।
1199 में मैमोनाइड्स ने अपने अनुवादक सैमुअल इब्न टिब्बन को एक पत्र में इसी तरह का अंतर व्यक्त किया था।Stitskin, Leon D. (Fall 1961). A Letter of Maimonides to Samuel ibn Tibbon. Tradition: A Journal of Orthodox Jewish Thought, Vol. 4, No. 1, p. 93 JSTOR उन्होंने लिखाः
I shall premise one rule: the translator who proposes to render each word literally and adhere slavishly to the order of the words and sentences in the original, will meet with much difficulty and the result will be doubtful and corrupt. This is not the right method. The translator should first try to grasp the meaning of the subject, and then state the theme with perfect clarity in the other language. This, however, cannot be done without changing the order of words, putting many words for one word, and vice versa, so that the subject be perfectly intelligible in the language into which he translates.
श्रेणी:अर्थविज्ञान
श्रेणी:अनुवाद अध्ययन
मैमोनाइड्स गत्यात्मक/कार्यात्मक समतुल्यता के पक्ष लेते हैं, हालांकि शायद पाठ के सांस्कृतिक प्रकार्य पर बहुत ज्यादा विचार नहीं करते हैं। वह औपचारिक समतुल्यता को "संदिग्ध और भ्रष्ट" कहकर स्पष्ट रूप से अस्वीकार करते हैं।
संदर्भ