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शिखण्डी
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अगस्त 2012
thumb|right|200px|लिंग परिवर्तन से पहले शिखण्डी का चित्रण।
शिखंडी महाभारत का एक पात्र है। महाभारत कथा के अनुसार भीष्म द्वारा अपहृता काशीराज की ज्येष्ठ पुत्री अम्बा का ही दूसरा अवतार शिखंडी के रूप में हुआ था।महाभारत के वो 10 पात्र जिन्हें जानते हैं बहुत कम लोग! http://www.bhaskar.com/article-hf/HAR-AMB-mahabharat-characters-known-less-to-people-haryana-4476348-PHO.html?seq=8 दैनिक भास्कर २७ दिसम्बर २०१३ https://archive.today/20131228044120/http://www.bhaskar.com/article-hf/HAR-AMB-mahabharat-characters-known-less-to-people-haryana-4476348-PHO.html?seq=8 28 दिसंबर 2013 28 दिसंबर 2013 live प्रतिशोध की भावना से उसने भगवान शंकर की घोर तपस्या की और उनसे वरदान पाकर महाराज द्रुपद के यहाँ जन्म लिया उसने महाभारत के युद्ध में अपने पिता द्रुपद और भाई धृष्टद्युम्न के साथ पाण्डवों की ओर से युद्ध किया।
पूर्व जन्म की कथा
शिखंडी के रूप में अम्बा का पुनर्जन्म हुआ था। अम्बा काशीराज की पुत्री थी। उसकी दो और बहने थी जिनका नाम अम्बिका और अम्बालिका था।। विवाह योग्य होने पर उसके पिता ने अपनी तीनो पुत्रियों का स्वयंवर रचाया। हस्तिनापुर के संरक्षक भीष्म ने अपने भाइ विचित्रवीर्य के लिए जो हस्तिनापुर का राजा भी था, काशीराज की तीनों पुत्रियों का स्वयंवर से हरण कर लिया। उन तीनों को वे हस्तिनापुर ले गए। वहाँ उन्हें अंबा के किसी और के प्रति आसक्त होने का पता चला। भीष्म ने अम्बा को उसके प्रेमी के पास पहुँचाने का प्रबंध कर दिया किंतु वहां से अंबा तिरस्कृत होकर लौट आई।
अम्बा ने इसका उत्तरदायित्व भीष्म पर डाला और उनसे विवाह करने पर जोर दिया। भीष्म द्वारा आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करने की प्रतिज्ञा से बंधे होने का तर्क दिए जाने पर भी वह अपने निश्चय से विचलित नहीं हुई।
अंततः अंबा ने प्रतिज्ञा की कि वह एक दिन भीष्म की मृत्यु का कारण बनेगी। इसके लिए उसने घोर तपस्या की। उसका जन्म पुनः एक राजा की पुत्री के रूप में हुआ। पुर्वजन्म की स्मृतियों के कारण अंबा ने पुनः अपने लक्ष्य की पूर्ति के लिए तपस्या आरंभ कर दी। भगवान शंकर ने प्रसन्न होकर उसकी मनोकामना पूर्ण होने का वरदान दिया तब अंबा ने शिखंडी के रूप में महाराज द्रुपद की पुत्री के रूप में जन्म लिया।
जीवन वृत
शिखण्डी का जन्म पंचाल नरेश द्रुपद के घर मूल रूप से एक कन्या के रूप में हुआ था। उसके जन्म के समय एक आकशवाणी हुई की उसका लालन एक पुत्री नहीं वरन एक पुत्र के रूप मे किया जाए। इसलिए शिखंडी का लालन-पालन पुरुष के समान किया गया। उसे युद्धकला का प्रशिक्षण दिया गया और कालंतर में उसका विवाह भी कर दिया गया। उसकी विवाह रात्री के दिन उसकी पत्नी ने सत्य का ज्ञान होने पर उसका अपमान किया।
आहत शिखंडी ने आत्महत्या का विचार लेकर वह पंचाल से भाग गई। तब एक यक्ष ने उसे बचाया और अपना लिंग परिवर्तन कर अपना पुरुषत्व उसे दे दिया। इस प्रकार शिखंडी एक पुरुष बनकर पंचाल वापस लौट गया और अपनी पत्नी और बच्चों के साथ सुखी वैवाहिक जीवन बिताया।
उसकी मृत्यु के पश्चात उसका पुरुषत्व यक्ष को वापस मिल गया।
प्रतिज्ञान पूर्ति और भीष्म का अंत
कुरुक्षेत्र के युद्ध में १० वें दिन वह भीष्म के सामने आ गया, लेकिन भीष्म ने उसके रूप में अंबा को पहचान लिया और अपने हथियार रख दिए। और तब अर्जुन ने अंबा के पीछे से उनपर बाणों की बौछर लगा दी और उन्हें बाण शय्या पर लिटा दिया। इस प्रकार अर्जुन द्वारा भीष्म को परास्त किया गया, जिन्हें किसी भी अन्य विधि से परास्त नहीं किया जा सकता था।
सन्दर्भ
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बाहरी सम्पर्क
श्रेणी:महाभारत के पात्र