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411 समाचार
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रविशङ्कर महाराज

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रविशङ्कर महाराज Ravisankar maharaj.jpg Ravishankar Maharaj portrait रविशङ्कर व्यास 1884 02 25 राधू गाँव, खेड़ा जिला, गुजरात, भारत 1984 07 01 1884 02 25 बोरसद, गुजरात, भारत भारतीय समाजसेवक सुराजबा पीताम्बर शिवराम व्यास, नाथी बा Ravishankar Maharaj Sign.jpg रविशङ्कर महाराज गुजरात राज्य के खेडा जिले के समाजसेवी थे। उन्होंने वात्रक नदी के आसपास के गाँवो में लोगों का जीवन सुधारने का, डाकुओं को पुनः मुख्यधारा में लाने का, अन्धश्रद्धा निवारण आदि कार्य किये थे। रविशङ्कर महाराज ने भारत के स्वतन्त्रता सङ्ग्राम में भाग लिया था। वे आर्य समाज से प्रभावित हुए थे। वो सन १९१५ मे महात्मा गांधी से मिले थे। जीवन रविशङ्कर व्यास का जन्म २५ फरवरी १८८४ को, राधू गाँव में (हाल में भारत के गुजरात राज्य के खेड़ा जिले में) महाशिवरात्रि के दिन, पिताम्बर शिवराम व्यास एवं नाथी बा के एक हिन्दू किसान परिवार में हुआ था। उनके परिवार का मूल महेमदावाद के पास सरसवनी गाँव था। बालक रविशङ्कर ने अपने माता-पिता को कृषि कार्य में मदद करने के लिए छठ्ठी कक्षा के बाद पढाई छोड़ दी थी।Lal Encyclopaedia of Indian Literature: Sasay to Zorgot https://books.google.com/books?id=KnPoYxrRfc0C&pg=PA4607 1992 Sahitya Akademi 978-81-260-1221-3 4607–4608 28 मई 2018 https://web.archive.org/web/20160723034450/https://books.google.com/books?id=KnPoYxrRfc0C 23 जुलाई 2016 liveM. V. Kamath Milkman from Anand: the story of Verghese Kurien https://books.google.com/books?id=HGjtAAAAMAAJ 1996 Konark Publishers 24 उन्होंने सूरजबा से विवाह किया। १९ वर्ष की उम्र में उनके पिता की मृत्यु हो गई और २२ वर्ष की उम्र में उनकी माँ की मृत्यु हो गई थी।પ.પૂ.રવિશંકર મહારાજ WebGurjari 2014-05-01 http://webgurjari.in/2014/05/01/ravishankar-maharaj/ gu 2016-12-24 https://web.archive.org/web/20170511155805/http://webgurjari.in/2014/05/01/ravishankar-maharaj/ 11 मई 2017 dead वह आर्य समाज से प्रभावित थे। वह १९१५ में महात्मा गांधी से मिले और उनकी आजादी और सामाजिक सुधार के कार्यो में सम्मिलित हो गए। वह १९२० और १९३० के दशक में गुजरात में राष्ट्रवादी विद्रोहियों के मुख्य आयोजक, दरबार गोपालदास देसाई, नरहरि परीख और मोहनलाल पंड्या के साथ गांधी और सरदार वल्लभभाई पटेल के सबसे शुरुआती और निकटतम सहयोगियों में से एक थे। उन्होंने तटीय एवं केंद्रीय गुजरात के बारैया और पाटनवाडिया जातियों के पुनर्वास के लिए सालों तक काम किया था।David Hardiman Peasant nationalists of Gujarat: Kheda District, 1917-1934 https://books.google.com/books?id=lzWFAAAAIAAJ 1981 Oxford University Press 175, 272–273Thomas Weber Gandhi's Peace Army: The Shanti Sena and Unarmed Peacekeeping https://books.google.com/books?id=BJ2B1TY6dL8C&pg=PA74 1996 Syracuse University Press 978-0-8156-2684-8 74, 108, 125 उन्होंने १९२० में सुनव गाँव में राष्ट्रीय शाला (नेशनल स्कूल) की स्थापना की। उन्होंने पत्नी की इच्छा के विरुद्ध पैतृक संपत्ति पर अपने अधिकार छोड़े और १९२१ में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में सम्मिलित हो गए। उन्होंने १९२३ में बोरसद सत्याग्रह में भाग लिया और हदिया टेक्ष का विरोध किया। उन्होंने १९२६ में बारडोली सत्याग्रह में भाग लिया और उन्हे छह महीने तक ब्रिटिश प्राधिकरण द्वारा कैद किया गया। उन्होंने १९२७ में बाढ़ के राहत कार्यों में भाग लिया जिसमें उन्होंने खाति प्राप्त की। वह १९३० में नमक सत्याग्रह के लिए दाण्डि कुच के लिए गांधी जी से जुड़ गए और दो साल तक कैद में रहें। १९४२ में उन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन में भी भाग लिया और अहमदाबाद में सांप्रदायिक हिंसा को शांत करने का भी प्रयत्न किया। १९४७ में भारत की आजादी के बाद, उन्होंने स्वयं को सामाजिक कार्य के लिए समर्पित किया। वह भूदान आंदोलन में विनोबा भावे से जुड़ गए और १९५५ और १९५८ के बीच उन्होंने ६००० किलोमीटर की यात्रा की। १९६० में, उन्होंने सर्वोदय आंदोलन का आयोजन और समर्थन किया। 1 मई १९६० को जब गुजरात राज्य की स्थापना हुई तब उन्होंने गुजरात राज्य का उद्घाटन किया था। उन्होंने १९७५ में कांग्रेस की सरकार द्वारा डाले गए आपातकाल का भी विरोध किया। उनकी मृत्यु तक, यह एक परंपरा रही कि गुजरात के हर नए नियुक्त मुख्यमंत्री कार्यालय की शपथ लेने के बाद उन्हें आशीर्वाद के लिए जाते हैं। १ जुलाई १९८४ को गुजरात के बोरसद में उनकी मृत्यु हो गई। उनके लिए समर्पित स्मारक बोचसान के अध्यापन मंदिर, वल्लभ विद्यालय में स्थित है। कार्य उन्होने शिक्षण, ग्राम्य पुन:निर्माण और कोलकाता के बारे मे लिखा है। ख्याति भारत सरकार ने १९८४ में उनके सम्मान में डाक टिकट जारी किया। सामाजिक कार्य के लिए 1 लाख रुपये के लायक, रविशंकर महाराज पुरस्कार, गुजरात सरकार के सामाजिक न्याय विभाग द्वारा, उनके सम्मान में स्थापित किया गया है। साहित्य में झवेरचंद मेघाणी ने जनजातियों के बीच अपने सामाजिक कार्य के दौरान रविशङ्कर महाराज के साथ अपने अनुभवों के आधार पर "माणसाइ ना दिवा" नामक पुस्तक लिखा है। पन्नालाल पटेल ने उनके ऊपर एक जीवनी उपन्यास 'जेणे जिवी जाण्यु (१९८४)' भी लिखा है जो दोनों ग्रंथ गुजराती भाषा में हैं।। सन्दर्भ श्रेणी:गुजरात के लोग श्रेणी:१९८४ में निधन श्रेणी:1984 में जन्मे लोग