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411 समाचार
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एक देश बारह दुनिया

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एक देश बारह दुनिया एक_देश_बारह_दुनिया 'एक देश बारह दुनिया' पर बात करते हुए लेखक शिरीष खरे शिरीष खरे हिंदी ग्रामीण भारत और सामाजिक यथार्थ राजपाल एण्ड सन्ज़, दिल्ली 208 (पेपरबैक संस्करण) 9789389373608 कुछ लोग देश के नक्शे पर होते हैं, लेकिन देश की तस्वीर में नहीं। ‘एक देश बारह दुनिया’ उन्हीं लोगों और भूगोलों की बारह वास्तविक कथाएँ हैं, जिन्हें शिरीष खरे ने दो दशक की पत्रकारिता में करीब से देखा है। आदिवासी बस्तियों, खेतों, उजड़ते गाँवों और शहरों के अँधेरे इलाकों से गुजरती ये कहानियाँ विकास के पीछे छूटते जीवन का चेहरा सामने लाती हैं। यह किताब हाशिये को देखने भर की नहीं, उस देश को समझने की किताब है जिसके भीतर हम सब रहते हैं। [आज तक] पुस्तक के बारे में एक देश बारह दुनिया (2021) महाराष्ट्र के विदर्भ और मराठवाड़ा से मुंबई तक, मध्यप्रदेश के महाकौशल से निमाड़ तक, राजस्थान के थार से गुजरात के सूरत तक और छत्तीसगढ़ के सरगुजा से बस्तर तक, इन दुनियाओं का भूगोल बदलता है, भाषा बदलती है, जीवन की परिस्थितियाँ बदलती हैं। कहीं खेत और सूखे की मार है, कहीं शहर की ओर खिंचता पलायन, कहीं जंगल और जमीन का सवाल तो कहीं रोज़गार की तलाश में बदलता हुआ जीवन। अलग-अलग जगहों की ये कथाएँ साथ रखे जाने पर बताती हैं कि भारत की विविधता के भीतर उसके संकटों और संघर्षों के भी कई साझा चेहरे हैं। यही दुनिया मिलकर एक ऐसे बड़े भारत का परिदृश्य रचती हैं, जिसे किसी एक जगह खड़े होकर पूरा नहीं देखा जा सकता। https://hindi.newslaundry.com/2021/07/04/book-review-ek-desh-barah-duniya-documents-related-to-current-and-future-crises पुस्तक- एक देश बारह दुनिया: मौजूदा और भावी संकटों से संबंधित दस्तावेज न्यूज़लॉन्ड्री 4 जुलाई 2021 22 अगस्त 2026https://www.aajtak.in/literature/review/story/ek-desh-barah-duniya-book-review-of-shirish-khare-1366681-2021-12-02 एक देश बारह दुनियाः अछूते, अदेखे सच का मार्मिक आख्यान आज तक 2 दिसंबर 2021 22 अगस्त 2026 लेकिन इन जगहों को केवल उनके संकटों से देखना भी उनके साथ न्याय नहीं होगा। इन कहानियों में हाशिये पर मौजूद लोग केवल अभाव, विस्थापन या दमन के पात्र नहीं हैं। उनके जीवन में दुख और संघर्ष के साथ प्रेम, रिश्ते, छोटी-छोटी खुशियाँ और बेहतर कल की उम्मीदें भी हैं। लेखक ने उनकी आवाज़ को किसी बाहरी व्याख्या के सहारे बोलने के बजाय उनके अपने अनुभवों और जीवन-स्थितियों के भीतर से सुनने की कोशिश की है। इसलिए ये कथाएँ केवल यह नहीं बतातीं कि उनके साथ क्या हुआ; वे यह भी दर्ज करती हैं कि उन परिस्थितियों के बीच वे कैसे जीते, सोचते और अपने हिस्से की दुनिया बचाए रखते हैं। यही मानवीय दृष्टि इन कथाओं को खबर के क्षण से आगे ले जाती है। यहाँ उस जीवन को दर्ज करने की कोशिश है, जो खबर बीत जाने के बाद भी चलता रहता है। आँकड़ों में भूख एक संख्या हो सकती है, विस्थापन एक आँकड़ा और बेरोज़गारी एक प्रतिशत; लेकिन किसी इंसान की जिंदगी में ये संख्याएँ घर, देह और रिश्तों पर घटती हुई घटनाएँ हैं। ‘एक देश बारह दुनिया’ इन्हीं आँकड़ों के पीछे छूटे चेहरों तक जाती है। सपाट सूचनाओं से आगे बढ़कर लोगों के अनुभवों और उनकी अपनी आवाज़ों में दर्ज ये कथाएँ आँकड़ों को फिर से मनुष्य का चेहरा देती हैं। https://hindi.newsclick.in/Ek-Desh-Barah-Duniya-A-picture-of-India-left-on-the-margins 'एक देश बारह दुनिया'- हाशिये पर छूटे भारत की तस्वीर न्यूज़क्लिक 16 अगस्त 2021 22 अगस्त 2026 और इन चेहरों को समझते हुए सामने आता है एक ऐसा भारत जो लगातार बदल रहा है। गाँवों की पुरानी दुनिया पर बाजार, सड़क, शहर और रोज़गार की नई जरूरतें असर डाल रही हैं; जीवन के तौर-तरीके बदल रहे हैं, रिश्तों और काम की पुरानी व्यवस्थाएँ टूट रही हैं और उनके बीच नई आकांक्षाएँ जन्म ले रही हैं। लेकिन नया हमेशा पुराने की जगह पूरी तरह नहीं लेता। कई बार दोनों लंबे समय तक एक-दूसरे के साथ बने रहते हैं। इसी संक्रमण में कहीं उम्मीद है, कहीं असमंजस, कहीं टूटन और कहीं अपने ढंग से टिके रहने की कोशिश। https://www.amarujala.com/kavya/book-review/ek-desh-baarah-duniya-book-review-in-hindi एक देश बारह दुनिया - विकास की वास्तविकता पर ग्रामीण भारत का शोध-विवेचन अमर उजाला 22 अगस्त 2026 इसी वजह से कुछ घटनाएँ खबर बनकर गुजर जाने के बाद भी लेखक के मन में बनी रहीं। पहली बार लिख देने के बाद भी सवाल बचे रहे, पात्र याद आते रहे और घटना का अर्थ समय के साथ बदलता हुआ दिखाई देता रहा। इसीलिए यहाँ लेखन उस समय को दर्ज करने तक सीमित नहीं रहता जिसमें घटना घटी थी; वह बीते हुए अनुभव को बाद के समय की रोशनी में फिर से देखने की कोशिश भी करता है। इस पूरी प्रक्रिया के पीछे लेखक की अपनी यात्राएँ हैं, जिनकी सादगी भी इस पुस्तक का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इन यात्राओं में महँगे होटलों या आरामदेह गाड़ियों के बजाय सार्वजनिक और सस्ते साधनों का सहारा रहा। जहाँ बस मिली, वहाँ तक बस से और जहाँ सड़क खत्म हुई, वहाँ से पैदल; कभी साधारण धर्मशाला, कभी किसी परिचित का घर और कभी किसी गाँव में स्थानीय लोगों के बीच ठहरना। यात्रा का इंतज़ाम भी उसी जीवन के करीब रहा जिसे देखने लेखक निकला था। रास्ते में मिलने वाला जीवन धीरे-धीरे यात्रा का हिस्सा बनता गया—उसकी असुविधाएँ, आत्मीयताएँ, इंतज़ार और अनायास मिले ठिकाने भी। श्रेणी:पुस्तकें