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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

कोटेश्वर

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कोटेश्वर स्थल 23.687594 68.528219 right गुजरात कच्छ sq. km thumb|समुद्रतट पर स्थित प्राचीन कोटेश्वर मन्दिर। कोटेश्वर गुजरात के कच्छ ज़िले में स्थित एक प्राचीन बन्दरगाह एवम सुप्रसिद्ध यात्राधाम है। http://kutchdp.gujarat.gov.in/kutch/marugam-6.htm कच्छ जिला पंचायत के जालस्थल पर जानकारी ज़िला पंचायत कच्छ kutchdp.gujarat.gov.in गुजरात सरकार https://web.archive.org/web/20160325165537/http://kutchdp.gujarat.gov.in/kutch/marugam-6.htm 25 मार्च 2016 live नर्मदा नदी और सागर का जहाँ संगम होता है इस सागर के तट पर स्थित ये स्थल पवित्र यात्राधाम नारायण सरोवर से ४ किमी की दूरी पर है। गुजरात की कच्छ से जूड़ने वाली भारतीय सीमा का ये अंतिम स्थान है। यहाँ से समुद्र में पड़ोशी राष्ट्र पाकिस्तान की सीमा का प्रारंभ हो जाता है। युवानच्वांग के यात्रा वृतांत में जिस 'ए-शिफाली' नगर का उल्लेख कच्छ की राजधानी के रूप में हुआ है। सम्भवतः वह कोटेश्वर नामक वर्तमान स्थान ही है। अति प्राचीन तीर्थस्थल नारायणसर यहाँ से दो मील की दूरी पर स्थित है। महाप्रभु वल्लभाचार्य इस स्थल पर 16वीं शताब्दी में आये थे। कोटेश्वर में कोटेश्वर नामक शिवमन्दिर भी है। नाम की व्युत्पत्ति कोटि शब्द का एक अर्थ सहस्त्र (१०००) होता है। यहाँ १००० शिवलिंग थे इसलिए इस स्थल का नाम कोटेश्वर पड़ा है।Gazetteer of the Bombay Presidency: Cutch, Palanpur, and Mahi Kantha http://books.google.com/books?id=dLUBAAAAYAAJ&pg=PA210 १८८० Printed at the Government Central Press 229-231 28 जनवरी 2017 https://web.archive.org/web/20170220020629/https://books.google.com/books?id=DLUBAAAAYAAJ 20 फ़रवरी 2017 live आज भी यहाँ अनेक शिवलिंग विद्यमान हैं और कालांतर के साथे कुछ नष्ट हो गये हैं। समुद्र में भी टूटे हुए शिवलिंग और मन्दिर के भग्नावशेष दिखाई देते हैं। रामायण और शिवपुराण में इस स्थल का उल्लेख मिलता है। इतिहास इस स्थल की शोध प्रसिद्ध चीनी यात्री युवानच्वांग ने की थी। युवानच्वांग के यात्रा वृतांत में जिस 'ए-शिफाली' नगर का उल्लेख कच्छ की राजधानी के रूप में हुआ है सम्भवतः वह कोटेश्वर नामक वर्तमान स्थान ही है। उक्त समय में कोटेश्वर बड़ा बंदरगाह था लेकिन आज बंदरगाह नामशेष हो गया है। इस स्थल पर शैवमन्दिर और पाशुपत साधुओं के मठ थे। वर्तमान कोटेश्वर मन्दिर के एक शिलालेख के अनुसार ये मन्दिर का निर्माण १७१ वर्ष पूर्व विक्रम संवत १८७७ में हुआ था। प्राचीन मन्दिर टूट चूका है और समुद्रतट पर भग्नावशेष आज भी दिखाई पड़ते हैं। वर्तमानकाल में कोटेश्वर और निलकंठ नाम के दो मन्दिर विद्यमान हैं। नारायण सरोवर में भी एक समय कानफ़टे साधुओ का प्रभुत्व था अत: प्राचीन काल में कोटेश्वर भी बड़ा तीर्थस्थल रहा होगा। महाप्रभु वल्लभाचार्य इस स्थल पर 16वीं शताब्दी में आये थे। पौराणिक इतिहास कोटेश्वर की कथा रावण के साथ शरु होती है। प्राचीन काल में रावण की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने अपना आत्मलिंग रावण को दिया। रावण इसे अपनी राजधानी लंका में स्थापित करना चाहता था। बीच रास्ते में रावण ने लिंग को जमीन पे छोड़ दिया और १००० एक जैसे लिंग बन गये। रावण भ्रमित होकर आत्मलिंग को लंका न ले जा सका और शिवजी यहाँ स्थित हो गये। कथा के अनुसार कोटेश्वर मन्दिर में आत्मलिंग स्थापित है जो खुद भगवान शिव ने दिया था। कैसे पहुंचे कोटेश्वर पहुंचने के लिए सबसे पहले भुज पहुंचें। दिल्ली, मुम्बई और अहमदाबाद से भुज तक रेल मार्ग से आ सकते हैं। रेलमार्ग से गांधीधाम आने के बाद वहाँ से भी भुज जा सकते है। मुम्बई और भुज के बीच दैनिक विमान सेवा भी है। अहमदाबाद से भुज की दूरी 350 कि॰मी॰ है। यहाँ से भुज पहुंचने के अनेक साधन हैं। भुज से कोटेश्वर जाते समय 36 किलोमीटर की दूरी पर 1100 वर्ष पुराना पुअरेश्वर महादेव का मन्दिर है। इसके बाद 95 किलोमीटर की दूरी पर कच्छ की कुल देवी माता आशापुरा की पीठ है। शारदीय नवरात्रों में यहां श्रद्धालुओं का जमघट लगा रहता है। नारायण सरोवर-कोटेश्वर से 30 किलोमीटर आगे भारत-पाकिस्तान की सीमा है। पहले नारायण सरोवर में ठहरने, भोजन आदि की व्यवस्था नहीं थी। इस कारण श्रद्धालुओं को बड़ी कठिनाई होती थी। पूरा इलाका वीरान होता था। किन्तु अब स्वयंसेवी संगठनों ने यहां ठहरने और खाने-पीने की अच्छी व्यवस्था कर दी है। आवागमन भी अब सुगम हो गया है। कोटेश्वर जाने के लिए नारायण सरोवर पहुंचने के बाद वहाँ से चलके या वाहन में कोटेश्वर जा सकते है। अतिथिगृह और खाने की व्यवस्था नारायण सरोवर में हैं। कोटेश्वर में रात में नहीं रुक सकते और ये भारतीय सीमा को जोड़ने वाला विस्तार होने के कारण पर्यटन स्थलों के अलावा दूसरा विस्तार बाहर के लोगों के लिए प्रतिबन्धित है। चित्रदीर्घा सन्दर्भ बाहरी कड़ियाँ श्रेणी:गुजरात श्रेणी:हिन्दू तीर्थ स्थल श्रेणी:कच्छ ज़िला श्रेणी:भारत के शिव मन्दिर