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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

मधुसूदन ओझा

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पण्डित मधुसूदन ओझा (1866-1939) संस्कृत के विद्वान एवं लगभग दो सौ पुस्तकों के रचयिता थे। वे जयपुर के महाराजा कॉलेज में संस्कृत के अध्यक्ष थे। जन्म व प्रारम्भिक जीवन पण्डित मधुसूदन ओझा का जन्म मिथिला (वर्तमान बिहार) के मुजफ्फरपुर जिले में गाढ़ा नामक गांव में सम्वत 1923 (ई.स.1866) में भाद्रपद कृष्ण अष्टमी (कृष्ण-जन्माष्टमी) को रात्रि के साढ़े दस बजे हुआ था। इनके पिता का नाम वैद्यनाथ ओझा था। बाल्यकाल के 8 वर्ष मधुसूदन जी पिता के साथ गांव में ही रहे। वैद्यनाथ ओझा के बड़े भाई राजीवलोचन मिथिला से जयपुर आकर बस गये थे और जयपुर महाराजा रामसिंह द्वारा उन्हें ससम्मान सम्पत्ति व जागीर आदि दी गई थी किंतु इनके कोई पुत्र नहीं था अतः वे अपने छोटे भाई के पुत्र मधुसूदन को आठ वर्ष की आयु गोद लिया तथा यज्ञोपवीत संस्कार के बाद जयपुर लेकर आ गये। लगभग 15 वर्ष की आयु तक मधुसूदन जी जयपुर में ही रहे किंतु सम्वर 1937 (ई.स.1880) में महाराजा रामसिंह जी का और सम्वत 1939 (ई.स.1882) में राजीवलोचन जी का स्वर्गवास हो गया और मधुसूदन जी को वापस मिथिला लौटना पड़ा। जयपुर से मिथिला लौटने पर लगभग 17 वर्ष की आयु में उनका विवाह चंचलनाथ ओझा कि सुपुत्री से हुआ। अध्ययन के प्रति अतिप्रबल रुचि के कारण परिजनों को सहमत कर काशी चले गए और वहां दरभंगा संस्कृत पाठशाला में प्रविष्ट हुए। पंडित शिवकुमार जी शास्त्री के चरणों में लगभग सात वर्षों तक व्याकरण, न्याय, मीमांसा, साहित्य, वेदांत आदि सभी विषयों का गहन अध्ययन किया और उन पर अधिकार प्राप्त किया। काशी में अध्ययन समाप्त कर पंडित जी बूंदी, कोटा, झालावाड़, नीमच, रतलाम आदि स्थानों की यात्रा करते हुए जयपुर आए। आजीविका सम्वत 1946 (ई.स.1889) में हरिदास जी शास्त्री जयपुर में शिक्षा विभाग के अध्यक्ष थे उन्होनें मधुसूदन जी से महाराजा कॉलेज में संस्कृत के प्राध्यापक का पदग्रहण करने का आग्रह किया। मधुसूदन जी अध्यापन कराने लगे। जयपुर के महाराजा सवांई माधवसिंह (द्वितीय) के समय में धर्मसभा के सदस्य बनें तथा बाद में अध्यक्ष भी रहे। उनकी प्रतिभा से प्रभावित होकर महाराजा सवांई माधवसिंह (द्वितीय) ने उन्हे अध्यापन कार्य से मुक्त कर अपने निजी वर्ग (Personal Staff) में सम्मिलित कर लिया। सम्वत 1952 (ई. स.1896) में महाराजा के संकेत पर मधुसूदन जी ने पोथीखाने में कार्य के लिए आवेदन किया और वो पोथीखाना में कार्य करने लगे यहीं उन्हे सभी ग्रंथ सहजता से मिलने लगे (जयपुर पोथीखाना की पत्रावलियों में उक्त संदर्भ दर्ज है)। कृतियाँ पण्डित मधुसूदन ओझा ने लगभग 150 से 200 पुस्तकों की रचना की है इनमें से 40 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है एवं 80 पुस्तकें अप्रकाशित हैं शेष पुस्तकें प्राप्य नहीं हैं। इनकी कुछ प्रकाशित रचनाएं हैं - 1. जगद्गुरुवैभवम् हजारों वर्ष पूर्व के वैदिक ब्रह्मा का ऐतिहासिक और वैज्ञानिक दोनों प्रकार का वर्णन है 2. इंद्रविजय भौम, दिव्य और शरीर इन त्रैलोक्य का विवेचन, भारतवर्ष व हिंदुस्थान दोनों नामों का विवरण। आर्य-लोग भारत में बाहर से आए इस धारणा को भी युक्ति प्रमाण से निर्मूल सिद्ध किया गया। 3. व्योमवाद आकाश ही सृष्टि का प्रभव प्रतिष्ठा और प्रलयस्थान है इसका विवेचन। (पण्डित अनंत शर्मा द्वारा हिंदी टिप्पणानुवाद, पण्डित मधुसूदन ओझा शोध प्रकोष्ठ, जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय, जोधपुर द्वारा प्रकाशित) 4. अपरवाद काल, स्वभाव, नियति, यदृच्छा, भूत, योनि, और पुरुष - इन सात तत्त्वों के पारस्परिक संयोग से विश्व की उत्पत्ति का समर्थन। (पण्डित अनंत शर्मा द्वारा हिंदी टिप्पणानुवाद, पण्डित मधुसूदन ओझा शोध प्रकोष्ठ, जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय, जोधपुर द्वारा प्रकाशित) 5. आवरणवाद वय, वयुन, वयोनाध नामक तीन तत्त्वों से सृष्टि की उत्पत्ति बताई गई है। (पण्डित अनंत शर्मा द्वारा हिंदी टिप्पणानुवाद, पण्डित मधुसूदन ओझा शोध प्रकोष्ठ, जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय, जोधपुर द्वारा प्रकाशित) 6. अम्भोवाद जल को जगत् की उत्पत्ति और प्रलय का कारण बताकर जल की घन, तरल और विरल अवस्थाओं को समझाकर उसकी मूल कारणता सिद्ध की गई है। (पण्डित अनंत शर्मा द्वारा हिंदी टिप्पणानुवाद, पण्डित मधुसूदन ओझा शोध प्रकोष्ठ, जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय, जोधपुर द्वारा प्रकाशित) 7. अत्रिख्याति अत्रिऋषि और उनके वंश का वैज्ञानिक व ऐतिहासिक दोनों प्रकार का वर्णन। (पण्डित अनंत शर्मा द्वारा हिंदी टिप्पणानुवाद, पण्डित मधुसूदन ओझा शोध प्रकोष्ठ, जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय, जोधपुर द्वारा प्रकाशित) 8. दशवादरहस्य जैसे आजकल षड्दर्शन हैं वैसे ही वैदिक काल में दशवाद प्रचलित थे उन्हीं का संक्षिप्त विवरण। अन्य ग्रन्थ इनके अतिरिक्त अहोरात्रवाद, गीताविज्ञानभाष्य, शारिरकविज्ञानभाष्य, ब्रह्मविज्ञान प्रवेशिका, ब्रह्मविज्ञान, ब्रह्मचतुष्पदी, ब्रह्मसमंवय, देवतानिवित्, वैदिक कोष, कादम्बिनी आदि लगभग 120 प्राप्य रचनाएं हैं। इनके जीवनकाल में व पश्चात भी लखनऊ विश्वविद्यालय के संस्कृत प्राध्यापक पण्डित आद्यादत्त ठाकुर ने अपने ही ज्ञान व धन से लगभग 15 पुस्तकें प्रकाशित की है और आर्थिक विवशता के कारण मूल (बिना व्याख्या के) ही प्रकाशित करना पड़ा। इसके पश्चात पण्डित मोतीलाल शर्मा, सुरजनदास स्वामी व पण्डित अनंत शर्मा द्वारा आए बढ़ाया गया। जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय, जोधपुर में पण्डित मधुसूदन ओझा के ग्रंथों पर शोध हेतु पण्डित मधुसूदन ओझा शोध प्रकोष्ठ की स्थापना भी की गई है। बाहरी कड़ियाँ ​पण्डित मधुसूदन ओझा ग्रन्थमाला श्रेणी:संस्कृत विद्वान श्रेणी:साहित्यकार श्रेणी:जयपुर के लोग श्रेणी:लेखक श्रेणी:राजस्थान के लोग