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मातंगिनी हाजरा
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मातंगिनी हाजरा মাতঙ্গিনী হাজরা Matangini Hazra.jpg yes 1870 10 19 Tamluk, Bengal Presidency, British India yes 1942 9 29 1870 10 19 Tamluk, Bengal Presidency, British India Activist in the Indian independence movement
मातंगिनी हाजरा (19 अक्टूबर 1870 http://www.amardeshonline.com/pages/details/2010/09/29/46101 মাতঙ্গিনী হাজরা Amardeshonline.com 2010-09-29 2012-10-03 https://web.archive.org/web/20160120001023/http://www.amardeshonline.com/pages/details/2010/09/29/46101 20 जनवरी 2016 dead ) भारत की क्रान्तिकारी थीं। उन्हें 'गाँधी बुढ़ी' के नाम से जाना जाता था।Amin
Sonia
2012
Hazra, Matangini
http://en.banglapedia.org/index.php?title=Hazra,_Matangini
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मातंगिनी हाजरा का जन्म पश्चिम बंगाल मिदनापुर जिले के होगला ग्राम में एक अत्यन्त निर्धन परिवार में हुआ था। गरीबी के कारण 12 वर्ष की अवस्था में ही उनका विवाह ग्राम अलीनान के 62वर्षीय विधुर त्रिलोचन हाजरा से कर दिया गया। इस पर भी दुर्भाग्य उनके पीछे पड़ा रहा। छह वर्ष बाद वह निःसन्तान ही विधवा हो गयीं। पति की पहली पत्नी से उत्पन्न पुत्र उससे बहुत घृणा करता था। अतः मातंगिनी एक अलग झोपड़ी में रहकर मजदूरी से जीवनयापन करने लगीं। गाँव वालों के दुःख-सुख में सदा सहभागी रहने के कारण वे पूरे गाँव में माँ के समान पूज्य हो गयीं।
1932 में गान्धी जी के नेतृत्व में देश भर में स्वाधीनता आन्दोलन चला। वन्देमातरम् का घोष करते हुए जुलूस प्रतिदिन निकलते थे। जब ऐसा एक जुलूस मातंगिनी के घर के पास से निकला, तो उसने बंगाली परम्परा के अनुसार शंख ध्वनि से उसका स्वागत किया और जुलूस के साथ चल दी। तामलुक के कृष्णगंज बाजार में पहुँचकर एक सभा हुई। वहाँ मातंगिनी ने सबके साथ स्वाधीनता संग्राम में तन, मन, धन से संघर्ष करने की शपथ ली।
मातंगिनी को अफीम की लत थी; पर अब इसके बदले उनके सिर पर स्वाधीनता का नशा सवार हो गया। 17 जनवरी, 1933 को ‘करबन्दी आन्दोलन’ को दबाने के लिए बंगाल के तत्कालीन गर्वनर एण्डरसन तामलुक आये, तो उनके विरोध में प्रदर्शन हुआ। वीरांगना मातंगिनी हाजरा सबसे आगे काला झण्डा लिये डटी थीं। वह ब्रिटिश शासन के विरोध में नारे लगाते हुई दरबार तक पहुँच गयीं। इस पर पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया और छह माह का सश्रम कारावास देकर मुर्शिदाबाद जेल में बन्द कर दिया।
1935 में तामलुक क्षेत्र भीषण बाढ़ के कारण हैजा और चेचक की चपेट में आ गया। मातंगिनी अपनी जान की चिन्ता किये बिना राहत कार्य में जुट गयीं। 1942 में जब ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ ने जोर पकड़ा, तो मातंगिनी उसमें कूद पड़ीं। आठ सितम्बर को तामलुक में हुए एक प्रदर्शन में पुलिस की गोली से तीन स्वाधीनता सेनानी मारे गये। लोगों ने इसके विरोध में 29 सितम्बर को और भी बड़ी रैली निकालने का निश्चय किया। इसके लिये मातंगिनी ने गाँव-गाँव में घूमकर रैली के लिए 5,000 लोगों को तैयार किया। सब दोपहर में सरकारी डाक बंगले पर पहुँच गये। तभी पुलिस की बन्दूकें गरज उठीं। मातंगिनी एक चबूतरे पर खड़ी होकर नारे लगवा रही थीं। एक गोली उनके बायें हाथ में लगी। उन्होंने तिरंगे झण्डे को गिरने से पहले ही दूसरे हाथ में ले लिया। तभी दूसरी गोली उनके दाहिने हाथ में और तीसरी उनके माथे पर लगी। मातंगिनी की मृत देह वहीं लुढ़क गयी।
इस बलिदान से पूरे क्षेत्र में इतना जोश उमड़ा कि दस दिन के अन्दर ही लोगों ने अंग्रेजों को खदेड़कर वहाँ स्वाधीन सरकार स्थापित कर दी, जिसने 21 महीने तक काम किया।
दिसम्बर, 1974 में भारत की प्रधानमन्त्री इन्दिरा गान्धी ने अपने प्रवास के समय तामलुक में मांतगिनी हाजरा की मूर्ति का अनावरण कर उन्हें अपने श्रद्धासुमन अर्पित किये।
भारत ने 1947 में स्वतंत्रता हासिल की और कोलकाता में हाजरा रोड के लंबे विस्तार सहित कई स्कूलों, कॉलोनियों और सड़कों का नाम हाजरा के नाम पर रखा गया। स्वतंत्र भारत में कोलकाता में स्थापित महिला की पहली मूर्ति 1977 में हाजरा की थी। तामलुक में जहां उनकी हत्या हुई थी, उस स्थान पर अब एक मूर्ति खड़ी है। वर्ष 2002 में, भारत छोड़ो आंदोलन के साठ साल और तमलुक राष्ट्रीय सरकार के गठन की स्मृति में डाक टिकटों की एक श्रृंखला के हिस्से के रूप में, भारतीय डाक विभाग ने मातंगिनी हाजरा के चित्र के साथ पांच रुपये का डाक टिकट जारी किया। बर्ष 2015 में, इस प्रसिद्ध क्रांतिकारी शख्सियत के नाम पर तामलुक, पूर्वी मेदिनीपुर में शहीद मातंगिनी हाजरा गवर्नमेंट कॉलेज फॉर वुमेन की स्थापना की गई थी।
सन्दर्भ
श्रेणी:भारतीय स्वतंत्रता सेनानी
श्रेणी:1870 में जन्मे लोग
श्रेणी:१९४२ में निधन
श्रेणी:क्रान्तिकारी महिलाएँ