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411 समाचार
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चित्तप्रिय रायचौधुरी

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चित्तप्रिय रायचौधुरी শহীদ চিত্তপ্রিয় রায় চৌধুরী.jpg महान क्रान्तिकारी चित्तप्रिय रायचौधुरी ६ दिसम्बर १८९४ थालिया, राजेर उपजिला, मादारीपुर, बंगाल प्रेसीडेन्सी(वर्तमान समय में बांग्लादेश में) ९ सितम्बर १९१५ बालेश्वर, बंगाल प्रेसीडेन्सी सम्मुख युद्ध कालो भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलनचित्तप्रिय रायचौधुरी (1894 - 1915) भारतीय उपमहाद्वीप के ब्रिटिश-विरोधी स्वतंत्रता आंदोलन में एक महत्वपूर्ण व्यक्ति और अग्नि युग के क्रांतिकारी थे। वे पूर्णचंद्र दास के नेतृत्व वाली गुप्त क्रांतिकारी संस्था मदारीपुर समिति के सदस्य थे एवं वे पूर्णचंद्र दास के सहयोगी थे। उन्होंने महान क्रांतिकारी बाघा जतिन के नेतृत्व में बुड़ी बालाम नदी के तट पर हुए आंशिक युद्ध में भाग लिया और आमने-सामने की लड़ाई में वीरगति को प्राप्त हुए। সুবোধ সেনগুপ্ত ও অঞ্জলি বসু সম্পাদিত, সংসদ বাঙালি চরিতাভিধান, প্রথম খণ্ড, সাহিত্য সংসদ, কলকাতা, নভেম্বর ২০১৩, পৃষ্ঠা ২২৩, 978-81-7955-135-6 प्रारंभिक जीवन चित्तप्रिय रायचौधुरी का जन्म 6 दिसंबर 1894 को मदारीपुर के राजोइर उपजिला के अंतर्गत खलिया गांव में एक माहिष्य जमींदार परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम पंचानन रायचौधुरी और माता का नाम सुखदा सुन्दरी देवी था। उनके पिता पंचानन रायचौधुरी मदारीपुर शहर में मानद मजिस्ट्रेट थे। चित्तप्रिय जब थालिया हाई स्कूल और बाद में मदारीपुर हाई स्कूल के छात्र थे तब मदारीपुर समिति के क्रांतिकारी सदस्य बने (1910) । মাদারীপুর জেলা পরিচিতি জাব্বার মিয়া আবদুল মিসেস লীনা জাব্বার ১৯৯৪ ১৬৭ क्रांतिकारी गतिविधियाँ दिसंबर 1913 में उन्हें फरीदपुर षड्यंत्र मामले में आरोपी के रूप में गिरफ्तार किया गया। उन्होंने पांच महीने जेल में बिताए। जेल से रिहा होने के बाद, 18 फरवरी 1915 को, कलकत्ता विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह के दिन, उन्होंने कुछ सहयोगियों की मदद से सड़क पर ड्यूटी पर तैनात पुलिस निरीक्षक सुरेश मुखर्जी की हत्या कर दी। क्रांतिकारी जतिन मुखर्जी के सहयोगी के रूप में, उन्होंने जर्मनी, जापान, अमेरिका और डच इंडीज से हथियार लाने का प्रयास किया। সুবোধ সেনগুপ্ত ও অঞ্জলি বসু সম্পাদিত, সংসদ বাঙালি চরিতাভিধান, প্রথম খণ্ড, সাহিত্য সংসদ, কলকাতা, নভেম্বর ২০১৩, পৃষ্ঠা ২২৩, 978-81-7955-135-6 बुड़ी बालाम नदी के तट पर खण्डयुद्ध right|thumb|300px|चित्तप्रिय रायचौधुरी ने अंग्रेज पुलिस से संघर्ष करते हुए मृत्यु को गले लगाया। 7 सितंबर 1915 की देर रात, जतिन मुखर्जी महलडीह में अपने अस्थायी निवास पर लौट आए। उनके साथ चित्तप्रिय रायचौधुरी, ज्योतिष चंद्र पाल, मनोरंजन सेनगुप्त और नीरेन्द्रनाथ दासगुप्त थे। 8 सितंबर को पूरा दिन गहरे जंगल में बीता। रात भर पैदल चलते हुए, वह 9 सितंबर की सुबह बालेश्वर के बलरामगढ़ी में बुड़ीबालाम (जिसे उड़िया में "बुड्ढाबालाङ्ग" कहा जाता है) नदी के किनारे पहुंचे।http://m.dailyhunt.in/news/india/bangla/banglahunt-epaper-banhun/raktakt+budibalamer+tire-newsid-81261615 রক্তাক্ত বুড়িবালামের তীরে - Banglahunt Dailyhunt en 2019-08-11https://www.enewsbangla.com/2019/04/Spend-some-days-in-simlipal.html গরমের ছুটিতে সিমলিপাল জাতীয় উদ্যানে কয়েকটা দিন giswami Ifsita E News Bangla Bengali News Portal https://web.archive.org/web/20190811104913/https://www.enewsbangla.com/2019/04/Spend-some-days-in-simlipal.html ২০১৯-০৮-১১ 2019-08-11 वहाँ नदी के पार तैरकर पहुँचे और युद्ध के लिए काफी उपयुक्त सूखे दलदल में शरण ले लिया। दूसरी तरफ चार्ल्स टेगर्ट, कमांडर रदरफोर्ड, जिला मजिस्ट्रेट किलवे, कई सशस्त्र पुलिस और सैन्य बलों के साथ दिखाई दिए। खाई के पीछे, बाघा जतिन के नेतृत्व में ये पाँचों थे और इनके हाथ में माउजर पिस्तौल थी। जब गोलीबारी शुरू हुई तो पुलिस की गोलीबारी में चित्तप्रिय घायल हुए एवं वीरगति को प्राप्त हुए। बाद में 16 अक्टूबर 1915 को एक मुकदमे में, मनोरंजन सेनगुप्त और नीरेन्द्रनाथ दासगुप्त को मौत की सजा सुनाई गई। उन दोनों को 3 दिसंबर 1915 को फांसी दी गई। ज्योतिष चंद्र पाल और ज्यादा दिन नहीं बचे। पुलिस के क्रूर अत्याचारों से परेशान होकर, अंडमान की सेल्युलर जेल में कैद में पागल हो गये। 4 दिसंबर 1924 को बेरहामपुर उन्माद आश्रम में उनकी मृत्यु हो गई।সুবোধ সেনগুপ্ত ও অঞ্জলি বসু সম্পাদিত, সংসদ বাঙালি চরিতাভিধান, প্রথম খণ্ড, সাহিত্য সংসদ, কলকাতা, নভেম্বর ২০১৩, পৃষ্ঠা ৫৪৮, 978-81-7955-135-6 सन्दर्भ श्रेणी:ब्रिटिश भारत के क़ैदी और बंदी श्रेणी:१९१५ में निधन श्रेणी:1894 में जन्मे लोग