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तत्त्व (शैव दर्शन)
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शैव दर्शन के अनुसार ३६ तत्त्व हैं। इनको तीन मुख्य भागों द्वारा समझ सकते हैं -
(1) शिवतत्व, (2) विद्यातत्व और (3) आत्मतत्व।
शिवतत्व
शिवतत्व में शिवतत्व और (2) शक्तितत्व का अंतर्भाव है। परमशिव प्रकाशविमर्शमय है। इसी प्रकाशरूप को शिव और विमर्शरूप को शक्तितत्व कहते हैं। जैसा प्रारंभ में कहा जा चुका है, पूर्ण अकृत्रिम अहं (मैं) की स्फूर्ति को विमर्श कहते हैं। यही स्फूर्ति विश्व की सृष्टि, स्थिति और संहार के रूप में प्रकट होती है। बिना विमर्श या शक्ति के शिव को अपने प्रकाश का ज्ञान नहीं होता। शिव ही जब अंत:स्थित अर्थतत्व को बाहर करने के लिये उन्मुख होता है, शक्ति कहलाता है।
विद्यातत्व
विद्यातत्व में तीन तत्वों का अंतर्भाव है :
(3) सदाशिव, (4) ईश्वर और (5) सद्विद्या।
सदाशिव शक्ति के द्वारा शिव की चेतना अहं और इदं में विभक्त हो जाती है। परंतु पहले अहमंश स्फुट रहता है और इदमंश अस्फुट रहता है। अहंता से आच्छादित अस्फुट इदमंश की अवस्था को सद्विद्या या शुद्धविद्यातत्व कहते हैं। इसमें क्रिया का प्राधान्य रहता है। शिव का परामर्श है "अहं"। सदाशिव तत्व का परामर्श है "अहमिदम्"। ईश्वरतत्व का परामर्श है "इदमहं"। शुद्धविद्यातत्व का परामर्श है "अहं इदं च"।
यहाँ तक "अहं" और "इद" में अभेद रहता है।
आत्म तत्व
आत्म तत्व में 31 तत्वों का अंतर्भाव है:
(6) माया, (7) कला, (8) विद्या, (9) राग, (10) काल, (11) नियति, (12) पुरुष, (13) प्रकृति, (14) बुद्धि (15) अहंकार, (16) मन,
(17-21) श्रोत्र; त्वक्, चक्षु, जिह्वी, घ्राण (पंचज्ञानेंद्रिय)
(22-26) पाद, हस्त, उपस्थ, पायु, वाक् (पञ्च कर्मेन्द्रिय)
(27-31) शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध (पंच तन्मात्राएँ),
(32-36) आकाश, वायु, तेज (अग्नि), आप (जल), भूमि (पंचभूत)।
(6) माया - यह अहं और इदं को पृथक् कर देती है। यहीं से भेद-बुद्धि प्रारंभ होती है। अहमंश पुरुष हो जाता है और इदमंश प्रकृति। माया की पाँच उपाधियाँ हैं- कला, विद्या, राग, काल और नियति। इन्हें "कंचुक" (आवरण) कहते हैं, क्योंकि ये पुरुष के स्वरूप को ढक देते है। इनके द्वारा पुरुष की शक्तियाँ संकुचित या परिमित हो जाती हैं। इन्हीं के कारण जीव परिमित प्रमाता कहलाता है। शांकर वेदांत और त्रिक्दर्शन की माया एक नहीं है। वेदांत में माया आगंतुक के रूप में है जिससे ईश्वरचैतन्य उपहित हो जाता है। इस दर्शन में माया शिव की स्वातंत्र्यशक्ति का ही विजृंभण मात्र है जिसके द्वारा वह अपने वैभव को अभिव्यक्त करता है।
(7) कला सर्वकर्तृत्व को संकुचित करके किंचित्कर्तित्व प्रस्थापित करता है।
(8) विद्या सर्वज्ञत्व को संकुचित कर किंचिज्ज्ञत्व लाती है।
(9) राग नित्यतृप्तित्व को संकुचित कर अनुराग लाता है।
(10) काल नित्यत्व को संकुचित करके अनित्यत्व प्रस्थापित करता है।
(11) नियति स्वातंत्र्य को संकुचित करके कार्य-कारण-संबंध प्रस्थापित करती है।
(12) इन्हीं कंचुकों से आवृत जीव पुरुष कहलाता है।
(13) प्रकृति महततत्व से लेकर पृथ्वीतत्व तक का मूल कारण है।
14 से 36 तत्व बिलकुल सांख्य की तरह हैं।
बन्ध आणव मल के कारण जीव बन्धन में पड़ता है। स्वातंत्र्य की हानि और स्वातंत्र्य के अज्ञान को आणव मल कहते हैं। माया के संसर्ग से उसमें मायीय मल भी आ जाता है। यही शरीर भुवनादि भिन्नता का कारण होता है। फल के लिये किए हुए धर्माधर्म कर्म और उसकी वासना से उत्पन्न हुए मल को कार्म मल कहते हैं। इन्हीं तीन मलों के कारण जीव बंधन में पड़ता है।
इन्हें भी देखें
पञ्चतत्त्व
प्रत्यभिज्ञा दर्शन
शैव दर्शन
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