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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

सूत्रात्मा

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तत्त्वमीमांसात्मक अध्ययनों और साहित्य में, सूत्रात्मा, जिसे अन्तःकरण का जीवनसूत्र भी कहा जाता है, आत्मन् से स्थूल शरीर तक की जीवनदायिनी संयोजिका को सूचित करता है। यह इस सूत्र तथा द्वितीय सूत्र (चेतनासूत्र, जो जीवात्मा से स्थूल शरीर तक जाता है) के विस्तारित संश्लेषण को भी सूचित करता है, जो स्थूल शरीर को प्राणमय शरीर से, आगे सूक्ष्म शरीर से और अन्ततः मनोमय शरीर से जोड़ता है। अन्य स्रोतों में, इसे एक दृढ़, रजतवर्ण, प्रत्यास्थ सूत्र के रूप में वर्णित किया जाता है, जो व्यक्ति के स्थूल शरीर को उसके सूक्ष्म शरीर (स्थूल शरीर की एक अल्प स्पष्ट अभिव्यक्ति) से जोड़ता है। सूक्ष्मशरीर प्रक्षेपण सूक्ष्मशरीर प्रक्षेपण और देहातीत अनुभवों के दौरान, कुछ लोग दावा करते हैं कि वे (इच्छानुसार वा अन्यथा) एक सूत्रात्मा को देख सकते हैं जो उनके सूक्ष्म रूप को उनके स्थूल शरीर से जोड़ता है। यह सूत्र मुख्यतः आरम्भिक प्रक्षेपक को इस आश्वासन के रूप में प्रतीत होता है कि वे खो नहीं जाएँगे।June 2011 तथापि, अन्य लोगों ने अभिकथित किया कि देहातीत अनुभवों और सूक्ष्मशरीर प्रक्षेपणों के दौरान सूत्रात्मा के प्रेक्षणों की स्थितियाँ विरल हैं; अपितु, अधिकांश स्थितियों में कोई सूक्ष्म शरीर प्रेक्षित नहीं होता और प्रक्षेपक स्वयं को 'विदेह चेतना या दृष्टिबिन्दु' के रूप में देखता है। एक संकीर्ण मार्ग से गमन की तुलना जननमार्ग से की जाती है, और सूत्रात्मा की नाभिरज्जु से समानता, ये देहातीत अनुभवों के समय कुछ प्रेक्षण हैं जिन्हें कभी-कभी प्रसव से उपमित किया जाता है। 'जन्म सिद्धान्तों' ने परिकल्पना की कि शल्य-प्रसव द्वारा जन्मे लोगों को सूक्ष्मशरीर प्रक्षेपणों के दौरान संकीर्ण मार्ग के अनुभव नहीं होते। इसके विपरीत, एक अध्ययन ने दर्शाया कि शल्य प्रसव द्वारा जन्मे लोगों और स्वाभाविक रूप से जन्मे लोगों द्वारा अपने देहातीत अनुभव या सूक्ष्मशरीर प्रक्षेपण के दौरान प्रेक्षित अनुभवों में कोई विभेद नहीं है। सूत्र का सूक्ष्म शरीर से संलग्नता-बिन्दु न केवल प्रक्षेपकों के मध्य भिन्न होता है, अपितु प्रक्षेपण से प्रक्षेपण तक भी भिन्न होता है। ये बिन्दु प्रमुख चक्र-स्थितियों के अनुरूप होते हैं। रॉबर्ट ब्रूस के प्रेक्षणों के अनुसार, सघन शरीर से संयोजन का एकल बिन्दु नहीं होता, अपितु समस्त प्रमुख चक्रों तथा कुछ गौण चक्रों से बाहर निकलने वाली सूत्र-रज्जुओं का स्थानीय रूप से अभिसरित समूह होता है (Astral Dynamics/सूक्ष्म गतिकी, पृष्ठ ३९८)। सूत्रात्मा का उल्लेख रहस्यवादियों द्वारा किया गया है, विशेषतः मरण तथा मृत्युसमीप अनुभवों के सन्दर्भों में। कहा जाता है प्रक्षेपण के समय सूत्र को सूक्ष्म और स्थूल शरीरों से जुड़ा रहना चाहिए, क्योंकि यदि वह टूट जाए तो प्रक्षेपक की मृत्यु हो जाएगी। यदि व्यक्ति वृद्ध हो जाता है या उसकी मृत्यु निकट होती है, तो सूक्ष्म शरीर धीरे-धीरे स्थूल शरीर से पृथक् हो जाता है और सूत्रात्मा टूट जाता है, जिससे दोनों शरीरों का पूर्ण और अपरिवर्तनीय पृथक्करण हो जाता है। इस स्थिति में, मृत्यु और मरण की धारणा की व्याख्या 'स्थायी सूक्ष्मशरीर प्रक्षेपण' के रूप में की जाती है, जिसे पूर्ववत् नहीं किया जा सकता। शब्दोत्पत्ति यह शब्द यहूदी धर्मग्रन्थ अथवा ईसाई पुरातन विधान के सभोपदेशक १२:६-७ से व्युत्पन्न है। सम्पूर्ण तनाख में मूल इब्रानी से अनूदित :http://www.chabad.org/library/bible_cdo/aid/63255/jewish/The-Bible-with-Rashi.htm The Complete Tanach with Rashi's Commentary - English translation with Rashi's commentary "इससे पूर्व कि सूत्रात्मा टूटे, और स्वर्ण स्रोत चूर-चूर हो, और स्रोत पर घट टूटे, और गर्त में चक्र चूर्ण होकर गिरे। और धूलि पृथ्वी पर यथापूर्व लौट जाए, और आत्मा उस ईश्वर के पास लौट जाए जिसने उसे दिया।" प्राधिकृत संस्करण में यथा प्रस्तुत : "अथवा इससे पूर्व कि सूत्रात्मा ढीला हो, अथवा स्वर्ण पात्र टूटे, अथवा स्रोत पर घट टूटे, अथवा जलाशय पर चक्र टूटे। तब धूलि पृथ्वी पर यथापूर्व लौट जाएगी, और आत्मा उस ईश्वर के पास लौट जाएगी जिसने उसे दिया।" अथवा नव अन्तर्राष्ट्रीय संस्करण से : "उसका स्मरण कर, इससे पूर्व कि सूत्रात्मा कट जाए, अथवा स्वर्ण पात्र टूट जाए ; इससे पूर्व कि स्रोत पर घट चूर-चूर हो जाए, अथवा कूप पर चक्र टूट जाए, और धूलि उस भूमि पर लौट जाए जहाँ से वह आई, और आत्मा उस ईश्वर के पास लौट जाए जिसने उसे दिया।" ये पद, सभोपदेशक १२:६-७, विविध प्रकार से अनूदित हैं, और धर्मग्रन्थ-भाष्यकारों के मध्य इसके अर्थ के विषय में सर्वसम्मति का अभाव है। उदाहरणार्थ, मैथ्यू हेनरी का भाष्य कहता है कि सूत्रात्मा केवल 'मेरुरज्जु' को सूचित करता है।https://books.google.com/books?id=c3JAAAAAcAAJ A Commentary Upon the Holy Bible Henry Matthew Scott Thomas Religious Tract Society 1835 3: Job to Salomon's song London 496 सम्बन्धित विषय नियति का रक्त सूत्र सन्दर्भ श्रेणी:यहूदी श्रेणी:यहूदी धर्म के दार्शनिक श्रेणी:यहूदी धर्म श्रेणी:खगोल श्रेणी:खगोल विज्ञान श्रेणी:खगोल विज्ञान का दर्शन