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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

तुलसी (जैन संत)

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File:Acharya tulsi.jpg आचार्य तुलसी तुलसी 1914, वि॰सं॰ 1971, कार्तिक शुक्ल द्वितीया लाडनूं, राजस्थान, भारत yes 1997 06 24, गंगाशहर, राजस्थानhttp://expressindia.indianexpress.com/ie/daily/19970624/17550473.html संग्रहीत प्रति 17 अक्तूबर 2014 https://web.archive.org/web/20140219050026/http://expressindia.indianexpress.com/ie/daily/19970624/17550473.html 19 फ़रवरी 2014 live आचार्य कालूगणी झूमरलाल और वंदना आचार्य कालूगणी लाडनूं, राजस्थान, भारत विक्रम संवत् 1982, पौष कृष्ण पंचमी वि॰सं॰ 1993 भाद्रशुक्ल तृतीया, गंगापुर, भीलवाड़ा वि॰सं॰ 1993 भाद्र V. शुक्ल नवमी, गंगापुर अणुव्रत आंदोलन आचार्य कालूगणी आचार्य महाप्रज्ञ आचार्य तुलसी (२० अक्टूबर १९१४ – २३ जून १९९७) जैन धर्म के श्वेतांबर तेरापंथ के नौवें आचार्य थे। वे अणुव्रत और जैन विश्व भारती विश्वविद्यालय के प्रवर्तक हैं एवं १००+ से भी अधिक पुस्तकों का लेखन किया हैं। सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने अपनी पुस्तक "लिविंग विद पर्पज" में उन्हें विश्व के १५ महान लोगों में शामील किया है। उन्हें भारत के पूर्व राष्ट्रपति वी वी गिरि ने १९७१ में एक कार्यक्रम में "युग-प्रधान" की उपाधि से विभूषित किया। उन्होंने आचार्य महाप्रज्ञ एवं साध्वी कनकप्रभा का विकास करने में महत्वपूर्ण कार्य किया। जन्म और परिवार अणुव्रत अनुशास्ता युगप्रधान आचार्य श्री तुलसी का जन्म १९१४ में कार्तिक शुक्ल द्वितीया को लाडनूं, राजस्थान, भारत में हुआ। उनके पिता का नाम झुमरलाल खट्टड़ और माँ का नाम वंदना था। उन्होंने आठ वर्ष की आयु में विद्यालय जाना आरम्भ किया।Mahapragya Acharya Acharya Tulsi - A Peacemaker Par Excellence आचार्य तुलसी: उत्कृष्टता के साथ शान्तिकर्ता http://www.herenow4u.net/index.php?id=93404 डॉ॰ प्रेमनाथ जैन, बी जैन पब्लिसर्स लिमिटेड 8 सितम्बर 2013 अंग्रेज़ी https://web.archive.org/web/20131224135717/http://www.herenow4u.net/index.php?id=93404 24 दिसंबर 2013 live। उनके पाँच भाई तथा तीन बहनें थी जिन में वे सबसे छोटे थे। उनके बड़े भाई चम्पालालजी पहले ही मुनि बन गए थे। उनके पारिवारिक लोग सहज धर्मानुरागी थे। वंदना जी की विशेष प्रेरणा-स्वरूप घर के सभी बच्चे सत्संग आदि में आया करते थे। उनके मन में बचपन से ही सत्संग व साधु-चर्या के प्रति अनुराग था। अष्टम आचार्य श्री कालूगणी का आगमन लाडनूं मे हुआ। पूज्य श्री कालूगणी के दिव्य प्रवचन तथा व्यक्तित्व ने बालक तुलसी के पूर्व अर्जित संस्कारो को जागृत कर दिया। उनके मन में मुनि-जीवन के प्रति अनुराग उत्पन्न हुआ। सन्दर्भ श्रेणी:जैन आचार्य श्रेणी:1914 में जन्मे लोग श्रेणी:१९९७ में निधन श्रेणी:राजस्थान के लोग