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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

जगन्नाथ पण्डितराज

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पण्डितराज जगन्नाथ जगन्नाथ 1590 भारत 1641 वाराणसी कवि, संस्कृत समालोचक, काव्यशास्त्री, साहित्यकार, वैयाकरण पेरुभट्ट (पिता) लक्ष्मी (माता) लवंगी तन्वंगी ( अनुमानित- अप्रामाणिक) निस्संतान जगन्नाथ पण्डितराज (जन्म : १६वीं शती के अन्तिम चरण में -- मृत्यु : १७वीं शदी के तृतीय चरण में), उच्च कोटि के कवि, समालोचक, साहित्यशास्त्रकार तथा वैयाकरण थे।https://indianexpress.com/article/opinion/columns/gyanvapi-mosque-dispute-kashi-vishwanath-temple-asi-7270802/ Weaponising faith: The Gyanvapi Mosque-Kashi Vishwanath dispute कवि के रूप में उनका स्थान उच्च कोटि के उत्कृष्ट कवियों में कालिदास के अनंतर, कुछ विद्वान् रखते हैं। "रसगंगाधर"कार के रूप में उनके साहित्यशास्त्रीय पांडित्य और उक्त ग्रंथ का पंडितमंडली में बड़ा आदर है। जीवनी पंडितराज जगन्नाथ वेल्लनाटीय कुलोद्भव कश्यप गोत्रीय रेही (पातालभेदी अवटंक के) तैलंग ब्राह्मण, गोदावरी जिलांतर्गत मुंगुडु ग्राम के निवासी थे। उनके उनके पिता का नाम "पेरुभट्ट" (पेरभट्ट) और माता का नाम लक्ष्मी था। नारायण अय्या इनके वंश के मूलपुरुष इनके पितामह थे ! पिता पेरुभट्ट जिनका एक नाम विष्णुअय्या भी लिखा मिलता है 'उत्तर भारतीय आन्ध्र-तैलंग-भट्ट-वंशवृक्ष' (भाग-२) संपादक स्व. पोतकूर्ची कंठमणि शास्त्री और करंजी गोकुलानंद तैलंग द्वारा 'शुद्धाद्वैत वैष्णव वेल्लनाटीय युवक-मंडल', नाथद्वारा से वि. सं. २००७ में प्रकाशित परम विद्वान् थे। उन्होंने ज्ञानेंद्र भिक्षु से "ब्रह्मविद्या", महेंद्र से न्याय और वैशेषिक, खंडदेव से "पूर्वमीमांसा" और शेषवीरेश्वर से महाभाष्य का अध्ययन किया था। वे अनेक विषयों के प्रौढ़ विद्वान् थे। पंडितराज ने अपने पिता से ही अधिकांश शास्त्रों का अध्ययन किया था। शेषवीरेश्वर जगन्नाथ के भी गुरु थे।मशहूर काव्यशास्त्री और कवि पंडितराज जगन्नाथ मुगल बादशाह जहाँगीर के दरबारी थे और उन्हीं के संरक्षण और हौसलाआफजाई में पंडितराज ने ‘पीयूषलहरी’, ‘गंगालहरी’, ‘अमृत लहरी’, ‘लक्ष्मी लहरी’ और काव्यशास्त्र मीमांसा ग्रंथ ‘रसगंगाधर’ लिखा था। औरंज़ेब ने ना तो पंडितराज जगन्नाथ को जलवाया और न उनके लिखे इन ग्रंथों को। ये ग्रंथ अभी भी उपलब्ध हैं। इतना ही नहीं कुछ विद्वान मानते हैं- पंडितराज ने औरंज़ेब के राज्याश्रय में रहते हुए बादशाह की बहन से शादी की और उसका नया नाम 'तन्वंगी' रखा और उस पर संस्कृत में कविता भी लिखी। किम्वदंतियाँ प्रसिद्धि के अनुसार जगन्नाथ, पहले जयपुर में एक विद्यालय के संस्थापक और अध्यापक थे। एक काजी को वाद-विवाद में परास्त करने के कीर्तिश्रवण से प्रभावित दिल्ली सम्राट् ने उन्हें बुलाकर अपना राजपंडित बनाया। "रसगंगाधर" के एक श्लोक में "नूरदीन" के उल्लेख से समझा जाता है नूरुद्दीन मुहम्मद "जहाँगीर" के शासन के अंतिम वर्षों में (17वीं शती के द्वितीय दशक में) वे दिल्ली आए और शाहजहाँ के राज्यकाल तथा दाराशिकोह के वध तक (1659 ई.) वे दिल्लीवल्लभों के पाणिपल्लव की छाया में रहे। मुगल विद्वान युवराज दाराशिकोह के साथ उनकी मैत्री घनिष्ठ थी पर उसकी हत्या के पश्चात् उनका उत्तर-जीवन मथुरा और काशी में में ईश्वरोपासना में बीता। उनके ग्रंथों में न मिलने पर भी उनके नाम से मिलने वाले पद्यों और किंवदंतियों के अनुसार पंडितराज का "लवंगी" नामक कोमलांगी, यवनसुंदरी के साथ प्रेम और शरीर-संबंध हो गया था जो एक मुग़ल दरबारी गायिका/ नर्तकी थी। उससे उनका विधिपूर्वक विवाह हुआ या नहीं, कब और कहाँ उसकी मृत्यु हुई - इस विषय में बहुत सी दंतकथाएँ प्रचलित हैं। इसके अतिरिक्त पंडितराज के संबंध में भी अनेक जनश्रुतियाँ पंडितों में प्रचलित हैं। कहा जाता है कि 'यवन संसर्गदोष' के कारण काशी के पंडितों, विशेषत: उन्हीं के सजातीय अप्पय दीक्षित द्वारा बहिष्कृत और तिरस्कृत होकर उन्होंने ' गंगालहरी' के श्लोकों का उच्चार करते हुए इच्छापूर्वक प्राणत्याग किया। कहीं-कहीं यह भी सुना जाता है कि यवनी लवंगी और पंडितराज - दोनों ने ही गंगा में डूब कर प्राण दे दिए थे। इस प्रकार की लोकप्रचलित दंतकथाओं का कोई ऐतिहासिक-प्रमाण उपलब्ध नहीं है। किसी मुसलमान रमणी से उनका प्रणय-संबंध रहा हो - यह संभव जान पड़ता है। 16वीं शती ई. के अंतिम चरण में संभवत: उनका जन्म हुआ था और 17वीं शती के तृतीय चरण में कदाचित् उनकी मृत्यु हुई। सार्वभौमश्री शाहजहाँ के प्रसाद से उनको "पंडितराज" की उपाधि (सार्वभौम श्री शाहजहाँ प्रसादाधिगतपंडितराज पदवीविराजितेन) अधिगत हुई थी। कश्मीर के रायमुकुंद ने उन्हें "आसफविलास" लिखने का आदेश दिया था। नवाब आसफ खाँ के (जो "नूरजहाँ" के भाई और शाहजहाँ के मंत्री थे) नाम पर उन्होंने उसका निर्माण किया। इससे जान पड़ता है कि शाहजहाँ और आसफ खाँ के साथ वे कश्मीर भी गए थे। साहित्यिक अवदान पंडितराज जगन्नाथ उच्च कोटि के कवि, समालोचक तथा शास्त्रकार थे। कवि के रूप में उनका स्थान उच्च काटि के उत्कृष्ट कवियों में कालिदास के अनंतर- कुछ विद्वान् रखते हैं। उन्होंने यद्यपि महाकाव्य की रचना नहीं की है, तथापि उनकी मुक्तक-कविताओं और स्तोत्रकाव्यों में उत्कर्षमय और उदात्त काव्यशैली का स्वरूप दिखाई देता है। उनकी कविता में प्रसादगुण के साथ-साथ आजप्रधान, समासबहुला रीति भी दिखाई देती है। भावनाओं का ललितगुंफन, भावचित्रों का मुग्धकारी अंकन, शब्दमाधुर्य की झंकार, अलंकारों का प्रसंगसहायक और सौंदर्यबोधक विनियोग, अर्थ में भाव-प्रवणता और बोध-गरिमा तथा पदों के संग्रथन में लालित्य की सर्जना - उनके काव्य में प्रसंगानुसार प्राय: सर्वत्र मिलती है। रीतिकालीन अलंकरणप्रियता और ऊहात्मक कल्पना की उड़ान का भी उनपर प्रभाव था। गद्य और पद्य - दोनों की रचना में उनकी अन्योक्तियों में उत्कृष्ट अलंकरणशैली का प्रयोग मिलता है। कल्पनारंजित होने पर भी उनमें तथ्यमूलक मर्मस्पर्शिता है। उनकी सूक्तियों में जीवन के अनुभव की प्रतिध्वनि है। उनके स्तोत्रों में भक्तिभाव और श्रद्धा की दृढ़ आस्था से उत्पन्न भावगुरुता और तन्मयता मुखरित है। उनके शास्त्रीय विवेचन में शास्त्र के गांभीर्य और नूतन प्रतिभा की दृष्टि दिखाई पड़ती है। सूक्ष्म विश्लेषण, गंभीर मनन-चिंतन और प्रौढ़ पांडित्य, के कारण उनका "रसगंगाधर" अपूर्ण रहने पर भी साहित्यशास्त्र के उत्कृष्टतम ग्रंथों में एक कहा जाता है। वे एक साथ कवि, साहित्यशास्त्रकार और वैयाकरण थे। पर "रसगंगाधर" कार के रूप में उनके साहित्यशास्त्रीय पांडित्य और उक्त ग्रंथ का पंडितमंडली में बड़ा आदर है। प्रमुख रचनाएँ ग्रंथ की प्रौढ़ता से आकृष्ट हो कर साहित्यशास्त्रज्ञ नागेश भट्ट ने "रसगंगाधर" की टीका लिखी थी। स्तोत्र (क) अमृतलहरी (यमुनास्तोत्र), (ख) गंगालहरी (पीयूषलहरी - गंगतामृतलहरी), (ग) करुणालहरी (विष्णुलहरी), (घ) लक्ष्मीलहरी और (ङ) सुधालहरी। प्रशस्तिकाव्य (क) आसफविलास, (ख) प्राणाभरण, और (ग) जगदाभरण। शास्त्रीय रचनाएँ - (क) रसगंगाधर (अपूर्ण सहित्यशास्त्रीय ग्रंथ), (ख) चित्रमीमांसाखंडन (अप्पय दीक्षित की "चित्रमीमांसा" नामक अलंकारग्रंथ की खंडनात्मक आलोचना) (अपूर्ण), (ग) काव्यप्रकाशटीका (मम्मट के "काव्यप्रकाश" की टीका) और (घ) प्रौढ़मनोरमाकुचमर्दन (भट्टोजि दीक्षित के "प्रौढ़मनोरमा" नामक व्याकरण के टीकाग्रंथ का खंडन)। इनके अतिरिक्त उनके गद्य ग्रंथ "यमुनावर्णन" का भी "रसगंगाधर" से संकेत मिलता है। "रसगंगाधर" नाम से सूचित होता है कि इस ग्रंथ में पाँच "आननों" (अध्यायों) की योजना रही होगी। परतु दो हो "आनन" मिलते हैं। "चित्रमीमांसाखंडन" भी अपूर्ण् है। "काव्यप्रकाशटीका" भी प्रकाशित होकर अब तक सामने नहीं आई। सुभाषित - भामिनीविलास (पंडितराज शतक) उनका परम प्रसिद्ध मुक्तक कविताओं का संकलन ग्रंथ है। "नागेश भट्ट" के अनुसार "रसंगगाधर" के लक्षणों का उदाहरण देने के लिए पहले से ही इसकी रचना हुई थी। इसमें चार विलास हैं, प्रथम "प्रस्तावित विलास" में अत्यन्त सुन्दर और ललित अन्योक्तियाँ हैं जिनमें जीवन के अनुभव और ज्ञान का सरस एवं भावमय प्रकाशन है। अन्य "विलास" हैं - शृंगारविलास, करुणविलास और शांतिविलास। सायास अलंकरणशैली का प्रभाव तथा चमत्कारसर्जना की प्रवृत्ति में अभिरुचि रखते हुए भी जगन्नाथ की उक्तियों में रस और भाव की मधुर योजना का समन्वय और संतुलन बराबर वर्तमान है। उनके मत से वाङ्मय में साहित्य, सहित्य में ध्वनि, ध्वनि में रस और रसो में शृंगार का स्थान क्रमश: उच्चतर हैं। पंडितराज न अपने पांडित्य और कवित्व के विषय में जो गर्वोक्तियाँ की हैं वे साधार हैं। ये सचमुच श्रेष्ठ कवि भी है और पंडितराज भी। इन्हें भी देखें रसगंगाधर बाहरी कड़ियाँ हिंदी रसगंगाधर Paṇḍitarāja Jagannātha, the renowned Sanskrit poet of medieval India (Google book; By Narendra Nath Sarma) पण्डितराज जगन्नाथ कृत ‘रसगंगाधर’ का सम्पादन, संशोधन व ‘सरला’ टीका : भट्ट मथुरानाथ शास्त्री (निर्णय सागर प्रेस, मुम्बई, 1939) रसगंगाधर (राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान) The Bhaminivilasa of Panditraja Jagannatha: With a Sanskrit Gloss, Bhushana by Paṇḍitarāja Jagannātha, Bālakṛishṇa Gopāla Bāla , Paṇḍitarāja Mahādeva Sūri समुद्र संगम - 'समुद्र संगम' मुग़ल शहज़ादे दाराशुकोह के गुरु प्रसिद्ध कवि पण्डितराज जगन्नाथ की अद्भुत प्रणय कथा है। इसे भोलाशंकर व्यास ने ऐतिहासिक उपन्यासों की प्रचलित परम्परा से अलग हटकर लिखा है। वैसे तो यह उपन्यास एक आत्मकथा है, किन्तु कुशल कथाकार ने इसे औपन्यासिक रूप देकर इसके माध्यम से उस युग की पूरी कहानी ही कह दी है। सन्दर्भ जगन्नाथ पंडितराज के सन्दर्भ : पठनीय आलेख 4. ‘समुद्र संगम’ मुगल राजकुमार दाराशुकोह के गुरू प्रसिद्ध कवि पण्डितराज जगन्नाथ की आत्मकथा की शैली में भोलाशंकर व्यास का उपन्यास : भारतीय ज्ञानपीठ: [ISBN 8126310847] 5. पण्डितराज जगन्नाथ ग्रन्थावली - प्रथम भाग विमर्शमयी 'बालक्रीडा' हिन्दी व्याख्या सहित : आचार्य मधुसूदन शास्त्री -चौखम्भा संस्कृत सीरीज : 6. पण्डितराज जगन्नाथ शैमुषी समुन्मीलन : मनुलता शर्मा - सम्पूर्णानन्द संस्कृत वि.वि. प्रकाशन 7. गंगालहरी : अंश: 8. आधुनिक संस्कृत काव्यशास्त्र डॉ॰ आनंद कुमार श्रीवास्तव [ISBN 978-81-7854-232-4] 9. अमृतलहरी - जगन्नाथ पण्डितराज[https://web.archive.org/web/20151130163013/http://docs.google.com/viewer? url=http%3A%2F%2Fwww.sanskritworld.in%2Fpublic%2Fassets%2Fbook%2Fbook_523731cca9ddf.txt] 10. प्राणाभरणम्‌ - जगन्नाथ पण्डितराज 11. Paṇḍitarāja Jagannātha mahākaviḥ :Khaṇḍavilli Sūryanārāyaṇaśāstrī Bharateeya Vidya Niketan, 1983 12. भामिनीविलास : जगन्नाथ पण्डितराज : महावीरप्रसाद द्विवेदी द्वारा हिंदी भाषानुवाद : खेमराज श्रीकृष्ण दास द्वारा बम्बई से संवत् 1950 में वेंकटेश्वर प्रेस से प्रकाशित 13. 'दाराशुकोह' : मेवाराम लिखित भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित एक वृहद् उपन्यास 16.https://hi.wikibooks.org/wiki/%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A5%80%E0%A4%AF_%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0_(%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%BF)/%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A5%80%E0%A4%AF_%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0_%E0%A4%95%E0%A5%80_%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%BE#(%E0%A5%A7%E0%A5%AB)%E0%A4%9C%E0%A4%97%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%A5 21.https://www.femina.in/hindi/sahitya/kahani/kahanilawangi-jagannath-1216.html 22. https://www.exoticindiaart.com/book/details/talent-of-pandit-jagannath-nzk413/ श्रेणी:संस्कृत कवि श्रेणी:संस्कृत आचार्य श्रेणी:संस्कृत साहित्य श्रेणी:संस्कृत साहित्यकार श्रेणी:जयपुर के लोग श्रेणी:संस्कृत संपादक श्रेणी:संस्कृत विद्वान श्रेणी:काव्यशास्त्री