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हस्सान इब्न साबित
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हस्सान इब्न साबित حسان بن ثابت حسان بن ثابت.jpg हस्सान इब्न साबित के नाम की इस्लामी कैलीग्राफी लगभग 563 ईसवी यथरिब (मदीना), अरबी प्रायद्वीप लगभग 674 ईसवी (54 हिजरी) मदीना, उमय्यद खिलाफत कवि, सहाबा शास्त्रीय अरबी अरब बनू खज़रज (बनू नज्जार शाखा) इस्लाम (पूर्व में बहुदेववादी) सिरीन बिन्त शामून अब्द अल-रहमान इब्न हस्सान, सईद इब्न अब्द अल-रहमान पैगंबर के कवि (शاعر الرسول - शायर अल-रसूल) Q2315457
हस्सान इब्न साबित (अरबी: حسان بن ثابت; जन्म लगभग 563 ईसवी – निधन 674 ईसवी) प्रारंभिक इस्लाम काल के एक अरबी कवि और इस्लामी पैगंबर मुहम्मद के सहचर (सहाबा) थे। वे मुख्य रूप से इस्लाम के समर्थन और पैगंबर मुहम्मद के पक्ष में रची गई अपनी कविताओं के लिए जाने जाते हैं। इसी कारण ऐतिहासिक ग्रंथों में उन्हें 'पैगंबर का कवि' (शायर अल-रसूल) कहा गया है। उनका संबंध मदीना के खज़रज कबीले से था। इस्लाम स्वीकार करने से पूर्व भी अरब समाज में उनकी पहचान एक कुशल कवि के रूप में थी। इस्लाम अपनाने के बाद, उनकी काव्य रचनाएँ प्रारंभिक मुस्लिम समुदाय के लिए वैचारिक समर्थन का एक प्रमुख माध्यम बन गईं।One or more of the preceding sentences incorporates text from a publication now in the public domain: Thatcher, Griffithes Wheeler (1911). "Ḥassān ibn Thābit". In Chisholm, Hugh (ed.). Encyclopædia Britannica. Vol. 13 (11th ed.). Cambridge University Press. p. 51.
प्रारंभिक जीवन और पृष्ठभूमि
हस्सान इब्न साबित का जन्म इस्लाम के प्रादुर्भाव से कई दशक पहले यथरिब (जिसे बाद में मदीना कहा गया) में हुआ था। उनका संबंध खज़रज कबीले की एक उपशाखा 'बनू नज्जार' से था। इस्लाम-पूर्व युग (जाहिलिया) में, हस्सान अपने कबीले के प्रमुख प्रवक्ता थे। उस समय के अरब समाज में कविता का विशेष सामाजिक और राजनीतिक महत्व था; कवि अपने कबीले के सम्मान का वर्णन करने और विरोधियों का वैचारिक रूप से सामना करने का कार्य करते थे। अपनी युवावस्था में हस्सान ने सीरिया के गस्सानी (Ghassanids) शासकों और अल-हीरा के लखमी राजाओं के दरबारों में समय व्यतीत किया था, जहाँ उनकी काव्य कला को मान्यता प्राप्त हुई थी।https://www.almoajam.org/lists/inner/220 معجم البابطين لشعراء العربية في القرنين التاسع عشر و العشرين -سليم بن حسن اليعقوبي www.almoajam.org ar 2026-03-13 1 जनवरी 2021 https://web.archive.org/web/20210101160527/https://www.almoajam.org/lists/inner/220 dead
इस्लाम स्वीकार करना और कविता का उपयोग
जब पैगंबर मुहम्मद 622 ईसवी में हिजरत (प्रवास) करके मदीना पहुँचे, तब हस्सान की आयु लगभग 60 वर्ष थी। उन्होंने इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया और अपनी काव्य कला का उपयोग नए धर्म के समर्थन में किया। उस कालखंड में मक्का के कुरैश कबीले के कवि पैगंबर मुहम्मद और मुसलमानों के विरुद्ध काव्यात्मक व्यंग्य किया करते थे। हस्सान इब्न साबित ने इन व्यंग्यात्मक कविताओं का उत्तर अपनी रचनाओं के माध्यम से दिया।Thomas Hughes (priest, born 1838) 2025-12-10 https://en.wikipedia.org/w/index.php?title=Thomas_Hughes_(priest,_born_1838)&oldid=1326653526 Wikipedia en 2026-03-13
इस्लामी ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार, पैगंबर मुहम्मद ने हस्सान को मक्का के विरोधियों का काव्यात्मक उत्तर देने की अनुमति दी थी। उस समय के अरब समाज में इन कविताओं का प्रभाव बहुत व्यापक माना जाता था। हस्सान अपनी कविताओं में विरोधियों की वंशावली और उनकी कमजोरियों को लक्षित करते थे, जिससे मदीना के मुस्लिम समुदाय (उम्मा) का मनोबल बढ़ता था।https://referenceworks.brill.com/display/db/eieo Encyclopaedia of Islam New Edition Online Bearman P.J. referenceworks.brill.com 9789004144484 2214-9945 2026-03-13
सैन्य अभियानों में अनुपस्थिति और इफ्क की घटना
यद्यपि हस्सान इब्न साबित इस्लाम के एक प्रमुख वैचारिक समर्थक थे, लेकिन ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार उन्होंने बद्र, उहुद या खंदक (अहज़ाब) जैसे प्रमुख सैन्य युद्धों में शारीरिक रूप से भाग नहीं लिया।https://books.google.co.ls/books?id=pbrjCQAAQBAJ&printsec=copyright#v=onepage&q&f=false The History of al-Ṭabarī Vol. 8: The Victory of Islam: Muhammad at Medina A.D. 626-630/A.H. 5-8 al-Ṭabarī Abū Jaʿfar Muḥammad ibn Jarīr 1997-01-09 SUNY Press 978-0-7914-3150-4 en इतिहासकारों का मानना है कि इसका कारण उनकी अधिक आयु या युद्ध के प्रति उनकी स्वाभाविक असहमति थी। खंदक की लड़ाई के दौरान उन्हें मदीना में महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा के लिए एक निर्दिष्ट स्थान पर रखा गया था।
उनके जीवन से जुड़ी एक प्रमुख ऐतिहासिक घटना 'इफ्क की घटना' (Incident of Ifk) है। इस घटना में हस्सान पैगंबर मुहम्मद की पत्नी आयशा के विरुद्ध फैलाई गई एक अफवाह में शामिल हो गए थे। इसके परिणामस्वरूप उन्हें तत्कालीन इस्लामी कानून के तहत दंडित किया गया था।https://www.islamweb.net/ar/fatwa/140502/%D8%AD%D8%B3%D8%A7%D9%86-%D8%A8%D9%86-%D8%AB%D8%A7%D8%A8%D8%AA-%D8%B9%D9%84%D9%89-%D9%81%D8%B6%D9%84%D9%87-%D9%88%D9%82%D8%B9-%D9%81%D9%8A-%D8%A7%D9%84%D8%A5%D9%81%D9%83-%D9%88%D8%AA%D8%A7%D8%A8-%D9%85%D9%86%D9%87 حسان بن ثابت على فضله وقع في الإفك وتاب منه www.islamweb.net ar https://web.archive.org/web/20191218053245/https://www.islamweb.net/ar/fatwa/140502/%D8%AD%D8%B3%D8%A7%D9%86-%D8%A8%D9%86-%D8%AB%D8%A7%D8%A8%D8%AA-%D8%B9%D9%84%D9%89-%D9%81%D8%B6%D9%84%D9%87-%D9%88%D9%82%D8%B9-%D9%81%D9%8A-%D8%A7%D9%84%D8%A5%D9%81%D9%83-%D9%88%D8%AA%D8%A7%D8%A8-%D9%85%D9%86%D9%87 2019-12-18 2026-03-13 हालाँकि, अभिलेख बताते हैं कि बाद में उन्होंने अपनी इस भूमिका के लिए पश्चाताप व्यक्त किया। ऐतिहासिक स्रोतों से यह भी ज्ञात होता है कि आयशा ने बाद में उन्हें क्षमा कर दिया था, क्योंकि वे इस्लाम के प्रारंभिक काल में किए गए उनके काव्य योगदान को मानती थीं।http://archive.org/details/al-isabah-fi-tamiz-al-sahaba-al-ibn-hajar-ashqalani-jild-1 Al Isabah fi tamyiz al Sahabah - Imam Ibn Hajar Asqalani 1995-04-01 201http://kingoflinks.net/Mkhalfoon/4Aysha/18Ifq/3.htm ( حمنة بنت جحش ) kingoflinks.net 2026-03-13
परिवार और अंतिम जीवन
हस्सान का विवाह 'सिरीन बिन्त शामून' नामक एक कॉप्टिक ईसाई महिला से हुआ था। सिरीन को मिस्र के शासक अल-मुकौकिस ने पैगंबर मुहम्मद के पास भेजा था और वे मारिया अल-किब्तिया की बहन थीं। हस्सान और सिरीन के पुत्र का नाम 'अब्द अल-रहमान इब्न हस्सान' था, जिन्होंने अपने पिता के नक्शेकदम पर चलते हुए कविता के क्षेत्र में ख्याति प्राप्त की।https://books.google.co.in/books?id=uewo1Q8_vZwC&dq=%D8%AA%D8%A7%D8%B1%D9%8A%D8%AE+%D9%88%D9%81%D8%A7%D8%A9+%D8%AD%D8%B3%D8%A7%D9%86+%D8%A7%D8%A8%D9%86+%D8%AB%D8%A7%D8%A8%D8%AA+%D9%81%D9%8A+%D8%B9%D9%87%D8%AF+%D8%AE%D9%84%D8%A7%D9%81%D8%A9&pg=PT103&redir_esc=y#v=onepage&q&f=false أسد الغابة - باب الحاء IslamKotob IslamKotob ar
अरब इतिहासकारों के अनुसार, हस्सान इब्न साबित ने लगभग 120 वर्ष का एक लंबा जीवन व्यतीत किया (60 वर्ष इस्लाम से पूर्व और 60 वर्ष इस्लाम स्वीकार करने के बाद)। आयु के अंतिम पड़ाव में उनके नेत्रों की दृष्टि चली गई थी। उमय्यद खलीफा मुआविया प्रथम के शासनकाल के दौरान, लगभग 674 ईसवी (54 हिजरी) में मदीना में उनका निधन हो गया।http://library.islamweb.net/newlibrary/showalam.php?ids=144 نسخة محفوظة library.islamweb.net 2026-03-13
सन्दर्भ
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