411 REFERENCE · Wikipedia
क्रैटिलस (संवाद)
Reference material by Wikipedia contributors. This retains its source identity and is not 411 news reporting.
क्रैटिलस (संवाद) प्लेटो प्राचीन यूनानी एथेंस (प्राचीन यूनान) भाषा का दर्शन, ज्ञानमीमांसा, व्युत्पत्ति सुकराती संवाद 5वीं शताब्दी ईसा पूर्व (लगभग 422 ईसा पूर्व)
क्रैटिलस (Cratylus, Κρατύλος) प्राचीन यूनानी दार्शनिक प्लेटो (Plato) द्वारा रचित एक महत्वपूर्ण संवाद है। यह पश्चिमी दर्शन के इतिहास में 'भाषा के दर्शन' पर लिखा गया पहला प्रमुख ग्रंथ माना जाता है। इस संवाद में सुकरात और दो अन्य पात्रों—क्रैटिलस और हर्मोजेनीज़-के बीच इस बात पर बहस होती है कि शब्दों या नामों का अर्थ कैसे तय होता है: क्या वे स्वाभाविक रूप से अपनी वस्तुओं से जुड़े होते हैं, या वे केवल मानव परंपरा का परिणाम हैं?Sedley David Plato's Cratylus Cambridge University Press 2003 978-0521584920 15-25Plato's Cratylusअगस्त 2026 InternetArchiveBot Plato's Cratylus: Argument, Form, and Structure
संवाद का मुख्य विवाद नामों की उत्पत्ति को लेकर दो विरोधी विचारधाराओं के बीच है:
हर्मोजेनीज़ का परंपरावाद
हर्मोजेनीज़ तर्क देता है कि शब्दों और उनके अर्थों के बीच कोई प्राकृतिक संबंध नहीं है। उसके अनुसार, नाम केवल 'परंपरा' और सामाजिक समझौते का परिणाम हैं। यदि समाज किसी वस्तु को एक नाम से पुकारने का निर्णय लेता है, तो वह सही है, और यदि वे इसे बदलना चाहें, तो नया नाम भी उतना ही सही होगा। भाषा पूरी तरह से मनमानी है।
इसके विपरीत, क्रैटिलस (जो दार्शनिक हेराक्लिटस का अनुयायी है) तर्क देता है कि प्रत्येक वस्तु का एक स्वाभाविक और सही नाम होता है जो उसकी 'प्रकृति' को दर्शाता है। यदि कोई नाम वस्तु के वास्तविक स्वरूप को व्यक्त नहीं करता है, तो वह वास्तव में कोई नाम ही नहीं है, बल्कि केवल एक निरर्थक ध्वनि है।Barney Rachel Names and Nature in Plato's Cratylus Routledge 2001 978-0415939317 45-55
सुकरात मध्यस्थ की भूमिका निभाते हैं और दोनों चरम विचारों का परीक्षण करते हैं। वे एक 'नाम-निर्माता' की अवधारणा प्रस्तुत करते हैं। सुकरात कहते हैं कि जिस प्रकार बढ़ई लकड़ी काटने के लिए एक उपकरण बनाता है, उसी प्रकार नाम-निर्माता वास्तविकता को विभाजित करने और एक-दूसरे को सिखाने के लिए शब्दों को 'उपकरण' के रूप में गढ़ता है।
सुकरात हर्मोजेनीज़ को गलत साबित करने के लिए यूनानी शब्दों की लंबी और चंचल व्युत्पत्ति का खेल खेलते हैं। वे दिखाते हैं कि कैसे विशिष्ट ध्वनियाँ (जैसे 'र' या Rho) गति को दर्शाती हैं, जबकि अन्य ध्वनियाँ (जैसे 'ल' या Lambda) चिकनाई को दर्शाती हैं। इससे वे यह सिद्ध करते हैं कि नाम पूरी तरह से मनमाने नहीं हैं।Reeve C. D. C. Plato: Cratylus (Translation and Introduction) Hackett Publishing 1998 978-0872204164 xxi-xxx
संवाद के अंतिम भाग में, सुकरात क्रैटिलस के विचारों की आलोचना करते हैं। क्रैटिलस का मानना था कि दुनिया निरंतर परिवर्तन या प्रवाह में है, और भाषा इस गतिशीलता को पकड़ने का प्रयास करती है।
सुकरात तर्क देते हैं कि यदि हर चीज़ हर समय बदल रही है, तो ज्ञान असंभव हो जाएगा, क्योंकि जिस क्षण आप किसी चीज़ को जानेंगे, वह बदल चुकी होगी। इसलिए, परिवर्तनशील भौतिक दुनिया के परे सत्य और ज्ञान के शाश्वत रूप होने चाहिए।
अंततः, सुकरात निष्कर्ष निकालते हैं कि शब्दों का अध्ययन करके सत्य तक नहीं पहुँचा जा सकता है। शब्दों के चित्र अक्सर दोषपूर्ण होते हैं। सच्चा दार्शनिक शब्दों के बजाय वस्तुओं का स्वयं अध्ययन करता है।
सन्दर्भ
बाहरी कड़ियाँ
प्रोजेक्ट गुटेनबर्ग पर क्रैटिलस
श्रेणी:ज्ञानमीमांसा