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महाभारत की विस्तृत कथा
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विकिपीडिया के लिए किसी कथा को प्रतिलिपि करना रखने योग्य लेख नहीं। विकिपीडिया:पृष्ठ हटाने हेतु चर्चा/लेख/महाभारत की विस्तृत कथा महाभारत की सम्पूर्ण कथा महर्षि वेदव्यास संस्कृत प्राचीन भारत महाकाव्य, इतिहास धर्म, कर्म, युद्ध, दर्शन
महाभारत के रचयता महर्षि वेद व्यास हैं। यह कथा 6 भागों में विभाजित है, जिनमें महाभारत के 18 पर्व लिखे गये हैं। महाभारत की यह कथा एक महाकाव्य है जिसे वेद व्यास ने भगवान गणेश से लिखवाया था। यहाँ महाभारत की संपूर्ण कथा विस्तृत रूप मे दी गयी है, जिसमे केवल मुख्य किरदारों की कहानियाँ कही गयी है। सभी पात्रों की कथा जानने के लिए मूल ग्रंथ को पढ़ें। यह गीताप्रेस-गोरखपुर द्वारा उत्पादित महाभारत के 6 भागों के आधार पर कथा लिखी गयी है।
A_Battle_Scene_from_Mahabharata,_Late_18th_century_CE,_Datia_Style,_Rajasthani_School_of_Art,_Himachal_State_Museum,_Shimla |thumb| महाभारत का युद्ध
महाभारत भाग - 1
महाभारत भाग - 1 (आदिपर्व और सभापर्व) 1999 गीताप्रेस-गोरपखपुर दिल्ली
आदिपर्व और सभापर्व
महाभारत में कई सारी कथाएँ दी गयी हैं, जिनमे से मुख्य पात्रों की कथाएँ यहाँ लिखी गयी हैं।
दुश्यंत - शकुंतला
महाराज दुष्यंत हस्तिनापुर के चक्रवर्ती राजा थे। वे एक दिन शिकार खेलते हुए कर्णव मुनि के आश्रम पहुँचे। वहाँ उन्होंने एक अति सुंदर स्त्री को देखा जिनका नाम शकुंतला था। पूछने पर उन्हें पता चला की शकुंतला महर्षि विश्वामित्र और स्वर्ग लोक की अप्सरा मेनका की पुत्री हैं। जिस समय विश्वामित्र कठोर तपस्या कर रहे थे उस समय, इंद्र को यह आभास हुआ की वे तपस्या करके इंद्रासन मांग लेंगे। इसीलिए इंद्र ने विश्वामित्र की तपस्या भंग करने के लिए मेनका को भेजा मेनका उनकी तपस्या भंग करने में सफल हुईं परंतु, इसके परिणाम स्वरूप, विश्वामित्र ने उनके साथ समागम करा, जिससे शकुंतला का जन्म हुआ। अपनी गलती का एहसास होने पर विश्वामित्र ने शकुंतला का त्याग करके फिर तपस्या मे लीन हो गये। मेनका, शकुंतला को वन में छोड़ के स्वर्ग चली गयी। शकुंतला की रक्षा शकुं पक्षियों ने करी। जब शकुंतला कर्णव ऋषि को मिली तब, उन्होंने शकुं पक्षियों द्वारा रक्षित होने के कारण उनका नाम शकुंतला रखा और अपने आश्रम ले आये। तबसे शकुंतला उनके आश्रम में ही निवास करने लगी।
Raja_Ravi_Varma_-_Mahabharata_-_Shakuntala |thumb|राजा रवि वर्मा द्वारा बनाया गया चित्र, शकुंतला अपने प्रेमी को देखने के लिए, पैर से काँटा निकालने का नाटक कर रही हैं
महाराज दुष्यंत उन्हे देख के मोहित हो गए और उनसे विवाह करने का प्रस्ताव रखा। कर्णव ऋषि की आज्ञा से दोनों का विवाह संपन्न हुआ। दुष्यंत तबसे वहीं रहने लगे। दुष्यंत को ढूंढते हुए उनके सैनिक एक दिन वहाँ आ पहुंचे, तब राजा ने शकुंतला को निशानी स्वरूप एक मुद्रिका दी। एक दिन ऋषि दुर्वासा उनके आश्रम पधारे, उस समय शकुंतला महाराज के ख्यालों में खोयी हुई थी, इसीलिए ऋषि पर उनका ध्यान नही गया। जिससे क्रोधित हो, दुर्वासा ने उन्हे श्राप दिया की जिसके विचारों में तुम खोयी ही, वो तुम्हे भूल जाये। शकुंतला की सखियों ने जब उन्हे बताया की ये महाराज दुष्यंत की पत्नी हैं और गर्भवती हैं, तब महर्षि ने उनसे कहा की जब वे उनकी कोई चीज उन्हें दिखायेंगी तब उन्हे सब याद आ जायेगा।
कुछ समय बाद, शकुंतला ने महाराज दुष्यंत के पुत्र भरत को जन्म दिया। कर्णव ऋषि की आज्ञा से शकुंतला अपनी सखियों के साथ राजमहल गयी। रास्ते मे, महाराज की दी हुई मुद्रिका नदी में गिर गयी और उसे मछली ने निगल लिया। जब वे राजमहल पहुंचे तब महाराज ने उन्हे नही पहचाना, जब उन्होंने प्रमाण के लिए मुद्रिका दिखानी चाहि, तब उन्हे पता चला मुद्रिका खो गयी है। दुखी होकर वे सभी आश्रम लौट गए। बाद में एक मचुवारे को मछली के उदर से मुद्रिका मिली जिसे उसने महाराज को लौटा दिया। उस मुद्रिका को देखते ही उन्हे सब कुछ याद आ गया और वो महारानी शकुंतला को वापस लाने आश्रम गये।
शांतनु, गंगा और सत्यवती
कई वर्ष बीत जाने के बाद जब महाराज भरत को अपने 9 पुत्रों में से युवराज बनाने योग्य कोई भी नज़र ना आया। तब उन्होंने अपने राज्य से किसी साधारण व्यक्ति को युवराज बनाया उनकी योग्यता के बल पर।
Santanu,_a_king_of_Hastinapura_in_the_Mahabharata,_saw_a_beautiful_woman_on_the_banks_of_the_river_Ganga |thumb|शांतनु और गंगा
समय के साथ साथ शकुंतला और भरत की मृत्यु के बाद शांतनु राजा बने, जो महाराज प्रतीप के पुत्र थे। एक दिन वे शिकार खेलने गंगा किनारे गये, जहाँ उन्हे गंगा स्त्री के सुंदर रूप में नज़र आयी। विवाह का प्रस्ताव रखने पर, गंगा ने शर्त रखी की वे उनसे कभी ये नही पूछेगे की वो ऐसा क्यों कर रही हैं। जिसपे शांतनु ने हाँमी भरके गंगा से विवाह किया। गंगा ने अपने 7 पुत्रों को नदी में डुबा के मार डाला। 8वें पुत्र को मारने से पहले ही शांतनु ने उनसे पूछ लिया तुम यह क्यों कर रही हो।
जिसके बाद गंगा ने उन्हें बताया की यह 8 पुत्र पूर्व जन्म मे वसु थे। जिन्हे ब्रम्हा ने श्राप दिया था। उनके श्राप की मुक्ति के लिए गंगा ने उन्हे वचन दिया था, कि वे उन्हें जन्म देते ही मार देंगी। क्योंकि महाराज ने अपना वचन तोड़ दिया था, इसीलिए गंगा उनके 8वें पुत्र को लेकर चली गयीं।
Raja_Ravi_Varma,_Ganga_and_Shantanu_(1890)|thumb|left|राजा रवि वर्मा द्वारा बनाई गयी चित्र, गंगा शांतनु के 8वें पुत्र को ले जा रही हैं
16 - 17 साल बाद गंगा ने महाराज शांतनु का पुत्र, देवव्रत, उन्हे लौटा दिया। देवव्रत को महर्षि वशिष्ठ, परशुराम और शुक्राचार्य ने शिक्षा दी थी। देवव्रत को पाके महाराज अति प्रसन्न हुए और उन्हें युवराज बना दिया। परंतु पूर्व जन्म में देवव्रत को ब्रम्हा ने श्राप दिया था, इसीलिए उनका जीवन कठिनाइयों से कम नही होने वाला था। ब्रम्हा के उस श्राप का असर कुछ ही माह में दिखने लगा।
एक दिन शांतनु और देवव्रत ने यमुना नदी के पास शिकार खेलते हुए डेरा डाला। देवव्रत तो लौट आये, परंतु शांतनु नदी किनारे चले गए जहाँ उनहें मचुवारे दशराज की पुत्री सत्यवती दिखी जिससे उन्हें प्रेम हो गया। जब उन्होंने विवाह का प्रस्ताव रखा तब सत्यवती उन्हें अपने घर ले गयी, वहाँ उनके पिता ने शांतनु को बताया की उनकी पुत्री की भाग्य रेखा के अनुसार, उसका पुत्र ही राजा बनेगा। परंतु शांतनु देवव्रत को युवराज बना चुके थे इसीलिए उन्होंने यह स्वीकार करने से मना कर दिया। महाराज जब दुखी रहने लगे, तब देवव्रत ने उनके सारथी से सत्य पूछा तब उन्हें भी सब पता चल गया।
Ravi_Varma-Shantanu_and_Satyavati|thumb|राजा रवि वर्मा द्वारा बनाया गया चित्र, शांतनु और सत्यवती
उसी रात देवव्रत, सत्यवती के घर गए वहाँ उन्होने प्रतिज्ञा ली की वे कभी राजा नहीं बनेंगे और आजीवन ब्रामहाचार्य का पालन करेंगे। उनकी इस प्रतिज्ञा से ही उनका नाम भीष्म हुआ और उनके पिता ने उन्हे इच्छा मृत्यु का वरदान दिया। भीष्म ने यह शपथ ली की जब तक वे हस्तिनापुर के राज सिंहासन को सुरक्षित हाथों में नही देख लेते तब तक प्राण नहीं त्यगेंगे। अपने पुत्र के इस त्याग से हर समय दुखी रहने से शांतनु की मृत्यु हो गयी। मृत्यू से पहले सत्यवती से उनके 2 पुत्र हुए थे - चित्रांगद और विचित्रवीर्य।
धृतराष्ट्र, पांडु और विदुर
शांतनु की मृत्यु के बाद, चित्रांगद को राजा बनाया गया, जो चित्रांगद नाम वाले गंधर्व के हाथों मारे गये। उनके बाद विचित्रवीर्य को राजा बनाया गया। विचित्रवीर्य का विवाह काशी के महाराज की 2 पुत्री - अंबिका और अंबालिका से हुआ। नि: संतान विचित्रवीर्य की मृत्यु के कारण सिंहासन पे खतरा आ गया। तब सत्यवती ने अपने मानस पुत्र वेद व्यास को बुलवाया जो महर्षि पराशर के और सत्यवती के पुत्र थे। उन्होंने दोनों रानियों के साथ समागम किया। अंबिका उन्हें देख के डर गयी और अपनी आँखें बंद कर ली। जिससे उन्हें नेत्रहीन पुत्र हुआ जिसका नाम रखा गया धृतराष्ट्र।
अंबालिका बहुत डर गयी थी, जिससे उसके बहुत कमजोर पुत्र हुआ जिसका नाम रखा गया पांडु। तीसरी बार दोनों इतना डरी हुई थी की उन्होंने अपनी दासी को भेज दिया। दासी महर्षि से डरी नहीं जिसे उनका एक स्वस्थ और बुद्धिमान पुत्र हुआ जिसका नाम विदुर रखा गया। उन तीनों को भीष्म ने ही शिक्षा प्रदान की।
धृतराष्ट्र और पांडु का विवाह
धृतराष्ट्र बड़े थे किंतु अंधे थे इसीलिए उनके स्थान पर पांडु राजा बने। जिससे धृतराष्ट्र के मन में इर्षया का भाव उत्पन्न हुआ।
भीष्म ने धृतराष्ट्र का विवाह, गंधार राज्य के राजा सुबल की पुत्री गांधारी से करवाया। अंधे व्यक्ति से विवाह होने के कारण गांधारी ने अपनी आँखों पर पट्टी बांध ली। यह सब देख के गांधारी के दुष्ट भाई शकुनि ने शपथ ली की वह कुरुकुल का विनाश कर देगा।
Gandhari_with_maids |thumb|गांधारी अपनी दसियों के साथ
महाराज पांडु का विवाह श्री कृष्ण की बुआ, कुंती से हुआ। और बाद मे उनका दूसरा विवाह मद्र राज शल्य की बहन माद्री से भी हुआ।
धृतराष्ट्र का राजतिलक और पांडु का वन गमन
एक बार पांडु अपनी दोनों पत्नियों के साथ वन में घूमने गए, शिकार के दौरान पांडु ने बाघ की ध्वनि सुनके शब्द भेदी तीर चलाया, परंतु असल में, बाघ के रूप मे एक ऋषि अपनी पत्नी के साथ समागम कर रहे थे, जिस से उन दोनों ऋषि दंपति की मृत्यु हो गयी बिना संतान के। मरते समय ऋषि ने पांडु को श्राप दिया की वह जब समागम करेगा तब उसकी भी मृत्यु हो जायेगी।
इस पाप के पश्चताप के लिए पांडु और उनकी दोनों पत्नियाँ उनके साथ वन चली गयी। पांडु अपना राज्य धृतराष्ट्र को धरोहर स्वरूप सौंप कर चले गये। जिसे धृतराष्ट्र को बहुत खुशी हुई।
पांडवों और कौरवों का जन्म
वन मे कुंती को एक पुराना दृश्य याद आया। जब वह छोटी थी, तब ऋषि दुर्वासा ने उनकी सेवा से प्रसन्न होकर उन्हे मंत्र दिया था। उस मंत्र के निरीक्षण के लिए कुंती ने सूर्य देव को बुला लिया। उन्हे विश्वास नहीं था की वे आयेंगे परंतु वे आ गये। कुंती के बार बार मना करने पर भी वे उन्हे कुछ दिये बिना जाना नहीं चाहते थे। इसीलिए उन्होंने कुंती को एक पुत्र दिया जो कवच कुंडल से सुशोभित था, जिसका नाम था कर्ण। विवाह से पूर्व ही बालक हो जाने से, कुंती ने कर्ण को, नदी में छोड़ दिया। बाद में वो बालक धृतराष्ट्र के सारथी अधिरथ को मिला, जिसका पालन पोषण करने हेतु उसने महल आने से इंकार कर दिया और अपनी जगह संजय को सारथी बनाया।
कुंती ने उसी मंत्र के प्रयोग से, धर्मराज से युधिष्ठिर, वायु देव से भीम, इंद्र देव से अर्जुन माँगा। उन्होंने यह मंत्र माद्री को भी दिया जिससे उन्होंने अश्विनी कुमार से जुड़वा पुत्र प्राप्त किये जिनका नाम नकुल और सहदेव था।
वहीं गांधारी 2 वर्ष से गर्भवती थी। बाद मे उसने खुद ही अपना गर्भ गिर दिया। उसके गर्भ से माँस का लोथरा निकला। उसे वेद व्यास ने ठंडे पानी से धुलवा कर, 100 घड़ों मे घी डालके रखवा दिया। गंधारी को एक पुत्री भी चाहिए थी, इसीलिए 1 घड़े मे पुत्री उत्पन्न हुई। कुछ समय बाद घड़ों को खोला गया। जिसे सबसे पहले खोला गया वह सबसे बड़ा भाई हुआ दुर्योधन, उसके बाद दुःशासन, इस प्रकार उनके 99 पुत्र और 1 पुत्री हुई जिसका नाम था दुशाला। महाराज धृतराष्ट्र ने दासी से एक और पुत्र उत्पन्न किया, युयुत्सु। इस प्रकार उनके 100 पुत्र और 1 पुत्री हुई, परंतु सभी युधिष्ठिर से छोटे थे और धृतराष्ट्र चाहते थे की उनका बेटा राजा बने, जो अब असंभव था।
पांडु की मृत्यु और पांडवों का हस्तिनापुर आगमन
एक दिन पांडु का मन विचलित हो गया और उन्होंने माद्री साथ समागम करना चाहा, उसी समय उनकी मृत्यु हो गयी। पांडु की मृत्यु का कारण माद्री ने खुद को माना और पांडु के साथ सती हो गयी। इसके बाद वन मे रहने वाले मुनियों ने कुंती और पांडवों को वापस हस्तिनापुर भेजने का निर्णय किया। युधिष्ठिर की आयु उस समय केवल 16 वर्ष थी।
पांडवों के वापस लौटने से धृतराष्ट्र की चिंता बढ़ गयी क्योंकि अब उन्हें युधिष्ठिर को युवराज बनाना पड़ेगा। पांडवों के वापस आने के बाद, वेद व्यास सत्यवती, अंबिका और अंबालिका को अपने साथ वन ले गए ये कह कर की अब यहाँ जो होने वाला है वो आपसे देखा नहीं जायेगा। कुछ समय बाद उन तीनों की भी मृत्यु को गयी। सभी के दबाव मे आकर धृतराष्ट्र ने युधिष्ठिर को युवराज बना दिया।
पांडवों की शिक्षा और दुर्योधन के षड्यंत्र
पांडव और कौरव एक बार जब क्रीड़ा कर रहे थे तब उनकी गेंद कुएँ में गिर गयी। उनकी गेंद निकालने एक तेजस्वी ऋषि आये। उन्होंने सरकंडे की डंडियों से गेंद बाहर निकाल दी। उनसे जब पांडवों ने उनका परिचय पूछा तब उन्होंने भीष्म से पूछने को कहा। भीष्म को अर्जुन ने सारा प्रसंग बताया। ये सारा प्रसंग सुन कर भीष्म समझ गये कि वे ऋषि भारद्वाज के पुत्र, कृपी के पति, उनके कुल गुरु कृपाचर्य के बेनोइ, महर्षि द्रोणाचार्य थे। बाद में द्रोणाचार्य ने पांडवों और कौरवों को अपना शिष्य स्वीकार किया। शिक्षा के समय सभी बालक गुरुकुल में रहते थे। शकुनि ने दुर्योधन और दुःशासन को पांडवों के खिलाफ बहुत भड़काया था। दुर्योधन ने भीम को खीर मे विष देकर गंगा में फेंक दिया। परंतु भीम नागलोक पहुँच गए, और साँपो से लड़के जीवित हो गए। वहाँ उन्होंने एक रस पिया जिसके एक कटोरे से 100 हाथियों का बल मिलता था। भीम ने 100 कटोरे पिये, जिससे उनमे 10000 हाथियों का बल आ गया।
पांडवों का कर्ण से शत्रु रूप में मिलना
पांडव और कौरव अब बड़े हो चुके थे। उनकी शस्त्र विद्या पूरी हो चुकी थी। रंगभूमि में वे सभी अपनी कला का प्रदर्शन करने पहुंचे। भीम और दुर्योधन ने गदा चलायी। नकुल और सहदेव ने तलवार, युधिष्ठिर ने भाला और अर्जुन ने धनुष। अर्जुन जैसा धनुर्धर कोई नहीं था, इसीलिए द्रोणाचार्य का पुत्र अश्वत्थामा भी उनसे जलता था। अर्जुन के प्रदर्शन के दौरान वहाँ कर्ण भी आया, परंतु नीच जाती का समझकर उसे युद्ध नहीं करने दिया गया। कर्ण अर्जुन को हरा सकता है ये सोचकर दुर्योधन ने कर्ण को अंगदेश का राजा बनाके अपना मित्र बना लिया।
लाक्षाग्रह का अग्निकांड और द्रौपदी स्वयंवर
पांडवों को मारने के लिए शकुनि मामा के सहयोग से दुर्योधन ने वार्नाव्रत नामक नगर में लाख का महल बनवाया, और पांडवों को कुंती सहित वहाँ भेज दिया। विदुर को दुर्योधन की इस चाल के बारे में पता चल गया था। इसीलिए उन्होंने अपने गुप्तचरों से एक सुरंग खुदवायी और युधिष्ठिर को सूचना दे दी। लाक्षाग्रह के अग्निकांड में वे बच गये और सुरंग से बाहर निकल गये। परंतु हस्तिनापुर में विदुर के अलावा सभी को लगा वे सभी जल चुके हैं। वे सभी वन मे भटक रहे थे, उसी समय भीम ने हिडिंब नाम के राक्षस को मार दिया। उसे मार के कुंती की आज्ञा से उसकी बहन हिडिंबा से विवाह कर लिया। जिससे उनका एक पुत्र हुआ जिसका नाम था घटोत्कच।
The_Palace_of_the_Pandava_Brothers_Set |thumb|left|लाक्षाग्रह का अग्निकांड
वे सभी एक्चक्रा नगरी में छिप के रह रहे थे। वहाँ भीम ने बकासुर नाम के राक्षस का वध किया। जिससे उनकी पहचान सामने आ सकती थी। इसीलिए वे ब्राह्मण बनके दूसरे नगर में रहने लगे।
वहाँ उन्हे पता चला की द्रुपद नाम के राजा अपनी पुत्री द्रौपदी का स्वयंवर कर रहे हैं। पांडव भी वहाँ पहुँचे, यहीं से महाभारत मे श्री कृष्ण का कार्य शुरू होता है। अर्जुन ने स्वयंवर में द्रौपदी को जीतके अपनी माता से कहा हम भिक्षा ले आये और उनकी माता ने कहा आपस में बाँट लो। इसीलिए द्रौपदी का विवाह पाँचों पांडवों से हुआ।
thumb|द्रोपदी स्वयंवर
द्रौपदी के जन्म का रहस्य और इंद्रप्रस्थ
द्रौपदी का जन्म सामान्य मनुष्य की तरह नहीं हुआ था। राजा द्रुपद ने द्रोणाचार्य से बदला लेने के लिए यज्ञ किया था। यज्ञ की अग्नि से पहले धृष्टद्युम्न और फिर द्रौपदी का प्रादुर्भाव हुआ। अग्नि से उत्पन्न होने के कारण उन्हें 'याज्ञसेनी' भी कहा जाता है। कृष्णा वर्ण होने से उनका एक नाम कृष्णा भी था।
पौराणिक कथा के अनुसार द्रौपदी पूर्व जन्म में एक ऋषि कन्या थी, जिसका नाम नलायनी था। उसने शिव को प्रसन्न करने के लिए तपस्या कर पति प्राप्ति का वर मांगा, और उतावलेपन में पाँच बार 'पति दे दो' कह दिया। शिव ने वर दिया कि अगले जन्म में तुम्हें पाँच पति प्राप्त होंगे। वही कन्या अगले जन्म में द्रौपदी के रूप में जन्मी और पाँच पांडवों की पत्नी बनी।
लाक्षागृह से बचने और द्रौपदी स्वयंवर के बाद पांडवों को हस्तिनापुर में आधा राज्य दिया गया। धृतराष्ट्र ने उन्हें खांडवप्रस्थ का बंजर क्षेत्र दिया। श्रीकृष्ण की प्रेरणा से पांडवों ने विश्वकर्मा के पुत्र मयासुर की सहायता से उस बंजर भूमि पर एक भव्य नगर बसाया। इस नगर का नाम इन्द्रप्रस्थ रखा गया, जो इन्द्र की नगरी अमरावती जैसा सुंदर था। यहीं मयसभा का निर्माण हुआ था।
राजसूय यज्ञ और दुर्योधन का अपमान
पांडवों ने इंद्रप्रस्थ को समृद्ध बनाने के बाद राजसूय यज्ञ करने का निर्णय लिया, ताकि युधिष्ठिर को सम्राट के रूप में मान्यता मिल सके। यज्ञ से पहले चारों पांडवों ने चारों दिशाओं में दिग्विजय किया। अर्जुन ने उत्तर, भीम ने पूर्व, सहदेव ने दक्षिण और नकुल ने पश्चिम दिशा के राजाओं को पराजित कर कर वसूला। यज्ञ सभा में सबसे पहले किसकी पूजा (अग्रपूजा) की जाए, इस पर निर्णय होना था। भीष्म ने श्रीकृष्ण को अग्रपूजा के योग्य बताया। इससे शिशुपाल क्रोधित हो गया, क्योंकि वह कृष्ण का बुआ का बेटा होते हुए भी उनका घोर विरोधी था। शिशुपाल ने कृष्ण को सभा में 100 गालियाँ दीं। कृष्ण ने अपनी माता (शिशुपाल की माँ) को वचन दिया था कि वे उसकी 100 भूलें क्षमा कर देंगे। 100 गालियाँ पूरी होते ही कृष्ण ने सुदर्शन चक्र से शिशुपाल का वध कर दिया। शिशुपाल के वध के बाद यज्ञ निर्विघ्न सम्पन्न हुआ और युधिष्ठिर चक्रवर्ती सम्राट घोषित हुए।
राजसूय यज्ञ में सभी कौरवों को आमंत्रित किया गया था। इंद्रप्रस्थ की मयसभा बहुत मायावी थी, जहाँ कई बार जल में स्थल और स्थल में जल का भ्रम होता था। एक बार दुर्योधन सभा में घूम रहा था, तो वह एक ऐसी जगह पर जहाँ जल था, उसे स्थल समझ कर गिर पड़ा। इस घटना के समय द्रौपदी वहाँ उपस्थित थी। महाभारत के अनुसार द्रौपदी को हँसी आ गयी। दुर्योधन ने इस हँसी और अपमान को अपना सबसे बड़ा अपमान माना। वह लज्जित होकर हस्तिनापुर लौटा और इसी अपमान का बदला लेने के लिए उसने शकुनि के साथ मिलकर द्यूत क्रीड़ा की योजना बनाई।
Arjunasubhadra2 |thumb|अर्जुन और सुभद्रा
द्यूत क्रीडा और द्रौपदी का चीर हरण
दुर्योधन इंद्रप्रस्थ के वैभव और अपने अपमान से जल रहा था। शकुनि ने उसे कहा कि पांडवों को युद्ध में हराना कठिन है, लेकिन युधिष्ठिर की जुए की कमजोरी से उन्हें हराया जा सकता है। धृतराष्ट्र ने दुर्योधन के कहने पर हस्तिनापुर में एक भव्य सभा का आयोजन किया और युधिष्ठिर को जुए के लिए आमंत्रित किया। विदुर और भीष्म ने इसका विरोध किया, पर धृतराष्ट्र नहीं माने। शकुनि दुर्योधन की तरफ से पासे फेंक रहा था, क्योंकि वह पासों में निपुण था। युधिष्ठिर एक-एक करके सब कुछ हारते गए -पहले अपना धन, रत्न, सोना, फिर अपना राज्य इंद्रप्रस्थ, फिर अपने चारों भाई, फिर स्वयं को
और अंत में द्रौपदी को भी दांव पर लगा दिया और हार गए। इस प्रकार पाँचों पांडव और द्रौपदी दास बन गए।
द्रौपदी को दासी घोषित करने के बाद दुर्योधन ने उसे सभा में लाने का आदेश दिया। दुशासन द्रौपदी को बालों से खींचकर भरी सभा में ले आया। उस समय द्रौपदी एक ही वस्त्र में थी। सभा में दुर्योधन ने द्रौपदी को अपनी जंघा पर बैठने को कहा। भीम ने तभी प्रतिज्ञा ली कि वह युद्ध में दुर्योधन की जंघा तोड़ेगा। दुर्योधन के कहने पर दुशासन ने द्रौपदी का वस्त्र खींचना शुरू किया। द्रौपदी ने पहले सभा में उपस्थित भीष्म, द्रोण, धृतराष्ट्र सभी से रक्षा की गुहार लगाई, पर कोई आगे नहीं आया। अंत में उसने श्रीकृष्ण का स्मरण किया। कथा के अनुसार श्रीकृष्ण की कृपा से द्रौपदी का चीर बढ़ता गया। दुशासन खींचते-खींचते थक कर गिर पड़ा, पर चीर समाप्त नहीं हुआ। सभा में सभी इस चमत्कार से स्तब्ध रह गए।
The_Graet_Gambling_Scene_of_the_Mahabharata,_Albert_Hall_Museum,_Jaipur |thumb|द्रौपदी के चीर हरण को दर्शता एक चित्र
इस घटना से क्रोधित होकर भीम ने दो भीषण प्रतिज्ञाएँ लीं - वह दुशासन के सीने का खून पिएगा और वह दुर्योधन की जंघा तोड़ेगा।
इसके बाद धृतराष्ट्र डर गए और उन्होंने द्रौपदी को तीन वर मांगने को कहा। द्रौपदी ने पहला वर युधिष्ठिर सहित पाँचों पांडवों की दासता से मुक्ति और दूसरा वर उनका राज्य वापस मांगा। धृतराष्ट्र को वर देने पड़े।
द्वितीय द्यूत क्रीडा और पांडवों का वन गमन
पहली द्यूत क्रीड़ा में धृतराष्ट्र ने डर कर पांडवों को सब कुछ वापस दे दिया था। पांडव इंद्रप्रस्थ लौटने लगे। पर शकुनि और दुर्योधन इससे संतुष्ट नहीं थे। उन्होंने धृतराष्ट्र को समझाया कि पांडव बदला जरूर लेंगे। उन्होंने एक और बार युधिष्ठिर को जुए के लिए बुलाया, इस बार शर्त अलग थी। जो पक्ष हारेगा, उसे 12 वर्ष वनवास और 1 वर्ष अज्ञातवास भोगना होगा। यदि अज्ञातवास में पहचान लिए गए, तो फिर से 12 वर्ष वनवास। युधिष्ठिर ने फिर से निमंत्रण स्वीकार कर लिया और फिर से शकुनि से हार गए। इस प्रकार पांडवों को 13 वर्ष के लिए राज्य छोड़ना पड़ा पांडव मुनियों के वस्त्र पहन कर द्रौपदी के साथ हस्तिनापुर से निकले। उनके साथ बहुत से ब्राह्मण और प्रजा भी रोते हुए कुछ दूर तक गई। विदुर ने पांडवों को विदा किया और धृतराष्ट्र को समझाने की बहुत कोशिश की, पर धृतराष्ट्र पुत्र-मोह में अंधे थे।
महाभारत भाग - 2
महाभारत भाग - 2 (वनपर्व और विराटपर्व) 2000 गीताप्रेस-गोरपखपुर दिल्ली
वनपर्व और विराटपर्व
इन दोनों पर्वों में पांडवों के वनवास की संपूर्ण कथा लिखी गयी है।
वनवास के पहले 5 वर्ष
द्वितीय द्यूत के तुरंत बाद पांडव वल्कल वस्त्र पहन कर काम्यक वन में आए। रास्ते में काम्यक वन में भीम ने किर्मीर नामक राक्षस का वध किया, जो बकासुर का भाई था। द्वारका से श्रीकृष्ण, द्रौपदी के भाई धृष्टद्युम्न और पांडवों के पुरोहित धौम्य उनसे मिलने आए। द्रौपदी ने कृष्ण के सामने सभा में हुए अपमान का स्मरण कर विलाप किया। कृष्ण ने प्रतिज्ञा ली - "जिन्होंने तुम्हें रुलाया है, वे अपनी स्त्रियों को रुलाते हुए मारे जाएंगे।" इसके बाद वहाँ बृह्दश्व ऋषि आये जिन्होंने उन्हें नल-दमयन्ती की कथा सुनाई।मार्कण्डेय ऋषि ने युधिष्ठिर को सांत्वना देने के लिए रामायण की कथा, सत्यवान-सावित्री की कथा और हरिश्चंद्र की कथा सुनाई। व्यास जी की सलाह पर पांडव द्वैतवन चले गए। यहीं व्यास जी ने युधिष्ठिर को प्रतिस्मृति विद्या दी ताकि वे अकेले में धर्म का चिंतन कर सकें।
देवर्षि नारद और व्यास के कहने पर तय हुआ कि अर्जुन दिव्यास्त्र प्राप्त करने जाएंगे। इंद्र के सारथी मातलि के कहने पर अर्जुन हिमालय में इन्द्रकील पर्वत पर कठोर तपस्या करने गए। बाकी चार पांडव और द्रौपदी द्वैतवन में ही रुके। तीसरा वर्ष अर्जुन की तपस्या का था, पांडवों ने उसकी प्रतीक्षा में बिताया।
अर्जुन की तपस्या से प्रसन्न होकर शिव किरात के वेश में आए। एक सूअर (मूक दानव) को लेकर अर्जुन और किरात में युद्ध हुआ। अंत में शिव ने अपना वास्तविक रूप दिखाया और अर्जुन को पाशुपतास्त्र प्रदान किया।
इसके बाद मातलि रथ लेकर आए और अर्जुन को स्वर्ग ले गए। स्वर्ग में अर्जुन ने इंद्र से वज्र आदि दिव्यास्त्र और गंधर्व चित्रसेन से नृत्य-संगीत सीखा। इसी दौरान उर्वशी ने अर्जुन पर मोहित होकर प्रणय प्रस्ताव रखा, जिसे ठुकराने पर उर्वशी ने उसे 1 वर्ष नपुंसक रहने का शाप दिया, जो आगे अज्ञातवास में वरदान बना।
इधर पृथ्वी पर पांडव तीर्थयात्रा पर निकल पड़े। अर्जुन के बिना 4 पांडव और द्रौपदी लोमश ऋषि के साथ भारत के सभी तीर्थों पर गए। नैमिषारण्य, गया, प्रयाग और काशी गंधमादन पर्वत पर द्रौपदी ने सौगंधिक पुष्प (कमल) देखा। उसे लाने भीम गए तो रास्ते में एक बूढ़े वानर ने रास्ता रोक लिया। वह वानर कोई और नहीं, भीम के बड़े भाई हनुमान जी थे। हनुमान ने भीम का घमंड तोड़ा और वर दिया कि युद्ध में वे अर्जुन के रथ की ध्वजा पर विराजमान रहेंगे। इसी दौरान जटासुर नामक राक्षस ने द्रौपदी, युधिष्ठिर, नकुल, सहदेव का अपहरण कर लिया। भीम ने उसका वध किया।
5वें वर्ष के अंत में अर्जुन सभी दिव्यास्त्र लेकर द्वैतवन लौट आए। उन्होंने युधिष्ठिर को सभी अस्त्र दिखाए। इसी समय जयद्रथ द्वारा द्रौपदी हरण की घटना हुई। जयद्रथ ने अकेली द्रौपदी को देख कर उसका अपहरण किया। भीम और अर्जुन ने उसका पीछा कर उसे पकड़ लिया। युधिष्ठिर के कहने पर उसे गंजा करके छोड़ दिया गया, पर अपमानित जयद्रथ ने शिव की तपस्या कर वर मांगा कि वह एक दिन पांडवों को रोकेगा - यही वर आगे अभिमन्यु वध का कारण बना।
अगले 5 वर्ष
दुर्योधन को सूचना मिली कि पांडव द्वैतवन में दुखी जीवन जी रहे हैं। उन्हें अपनी समृद्धि दिखाने के लिए वह कर्ण और शकुनि के साथ विशाल सेना लेकर द्वैतवन में *घोषयात्रा* (पशुओं की गिनती के बहाने) पर गया। वहाँ पास के सरोवर में गंधर्व राज चित्रसेन (जो अर्जुन के मित्र थे) विहार कर रहे थे। कर्ण और दुर्योधन का गंधर्वों से युद्ध हुआ। कर्ण हार कर भाग गया और गंधर्वों ने दुर्योधन, दुशासन और कौरव स्त्रियों को बंदी बना लिया। द्वैतवन में हाहाकार मचा। कौरवों के कुछ सैनिक युधिष्ठिर के पास आए और मदद मांगी। युधिष्ठिर ने कहा - "हम में आपस में भेद है, पर दूसरों के सामने हम 105 हैं।" युधिष्ठिर के आदेश पर अर्जुन ने गंधर्वों से युद्ध कर चित्रसेन को हराया और दुर्योधन को मुक्त करवाया। इससे दुर्योधन इतना लज्जित हुआ कि उसने प्राण त्यागने के लिए अनशन शुरू कर दिया। तब दानवों ने उसे पाताल ले जाकर समझाया कि वे उसकी मदद करेंगे।
युधिष्ठिर ने एक विचित्र स्वप्न देखा - द्वैतवन के मृग उनसे कह रहे हैं कि "हम बहुत कम बचे हैं, आप कहीं और चले जाइए, नहीं तो भीम हमें मार कर समाप्त कर देंगे।" इस स्वप्न के बाद पांडव द्वैतवन छोड़कर फिर से काम्यक वन लौट आए। पांडवों के पुरोहित धौम्य ने उन्हें सूर्य की उपासना और धर्म का उपदेश दिया।
श्रीकृष्ण और सत्यभामा पांडवों से मिलने काम्यक वन आए।
यहीं प्रसिद्ध द्रौपदी-सत्यभामा संवाद हुआ। सत्यभामा ने द्रौपदी से पूछा कि तुम पाँच पतियों को कैसे वश में रखती हो? द्रौपदी ने उत्तर दिया - "मैं किसी मंत्र-टोटके से नहीं, बल्कि सेवा, प्रेम, नम्रता और पतिव्रत धर्म से उन्हें प्रसन्न रखती हूँ। मैं कभी उनकी इच्छा के विरुद्ध कुछ नहीं करती।"
दुर्योधन ने दुर्वासा ऋषि को पांडवों के पास भेजा, ताकि वे पांडवों को शाप दे दें। योजना यह थी कि दुर्वासा को तब भेजा जाए जब द्रौपदी का *अक्षय पात्र* (सूर्य ने दिया था, जिससे दिन में एक बार अन्न समाप्त होने तक भोजन मिलता था) खाली हो चुका हो। दुर्वासा 10,000 शिष्यों के साथ संध्या समय पहुंचे। द्रौपदी का पात्र खाली हो चुका था। युधिष्ठिर ने उन्हें स्नान करके आने को कहा और अंदर द्रौपदी चिंता में कृष्ण को पुकारने लगी। तभी श्रीकृष्ण प्रकट हुए और कहा - "कुछ खाने को दो।" द्रौपदी ने कहा पात्र खाली है, केवल एक चावल का दाना चिपका है। कृष्ण ने वही खा लिया और तृप्ति की डकार ली। उधर नदी में स्नान कर रहे दुर्वासा और उनके सभी शिष्यों का पेट अचानक भर गया। वे बिना कुछ कहे वहाँ से चले गए। इस प्रकार कृष्ण ने फिर से द्रौपदी की लाज बचाई।
इधर हस्तिनापुर में कर्ण ने अकेले ही सभी राजाओं को जीत कर दुर्योधन को चक्रवर्ती बनाने के लिए *दिग्विजय* की। उसने पूरे भारत पर विजय प्राप्त की और दुर्योधन को सम्राट घोषित करवाया। वन में पांडवों ने यह समाचार सुना। युधिष्ठिर को चिंता हुई, पर भीम ने कहा - "कर्ण क्या है, अर्जुन अकेले ही सब अस्त्रों से उसे हरा देंगे।" 10वें वर्ष तक पांडव अब तप और तीर्थों से और अधिक शक्तिशाली और विनम्र हो चुके थे।
11वां वर्ष
इस वर्ष पांडव फिर से द्वैतवन से काम्यक वन में आ गए थे। यहीं बहुत से ऋषि-मुनि उनसे मिलने आते रहे। मार्कण्डेय ऋषि ने इस वर्ष युधिष्ठिर को भविष्य के कलियुग का वर्णन सुनाया और वामन अवतार, परशुराम, मत्स्य अवतार की कथाएँ सुनाईं। द्रौपदी का मनोबल बढ़ाने के लिए कृष्ण बार-बार आते रहे। इसी अंतिम समय में इंद्र ने सोचा - कर्ण के पास कवच-कुंडल हैं तो अर्जुन उसे मार नहीं पाएगा। इंद्र ब्राह्मण के वेश में कर्ण के पास गए और उससे उसके जन्मजात कवच-कुंडल दान में मांग लिए। कर्ण ने जानते हुए भी कि ये इंद्र हैं, अपना कवच-कुंडल शरीर से काट कर दे दिया। इसके बदले इंद्र ने उसे एक बार चलने वाला वासवी शक्ति नामक अमोघ अस्त्र दिया, जो कर्ण ने बाद में घटोत्कच पर चलाया।
वर्ष 12 - यक्ष प्रश्न - वनवास का अंतिम पड़ाव
12वां वर्ष समाप्त होने वाला था। पांडव काम्यक वन में ही थे। एक दिन एक ब्राह्मण का अरणी (यज्ञ की लकड़ी) एक हिरण के सींग में फंस गया और हिरण भाग गया। ब्राह्मण मदद के लिए पांडवों के पास आया। चारों भाई हिरण को खोजते-खोजते थक गए और प्यास से व्याकुल हो गए। पास में एक जलाशय दिखा। युधिष्ठिर ने क्रमशः नकुल, सहदेव, अर्जुन और भीम को पानी लाने भेजा। वहाँ एक यक्ष (वास्तव में धर्मराज) ने कहा - "पहले मेरे प्रश्नों का उत्तर दो, फिर पानी पियो।" चारों ने यक्ष की बात अनसुनी कर पानी पीने की कोशिश की और मूर्छित होकर गिर पड़े। अंत में युधिष्ठिर स्वयं गए। यक्ष ने उन्हें रोका और 100 से अधिक प्रश्न पूछे।
युधिष्ठिर के उत्तरों से प्रसन्न होकर यक्ष ने अपना असली रूप - धर्मराज प्रकट किया। उन्होंने कहा - "मैं तुम्हारे पिता धर्म हूँ, तुम्हारी परीक्षा ले रहा था।"
वरदान के रूप में युधिष्ठिर ने अपने चारों भाइयों को जीवित करवा लिया और धर्मराज ने उन्हें वर दिया कि उनका 13वां वर्ष का अज्ञातवास निर्विघ्न बीतेगा, कोई उन्हें पहचान नहीं पाएगा। इसी के साथ 12 वर्ष का वनवास समाप्त हुआ और पांडव अज्ञातवास के लिए विराट नगरी की ओर निकल पड़े।
13वां वर्ष, अज्ञातवास
12 वर्ष वनवास के बाद पांडवों के सामने शर्त थी - 1 वर्ष ऐसा अज्ञातवास कि कोई पहचान न सके, पहचान लिए गए तो फिर 12 वर्ष वनवास। युधिष्ठिर ने तय किया कि मत्स्य देश के राजा विराट के यहाँ रहा जाए, क्योंकि विराट राजा धर्मात्मा हैं और दुर्योधन के शत्रु हैं। धौम्य ऋषि ने उन्हें विराट नगरी में कैसे रहना है, इसका उपदेश दिया। फिर पांडवों ने अपने अस्त्र-शस्त्रों को एक शमी के पेड़ पर एक शव की पोटली में बाँध कर छुपा दिया, ताकि कोई देखे तो लगे कि कोई मरा हुआ है। उस पेड़ पर श्मशान की रक्षा करने वाला भूत रहता था, इसलिए कोई उधर जाता नहीं था।
युधिष्ठिर - कंक: ब्राह्मण के वेश में राजा विराट के सभा में जुआरी और सलाहकार बने। वे पासों के खेल में निपुण थे।
भीम - वल्लभ: रसोइया बने। नाम रखा बल्लभ। रसोई के साथ-साथ वे पहलवान भी थे और विराट के पहलवानों को हराते थे।
अर्जुन - बृहन्नला: उर्वशी के शाप का उपयोग किया। नपुंसक के वेश में स्त्रियों के वस्त्र पहन कर राजकुमारी उत्तरा को नृत्य-संगीत सिखाने लगे। नाम बृहन्नला।
नकुल - ग्रंथिक: घोड़ों की देखभाल करने वाले। अश्वशाला के अध्यक्ष।
सहदेव - तंतिपाल: गायों की देखभाल करने वाले। गोशाला के अध्यक्ष।
द्रौपदी - सैरंध्री: महारानी सुदेष्णा की दासी बनी। बाल संवारने वाली सेविका।
कीचक वध
विराट का साला कीचक बहुत शक्तिशाली सेनापति था। उसने सैरंध्री (द्रौपदी) को देखा और उस पर मोहित हो गया। उसने सुदेष्णा से द्रौपदी को अपने महल में भेजने को कहा।
द्रौपदी ने युधिष्ठिर और भीम को बताया, पर युधिष्ठिर ने कहा अभी समय नहीं है, सहन करो। अंत में द्रौपदी ने भीम से प्रार्थना की। भीम ने कहा - "रात को नृत्यशाला में उसे मिलने बुला।" रात को कीचक सज-धज कर नृत्यशाला में आया, वहाँ अंधेरे में भीम बैठा था। भीम ने कीचक को इतनी बुरी तरह मारा कि उसका मांस का लोथड़ा बना दिया, हड्डियाँ चूर कर दीं और उसे हाथ-पैर समेट कर एक गोले जैसा बना दिया।
Raja_Ravi_Varma,_Keechaka_and_Sairandhri,_Oleograph|thumb|राजा रवि वर्मा द्वारा बनाया गया चित्र, कीचक और सैरेन्धरी
कीचक के मरने की खबर सुनकर उसके 105 भाई (उपकीचक) आए और बोले - इसी सैरंध्री के कारण हमारा भाई मरा, इसे कीचक के साथ जला दो। उन्होंने द्रौपदी को पकड़ कर चिता की ओर खींचा। द्रौपदी ने भीम को पुकारा। भीम पेड़ उखाड़ कर दौड़ा और सभी 105 उपकीचकों को मार डाला। इससे विराट नगरी में डर फैल गया कि सैरंध्री के पीछे कोई गंधर्व है।
कौरवों द्वारा विराट पर आक्रमण
कीचक के मरने की खबर हस्तिनापुर पहुंची। दुर्योधन समझ गया कि कीचक को केवल भीम ही मार सकता है, इसका अर्थ पांडव विराट में ही हैं। पांडवों को ढूंढने और विराट की गायों को लूटने के लिए कौरवों ने दो तरफ से आक्रमण किया। सुशर्मा ने एक तरफ से और दुर्योधन, भीष्म, द्रोण, कर्ण, अश्वत्थामा ने दूसरी तरफ से। पहले दिन विराट राजा सुशर्मा से युद्ध करने चले गए और बंदी बन गए। भीम ने उन्हें छुड़ाया। दूसरे दिन कौरवों ने विराट की सारी गायें हरण कर लीं। नगरी में केवल राजकुमार *उत्तर* बचा था। उत्तर डरपोक था। द्रौपदी ने कहा - बृहन्नला सारथी का अच्छा काम जानती है, इसे ले जाओ।
बृहन्नला के रूप में अर्जुन का युद्ध
उत्तर बृहन्नला को लेकर युद्धभूमि में गया, पर कौरवों की विशाल सेना देख कर डर गया और रथ से कूद कर भागने लगा। अर्जुन ने उसे पकड़ा और कहा - "तू रथ संभाल, मैं युद्ध करता हूँ।" अर्जुन उत्तर को शमी के पेड़ के पास ले गया, जहाँ उनके अस्त्र रखे थे। अर्जुन ने बृहन्नला का वेश उतारा और अपना गाण्डीव धनुष निकाला। फिर अकेले अर्जुन ने पूरी कौरव सेना को हरा दिया। उसने भीष्म, द्रोण, कर्ण, अश्वत्थामा सभी को सम्मोहन अस्त्र से मूर्छित कर दिया और विराट की सारी गायें वापस ले आए। उत्तर कुमार ने लौट कर कहा कि मैंने युद्ध जीता है, पर बाद में सच्चाई बता दी।
इसी के साथ अज्ञातवास के 13 वर्ष पूरे हुए। पांडव विराट राजा के सामने अपने असली रूप में प्रकट हो गए। विराट ने अपनी पुत्री उत्तरा का विवाह अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु से कर दिया।
महाभारत भाग - 3
महाभारत भाग - 3 (उद्योगपर्व और भीष्मपर्व) 2000 गीताप्रेस-गोरपखपुर दिल्ली
उद्योगपर्व और भीष्मपर्व
इन पर्वों में युद्ध रोकने की कोशिश होती है। परंतु नकाम होने पर महाभारत का युद्ध शुरू हो जाता है। उद्योग पर्व महाभारत का सबसे बड़ा पर्व है। इसमें युद्ध से पहले की सारी राजनीति है।
अभिमन्यु-उत्तरा विवाह और सभा
अज्ञातवास समाप्त होने पर विराट नगरी में अभिमन्यु और उत्तरा का विवाह हुआ। इस विवाह में कृष्ण, बलराम, सात्यकी, द्रुपद, सभी राजा आए। यहीं तय हुआ कि अब पांडवों को अपना राज्य वापस मांगना चाहिए। द्रुपद के पुरोहित को हस्तिनापुर शांति प्रस्ताव लेकर भेजा गया, पर दुर्योधन ने मना कर दिया।
कृष्ण की द्वारका में - अर्जुन और दुर्योधन
दोनों पक्ष सेना इकट्ठा करने लगे। दुर्योधन और अर्जुन दोनों कृष्ण के पास मदद मांगने द्वारका गए। दुर्योधन पहले पहुंचा और सिर के पास बैठ गया, अर्जुन बाद में आया और पैरों के पास बैठ गया। कृष्ण ने आँख खोल कर पहले अर्जुन को देखा। कृष्ण ने कहा - एक तरफ मैं अकेला, निहत्था रहूंगा, दूसरी तरफ मेरी पूरी नारायण सेना। अर्जुन ने निहत्थे कृष्ण को माँगा और दुर्योधन ने नारायण सेना ले ली।
शांति दूत - श्रीकृष्ण का हस्तिनापुर जाना
Sri_Krishna_as_Envoy |thumb|शांतिदूत श्री कृष्ण
युद्ध टालने के लिए युधिष्ठिर की प्रार्थना पर कृष्ण स्वयं शांति दूत बन कर हस्तिनापुर गए। सभा में उन्होंने कहा - "पांडवों को केवल 5 गाँव दे दो - अविस्थल, वृकस्थल, माकंदी, वारणावत और पाँचवाँ कोई भी।" इस पर दुर्योधन ने कहा - "सूच्यग्रं नैव दास्यामि बिना युद्धेन केशव" - हे केशव, बिना युद्ध के मैं सुई की नोक के बराबर भूमि भी नहीं दूँगा। दुर्योधन ने कृष्ण को बंदी बनाने की कोशिश की, तब कृष्ण ने अपना विराट रूप दिखाया।
कर्ण-कृष्ण संवाद और विदुर-भीष्म का विरोध
लौटते समय कृष्ण ने कर्ण को बताया कि वह कुंती का सबसे बड़ा पुत्र है, वह पांडवों की ओर आ जाए। कर्ण ने मना कर दिया और कहा - दुर्योधन मेरा मित्र है, मैं उसे धोखा नहीं दूंगा। सके बाद दोनों पक्ष कुरुक्षेत्र पहुँचे।
युद्ध के पहले 10 दिन
कुरुक्षेत्र में 18 दिन युद्ध चला। भीष्म पर्व में पहले 10 दिन का वर्णन है। भीष्म कौरवों के सेनापति थे। भीष्म ने युद्ध के नियम बनवाए - दिन में ही युद्ध होगा, निहत्थे पर वार नहीं होगा, बराबर वाले से ही युद्ध होगा। पहले दिन जब अर्जुन ने अपने सामने भीष्म, द्रोण, अपने भाइयों को देखा तो उसका गाण्डीव गिर गया। वह बोला मैं युद्ध नहीं करूंगा। तब रणभूमि में ही कृष्ण ने उसे भगवद्गीता का उपदेश दिया - कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग।
10 दिन का युद्ध
भीष्म 10 दिन तक अकेले ही पांडव सेना का संहार करते रहे। रोज 10 हजार सैनिक मारते। पांडवों में हाहाकार मच गया। पहले दिन - अभिमन्यु ने भीष्म को रोका। दूसरे-तीसरे दिन - भीम और अर्जुन ने भीष्म से घोर युद्ध किया, पर कोई हरा नहीं पाया। 9वें दिन युधिष्ठिर रो पड़े और कृष्ण क्रोधित होकर रथ का पहिया उठा कर भीष्म को मारने दौड़े, अर्जुन ने रोक लिया। अंत में कृष्ण ने उपाय बताया - शिखंडी को सामने रखो, क्योंकि भीष्म शिखंडी को स्त्री मानते हैं [पूर्व जन्म में अम्बा (अंबिका और अंबालिका की बड़ी बहन)] और उस पर बाण नहीं चलाएंगे।
Krishna_attacks_Bhishma|thumb|left|श्री कृष्ण का भीष्म पर हमला
10वें दिन अर्जुन ने शिखंडी को आगे रखा। भीष्म ने शस्त्र नीचे रख दिए। अर्जुन ने हजारों बाण मार कर भीष्म को बाणों की शैय्या पर गिरा दिया। भीष्म इच्छा-मृत्यु के वरदान के कारण मरे नहीं, बाणों की शैय्या पर लेटे रहे और उत्तरायण आने तक 58 दिन तक वहीं से सबको उपदेश देते रहे। भीष्म के गिरने के बाद कौरवों ने द्रोण को सेनापति बनाया।
महाभारत भाग - 4
महाभारत भाग - 4 (द्रोणपर्व, कर्णपर्व, शल्यपर्व, सौप्तिकपर्व और स्त्रीपर्व) 2000 गीताप्रेस-गोरपखपुर दिल्ली
द्रोणपर्व, कर्णपर्व, शल्यपर्व, सौप्तिकपर्व और स्त्रीपर्व
इन पर्वों में महाभारत युद्ध की संपूर्ण कथा समाप्त होती है।
युद्ध के 11वें से 15वें दिन तक
भीष्म के गिरने के बाद द्रोण सेनापति बने। उन्होंने युधिष्ठिर को जीवित पकड़ने की प्रतिज्ञा ली, पर अर्जुन ने बचा लिया।
द्रोण ने चक्रव्यूह बनाया। अर्जुन को सुशर्मा दूर ले गया था। चक्रव्यूह तोड़ना केवल अर्जुन और अभिमन्यु जानते थे।
16 साल के अभिमन्यु ने कहा मैं अंदर घुसना जानता हूँ। वह घुसा, पर जयद्रथ ने बाकी पांडवों को अंदर नहीं आने दिया। अंदर अकेले अभिमन्यु ने कोहराम मचा दिया - कर्ण के भाई, दुर्योधन के बेटे लक्ष्मण, शल्य के भाई सब मारे। अंत में 7 महारथियों ने मिलकर नियम तोड़ कर निहत्थे अभिमन्यु को मार डाला।
अर्जुन ने प्रतिज्ञा ली - कल सूर्यास्त तक जयद्रथ नहीं मारा तो आत्मदाह कर लूंगा। अगले दिन कौरवों ने जयद्रथ को सेना के पीछे छुपा दिया। कृष्ण ने माया से सूर्य को ढक दिया, जयद्रथ हँसते हुए बाहर आया, तब कृष्ण ने माया हटाई और अर्जुन ने जयद्रथ का सिर काट कर उसके पिता की गोद में गिरा दिया।
द्रोण ने विराट और द्रुपद को मार दिया। रात में भीम का पुत्र घटोत्कच राक्षस रूप में कौरव सेना को कुचलने लगा। दुर्योधन के कहने पर कर्ण को अपनी इंद्र से मिली *वासवी शक्ति* अर्जुन के लिए बचाई हुई थी, पर घटोत्कच पर चलानी पड़ी। घटोत्कच वीरगति को प्राप्त हुआ।
द्रोण को रोकना असंभव था। कृष्ण ने उपाय बताया। भीम ने अश्वत्थामा नाम के हाथी को मार कर चिल्लाया - अश्वत्थामा मारा गया। युधिष्ठिर ने धीरे से कहा - "नरो वा कुंजरो वा"। पुत्र शोक में द्रोण ने हथियार छोड़ दिए। द्रुपद के पुत्र धृष्टद्युम्न ने उनका वध कर दिया।
16वां और 17वां दिन
कर्ण सेनापति बना। भीम ने दुशासन की छाती फाड़ कर खून पिया और द्रौपदी के अपमान का बदला लिया। सहदेव ने शकुनि को मारने की तैयारी की। दोनों में महायुद्ध हुआ। कर्ण के रथ का पहिया शाप के कारण धरती में धंस गया। वह पहिया निकालने लगा और धर्म की दुहाई दी। परंतु अर्जुन ने कर्ण को मार दिया।
18वां दिन - अंतिम दिन
शल्य सेनापति बने। युधिष्ठिर ने शल्य को मार दिया। सहदेव ने शकुनि को मार दिया। सेना खत्म होने पर दुर्योधन भाग कर द्वैपायन सरोवर में छुप गया। भीम ने उसे ललकारा। फिर भीम और दुर्योधन में गदा युद्ध हुआ। कृष्ण के इशारे पर भीम ने दुर्योधन की जांघ तोड़ दी, क्योंकि भीम ने प्रतिज्ञा ली थी।
युद्ध की रात
दुर्योधन मरणासन्न पड़ा था। अश्वत्थामा, कृपाचार्य, कृतवर्मा उससे मिले। बदला लेने के लिए अश्वत्थामा ने रात में सोते हुए पांडव शिविर पर हमला किया। उसने द्रौपदी के पाँचों बेटों को पांडव समझ कर मार दिया। फिर उसने ब्रह्मास्त्र चलाया और उत्तरा के गर्भ को नष्ट करने की कोशिश की। कृष्ण ने गर्भ में परीक्षित की रक्षा की और अश्वत्थामा की मणि छीन कर उसे 3000 साल भटकने का शाप दिया।
युद्ध के परिणाम
गांधारी, धृतराष्ट्र, कुंती कुरुक्षेत्र आईं। लाशों को देख कर विलाप हुआ। यहीं गांधारी ने क्रोध में कृष्ण को शाप दिया - "जैसे मेरा वंश नष्ट हुआ, वैसे तेरा यदुवंश भी आपस में लड़ कर नष्ट होगा।"
महाभारत भाग - 5
महाभारत भाग - 5 (शांतिपर्व और अनुशासनपर्व) 2001 गीताप्रेस-गोरपखपुर दिल्ली
शांतिपर्व और अनुशासनपर्व
ये दोनों पर्व महाभारत के दो सबसे बड़े और सबसे ज्ञान वाले पर्व हैं। युद्ध खत्म, भीष्म बाणों की शैय्या पर हैं, उत्तरायण का इंतजार कर रहे हैं। युधिष्ठिर राजा तो बन गए पर बहुत दुखी हैं - "मेरे कारण सब मर गए"। कृष्ण उन्हें भीष्म के पास ले जाते हैं।
शांति पर्व में बताया गया है की राजा कैसे बनना है और जीवन का सच क्या है।
अनुशासन पर्व में बताया गया है कि दान कैसे देना है और भगवान को कैसे याद करना है।
Draupadi_and_Pandavas|thumb|left|पांडव संग द्रौपदी
माघ शुक्ल अष्टमी को उत्तरायण शुरू होते ही भीष्म अपनी इच्छा से प्राण त्याग देते हैं। देवता पुष्प बरसाते हैं।
महाभारत भाग - 6
महाभारत भाग - 6 (आश्वमेधिकपर्व, आश्रमवासिकपर्व, मौसलपर्व, महाप्रस्थानिकपर्व और स्वर्गारोहणपर्व) 2001 गीताप्रेस-गोरपखपुर दिल्ली
आश्वमेधिकपर्व, आश्रमवासिकपर्व, मौसलपर्व, महाप्रस्थानिकपर्व और स्वर्गारोहणपर्व
युद्ध के बाद क्या हुआ, इनमें यह बताया गया है।
युधिष्ठिर का अश्वमेधयज्ञ
युद्ध से पाप को धोने के लिए कृष्ण के कहने पर युधिष्ठिर ने अश्वमेध यज्ञ किया। घोड़ा छोड़ा गया, अर्जुन उसकी रक्षा में चला। रास्ते में अर्जुन का युद्ध त्रिगर्तों से हुआ, फिर मणिपुर में उसके ही बेटे बभ्रुवाहन ने अर्जुन को हरा कर मार दिया। फिर नागकन्या उलूपी लाई हुई नागमणि से अर्जुन जीवित हुआ। अंत में यज्ञ हुआ और यहीं अनुगीता का उपदेश कृष्ण ने अर्जुन को फिर से दिया, क्योंकि अर्जुन गीता भूल गया था।
बड़ों की मृत्यु
15 साल तक युधिष्ठिर ने राज किया। फिर धृतराष्ट्र, गांधारी, कुंती और विदुर बोले - अब हम वन जाएंगे। वे कुरुक्षेत्र के पास आश्रम में रहने लगे। एक दिन पांडव उनसे मिलने गए, तभी जंगल में आग लग गई। धृतराष्ट्र, गांधारी और कुंती उसी आग में बैठ कर शरीर त्याग देती हैं। विदुर पहले ही तपस्या में देह छोड़ चुके थे। संजय बच कर युधिष्ठिर को खबर देता है।
यदुवंश का नाश
गांधारी के शाप के 36 साल बाद। प्रभास तीर्थ पर सारे यादव नशे में आपस में लड़ पड़े। ऋषियों के शाप से समुद्र किनारे उगी *एरका घास* वज्र के मूसल बन गई। उसी घास से मार-मार कर कृष्ण के सामने ही सब यदुवंशी मर गए - सात्यकी, कृतवर्मा, प्रद्युम्न सब। बलराम जी ने समुद्र किनारे योग समाधि ले ली, उनके मुंह से शेषनाग निकला। अकेले बचे कृष्ण एक पेड़ के नीचे लेटे थे, तभी जरा नाम के शिकारी ने उनके पैर में हिरण समझ कर तीर मार दिया। कृष्ण ने देह त्याग दी।
पांडवों की अंतिम यात्रा
कृष्ण की मृत्यु सुन कर पांडवों को वैराग्य हो गया। उन्होंने अभिमन्यु के बेटे परीक्षित को राजा बनाया और द्रौपदी के साथ हिमालय की ओर चल दिए। इसे महाप्रस्थान कहते हैं - जीते जी शरीर छोड़ने की यात्रा। रास्ते में सबसे पहले द्रौपदी गिरी - युधिष्ठिर ने कहा इसे अर्जुन से अधिक प्रेम था। फिर सहदेव - ज्ञान का घमंड, नकुल - रूप का घमंड, अर्जुन - मैं सबसे श्रेष्ठ धनुर्धर हूँ का घमंड, भीम - बहुत खाने और बल का घमंड। अंत में सिर्फ युधिष्ठिर और एक कुत्ता जो शुरू से साथ था, बचे।
स्वर्गारोहण पर्व - आखिरी पर्व
इंद्र रथ लेकर युधिष्ठिर को लेने आए, बोले कुत्ते को छोड़ दो स्वर्ग में कुत्ता नहीं जाता। युधिष्ठिर बोले - जो मेरे साथ आया है उसे छोड़ कर मैं स्वर्ग नहीं जाऊंगा। तब कुत्ते ने धर्मराज का रूप ले लिया और कहा मैंने तुम्हारी परीक्षा ली। स्वर्ग में जा कर युधिष्ठिर ने देखा वहां दुर्योधन सिंहासन पर बैठा है और पांडव, द्रौपदी नरक में। यह उनकी अंतिम परीक्षा थी। युधिष्ठिर ने कहा मैं भाइयों के साथ नरक में रहूंगा। तभी माया हटी, नरक गायब हुआ। असल में वह भी परीक्षा थी। अंत में युधिष्ठिर ने गंगा में मानव शरीर त्यागा और दिव्य रूप में अपने भाइयों और द्रौपदी के साथ सदा के लिए स्वर्ग में मिल गए।
यहीं महाभारत समाप्त होती है।
यह भी देखें
महाभारत
भगवद्गीता
ग्रंथसूची
श्रेणी:महाभारत कथा