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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

दुग्ध ज्वर

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मिल्क फीवर गाय-भैंसों में ब्यांत (बच्चा देने) के आस-पास होने वाली एक उपापचीय बीमारी है।https://www.msdvetmanual.com/metabolic-disorders/parturient-paresis-in-ruminants/parturient-paresis-in-cows Parturient Paresis in Cows - Metabolic Disorders एमएसडी वेटरिनरी मैनुअल en 2026-01-15 इसे हिंदी में दुग्ध ज्वर और चिकित्सकीय भाषा में हाइपोकैल्सीमिया कहा जाता है। मिल्क फीवर एक असंक्रामक रोग है जो शरीर पोषक तत्व की कमी से होता है। यह रक्त में कैल्शियम की कमी के कारण होती है और विशेष रूप से उच्च दूध उत्पादन वाली गायों को प्रभावित करती है। ब्यांत के बाद दूध उतारू होने पर, दूध के साथ अचानक बड़ी मात्रा में कैल्शियम निकल जाता है, जिसकी पूर्ति शरीर तुरंत नहीं कर पाता। इस स्थिति में पशु के शारीरिक तंत्र पर गहरा असर पड़ता है और यह जानलेवा भी साबित हो सकती है। मिल्क फीवर एक ऐसी बीमारी है जो केवल मादा पशुओं में पाई जाती है, क्योंकि दूध का उत्पादन वही करती हैं, जबकि नर पशुओं में यह रोग नहीं होता। यह रोग शरीर में कैल्शियम की कमी, जिसे हाइपोकैल्सीमिया कहा जाता है, के कारण होता है। उपापचयी रोग उपापचयी रोग वे बीमारियाँ हैं जो शरीर में पोषक तत्त्वों की कमी, असंतुलन या चयापचय (Metabolism) की गड़बड़ी के कारण होती हैं। ये रोग खासकर उन पशुओं में अधिक देखे जाते हैं जिनकी ऊर्जा आवश्यकता ज्यादा होती है, जैसे अधिक दूध देने वाले, गर्भवती या हाल ही में बच्चे देने वाले पशु। ये रोग संक्रामक नहीं होते, यानी एक पशु से दूसरे पशु में नहीं फैलते। अधिकतर मामलों में इनका संबंध उत्पादन प्रणाली से होता है, इसलिए इन्हें “प्रोडक्शन डिज़ीज़” भी कहा जाता है। जब दूध उत्पादन अधिक होता है, तब शरीर पर पोषण और खनिजों की मांग बढ़ जाती है। यदि आहार संतुलित न हो तो शरीर में असंतुलन पैदा हो जाता है और रोग की स्थिति बनती है। दुग्ध ज्वर रोग के लक्षण इस स्थिति में पशु को बुखार नहीं होता, लेकिन शरीर में शिथिल पक्षाघात आ जाता है, मांसपेशियाँ कमजोर हो जाती हैं, रक्त का संचार धीमा हो जाता है और हृदय की गति भी कम हो जाती है। मिल्क फीवर का एक खास और पहचानने योग्य लक्षण यह है कि गाय अपनी गर्दन को मोड़कर पेट यानी फ्लैंक की ओर करके बैठ जाती है। यह बीमारी आमतौर पर ब्याने के बाद 72 घंटे के भीतर दिखाई देती है, हालांकि कुछ मामलों में ब्याने से 2–3 दिन पहले भी इसके लक्षण नजर आ सकते हैं। जब गाय कोलोस्ट्रम यानी पहला दूध देने लगती है, तब शरीर से कैल्शियम बहुत अधिक मात्रा में दूध के साथ बाहर निकल जाता है, जबकि आंतों और हड्डियों से कैल्शियम का अवशोषण उतनी तेजी से नहीं हो पाता, जिससे शरीर में असंतुलन पैदा हो जाता है।http://www.agritech.tnau.ac.in/expert_system/cattlebuffalo/parturient.html Metabolic diseases of Cattle and Buffalo www.agritech.tnau.ac.in 2026-01-16 गाय-भैंसों मे दुग्ध रोग होने की संभावना यह रोग देशी गायों की तुलना में विदेशी नस्ल की गायों में अधिक देखा जाता है, विशेष रूप से जर्सी और होलस्टीन फ्रिज़ियन नस्लों में। गायों में यह बीमारी भैंसों की अपेक्षा अधिक होती है और सामान्यतः तीसरे ब्यांत के आसपास इसका खतरा सबसे ज्यादा रहता है, जबकि भैंसों में चौथे ब्यांत और विदेशी गायों में पाँचवे ब्यांत के समय यह रोग अधिक देखने को मिलता है, क्योंकि इसी समय दुग्ध उत्पादन अपने चरम पर होता है। कुतिया में इसी तरह की स्थिति को एक्लेम्पसिया कहा जाता है। शरीर मे कैल्शियम की सामान्य मात्रा सामान्य अवस्था में गाय के शरीर में कैल्शियम और फॉस्फोरस का अनुपात 2:1 होता है और रक्त में कैल्शियम की मात्रा 8 से 12 मिलीग्राम प्रति 100 मिलीलीटर तथा फॉस्फोरस की मात्रा 4 से 8 मिलीग्राम प्रति 100 मिलीलीटर होती है, लेकिन मिल्क फीवर की स्थिति में रक्त में कैल्शियम का स्तर घटकर लगभग 5 मिलीग्राम तक रह जाता है, जिससे शरीर में तीव्र कैल्शियम की कमी हो जाती है। इस कमी के मुख्य कारणों में कोलोस्ट्रम के माध्यम से अत्यधिक कैल्शियम का निकल जाना, ग्रामीण क्षेत्रों में बछड़े को खीस पिलाने के बाद बचा हुआ कोलोस्ट्रम मानव उपयोग के लिए निकाल लेना, तथा गर्भावस्था के दौरान मिनरल मिश्रण या संतुलित आहार की कमी शामिल हैं। सन्दर्भ श्रेणी:पशुरोग