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411 समाचार
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भारत में आयकर

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भारत सरकार व्यक्तियों, हिंदू अविभाजित परिवारों (एचयूएफ), कंपनियां, फर्मों, सहकारी समितियों और ट्रस्टों (जिन्हें व्यक्तियों और लोगों के समूह के रूप में पहचान प्राप्त है) और किसी भी की अन्य कृत्रिम व्यक्ति के कर योग्य आय पर एक आयकर लगाता है। कर का भार प्रत्येक व्यक्ति पर अलग होता है। यह उदग्रहण भारतीय आय कर अधिनियम, 1961 द्वारा शासित किया जाता है। भारतीय आयकर विभाग, केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) द्वारा संचालित है और भारत सरकार के वित्त मंत्रालय के अधीन राजस्व विभाग का हिस्सा है। भारतीय आयकर के भाग आयकर प्रत्येक व्यक्ति की गतवर्ष में अर्जित की गयी आय पर लगने वाला कर है। 'व्यक्ति' में : एक व्यक्ति, हिन्दू अविभाजित परिवार, व्यक्तियों का संघ, व्यक्तियों का समूह, एक फर्म, कम्पनी आदि शामिल हैं। आयकर सर्वाधिक महत्वपूर्ण प्रत्यक्ष कर है। भारत का आयकर अधिनियम निम्न तत्त्वों/भागों से मिलकर बना है- (१) आयकर अधिनियम, 1961 (२) वित्त अधिनियम (Finance Act) (३) आयकर नियमावली (Income-tax Rule) (४) परिपत्र/अधिसूचना (Circulars and Notification) (५) न्यायालय के विधायी निर्णय (Case Law) आयकर अधिनियम, 1961 भारत में आयकर, आयकर अधिनियम, 1961 द्वारा लगाया जाता है। इस पुस्तक में हम इसे संक्षिप्त में ‘अधिनियम’ कहेंगे। यह अधिनियम 1 अप्रैल, 1962 से प्रभाव में आया। इस अधिनियम में कुल 298 धाराएं तथा XIV अनुसूचियां शामिल हैं। संसद द्वारा पारित वित्त अधिनियम द्वारा इसमें सम्वर्धन और विलोपन के साथ प्रतिवर्ष परिवर्तित होता है। आयकर अधिनियम 1961 को सही ढंग से संचालित करने के लिए अधिकारियों को उपयुक्त अधिकार दिये गये हैं। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 1 फरवरी को आम बजट 2023 प्रस्तुत करते हुए नया टैक्स स्लैब प्रस्तुत किया है। वित्त अधिनियम प्रत्येक वर्ष वित्तमन्त्री द्वारा संसद में आय -व्यय का लेखा-जोखा प्रस्तुत किया जाता है। भाग A में सरकार के वित्तीय क्षेत्र में प्रस्तावित नीतियों को दर्शाया जाता है। भाग B में प्रस्तावित कर बजट का वर्णन रहता है। इसे लागू करने के लिए संसद में वित्त विधेयक प्रस्तुत किया जाता है। जब इसे संसद से स्वीकृति मिल जाती है और राष्ट्रपति की सहमति प्राप्त हो जाती है तब यह वित्त अधिनियम बन जाता है। वित्त अधिनियम की प्रथम अनुसूची में चार भाग होते हैं जिनमें दरें निर्दिष्ट होती हैं : भाग 1 - में चालू निर्धारण वर्ष में लागू कर की दरें निर्दिष्ट होती है। भाग 2 - में चालू वित्त वर्ष में लागू TDS की दरें निर्दिष्ट होती हैं। भाग 3 - में वेतन शीर्षक की आय से आयकर की कटौती की गणना एवं अग्रिम कर गणना की दरें उपलब्ध होती हैं। भाग 4 - में शुद्ध कृषि आय की गणना सम्बन्धी नियम उपलब्ध होते हैं। आयकर नियमावली प्रत्यक्ष कर का प्रशासनिक कार्य ‘केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड’ द्वारा किया जाता है। केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड को अधिनियम के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए नियम बनाने के अधिकार प्राप्त हैं। आयकर के प्रशासन के लिये CBDT समय-समय पर नियमावली तैयार करता है। इन्हें सामूहिक रूप से आयकर नियमावली, 1962 कहा जाता है। यह स्पष्ट होना चाहिए कि आयकर अधिनियम के साथ ही इस नियमावली का अध्ययन भी आवश्यक है। परिपत्र और अधिसूचनाएँ CBDT द्वारा समय-समय पर परिपत्र जारी किये जाते हैं, जिससे कि विशेष समस्याओं का निदान हो और प्रावधानों का अर्थ एवं क्षेत्र से सम्बन्धित संदेह दूर हो सके। यह परिपत्र अधिकारियों और करदाताओं के दिशा-निर्देश के लिये जारी किये जाते हैं। परिपत्रों का पालन करना विभाग के लिए अनिवार्य है अर्थात् विभाग परिपत्र का पालन करने के लिए बाध्य है, जबकि करदाता नहीं। करदाता अपने हित में लाभ पहुँचाने वाले परिपत्रों का पालन कर सकता है। अधिनियम के प्रावधानों को लागू करने के लिये अधिसूचनाओं का निर्गमन केन्द्रीय सरकार द्वारा किया जाता है। उदाहरणार्थ, धारा 10(15)(iv)(h) के अधीन किसी सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम द्वारा निर्गमित ऐसे वाण्ड या ऋण पत्र पर ब्याज, उन शर्तों के अधीन जो केन्द्रीय सरकार द्वारा इस सम्बन्ध में राजपत्र में अधिसूचित की जाय, करमुक्त होगा। अतः बॉण्ड्स एवं ऋणपत्र, जिन पर इस धारा के अधीन ब्याज करमुक्त होगा, केन्द्रीय सरकार द्वारा अधिसूचनाओं के माध्यम से निर्दिष्ट किया जायेगा। अधिनियम के उद्देश्य के लिये CBDT को अधिसूचनाओं के निर्गमन द्वारा नियमों में संशोधन करने की शक्ति प्रदान की गयी है। उदाहरणार्थ धारा 35CCD के अधीन CBDT को यह शक्ति प्राप्त है कि कौशल विकास परियोजनाओं के लिये मार्गदर्शन प्रदान कर सके। तदनुसार, CBDT ने अधिसूचना सं. 54/2013 दि. 15/7/2013 के अन्तर्गत नियम 6AAF निर्धारित किया है जिनके अधीन ऐसी शर्तें एवं मार्गदर्शन का उल्लेख है उनके अनुसार धारा 35CCD के अधीन कौशल विकास परियोजनाओं को अनुमोदन प्राप्त हो सकेगा। न्यायिक निर्णय आयकर विधान के अध्ययन के लिये यह आवश्यक एवं महत्वपूर्ण है कि निर्णीत वादों का भी अध्ययन किया जाय। संसद के लिए यह सम्भव नहीं है, कि इस अधिनियम में आने वाली समस्याओं का पूर्वानुमान करके निदान बता दे। अतः करदाता और विभाग के बीच होने वाले विवादों का निदान न्यायालय द्वारा किया जाता है। सर्वोच्च न्यायालय इस देश की सर्वोच्च न्यायिक सत्ता है और इसके द्वारा बनाये गये नियम और दिये गये निर्णय देश का विधान/विधि माना जाता है। विभिन्न उच्च न्यायालयों द्वारा दिये गये निर्णय सम्बन्धित राज्यों में ही प्रभावी होते हैं जहां ऐसे उच्च न्यायालयों का न्यायक्षेत्र होता है एक नजर आयकर प्रभार्य प्रत्येक व्यक्ति जिसकी कुल आय, आयकर प्रभार्य किए जाने वाले अधिकतम राशि से अधिक होती है, वह निर्धारिती होता है और इसपर उस संगत निर्धारण वर्ष के लिए वित्त अधिनियम द्वारा निर्धारित दर या दरों के हिसाब से आयकर प्रभार्य किया जाएगा, जो उसके आवासीय स्थिति के आधार पर निर्धारित किया जाएगा. आयकर एक ऐसा कर है, जो प्रत्येक व्यक्ति द्वारा पिछले वर्ष में अर्जित कुल आय पर, प्रत्येक निर्धारण वर्ष के लिए केन्द्रीय बजट (वित्त अधिनियम) द्वारा अधिनियमित दर पर देय होता है। इसका बदलाव आय की प्रकृति पर निर्भर करता है, अर्थात्, वह राजस्व है या मूलधन है। आय के कराधान के सिद्धांत हैं: आयकर दरें/स्लैब दर (%) 2023 आयकर दरें/स्लैब दर (%) New Tax regime आयकर दरें/स्लैब दर (%) 0 - 2,50,000 = शून्य, 2,50,001 - 5,00,000 तक = 5% 5,00,001 - 7,50,000 तक = 10% 7,50,001 -10,00,000 तक = 15% 10,00,000- 12,50,000 तक 20% Senior Citizens 0 - 3,00,000 तक (60 वर्ष या अधिक के निवासी व्यक्ति) = 0% 3,00,001 - 5,00,000 तक (60 वर्ष या अधिक के निवासी व्यक्ति) = 5% 5,00,001 - 10,00,000 तक = 20% 10,00,001 से ज्य़ादा = 30% Super Senior Citizens 0 - 5,00,000(80 वर्ष या अधिक के निवासी व्यक्ति) = 0% 5,00,001 - 10,00,000 = 20% 10,00,001 से अधिक = 30% शिक्षा उपकर आय कर पर 3 प्रतिशत के दर से लागू है, अधिभार = शून्य आयकर प्रभार्य आवासीय स्थिति आवासीय स्थिति तीन आवासीय स्थिति, अर्थात्., (i) साधारण आवासीय निवासी (निवासी) (ii) निवासी लेकिन मामूली तौर पर निवासी नहीं और (iii) गैर निवासी. एक व्यक्ति की आवासीय स्थिति को निर्धारित करने में कई चरण शामिल होते हैhttp://www.v-krishnan-and-company.com/Residential_Status.html आवासीय स्थिति का निर्धारण 17 फ़रवरी 2011 https://web.archive.org/web/20100607071424/http://www.v-krishnan-and-company.com/Residential_Status.html 7 जून 2010 dead सभी निवासी अपनी सभी आय के लिए कर देने के योग्य होते हैं, जिसमें भारत के बाहर आय भी शामिल है।http://papers.ssrn.com/sol3/papers.cfm?abstract_id=1286009 भारतीय कर प्रणाली का एक अध्ययन - भाग एक और दो - सुनील ठेकर 17 फ़रवरी 2011 https://web.archive.org/web/20101107075826/http://papers.ssrn.com/sol3/papers.cfm?abstract_id=1286009 7 नवंबर 2010 live गैर निवासियों को केवल भारत में प्राप्त या भारत में उपार्जित आय पर कर देय होता है। जो मामूली तौर पर निवासी नहीं हैं वे भारत में प्राप्त आय या भारत में अर्जित आय और भारत से नियंत्रित व्यवसाय या पेशे से होने वाले आय के संबंध में कर के योग्य हैं। आय के वर्ग एक व्यक्ति की कुल आय पांच प्रमुख में शीर्षकों में विभाजित है। 1. वेतन 2. पूँजीगत लाभ 3. गृह-सम्पत्ति से आय 4. व्यवसाय अथवा पेशे से आय 5. अन्य स्रोतों से आय आय के व्यक्तिगत वर्ग वेतन से आय ऐसे सभी वेतन जो नियोक्ता-कर्मचारी संबंध के तहत प्राप्त होते हैं, पर इस खंड के दायरे में कर लगाये जाते है। नियोक्ताओं को स्रोत पर काटे गये आय कर (टीडीएस) के रूप में अनिवार्य रूप से टैक्स काट लेना चाहिए यदि आय छूट की न्यूनतम सीमा से अधिक है और अपने कर्मचारियों को एक फॉर्म 16 देना चाहिए जो कर की कटौती और कुल आय को दर्शाता है। इसके अतिरिक्त, फार्म 16, वेतन से किसी भी अन्य कटौती को दर्शाता है जैसे: चिकित्सा प्रतिपूर्ति: बिलों के समर्थन से 15,000 रुपय प्रति वर्ष तक कर से मुक्त है। वाहन भत्ता: 800 रुपय प्रति माह तक (रु. 9,600 प्रति वर्ष) वाहन भत्ते के रूप में प्रदान किये जाने पर कर मुक्त है। इस राशि के लिए किसी बिल की आवश्यक नहीं होती है। प्रोफेशनल टैक्स: अधिकांश राज्य रोजगारों पर एक प्रति व्यावसायिक आधार पर कर लगाते हैं, जो आमतौर पर सकल आय पर आधारित एक खंड की हुई राशि होती है। इस तरह के करों का भुगतान आय कर से घटाए जाते है। मकान किराया भत्ता: निम्न में से कम से कम कटौती के रूप में उपलब्ध है वास्तविक प्राप्त एचआरए बुनियादी 'वेतन' का 50%/40% (मेट्रो/गैर मेट्रो) भुगतान किया हुआ किराये से 'वेतन' का 10% कम. इस उद्देश्य के लिए बुनियादी वेतन बुनियादी + डीए एक हिस्से के रूप में + निर्धारित दर पर बिक्री पर कमीशन. वेतन से आय उपरोक्त सभी कटौतियों का निचोड़ है। गृह संपत्ति से आय गृह संपत्ति से आय की गणना वार्षिक मूल्य से की जाती है वार्षिक मूल्य (किराये पर दिए एक संपत्ति के मामले में) निम्नलिखित में अधिकतम होती है: प्राप्त किराया नगर निगम के मूल्यांकन सही किराया (जो आई-टी विभाग द्वारा निर्धारित किया गया हो) अगर कोई घर किराये पर नहीं दिया गया है और ना ही उसमें स्वयं रहा जा रहा है, तब यह माना जाएगा कि उसके मालिक पर वार्षिक मूल्य देय होगा। एक स्वअधिकृत घर के मामले में वार्षिक मूल्य शून्य होता है। (लेकिन अगर एक स्वाधिकृत घर से आधिक हो तो अन्य आवासों के वार्षिक मूल्य पर कर देय होगा। ) इस से, भुगतान किया हुआ नगर निगम टैक्स घटाने पर आपको शुद्ध वार्षिक मूल्य मिलता है। इस शुद्ध वार्षिक मूल्य से घटाएं: मरम्मत लागत के रूप में नेट मूल्य का 30% (यह एक अनिवार्य कटौती है) एक आवासीय ऋण पर भुगतान किया हुआ या देय ब्याज एक स्वाधिकृत घर के मामले में, भुगतान किया हुआ या देय ब्याज 1,50,000 रुपय के अधिकतम सीमा के अधीन है (यदि ऋण 1 अप्रैल 1999 को या उसके बाद लिया गया है और निर्माण 3 साल के भीतर पूरा हो गया है) और 30,000 रुपय (यदि ऋण 1 अप्रैल 1999 से पहले लिया गया है). सभी गैर स्वाधिकृत निवासों के लिए, सभी ब्याज घटाये जाने योग्य है, जिनकी कोई ऊपरी सीमा नहीं होती है। अतिरिक्त राशि को कर लगाये जाने योग्य आय में जोड़ा जाता है। व्यापार या व्यवसाय से आय घाटों को आगे ले जाना एक उदाहरण .. एक वास्तुकार और अपने घर से बाहर रहकर ग्राहकों के लिए कार्य का समन्वय करता है। सभी निम्नलिखित व्यय उसके पेशेवर शुल्क से घटाए जाएंगे. वह एक कंप्यूटर का उपयोग करता है, वह अपनी कार में साइटों तक जाता है, उसके पास एक चपरासी है जो भुगतान वसूली में उसकी मदद करता है उसकी एक नौकरानी जो रोज़ आती है सोसाइटी रखरखाव के बिल का हिस्सा किए गए मनोरंजन खर्च.. अपने पेशेवर अभ्यास के लिए किताबें और पत्रिकाएं. धारा 28 में निर्दिष्ट आय, यानी, "व्यापार या व्यवसाय से आय" के रूप में प्रभार्य आय की गणना धारा 30 से 43D में निहित प्रावधानों के अनुसार की जाएगी. हालांकि, इस अध्याय के अंतर्गत कुछ वर्ग हैं, अर्थात., 44 धारा से 44DA (44AA, 44AB और 44C को छोड़कर), जो गणना को पूरी तरह से स्वयं के भीतर शामिल करता है। गैर निवासी मामले में धारा 44C एक निषेध प्रावधान है। धारा 44AA खातों के रखरखाव के साथ सम्बद्ध है और धारा 44AB लेखा परीक्षा के साथ सम्बद्ध है। सारांश में, व्यापार आय की गणना से संबंधित धाराओं को निम्नलिखित भागों में बांटा जा सकता है: - घटाया जाने वाला व्यय - धारा 30 से 38 [37 (2) को छोड़कर]. अग्राह्य व्यय - धारा 37(2), 40, 40A, 43B, एवं 44C. मानी गई आय - धारा 33AB, 33ABA, 33AC, 35A 35ABB और 41. विशेष प्रावधान - धारा 42 और 43D स्वयम - कोडित संगणना - धारा 44, 44A, 44AD, 44AE, 44AF, 44B, 44BB, 44BBA, 44BBB, 44D और 44DA. "व्यापार या पेशे के लाभ या मुनाफे" शीर्षक के तहत आय की गणना उपलब्ध जानकारी और विवरण पर निर्भर करता है।http://www.v-krishnan-and-company.com/business_income.html व्यापार आय 17 फ़रवरी 2011 https://web.archive.org/web/20080329024527/http://www.v-krishnan-and-company.com/business_income.html 29 मार्च 2008 dead यदि नियमित हिसाब किताब नहीं रखा जाता है, तो गणना निम्नानुसार होगी: - आय (माने गए आय सहित) इस शीर्षक xxx अंतर्गत आय के रूप में प्रभार्य घटाएं: घटाए जाने वाले व्यय (निषेधों का नेट) इस xxx शीर्षक के तहत व्यापार या व्यवसाय का लाभ और मुनाफा xxx हालांकि, अगर खातों का रख रखाव नियमित रूप से किया जाता है और लाभ और हानि का लेखा तैयार किया जाता है, तो गणना निम्नानुसार होगी: - लाभ और हानि खाते xxx के अनुसार शुद्ध लाभ जोड़ें: अमान्य व्यय जो लाभ और हानि खाते xxx में डेबिट किया गया हो माना गया आय जो लाभ और हानि खाते xxx में जमा नहीं किया गया xxx कम: घटाये जाने योग्य व्यय जो लाभ और हानि खाते xxx में डेबिट नहीं किया गया आय जो अन्य शीर्षकों के तहत प्रभार्य होते हैं लाभ और हानि खाते xxx में जमा किए जाते हैं। xxx व्यापार या व्यवसाय xxx का लाभ और मुनाफा पूंजीगत लाभ से आय पूंजीगत परिसंपत्ति के स्थानांतरण से पूंजीगत लाभ परिणामित होता है। एक पूंजीगत परिसंपत्ति को आई.टी अधिनियम, 1961 की धारा 2(14) के तहत एक ऐसी किसी भी प्रकार की सम्पत्ति के रूप में परिभाषित किया गया है जो रियल एस्टेट, इक्विटी शेयर, बांड, आभूषण, चित्रकारी, कला आदि के रूप में एक निर्धारिती द्वारा दखल किया हुआ हो लेकिन जिसमें कोई वस्तु जैसे कारोबार के लिए माल और व्यक्तिगत प्रभाव शामिल ना हो। स्थानांतरण को धारा 2(47) के तहत परिभाषित किया गया है ताकि उसमें संपत्ति की बिक्री, अदला-बदली, संपत्ति का त्याग, संपत्ति में अधिकार का निर्वापन आदि शामिल किया जा सके। कुछ लेनदेनों को धारा 47 के तहत 'ट्रांसफर' नहीं जाता है। कर उद्देश्यों के लिए, दो प्रकार के पूंजीगत परिसम्पत्तियां होती हैं: दीर्घकालिक और अल्पकालिक. दीर्घकालिक संपत्ति एक व्यक्ति द्वारा तीन साल के लिए रखी जा सकती है शेयर या म्युचुअल फंड के मामले को छोड़कर जो एक वर्ष तक रखे जाने पर ही दीर्घकालिक हो जाती हैं। इतने दीर्घकालिक संपत्ति की बिक्री दीर्घकालिक पूंजीगत लाभ में वृद्धि करती है। दीर्घकालिक पूंजीगत लाभ के कराधान के विभिन्न योजनाएं हैं। ये हैं: आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 10(38) के अनुसार शेयर या प्रतिभूतियों या म्युचुअल फंड, पर दीर्घकालिक पूंजीगत लाभ, जिस पर सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स (एसटीटी) काटा गया हो और भुगतान किया गया हो, उस पर कर देय नहीं होता। अक्टूबर 2004 के बाद से सभी शेयर बाजार में लेनदेन पर एसटीटी लागू किया किया गया है लेकिन यह बाजार के बाहर के लेनदेन और कम्पनी बाईबैक पर लागू नहीं होता; इसलिए अधिक पूंजीगत लाभ कर ऐसे लेनदेनों पर ही लागू होगा जहां एसटीटी का भुगतान नहीं किया है। अन्य शेयरों और प्रतिभूतियों के मामले में, व्यक्ति को या तो मुद्रास्फीति लागत को सूचीबद्ध कर सकता है और सूचीबद्ध लाभ का 20% भुगतान करता है, या गैर सूचीबद्ध लाभ का 10% भुगतान करता है। इन सूचीकरण दरों को आईटी विभाग द्वारा हर साल जारी किया जाता है। अन्य सभी दीर्घकालिक पूंजीगत लाभ के मामले में, सूचीकरण लाभ उपलब्ध है और कर की दर 20% है। सभी पूंजीगत लाभ जो दीर्घकालिक नहीं हैं वे अल्पावधि पूंजी लाभ होते हैं, जिसपर इस तरह से कर लगाया जाता है: धारा 111A के तहत, उन शेयरों या म्युचुअल फंडों के लिए जिसमें एसटीटी का भुगतान किया जाता है, कर की दर वित्त अधिनियम 2004 के अनुसार निर्धारण वर्ष 2005-06 से 10% है। निर्धारण वर्ष 2009-10 के लिए कर की दर 15% है। अन्य सभी मामलों में, यह सकल कुल आय का हिस्सा है और सामान्य कर की दर लागू होती है। विदेश में कंपनियों के लिए, कर देयता उपयुक्त रूप से अनुक्रमित ऐसे लाभों का 20% है (चूंकि एसटीटी का भुगतान नहीं किया जाता है). अन्य स्रोतों से आय यह एक अवशिष्ट शीर्षक है, इस शीर्षक के तहत वे आय जो अन्य शीर्षकों के मापदंड को पूरा नहीं करती है, पर कर लगाया जाता है। ऐसे कुछ विशिष्ट आय भी हैं जिनपर इस शीर्षक के तहत कर लगाया जाता है। लाभांश के माध्यम से आय घुड़दौड़ से आय बैलदौड़ जीतने से आय मुख्य आदमी बीमा पॉलिसी से दान के रूप में प्राप्त कोई भी राशि. शेयरों से आय (लाभांश) कटौती जबकि आय पर छूट दी जाती है कुछ भुगतानों के लिए कर योग्य आय की गणना में कुछ कटौती की अनुमति दी जाती है। धारा 80सी की कटौती आय कर अधिनियम की धारा 80सी कुछ निवेशों और व्यय को करों से छूट की अनुमति देता है। इस धारा के अंतर्गत कुल सीमा रु 1,50,000 (एक लाख पचास हज़ार रूपये), जो निम्नलिखित में से किसी का संयोजन हो सकता है: भविष्य निधि या सार्वजनिक भविष्य निधि में अंशदान. पीपीएफ 8% सालाना चक्रवृद्धि वापसी प्रदान करता है। उसमें योगदान देने की अधिकतम सीमा 1,50,000 प्रति वर्ष है। यह एक दीर्घकालिक निवेश है जिसमें 15 साल तक पूरी वापसी सम्भव नहीं है हालांकि 5 साल बाद आंशिक वापसी सम्भव है। इसके अलावा, कर्मचारी भविष्य निधि फंड है जो व्यक्ति के वेतन से काटा जाता है। यह बेसिक वेतन घटक के लगभग 10% से 12% होता है। हाल ही में, व्यक्ति के नौकरी बदलते समय ईपीएफ से निकासी के मामलों को कम करने के सम्बंध में बदलावों के विषय में चर्चा की गयी। ईपीएफ के पास नौकरी छोड़ते समय, वीआरएस लेने पर, 58 के बाद सेवानिवृत्ति पर, पूर्ण निपटान का विकल्प है। इसमें घर, शादी, या चिकित्सा से संबंधित कुछ खर्चों के लिए भी निकासी का विकल्प है। ईपीएफ योगदान में शामिल है कर्मचारी और नियोक्ता से मूल वेतन का 12%. यह 8.33:3.67 के अनुपात में पेंशन निधि और भविष्य निधि में वितरित किया जाता है। जीवन बीमा प्रीमियम का भुगतान. पेंशन योजनाओं में निवेश. राष्ट्रीय पेंशन योजना को सेवानिवृत्ति के बाद के लिए पैसे बचाने के लिए बनाया गया है जो इक्विटी और ऋण के विभिन्न संयोजन में पैसे का निवेश करता है। उम्र के आधार पर 50% तक इक्विटी में जा सकता है। सेवानिवृत्ति के बाद देय वार्षिकी आयु पर निर्भर है। एनपीएस के पास छह फंड मैनेजर है। प्रत्येक व्यक्ति रुपये 6000/- का न्यूनतम योगदान कर सकता है। इसमें खरीद (बैंक) के 22 पोएंट हैं। म्यूचुअल फंड के इक्विटी लिंक्ड सेविंग स्कीम में निवेश (ईएलएसएस) राष्ट्रीय बचत पत्र में निवेश (पुर्व के एनएससीयों के ब्याजों का प्रत्येक वर्ष पुनर्निवेश किया जाता है और धारा 80 की सीमा में जोड़ा जा सकता है) कर बचाने वाले मीयादी जमा बैंकों द्वारा 5 वर्ष की अवधि के लिए प्रदान किया जाता है। ब्याज भी कर योग्य होते हैं। आवासीय ऋणों के मूलधन अदायगी के लिए भुगतान. इसके अलावा किसी भी पंजीकरण शुल्क या स्टाम्प ड्यूटी का भुगतान. बच्चों के लिए किसी भी स्कूल या कॉलेज या विश्वविद्यालय या इसी तरह की संस्था को ट्यूशन फीस के रूप में किया गया भुगतान. (केवल 2 बच्चों के लिए) या विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं की कोचिंग शुल्क के लिए। डाकघर निवेश Sukanya Samridhi Yojna एक Tax Saving Scheme है,  जिसमे Girl Child के नाम से अकाउंट खुलवाना पड़ता है, इसमें एक Financial Year में कम से कम 1000 और अधिकतम 150000 तक जमा करा सकते है। जमा की गयी राशि की 80 सी में छूट ली जा सकती है। इस अकाउंट से मिलने वाला ब्याज भी टैक्स फ्री होता है। निवेश किसी भी स्रोत से हो सकता है और यह आवश्यक नहीं है कि वह कर प्रभार्य आय से ही हो। धारा 80CCF: इन्फ्रास्ट्रक्चर बांड में निवेश 1 अप्रैल 2010 से धारा 80CCF के तहत अधिकतम 20,000 रुपये की छूट मिलती है यदि उस राशि का निवेश बुनियादी ढांचे के बांडों में किया है। यह उस 1,50,000 रुपय के अतिरिक्त है जो धारा 80(सी) के तहत छोड़ी माफ की जाती है। धारा 80 डी: चिकित्सा बीमा प्रीमियम स्वास्थ्य बीमा, जिसे मेडिक्लेम पौलिसीज़ के रूप में जाना जाता है, 35,000.00 रुपये तक की कटौती प्रदान करता है (स्वयं, पति और बच्चों की पॉलिसी के प्रति प्रीमियम भुगतान के लिए 15,000.00 रुपये और (के अलावा के रूप में पढ़ें) रुपये 15,000.00 गैर वरिष्ठ नागरिक आश्रित माता-पिता के लिए प्रीमियम भुगतान के लिए या रुपये 20,000.00 वरिष्ठ नागरिक निर्भर प्रीमियम भुगतान के लिए). यह कटौती आयकर कटौती धारा 80C के तहत रुपये 1,00,000 की बचत के अतिरिक्त है। वरिष्ठ नागरिक की श्रेणी में विचारार्थ, पदधारी की उम्र चालू वित्त वर्ष के किसी भी भाग में 65 वर्ष होनी चाहिए, उदाहरण के लिए वित्तीय वर्ष 2010-11 के लिए, पदधारी को 31 मार्च 2011 को 65 का होना चाहिए, यह कटौती मालिक कंपनियों द्वारा भुगतान किये गए चेक के लिए भी लागू होती है। आवास ऋण खंड पर ब्याज स्व-स्वामित्व वाली संपत्तियों के लिए, प्रति वर्ष 150,000 रुपये तक के आवास ऋण पर दिया गया ब्याज कर से मुक्त है। (रुपये 1,00,000/प्रति वर्ष u/s 80c बचत). बहरहाल, यह केवल एक तीन वित्तीय वर्षों के भीतर निर्माण निवास के लिए लागू करने के बाद कर्ज लिया है और ऋण अगर 1 अप्रैल 1999 के बाद लिया गया हो। अगर घर रोजगार की वजह से अधिकृत नहीं किया गया है तो घर स्वाधिकृत माना जायेगा. किराए पर दिए गए मकानों के लिए, अदा किए जाने वाला सम्पूर्ण व्याज आय कर अधिनियम की धारा 24 के तहत कटौती योग्य है। हालांकि, किराए को इस तरह की सम्पत्ति से हुए आय के रूप में दिखाया जाना चाहिए। भुग्तानित किराए का 30% और नगरपालिका करों का भुगतान कर से कटौती के लिए उपलब्ध हैं। सभी सम्पत्तियों से नुकसान को वेतन से हुए आय स्रोत में ही समायोजित किया जान चाहिए। इसलिए, इस बिनाह पर, काटे गए अधिक टीडीएस की वापसी का दावा, आवश्यक नहीं होगा। http://www.incometaxindia.gov.in/publications/1_Compute_Your_Salary_Income/2_Income_from_house_property.asp संग्रहीत प्रति 17 फ़रवरी 2011 https://web.archive.org/web/20110310100524/http://www.incometaxindia.gov.in/publications/1_Compute_Your_Salary_Income/2_Income_from_house_property.asp 10 मार्च 2011 dead कटौती का उपयोग जबकि उपरोक्त खण्डों का उपयोग एक व्यक्ति को कर के रूप में धन का भुगतान करने से बचाता है यदि वह कर दायरे में आता है, इसे एक निवेश-लाभ के अवसर के रूप में अधिक देखा जाना चाहिए। व्यक्ति को तब भी आयकर दाखिल करना चाहिए, जब वह कोई कर नहीं दे रहा है। ईएलएसएस (इक्विटी लिंक्ड सेविंग स्कीम) और एनपीएस (राष्ट्रीय पेंशन योजना) को छोड़कर, 80C के तहत अन्य योजनाएं आम तौर पर एक अपेक्षाकृत जोखिम मुक्त निवेश और लाभ की गारंटी प्रदान करती हैं। आयकर की दरें भारत में, व्यक्तिगत आयकर, तीन स्तरों का प्रगतिशील कर है। जनसंख्या का करीब 10 प्रतिशत, कर योग्य आय सीमा में आता है।http://www.saraltaxoffice.com/articles/budget2010.php 2010-11 के लिए परिवर्तित आयकर दरें 17 फ़रवरी 2011 https://web.archive.org/web/20110105123301/http://saraltaxoffice.com/articles/budget2010.php 5 जनवरी 2011 dead http://www.saraltaxoffice.com/articles/it-finance-act-2010.php वित्त अधिनियम 2010 प्रभाव में आया 17 फ़रवरी 2011 https://web.archive.org/web/20110105124929/http://saraltaxoffice.com/articles/it-finance-act-2010.php 5 जनवरी 2011 dead 1 अप्रैल 2018 से, नया टैक्स स्लैब लागू हुआ है, जो इस प्रकार हैं: प्रति वर्ष रुपये 2,50,000 तक की आय पर कोई आय कर लागू नहीं है। (वरिष्ठ नागरिकों के लिए जो 60 वर्ष से अधिक हैं 3,00,000 रुपये और 80 और ऊपर के के लिए 5,00,000 रुपये और उन्हें भारत का निवासी होना चाहिए) रुपये 2,50,001 से लेकर 5,00,000 तक: 2,50,000 रुपये से अधिक की राशि का 5% (निचली सीमा वरिष्ठ नागरिकों के लिए उचित रूप से बदलती है) 5,00,001 से 10,00,000 तक: 20% 10,00,000 से ऊपर: 30% अधिभार अधिभार को वित्तीय वर्ष 2009-10 में व्यक्तिगत आय कर के लिए समाप्त कर दिया गया है। यदि कर योग्य आय (सभी कटौतियों को ध्यान में रखकर) 10 लाख (1 मिलियन रूपये) रुपये से ऊपर है तो 7.5% का अधिभार (कर पर कर) लागू होता है। 1 जून 2007 से 10 लाख की सीमा को बढ़ा कर 1 करोड़ रुपये (10 मीलियन रूपये) कर दिया गया है। भारत में सभी कर शिक्षा उपकर के अधीन हैं जो कुल देय कर का 3% है। आकलन वर्ष 2009-10 से प्रभावी होते हुए, 1% का माध्यमिक और उच्चतर माध्यमिक शिक्षा उपकर, कर योग्य आय के पूर्ण योग पर लागू होता है। मुख्य रूप से शिक्षा उपकर, उत्पाद शुल्क और सेवा कर पर लागू होता है आयकर वर्ष 2010-11 से, शिक्षा उपकर 3% होगा और कोई अधिभार नहीं लगाया जाएगा. आयकर वर्ष 2018-19 से, स्वास्थ्य और शिक्षा उपकर 4% होगा और कोई अधिभार नहीं लगाया जाएगा. गैर-व्यक्तिगत के लिए कर की दर फर्म, कॉर्पोरेट्स, स्थानीय प्राधिकरण और को-ऑपरेटिव सोसायटी के लिए विशेष दरें निर्धारित हैं।http://www.v-krishnan-and-company.com/tax_rates_in_India.html मूल्यांकन वर्ष 2008-09 के लिए कर दरें 17 फ़रवरी 2011 https://web.archive.org/web/20100223181529/http://www.v-krishnan-and-company.com/tax_rates_in_India.html 23 फ़रवरी 2010 dead वेतनभोगी करदाताओं के लिए वापसी की स्थिति आयकर विभाग ने अपनी वेबसाइट पर उन सभी वेतन करदाताओं की कर वापसी की सूची प्रकाशित की है जिसे सही पते के अभाव में संबंधित व्यक्तियों को नहीं भेजा जा सका है। (वापसी की जांच करने के लिए लिंक) वेतन करदाता जिन्हें मूल्यांकन वर्ष 2003-04 से 2006-07 तक रिफंड प्राप्त नहीं हुआ है वे नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक कर सकते हैं और पैन नंबर और मूल्यांकन वर्ष का प्रयोग करते हुए पता कर सकते हैं कि क्या कोई वापसी उन्हें बिना प्राप्त हुए वापस लौट गई है। .https://tin.tin.nsdl.com/oltas/refundstatuslogin.html एनएसडीएल रीफंड स्थिति जांच 17 फ़रवरी 2011 https://web.archive.org/web/20110515084122/https://tin.tin.nsdl.com/oltas/refundstatuslogin.html 15 मई 2011 dead कॉर्पोरेट आय कर कंपनियों के लिए, भारतीय कंपनियों के लिए आय कर को 30% की समान दर से लगाया जाता है, तथा उन कंपनियों के कर पर 7.5% का अधिभार लगाया जाता है जिनका सकल कारोबार 1 करोड़ (10 मीलियन) से अधिक होता है। विदेशी कंपनियां 40% का भुगतान करती हैं।http://www.taxmann.com/DitTaxmann/IncomeTaxActs/2006ITAct/gr.htm आयकर अधिनियम, विदेशी कंपनियों के लिए कर दरें 17 फ़रवरी 2011 https://web.archive.org/web/20090111223150/http://www.taxmann.com/DitTaxmann/IncomeTaxActs/2006ITAct/gr.htm 11 जनवरी 2009 dead 3% (कर और अधिभार, दोनों पर) का शिक्षा उपकर देय है, जिससे घरेलू कंपनियों के लिए 33.2175% और विदेशी कंपनियों के लिए 41.2% की प्रभावी कर की दर लागू होती है। वित्त अधिनियम 2010 2005-06 से, कंपनी रिटर्न की इलेक्ट्रॉनिक फाइलिंग अनिवार्य है।मूल्यांकन वर्ष 2010-11 से प्रभावी करते हुए अधिभार को 10% से 7.5% संशोधित किया गया।कारपोरेट करदाताओं को इलेक्ट्रॉनिक तरीके से दाखिल करना चाहिए, आईटी परिपत्र का बिंदु 4. https://web.archive.org/web/20070104125508/http://incometaxindiaefiling.gov.in/download/Circular%20No.9-2006.pdf 4 जनवरी 2007 विलंब से जमा करने पर जुर्माना (धारा 234F) आयकर अधिनियम की धारा 234F के तहत, यदि निर्धारिती निर्धारित अंतिम तिथि (सामान्यतः 31 जुलाई) के बाद ITR दाखिल करता है, तो विलंब शुल्क देय होता है: यदि 31 दिसंबर तक विलंबित रिटर्न दाखिल किया जाता है, तो अधिकतम ₹5,000 का जुर्माना होता है। यदि 31 दिसंबर के बाद (लेकिन वित्तीय वर्ष के अंत तक) दाखिल किया जाता है, तो अधिकतम ₹10,000 का जुर्माना होता है। अपवाद: यदि करदाता की कुल आय ₹5,00,000 से कम है, तो विलंब शुल्क अधिकतम ₹1,000 तक सीमित रहेगा।https://www.incometaxindia.gov.in/Pages/tools/late-filing-fee.aspx विलंब से जमा करने पर शुल्क केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (CBDT) 16 जुलाई 2026 कर दंड "यदि निर्धारण अधिकारी या आयुक्त (अपील) या इस अधिनियम के तहत किसी भी कार्यवाही के क्रम में आयुक्त, आश्वस्त हो कि कोई व्यक्ति- (ख) धारा 142 की उप-धारा (1) या धारा 143 की उप-धारा (2) के अंतर्गत नोटिस का पालन करने में नाकाम रहता है या धारा 142 की उप-धारा (2A) के तहत जारी किए गए आदेश का पालन करने में विफल रहता है, या (ग) अपनी आय के विवरण को छुपाया है या ऐसी आय का गलत विवरण पेश किया है, वह यह निर्देश दे सकता है कि ऐसे व्यक्ति को दंड के माध्यम से भुगतान करना होगा - (ii) उसके द्वारा देय किसी भी कर के अतिरिक्त, खंड (b) में निर्दिष्ट मामलों में, ऐसी प्रत्येक विफलता के लिए दस हजार रुपए की राशि; (iii) उसके द्वारा देय किसी भी कर के अतिरिक्त, खंड (c) में निर्दिष्ट मामलों में, अपनी आय के विवरण को छुपाने या ऐसी आय का गलत विवरण प्रस्तुत करने के कारण कर की टाली गई राशि से कम कम की राशि नहीं, लेकिन जो उससे तीन गुना से अधिक भी नहीं होगी। इन्हें भी देखें भारत में सेवा कर केन्द्रीय उत्पाद शुल्क (भारत) सन्दर्भ बाहरी कड़ियाँ भारतीय आयकर विभाग आयकर रिटर्न की इलेक्ट्रॉनिक फाइलिंग खुद करें आयकर रिटर्न दाखिल ईफाइलिंग आवेदन TaxMunshi_Dot_com http://80 c डिडक्शन श्रेणी:भारत में कराधान श्रेणी:आयकर