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अष्टांगसंग्रह
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अष्टांगसंग्रह आयुर्वेद का प्रसिद्ध ग्रन्थ है। इसके रचयिता वृद्ध वाग्भट हैं। अष्टाङ्गसंग्रह, आयुर्वेद के तीन प्रमुख ग्रन्थों (बृहत्त्रयी) में से एक है।
अष्टाङ्गसंग्रह की इन्दुकृत शशिलेखा-व्याख्या अत्यधिक प्रसिद्ध है। अष्टाङ्गसंग्रह की भाषा कठिन, अनेक छन्दों वाली, साहित्य से प्रभावित, भौगोलिक, ऐतिहासिक और सामाजिक वातावरण
के अधिक समीप है। इसमें सभी विषयों का विस्तारपूर्वक वर्णन है। इसमें आयुर्वेद के दोनों सम्प्रदायों (कायचिकित्सा और शल्यतन्त्र) के विषयों को वर्णित किया गया है। इस एक संहिता के विधिपूर्वक अध्ययन से आयुर्वेद के ज्ञान को प्राप्त किया जा सकता है। यह संहिता दक्षिण भारत में विशेष रूप से लोकप्रिय है और चिकित्सकों का सर्वाधिक लोकप्रिय ग्रन्थ है।
== अष्टाङ्गसंग्रह की रचना का हेतु ==
इस ग्रन्थ के निर्माण का हेतु वाग्भट ने यों बताया है-
तैः प्रशस्तानि तान्येषां प्रतिष्ठां भुवि लेभिरे।
तेषामेकैकमव्यापि समस्तव्याधिसाधने॥
प्रतितन्त्राभियोगे तु पुरुषायुषसंक्षयः।
भवत्यध्ययनेनैव यस्मात् प्रोक्तः पुनः पुनः॥
तन्त्रकारैः स एवऽर्थः क्वचित् क्श्चिद्विशेषतः।
तेऽर्थप्रत्यायनपरा वचने यच्च नादृताः॥
सर्वतन्त्राण्यतः प्रायः संहृत्याऽष्टाङ्गसङ्ग्रहः।
अस्थानविस्तराक्षेपपुनरुक्तादिवर्जितः॥
हेतुलिङ्गौषधस्कन्धत्रयमात्रनिबन्धनः।
विनिगूढार्थतत्वानां प्रदेशानां प्रकाशकः॥
स्वान्यतन्त्रविरोधानां भूयिष्ठं विनिवर्तकः।
युगानुरूपसन्दर्भो विभागेन करिष्यते॥
नित्योपयोगि दुर्बोधं सर्वाङ्गव्यापि भावतः।
सङ्गृहीतं विशेषेण यत्र कायचिकित्सितम्॥ -- अष्टांगसंग्रह, सूत्रस्थान, अध्याय १
अर्थ - अग्निवेश, सुश्रुत आदि ने जो पृथक् पृथक् ग्रन्थ बनाये हैं, वे अलग अलग सम्पूर्ण रोगी को नष्ट नहीं कर सकते। इन ग्रन्थो मे से कोई भी तंत्र अपने आपमें सम्पूर्ण नहीं है। सब तंत्रों के पढ़ने में पुरुष की आयु ही समाप्त हो जाती है। इतना ही नहीं, ग्रन्थकारों ने एक ही बात को कई स्थानों पर कहा है अर्थात् जो एक बात एक ग्रन्थ में है, वही दूसरे में भी है। कहीं-कहीं उसी बात को बदल कर कह दिया है, और कहीं वह इस प्रकार कह दी है। कि समझने मे कठिन हो गई है। इसलिये जन समाज मे इन तंत्रो का अधिक आदर ( प्रचार) नही हुआ।
इन सब कारणों को लेकर वाग्भट को पृथक तंत्र बनाना पड़ा। ठीक यही कारण पंचतंत्र के बनाने में पण्डित विष्णुशर्मा ने बताये है। उन्होंने भी कहा कि नीतिशास्त्र के कौटिल्य, औशनस, बार्हस्पत्य आदि बहुत से ग्रन्थ हैं, उन सब को पढना मनुष्य की आयु का क्षय है। इसलिये सुगमता से जानी जाये, ऐसी नीति को बताने के लिये पंचतत्र बनाता हूँ । यही प्रयोजन इस ग्रन्थ का है। अन्थकर्ता इस कार्य मे पूर्णत सफल भी हुआ है। इस एक ग्रन्थ को पढ लेने से आयुर्वेद चिकित्सा सम्बन्धी कोई ऐसा विषय नही बचता, जो चरक, सुश्रुत में अधिक रहे। इतना ही नहीं, इनसे अतिरिक्त पाराशर, गौतम आदि के सिद्धान्तों का भी इसमें समावेश है। इससे स्पष्ट है कि चरक, सुश्रुत से अतिरिक्त दूसरे आचार्यों के सिद्धान्त भी देश में प्रचलित थे, जो कि ग्रन्थकर्त्ता ने अपनी पुस्तक में समाविष्ट कर दिये हैं। इसलिये चरक, सुश्रुत दोनों का नवीन संस्करण होने से इस एक ही ग्रन्थका पठन-पाठन थोड़े समय में ही आयुर्वेद का ज्ञान करा सकता है। यही कारण है कि दक्षिण भारत में अष्टांगसंग्रह का महत्त्व अधिक है। उत्तरी भारत में चरक, सुश्रुत पर जोर दिया जाता है; दक्षिण भारत में अष्टांगसंग्रह पर अधिक आधार रहता है।
== संरचना ==
अष्टांगसंग्रह में ६ स्थान एवं १५० अध्याय हैं-
सूत्रस्थानम् (40 अध्याय)
शरीरस्थानम् (12 अध्याय)
निदानस्थानम् (16 अध्याय)
चिकित्सितस्थानम् (24 अध्याय)
कल्पस्थानम् (80 अध्याय)
उत्तरस्थानम् (50 अध्याय)
वाग्भट ने इन अध्यायों में विषयों को वैज्ञानिक रूप से व्यवस्थित करने का पूरा प्रयास किया है। इस विषय विभाजन से स्पष्ट होता है कि संग्रह की अपेक्षा सूत्रस्थान का संक्षिप्तीकरण किया गया है। शारीरस्थान आधा रह
गया है। निदानस्थान तो समान है। चिकित्सास्थान को विस्तृत किया गया है। उत्तरस्थान भी कम है। इस प्रकार अष्टाङ्गसंग्रह का संक्षितरूप ही अष्टाङ्गहृदय है।
== अष्टाङ्गसंग्रह की विशेषतायें ==
प्राचीन संहिताओं का अनुसरण करने पर भी इसमें अनेक मौलिक तथ्य है। उन्हीं में से कुछ प्रमुख तथ्यों को यहाँ उल्लिखित
किया जा रहा है-
1. धातुओं की वृद्धि के लक्षणों का सामञ्जस्य दोषलक्षणों के साथ किया गया है जैसे रसवृद्धि में श्लेष्मविकार और पित्तविकार
आदि।
2. द्रव्यविज्ञान में औषधियों क विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। रसायन होने पर भी गुग्गुलु के अत्यधिक सेवन से क्लैव्य आदि
दोष हो जाते हैं।
3. ऋतुसन्धि का कालविभाग में वर्णन किया गया है, उसी समय प्रायः रोग उत्पन्न होते हैं। ऋतु के लक्षण को काल, मास और
राशि के आधार पर किया है।
4. अष्टाङ्गसंग्रह में अर्ध्वगुद रोग का वर्णन प्राप्त होता है। इससे मुख से दुर्गन्ध आती है। दन्तोपाटन का वर्णन भी है।
5. चौदह प्रकार के नेत्ररोग वताए हैं। कर्णस्राव की लसीका के लगने से पाक हो जाता है।
6. कायचिकित्सा से भिन्न शल्यतन्त्र में भी मौलिक विचारों का वर्णन प्राप्त होता है।
7. रोगों का वर्गीकरण रोगविज्ञान प्रकरण में विस्तृत रूप से प्राप्त होता है।
8. पाचनकाल के सम्बन्ध में सम अग्नि रहने पर भोजन का पाचन चार याम (12 घंटे) में और औषध का दो याम (6 घंटे) में होता है।
9. प्रलेपक, वाल्बलसक और हारिद्रक ज्वर का वर्णन ज्वर प्रकरण में मिलता है।
10. अनेक आचार्यों के मतों को अगदतन्त्र प्रकरण में वर्णित किया है। कौटिल्य के भी दो योगों का उद्धरण प्राप्त होता है।
हरताल विष और धत्तूर विष का वर्णन है। विषों को चिकित्सीय उपयोग को सर्वप्रथम वाग्भट ने बतलाया है।
11. रसायन प्रकरण ने आसानी से प्राप्त होने वाली औषधियों का वर्णन प्राप्य है- जैसे भल्लातक, पिप्पली, सोमराजी, लशुन,
पलाण्डु, गुग्गुलु, शिलाजतु, स्वर्णमाक्षिक आदि। 'शिवा गुटिका' अष्टाङ्गसंग्रह का ही योग है।
12. वाजीकरण के अन्य विधानों के अतिरिक्त, पादलेप के योग भी वर्णित हैं।
13. अष्टाङ्गसंग्रह में 36 तन्त्रयुक्तियों का वर्णन मिलता है।
इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि वाग्भट के समय में धातुओं और विषों का प्रयोग विशेष रूप से होने लगा था परन्तु फिर भी
सरलता से प्राप्य वानस्पतिक द्रव्यों का अधिक प्रयोग होता था।
== टीका ==
अष्टाङ्गसंग्रह की एकमात्र टीका इन्दु नामक विद्वान द्वारा रचित शशिलेखा है।
== इन्हें भी देखें ==
अष्टांगहृदय (लघु वाग्भट)
== बाहरी कड़ियाँ ==
अष्टांगसंग्रहः (संस्कृत विकिस्रोत)
अष्टाङ्गहृदयम् एवम् अष्टाङ्गसङ्ग्रहः (सर्वांगसुन्दरा टीका सहित)
अष्टांगसंग्रह
अष्टाङ्गसंग्रह (हिन्दी व्याख्या- गोवर्धन शर्मा छाङ्गाणी)
अष्टांगसंग्रह (हिन्दी अनुवाद - कविराज अत्रिदेव गुप्त)
A Bird'seye View of AshTanga Sangrah