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स्वामी रामतीर्थ

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स्वामी रामतीर्थ Swami Rama Tirtha.jpg right thumb 150px स्वामी रामतीर्थ अद्वैत वेदान्त "भारत भूमि मेरा शरीर है, कन्याकुमारी मेरे पैर हैं और हिमालय मेरा सिर"स्वामी रामतीर्थ की पुस्तक भारत का भविष्य पृष्ठ ६० हिन्दू धर्म ਸਵਾਮੀ ਰਾਮਤੀਰਥ pa संयुक्त राज्य में वेदान्त का प्रचार 1906 10 17 1873 10 22 yes टिहरी, संयुक्त प्रांत, ब्रिटिश राज 1873 10 22 yes मुरलीवाला, पंजाब प्रांत, ब्रिटिश राज पूर्णसिंह, नारायण स्वामी स्वामी रामतीर्थ (pa ਸਵਾਮੀ ਰਾਮਤੀਰਥ; 22 अक्टूबर 1873 – 17 अक्टूबर 1906Verma, M.L. (2006). Swadhinta Sangram Ke Krantikari Sahitya Ka Itihas. Vol 2. pp. 418–421) वेदान्त दर्शन के अनुयायी भारतीय संन्यासी थे।स्वाधीनता संग्राम के क्रान्तिकारी साहित्य का इतिहास (भाग-दो) पृष्ठ ४१८ जीवन चरित स्वामी रामतीर्थ का जन्म सन् १८७३ की दीपावली के दिन पंजाब के गुजरावालां जिले मुरारीवाला ग्राम में पण्डित हीरानन्द गोस्वामी के एक धर्मनिष्ठ ब्राह्मण परिवार में हुआ था। इनके बचपन का नाम तीर्थराम था। विद्यार्थी जीवन में इन्होंने अनेक कष्टों का सामना किया। भूख और आर्थिक बदहाली के बीच भी उन्होंने अपनी माध्यमिक और फिर उच्च शिक्षा पूरी की। पिता ने बाल्यावस्था में ही उनका विवाह भी कर दिया था। वे उच्च शिक्षा के लिए लाहौर चले गए। सन् १८९१ में पंजाब विश्वविद्यालय की बी० ए० परीक्षा में प्रान्त भर में सर्वप्रथम आये। इसके लिए इन्हें ९० रुपये मासिक की छात्रवृत्ति भी मिली। अपने अत्यंत प्रिय विषय गणित में सर्वोच्च अंकों से एम० ए० उत्तीर्ण कर वे उसी कालेज में गणित के प्रोफेसर नियुक्त हो गए।स्वाधीनता संग्राम के क्रान्तिकारी साहित्य का इतिहास (भाग-दो) पृष्ठ ४१८-४१९ वे अपने वेतन का एक बड़ा हिस्सा निर्धन छात्रों के अध्ययन के लिये दे देते थे। इनका रहन-सहन बहुत ही साधारण था। लाहौर में ही उन्हें स्वामी विवेकानन्द के प्रवचन सुनने तथा सान्निध्य प्राप्त करने का अवसर मिला। उस समय वे पंजाब की सनातन धर्म सभा से जुड़े हुए थे। इक़बाल और स्वामी रामतीर्थ* लाहौर प्रवास के दौरान स्वामी रामतीर्थ से प्रसिद्ध दार्शनिक व उर्दू के कवि अल्लामा इक़बाल अत्यंत प्रभावित थे व इक़बाल ने स्वामी जी की प्रशंसा में एक कविता लिखी है जिसका शीर्षक "स्वामी रामतीर्थ" है जो उनके काव्य संकलन कुल्लियाते इक़बाल में मौजूद है इसमें इक़बाल ने स्वामी रामतीर्थ जी की भूरी भूरी प्रशंसा की है व उनके सापेक्ष अपने ज्ञान को तुच्छ माना है स्वयं को ज्ञानार्जन में प्राथमिक चरणों में होना बताया है इस कविता का एक शेर इस प्रकार है। "आह खोला किस अदा से तूने राज़े रंगो बू।* मैं अभी तक हूं असीरे इम्तियाज़ें रंगो बू।।" अर्थात इस ज्ञानेन्द्रियों से अवबोधित होने वाले संसार के रहस्यों को आपने किस रोचक प्रकार से खोल दिया है मैं तो अभी यह ही विभेद करने में असमर्थ हूं रंग क्या है और बू क्या है आध्यात्मिक साधना तुलसी, सूर, नानक, आदि भारतीय सन्त; शम्स तबरेज, मौलाना रूसी आदि सूफी सन्त; गीता, उपनिषद्, षड्दर्शन, योगवासिष्ठ आदि के साथ ही पाश्चात्य विचारवादी और यथार्थवादी दर्शनशास्त्र, तथा इमर्सन, वाल्ट ह्विटमैन, थोरो, हक्सले, डार्विन आदि मनीषियों का साहित्य इन्होंने हृदयंगम किया था। इन्होंने अद्वैत वेदांत का अध्ययन और मनन प्रारम्भ किया और अद्वैतनिष्ठा बलवती होते ही उर्दू में एक मासिक-पत्र "अलिफ" निकाला। इसी बीच उन पर दो महात्माओं का विशेष प्रभाव पड़ा - द्वारकापीठ के तत्कालीन शंकराचार्य और स्वामी विवेकानन्द। सन्यास thumb|left|150px|स्वामी रामतीर्थ का एक दुर्लभ चित्र वर्ष १९०१ में प्रो॰ तीर्थराम ने लाहौर से अन्तिम विदा लेकर परिजनों सहित हिमालय की ओर प्रस्थान किया। अलकनन्दा व भागीरथी के पवित्र संगम पर पहूँचकर उन्होंने पैदल मार्ग से गंगोत्री जाने का मन बनाया। टिहरी के समीप पहुँचकर नगर में प्रवेश करने की बजाय वे कोटी ग्राम में शाल्माली वृक्ष के नीचे ठहर गये। ग्रीष्मकाल होने के कारण उन्हें यह स्थान सुविधाजनक लगा। मध्यरात्रि में प्रो॰ तीर्थराम को आत्म-साक्षात्कार हुआ। उनके मन के सभी भ्रम और संशय मिट गये। उन्होंने स्वयं को ईश्वरीय कार्य के लिए समर्पित कर दिया और वह प्रो॰ तीर्थराम से रामतीर्थ हो गये। उन्होंने द्वारिका पीठ के शंकराचार्य के निर्देशानुसार केश व मूँछ आदि का त्यागकर सन्यास ले लिया तथा अपनी पत्नी व साथियों को वहाँ से वापस लौटा दिया। राम प्रसाद 'बिस्मिल' ने अपनी पुस्तक मन की लहर में युवा सन्यासीमन की लहर पृष्ठ २० शीर्षक से एक बड़ी ही मार्मिक कविता लिखी थी जिसके कुछ अंश इस प्रकार हैं: "वृद्ध पिता-माता की ममता, बिन ब्याही कन्या का भार;शिक्षाहीन सुतोंकी ममता, पतिव्रता पत्नी का प्यार.सन्मित्रों की प्रीति और, कालेज वालों का निर्मल प्रेम;त्याग सभी अनुराग किया, उसने विराग में योगक्षेम.प्राणनाथ बालक-सुत-दुहिता, यूँ कहती प्यारी छोड़ी;हाय! वत्स वृद्धा के धन, यूँ रोती महतारी छोड़ी.चिर-सहचरी रियाजी छोड़ी, रम्यतटी रावी छोड़ी.शिखा-सूत्र के साथ हाय!उन बोली पंजाबी छोड़ी."*युवा-सन्यासी (स्वामी रामतीर्थ के सन्यासोपलक्ष्य में रचित) विदेश-यात्रा स्वामी रामतीर्थ ने सभी बन्धनों से मुक्त होकर एक संन्यासी के रूप में घोर तपस्या की। प्रवास के समय उनकी भेंट टिहरी रियासत के तत्कालीन नरेश कीर्तिशाह से हुई। टिहरी नरेश पहले घोर अनीश्वरवादी थे। स्वामी रामतीर्थ के सम्पर्क में आकर वे भी पूर्ण आस्तिक हो गये। महाराजा ने स्वामी रामतीर्थ के जापान में होने वाले विश्व धर्म सम्मेलन में जाने की व्यवस्था की। वे जापान से अमरीका तथा मिस्र भी गये। विदेश यात्रा में उन्होंने भारतीय संस्कृति का उद्घोष किया तथा विदेश से लौटकर भारत में भी अनेक स्थानों पर प्रवचन दिये। उनके व्यावहारिक वेदान्त पर विद्वानों ने सर्वत्र चर्चा की। स्वामी रामतीर्थ ने जापान में लगभग एक मास और अमेरिका में लगभग दो वर्ष तक प्रवास किया। वे जहाँ-जहाँ पहुँचे, लोगों ने उनका एक सन्त के रूप में स्वागत किया। उनके व्यक्तित्व में चुम्बकीय आकर्षण था, जो भी उन्हें देखता वह अपने अन्दर एक शान्तिमूलक चेतना का अनुभव करता। दोनों देशों में राम ने एक ही संदेश दिया-"आप लोग देश और ज्ञान के लिये सहर्ष प्राणों का उत्सर्ग कर सकते हैं। यह वेदान्त के अनुकूल है। पर आप जिन सुख साधनों पर भरोसा करते हैं उसी अनुपात में इच्छाएँ बढ़ती हैं। शाश्वत शान्ति का एकमात्र उपाय है आत्मज्ञान। अपने आप को पहचानो, तुम स्वयं ईश्वर हो।" प्रत्यागमन सन् १९०४ में स्वदेश लौटने पर लोगों ने राम से अपना एक समाज खोलने का आग्रह किया। राम ने बाँहें फैलाकर कहा, भारत में जितनी सभा समाजें हैं, सब राम की अपनी हैं। राम मतैक्य के लिए हैं, मतभेद के लिए नहीं; देश को इस समय आवश्यकता है एकता और संगठन की, राष्ट्रधर्म और विज्ञान साधना की, संयम और ब्रह्मचर्य की। टिहरी (गढ़वाल) से उन्हें अगाध स्नेह था। वे पुन: यहाँ लौटकर आये। टिहरी उनकी आध्यात्मिक प्रेरणास्थली थी और वही उनकी मोक्षस्थली भी बनी। १९०६ की दीपावली के दिन उन्होंने मृत्यु के नाम एक सन्देश लिखकर गंगा में जलसमाधि ले ली। रामतीर्थ के जीवन का प्रत्येक पक्ष आदर्शमय था वे एक आदर्श विद्यार्थी, आदर्श गणितज्ञ, अनुपम समाज-सुधारक व देशभक्त, दार्शनिक कवि और प्रज्ञावान सन्त थे। सिद्धान्त और सन्देश right|thumb|200px|स्वामी रामतीर्थ पर पुस्तक स्वामी रामतीर्थ शंकराचार्य के अद्वैतवाद के समर्थक थे, पर उसकी सिद्धि के लिये उन्होंने स्वानुभव को ही महत्वपूर्ण माना है। वे कहते हैं - हमें धर्म और दर्शनशास्त्र भौतिकविज्ञान की भाँति पढ़ना चाहिये। पाश्चात्य दर्शन केवल जाग्रतावस्था पर आधारित हैं, उनके द्वारा सत्य का दर्शन नहीं होता। यथार्थ तत्व वह है जो जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति के आधार में सत् चित् और आनन्द रूप से विद्यमान है। वहीं वास्तविक आत्मा है। उनकी दृष्टि में सारा संसार केवल एक आत्मा का खेल है। जिस शक्ति से हम बोलते हैं, उसी शक्ति से उदर में अन्न पचता है। उनमें कोई अन्तर नहीं। जो शक्ति एक शरीर में है, वही सब शरीरों में है। जो जंगम में है, वही स्थावर में है। सबका आधार है हमारी आत्मा। वे विकासवाद के समर्थक थे। मनुष्य भिन्न-भिन्न श्रेणियों है। कोई अपने परिवार के, कोई जाति के, कोई समाज के और कोई धर्म के घेरे से घिरा हुआ है। उसे घेरे के भीतर की वस्तु अनुकूल और घेरे से बाहर की प्रतिकूल लगती है। यही संकीर्णता अनर्थों की जड़ है। प्रकृति में कोई वस्तु स्थिर नहीं। अपनी सहानुभति के घेरे भी फैलना चाहिये। सच्चा मनुष्य वह है, जो देशमय होने के साथ-साथ विश्वमय हो जाता है। वे आनन्द को ही जीवन का लक्ष्य मानते हैं पर जन्म से मरण पर्यंन्त हम अपने आनन्द-केन्द्रों को बदलते रहते हैं। कभी किसी पदार्थ में सुख मानते हैं और कभी किसी व्यक्ति में। आनन्द का स्रोत हमारी आत्मा है। हम उसके लिए प्राणों का भी उत्सर्ग देते हैं। जब से भारतवासियों ने अपने आत्मस्वरूप को भुलाकर हृदय से अपने आपको दास मानना प्रारम्भ किया हम पतनोन्मुख हुए। प्रवृत्ति अटल और शाश्वत है। स्मृति गौण है, उसे देशकालानुसार बदलना चाहिये। श्रम-विभाजन के आधार पर वर्ण-व्यवस्था किसी समय समाज के लिए हितकर थी, पर आज हमने उसके नियमों को अटल बना कर समाज के टुकड़े-टुकड़े कर दिये। आज देश के सामने एक ही धर्म है-राष्ट्रधर्म। अब शारीरिक सेवा और श्रम केवल शूद्रों का कर्तव्य नहीं माना जा सकता। सभी को अपनी सारी शक्तियों को देशोत्थान के कार्यों में लगाना चाहिये। भारत के साथ तादात्म्य होने वाली भविष्यवाणी उन्होंने की थी-"चाहे एक शरीर द्वारा, चाहे अनेक शरीरों द्वारा काम करते हुए राम प्रतिज्ञा करता है कि बीसवीं शताब्दी के अर्धभाग के पूर्व ही भारत स्वतन्त्र होकर उज्ज्वल गौरव को प्राप्त करेगा। उन्हों ने अपने एक पत्र में लाला हरदयाल को लिखा था -" हिन्दी में प्रचार कार्य प्रारम्भ करो। वही स्वतन्त्र भारत की राष्ट्रभाषा होगी।" केवल तीन शब्दों में उनका सन्देश निहित है - त्याग और प्रेम। स्वामी रामतीर्थ की रचनायें डॉ॰ विश्वनाथ प्रसाद वर्मा की पुस्तक आधुनिक भारतीय राजनीतिक चिन्तन में उल्लिखित तथ्योंस्वाधीनता संग्राम के क्रान्तिकारी साहित्य का इतिहास (भाग-दो) पृष्ठ ४२४-४२५ के आधार पर स्वामी रामतीर्थ की रचनायें इस प्रकार हैं: गैर मुल्कों के तजुर्बे (लेख और व्याख्यान), वार्तालाप (लेख और व्याख्यान), उन्नति का मार्ग (लेख और उपदेश), सफलता की कुंजी, हमारा राष्ट्रीय धर्म, मानवता और विश्व-प्रेम, विश्वधर्म, भारत का भविष्यविश्वनाथ प्रसाद वर्मा की पुस्तक आधुनिक भारतीय राजनीतिक चिन्तन पृष्ठ १५८ सन्दर्भ डॉ॰ मदनलाल वर्मा 'क्रान्त' स्वाधीनता संग्राम के क्रान्तिकारी साहित्य का इतिहास (३ खण्डों में) २००६ प्रवीण प्रकाशन ४७६०/६१ (दूसरी मंजिल) २३ अंसारी रोड दरियागंज नई दिल्ली-११०००२ ISBN 81-7783-122-4 मदन लाल वर्मा 'क्रान्त' मन की लहर (रामप्रसाद 'बिस्मिल' की कवितायें)'' २००६ प्रवीण प्रकाशन ४७६०-६१ (दूसरी मंजिल) २३ अन्सारी रोड दरियागंज नई दिल्ली- ११०००२ ISBN 81-7783-127-5 बाहरी कड़ियाँ स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली २८ भागों में Complete Works of Swami Rama Tirtha - In Woods Of God-Realization - 10 Volumes स्वामी रामतीर्थ का राष्ट्रप्रेमजून 2020 InternetArchiveBot (डॉ सतीशचन्द्र मित्तल; पाञ्चजन्य में) सतत् यायावर स्वामी रामतीर्थ स्वामी रामतीर्थ : सफलता का रहस्य स्वामी रामतीर्थ के विचार बाहरी कड़ियाँ Rama Tirtha श्रेणी:स्वामी रामतीर्थ सन्दर्भ श्रेणी:हिन्दू आध्यात्मिक नेता