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411 समाचार
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मार्जिन (वित्त)

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सितंबर 2026सितंबर 2026 मार्जिन (अंग्रेज़ी: Margin) वित्त तथा प्रतिभूति व्यापार के क्षेत्र में प्रयुक्त एक शब्द है, जो उस नकद राशि अथवा प्रतिभूतियों को दर्शाता है, जिन्हें किसी उधार-आधारित (लीवरेज्ड) खाते में जमानत (कोलैटरल) के रूप में रखा जाता है, ताकि दलाल (ब्रोकर) को किसी प्रतिकूल मूल्य परिवर्तन से सुरक्षा मिल सके। मार्जिन के माध्यम से निवेशक अपने पास उपलब्ध पूँजी से कहीं अधिक मूल्य की प्रतिभूतियाँ या अनुबंध ख़रीद अथवा बेच सकते हैं, क्योंकि शेष राशि दलाल से उधार के रूप में प्राप्त होती है। लीवरेज एवं मार्जिन व्यापार "मार्जिन पर व्यापार" (मार्जिन ट्रेडिंग) का अर्थ है दलाली फर्म से धनराशि उधार लेकर उतनी अधिक प्रतिभूतियाँ ख़रीदना जितनी कि केवल अपनी पूँजी से संभव न होतीं, जिसमें निवेशक की मौजूदा प्रतिभूतियाँ ही जमानत के रूप में कार्य करती हैं। उदाहरणस्वरूप, यदि मार्जिन आवश्यकता 50 प्रतिशत हो और निवेशक 10,000 डॉलर मूल्य का व्यापार करना चाहे, तो उसे स्वयं केवल 5,000 डॉलर नकद जमा करने होंगे; शेष राशि दलाल द्वारा उधार दी जाती है। इस उधार राशि पर निवेशक को ब्याज भी चुकाना होता है। यद्यपि मार्जिन व्यापार निवेशकों की क्रय-शक्ति को बढ़ाता है, यह जोखिम को भी उसी अनुपात में बढ़ा देता है, क्योंकि हानि होने पर वह निवेशक की मूल पूँजी से भी अधिक हो सकती है। मार्जिन कॉल जब मार्जिन खाते में रखी गई इक्विटी (शुद्ध पूँजी) दलाल द्वारा निर्धारित न्यूनतम अनुरक्षण मार्जिन (मेंटेनेंस मार्जिन) से नीचे गिर जाती है, तब दलाल निवेशक से अतिरिक्त धनराशि अथवा प्रतिभूतियाँ जमा करने की माँग करता है, जिसे "मार्जिन कॉल" कहा जाता है। यदि निवेशक निर्धारित समय के भीतर आवश्यक राशि जमा नहीं करता, तो दलाल उसके खाते में मौजूद प्रतिभूतियों को बलपूर्वक बेचकर (लिक्विडेट करके) हानि की भरपाई कर सकता है। संयुक्त राज्य अमेरिका में वित्तीय उद्योग नियामक प्राधिकरण (FINRA) के नियमों के अंतर्गत अधिकांश प्रतिभूतियों के लिए न्यूनतम अनुरक्षण मार्जिन कम से कम 25 प्रतिशत निर्धारित है, यद्यपि अनेक दलाली फर्में इससे भी अधिक कठोर आवश्यकताएँ लागू करती हैं। जोखिम मार्जिन व्यापार को प्रायः एक ऐसे यांत्रिक उपकरण के रूप में वर्णित किया जाता है जो निवेशक की क्रय-क्षमता तथा संभावित लाभ को बढ़ाता है, परंतु साथ ही यह हानि को भी उसी अनुपात में बढ़ा देता है। मूल्य में प्रतिकूल परिवर्तन होने पर निवेशक को अपने मूल निवेश से कहीं अधिक की हानि उठानी पड़ सकती है, जिससे विनियामक संस्थाएँ निवेशकों की सुरक्षा हेतु न्यूनतम मार्जिन आवश्यकताएँ अनिवार्य करती हैं। सन्दर्भ श्रेणी:वित्त बाज़ार