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नाथन सोदरब्लोम
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नाथन सोदरब्लोम Nathan Söderblom Nathan Söderblom.jpg नाथन सोदरब्लोम, उप्साला के आर्कबिशप लार्स ओलोफ जोनाथन सोदरब्लोम 1866 1 15 yes ट्रोनो (Trönö), स्वीडन 1931 7 12 1866 1 15 yes उप्साला, स्वीडन स्वीडिश उप्साला विश्वविद्यालय पादरी, धर्मशास्त्री, आर्कबिशप उप्साला के आर्कबिशप (1914–1931) नोबेल शांति पुरस्कार (1930) अन्ना फोर्सल
नाथन सोदरब्लोम (Nathan Söderblom; जन्म: लार्स ओलोफ जोनाथन सोदरब्लोम; 15 जनवरी 1866 – 12 जुलाई 1931) एक स्वीडिश पादरी, धर्मशास्त्री और उप्साला के आर्कबिशप थे। उन्हें मुख्य रूप से ईसाई धर्म के भीतर एकता स्थापित करने और विश्व शांति के लिए किए गए उनके महत्वपूर्ण प्रयासों के लिए जाना जाता है। प्रथम विश्व युद्ध के बाद धार्मिक एकता और शांति की दिशा में उनके असाधारण योगदान के लिए उन्हें 1930 में नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।https://www.nobelprize.org/prizes/peace/1930/soderblom/biographical/ Nathan Söderblom - Biographical Nobel Prize Outreach AB 25 मई 2024 वे 'एकुमेनिकल आंदोलन' (विश्वव्यापी चर्च आंदोलन) के प्रमुख संस्थापकों में से एक माने जाते हैं।
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
नाथन सोदरब्लोम का जन्म 15 जनवरी 1866 को स्वीडन के गावलेबोर्ग काउंटी के ट्रोनो नामक गाँव में हुआ था। उनके पिता जोनास सोदरब्लोम एक धर्मनिष्ठ पादरी थे, जिनकी धार्मिक मान्यताओं का नाथन के प्रारंभिक जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा। सोदरब्लोम ने अपनी स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद 1883 में स्वीडन के प्रतिष्ठित उप्साला विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया। वहाँ उन्होंने धर्मशास्त्र (Theology) और मानविकी का गहन अध्ययन किया। 1892 में उन्होंने अपनी धर्मशास्त्र की डिग्री पूरी की और 1893 में उन्हें स्वीडिश चर्च में एक पादरी के रूप में नियुक्त कर दिया गया।https://www.britannica.com/biography/Nathan-Soderblom Nathan Söderblom: Swedish archbishop Encyclopedia Britannica 25 मई 2024
करियर और विश्वव्यापी शांति आंदोलन
पादरित्व ग्रहण करने के बाद, सोदरब्लोम ने पेरिस में स्वीडिश दूतावास के पादरी के रूप में भी कार्य किया (1894 से 1901 तक)। इस दौरान उन्होंने विभिन्न संस्कृतियों और धार्मिक परंपराओं को करीब से समझा। इसके बाद वे उप्साला विश्वविद्यालय और जर्मनी के लीपज़िग विश्वविद्यालय में धर्मशास्त्र के प्रोफेसर बने।
1914 में, सोदरब्लोम को उप्साला का आर्कबिशप (Archbishop of Uppsala) चुना गया, जो स्वीडन के चर्च का सर्वोच्च और सबसे गरिमामयी पद है। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान और उसके बाद की विभीषिका को देखकर उन्होंने महसूस किया कि दुनिया में शांति और करुणा स्थापित करने के लिए सभी ईसाई संप्रदायों को अपने मतभेद भुलाकर एकजुट होना चाहिए। इसी उद्देश्य से उन्होंने "जीवन और कार्य" (Life and Work) आंदोलन की शुरुआत की।
1925 में, सोदरब्लोम ने स्टॉकहोम में 'यूनिवर्सल क्रिश्चियन कॉन्फ्रेंस ऑन लाइफ एंड वर्क' का सफलतापूर्वक आयोजन किया। इस ऐतिहासिक सम्मेलन में विश्व भर के विभिन्न चर्चों के नेताओं ने भाग लिया। उनका यह प्रयास भविष्य में 'वर्ल्ड काउंसिल ऑफ चर्चेस' की स्थापना का प्रमुख आधार बना।
नोबेल पुरस्कार और निधन
अंतरराष्ट्रीय समझ, सद्भाव और धार्मिक एकता के माध्यम से विश्व में शांति को बढ़ावा देने के उनके अथक और निस्वार्थ प्रयासों की वैश्विक स्तर पर सराहना हुई। इसी के परिणामस्वरूप, नाथन सोदरब्लोम को 1930 में नोबेल शांति पुरस्कार प्रदान किया गया।
नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने के मात्र एक वर्ष बाद, 12 जुलाई 1931 को 65 वर्ष की आयु में उप्साला में उनका निधन हो गया। उन्हें उप्साला कैथेड्रल में दफनाया गया। उनके द्वारा स्थापित धार्मिक सहिष्णुता और विश्व शांति का मार्ग आज भी प्रासंगिक है।
इन्हें भी देखें
नोबेल शांति पुरस्कार
नोबेल पुरस्कार विजेताओं की सूची
सन्दर्भ
बाहरी कड़ियाँ
NobelPrize.org पर नाथन सोदरब्लोम के तथ्य