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स्नानगृह में गान
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स्नानगृह में गान, जिसे स्नानगृह-गायन, स्नान करते समय गान अथवा शावर में गान भी कहा जाता है, एक व्यापक रूप से प्रचलित प्रवृत्ति है।
बहुतेरे जन स्नानगृह में गाते हैं क्योंकि वहाँ की कठोर भीतें, प्रायः टाइल अथवा काष्ठ-पट्टिकाओं से निर्मित, तथा मृदु वस्त्रों का अभाव, श्रवण के लिये सुखद ध्वनि-परिवेश उत्पन्न करते हैं।
वैज्ञानिक विवेचन
भीतों से ध्वनि की बहुविध परावृत्तियाँ स्वर को समृद्ध करती हैं। एक सामान्य स्नानगृह की लघु आयामों और कठोर सतहों के कारण स्थायी तरङ्गें, प्रतिध्वनि तथा गूँज उत्पन्न होती हैं, जिससे स्वर में "गम्भीरता और गहराई" आती है।http://www.musiciansfriend.com/document?doc_id=89423&g=home&src=3SOSWXXA musiciansfriend.com" "Studio Tech Tip – Taming the wild bedroom" Musiciansfriend.com 2014-06-25
यह प्रवृत्ति शताब्दियों पूर्व भी वर्णित की गयी थी। उदाहरणार्थ, इब्न ख़ल्दून ने अपनी कृति ‘मुक़द्दिमा’ के प्रथम अध्याय में लिखा है—http://www.muslimphilosophy.com/ik/Muqaddimah/Chapter1/Ch_1_04.htm Ibn Khaldun, Muqaddimah, section "The influence of the air (climate) upon human character" from Ch. 1 Muslimphilosophy.com 2014-06-25"जैसे ही कोई व्यक्ति उष्ण स्नान का आनन्द लेता है और उस स्नानगृह की वायु को श्वास द्वारा ग्रहण करता है, जिससे वह उष्णता उसकी आत्मा में प्रवेश करती है और उसे उष्ण बनाती है, तब वह आनन्द की अनुभूति करता है। प्रायः ऐसा होता है कि वह गान आरम्भ कर देता है, क्योंकि गान का मूल स्रोत हर्ष है।"
सन्दर्भ
श्रेणी:आदतें