Skip to main content

  | मौसम…

411 समाचार
Public archive edition · Attributed source reporting with original dates · AI drafts are excluded

411 REFERENCE · Wikipedia

योग

Reference material by Wikipedia contributors. This retains its source identity and is not 411 news reporting.

१२वीं-१३वीं शताब्दी के एक भारतीय चित्र में योगी तथा योगिनी A yogi seated in a garden.jpg 140 A male yogi Female Ascetics (Yoginis) LACMA M.2011.156.4 (1 of 2).jpg 160 Two female yoginis thumb|right|200px|पद्मासन मुद्रा में यौगिक ध्यानस्थ शिव-मूर्ति योग (sa योगः) प्राचीन भारतीय ऋषिमुनियों और तत्त्ववेत्ताओं द्वारा प्रतिपादित एक विशिष्ट आध्यात्मिक प्रक्रिया है। पतंजलि ने 'चित्त की वृत्तियों के निरोध' को योग कहा है और इसके आठ अंग (अष्टांग) बताए हैं- यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि। व्यास ने समाधि को ही योग माना है। योगवासिष्ठ के अनुसार योग वह युक्ति है जिसके द्वारा संसार सागर से पार जाया जा सकता है। योग के कई सारे अंग और प्रकार होते हैं, जिनके जरिए हमें ध्यान, समाधि और मोक्ष तक पहुंचना होता हैै। 'योग' शब्द तथा इसकी प्रक्रिया और धारणा हिन्दू धर्म, जैन धर्म और बौद्ध धर्म में ध्यान प्रक्रिया से सम्बन्धित है। योग शब्द भारत से बौद्ध पन्थ के साथ चीन, जापान, तिब्बत, दक्षिण पूर्व एशिया और श्रीलंका में भी फैल गया है और इस समय सारे सभ्य जगत्‌ में लोग इससे परिचित हैं। सिद्धि के बाद पहली बार ११ दिसम्बर २०१४ को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने प्रत्येक वर्ष २१ जून को विश्व योग दिवस के रूप में मान्यता दी है। हिन्दू धर्म, जैन धर्म और बौद्ध धर्म में योग के अनेक सम्प्रदाय हैं, योग के विभिन्न लक्ष्य हैं तथा योग के अलग-अलग व्यवहार हैं।Denise Lardner Carmody, John Carmody (1996), Serene Compassion. Oxford University Press US. p. 68. Stuart Ray Sarbacker, Samādhi: The Numinous and Cessative in Indo-Tibetan Yoga. SUNY Press, 2005, pp. 1–2. तत्त्वार्थसूत्र [6.1], देखें मनु दोषी (2007) Translation of Tattvarthasutra, Ahmedabad: Shrut Ratnakar p. 102 परम्परागत योग तथा इसका आधुनिक रूप विश्व भर में प्रसिद्ध हैं। सबसे पहले 'योग' शब्द का उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है। इसके बाद अनेक उपनिषदों में इसका उल्लेख आया है। कठोपनिषद में सबसे पहले योग शब्द उसी अर्थ में प्रयुक्त हुआ है जिस अर्थ में इसे आधुनिक समय में समझा जाता है। माना जाता है कि कठोपनिषद की रचना ईसापूर्व पच्चीसवी और तीसवी शताब्दी ईसापूर्व के बीच के कालखण्ड में हुई थी। पतञ्जलि का योगसूत्र योग का सबसे पूर्ण ग्रन्थ है। इसका रचनाकाल ईसा की प्रथम शताब्दी या उसके आसपास माना जाता है। हठ योग के ग्रन्थ ९वीं से लेकर ११वीं शताब्दी में रचे जाने लगे थे। इनका विकास तन्त्र से हुआ। पश्चिमी जगत में "योग" को हठयोग के आधुनिक रूप में लिया जाता है जिसमें शारीरिक फिटनेस, तनाव-शैथिल्य तथा विश्रान्ति (relaxation) की तकनीकों की प्रधानता है। ये तकनीकें मुख्यतः आसनों पर आधारित हैं जबकि परम्परागत योग का केन्द्र बिन्दु ध्यान है और वह सांसारिक लगावों से छुटकारा दिलाने का प्रयास करता है। पश्चिमी जगत में आधुनिक योग का प्रचार-प्रसार भारत से उन देशों में गये गुरुओं ने किया जो प्रायः स्वामी विवेकानन्द की पश्चिमी जगत में प्रसिद्धि के बाद वहाँ गये थे। व्युत्पत्ति, परिभाषा एवं प्रकार योग शब्द युज् धातु में ‘घञ्’ प्रत्यय लगाने से निष्पन्न होता है। धातुपाठ में युज्‌ शब्द के तीन अर्थ उपलब्ध होते हैं - समाधि, संयोग, संयमन । लेकिन योगशात्र का प्रतिपादक शब्द निःसन्देह दिवादिगणीय "युज्" धातु से बना है जिसका व्युत्पत्ति लभ्य अर्थ है 'समाधि' । व्यास जी ने स्पष्ट शब्दों में कहा है - "योगः समाधिः"। वैसे ‘योग’ शब्द ‘युजिर योगे’ तथा ‘युज संयमने’ धातु से भी निष्पन्न होता है किन्तु तब इस स्थिति में योग शब्द का अर्थ क्रमशः योगफल, जोड़ तथा नियमन होगा। आगे योग में हम देखेंगे कि आत्मा और परमात्मा के विषय में भी योग कहा गया है। पाणिनीय गणपाठ में तीन 'युज्' धातुओं का पाठ मिलता हैं - १) युज् समाधौ – दिवादिगणीय २) युजिर् योगे – रुधादिगणीय ३) युज् संयमने - चुरादिगणीय युज् समाधौ – दिवादिगणीय युज् धातु का अर्थ है, समाधि । समाधि का प्रकृति प्रत्यय अर्थ है, सम्यक् स्थापन। दूसरे अर्थ मे समाधि की सिद्धि के लिए जुड़ना । युजिर् योगे – रुधादिगणीय युज् धातु का अर्थ है, जुड़ना, जोड़ना, मेल करना, संयोग करना अर्थात् इस दु:ख रूप संसार से वियोग तथा ईश्वर से संयोग का नाम योग है । भगवद्गीता में भी वर्णन मिलता है - तं विद्यात् दुखंसंयोगवियोगं योग संज्ञितम् । (6/23) युज् संयमने – चुरादिगणीय युज् धातु का अर्थ है, संयमन अर्थात् मन का संयम अथवा मन का नियमन । मन को संयमित करना ही योग है। इस प्रकार योग का अर्थ हुआ - "योग साधनाओं को अपनाते हुए मन को नियन्त्रित कर, संयमित कर, आत्मा का परमात्मा से मिलन" । परिभाषा ऐसी होनी चाहिए जो अव्याप्ति और अतिव्याप्ति दोषों से मुक्त हो, योग शब्द के वाच्यार्थ का ऐसा लक्षण बतला सके जो प्रत्येक प्रसंग के लिये उपयुक्त हो और योग के सिवाय किसी अन्य वस्तु के लिये उपयुक्त न हो। भगवद्गीता प्रतिष्ठित ग्रन्थ माना जाता है। उसमें योग शब्द का कई बार प्रयोग हुआ है, कभी अकेले और कभी सविशेषण, जैसे बुद्धियोग, सन्यासयोग, कर्मयोग। वेदोत्तर काल में भक्तियोग और हठयोग नाम भी प्रचलित हो गए हैं। पतंजलि योगदर्शन में 'क्रियायोग' शब्द देखने में आता है। पाशुपत योग और माहेश्वर योग जैसे शब्दों के भी प्रसंग मिलते है। इन सब स्थलों में योग शब्द के जो अर्थ हैं वह एक दूसरे से भिन्न हैं । गीता में श्रीकृष्ण ने एक स्थल पर कहा है 'योगः कर्मसु कौशलम्‌' ( कर्मों में कुशलता ही योग है।) यह वाक्य योग की परिभाषा नहीं है। कुछ विद्वानों का यह मत है कि जीवात्मा और परमात्मा के मिल जाने को योग कहते हैं। इस बात को स्वीकार करने में यह बड़ी आपत्ति खड़ी होती है कि बौद्धमतावलम्बी भी, जो परमात्मा की सत्ता को स्वीकार नहीं करते, योग शब्द का व्यवहार करते और योग का समर्थन करते हैं। यही बात सांख्यवादियों के लिए भी कही जा सकती है जो ईश्वर की सत्ता को असिद्ध मानते हैं। पतञ्जलि ने योगसूत्र में, जो परिभाषा दी है 'योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः', चित्त की वृत्तियों के निरोध का नाम योग है। इस वाक्य के दो अर्थ हो सकते हैं: चित्तवृत्तियों के निरोध की अवस्था का नाम योग है या इस अवस्था को लाने के उपाय को योग कहते हैं। परन्तु इस परिभाषा पर कई विद्वानों को आपत्ति है। उनका कहना है कि चित्तवृत्तियों के प्रवाह का ही नाम चित्त है। पूर्ण निरोध का अर्थ होगा चित्त के अस्तित्व का पूर्ण लोप, चित्ताश्रय समस्त स्मृतियों और संस्कारों का निःशेष हो जाना। यदि ऐसा हो जाए तो फिर समाधि से उठना संभव नहीं होगा। क्योंकि उस अवस्था के सहारे के लिये कोई भी संस्कार बचा नहीं होगा, प्रारब्ध दग्ध हो गया होगा। निरोध यदि संभव हो तो श्रीकृष्ण के इस वाक्य का क्या अर्थ होगा? योगस्थः कुरु कर्माणि, योग में स्थित होकर कर्म करो। विरुद्धावस्था में कर्म हो नहीं सकता और उस अवस्था में कोई संस्कार नहीं पड़ सकते, स्मृतियाँ नहीं बन सकतीं, जो समाधि से उठने के बाद कर्म करने में सहायक हों। संक्षेप में आशय यह है कि योग के शास्त्रीय स्वरूप, उसके दार्शनिक आधार, को सम्यक्‌ रूप से समझना बहुत सरल नहीं है। संसार को मिथ्या माननेवाला अद्वैतवादी भी निदिध्याह्न के नाम से उसका समर्थन करता है। अनीश्वरवादी सांख्य विद्वान भी उसका अनुमोदन करता है। बौद्ध ही नहीं, मुस्लिम सूफ़ी और ईसाई मिस्टिक भी किसी न किसी प्रकार अपने संप्रदाय की मान्यताओं और दार्शनिक सिद्धांतों के साथ उसका सामंजस्य स्थापित कर लेते हैं। इन विभिन्न दार्शनिक विचारधाराओं में किस प्रकार ऐसा समन्वय हो सकता है कि ऐसा धरातल मिल सके जिस पर योग की भित्ति खड़ी की जा सके, यह बड़ा रोचक प्रश्न है परंतु इसके विवेचन के लिये बहुत समय चाहिए। यहाँ उस प्रक्रिया पर थोड़ा सा विचार कर लेना आवश्यक है जिसकी रूपरेखा हमको पतंजलि के सूत्रों में मिलती है। थोड़े बहुत शब्दभेद से यह प्रक्रिया उन सभी समुदायों को मान्य है जो योग के अभ्यास का समर्थन करते हैं। परिभाषा (१) पातञ्जल योग दर्शन के अनुसार - योगश्चित्तवृतिनिरोधः (1/2) अर्थात् चित्त की वृत्तियों का निरोध ही योग है। (२) सांख्य दर्शन के अनुसार - पुरुषप्रकृत्योर्वियोगेपि योगइत्यमिधीयते। अर्थात् पुरुष एवं प्रकृति के पार्थक्य को स्थापित कर पुरुष का स्व स्वरूप में अवस्थित होना ही योग है। (३) विष्णुपुराण के अनुसार - योगः संयोग इत्युक्तः जीवात्म परमात्मने अर्थात् जीवात्मा तथा परमात्मा का पूर्णतया मिलन ही योग है। (४) भगवद्गीता के अनुसार - सिद्धासिद्धयो समोभूत्वा समत्वं योग उच्चते (2/48) अर्थात् दुःख-सुख, लाभ-अलाभ, शत्रु-मित्र, शीत और उष्ण आदि द्वन्दों में सर्वत्र समभाव रखना योग है। (५) भगवद्गीता के अनुसार - तस्माद्दयोगाययुज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् अर्थात् कर्त्तव्य कर्म बन्धक न हो, इसलिए निष्काम भावना से अनुप्रेरित होकर कर्त्तव्य करने का कौशल योग है। (६) आचार्य हरिभद्र के अनुसार - मोक्खेण जोयणाओ सव्वो वि धम्म ववहारो जोगो अर्थात् मोक्ष से जोड़ने वाले सभी व्यवहार योग हैं। (७) बौद्ध धर्म के अनुसार - कुशल चितैकग्गता योगः अर्थात् कुशल चित्त की एकाग्रता योग है। भारतीय दार्शनिक और धार्मिक परंपराओं में "योग" शब्द को अलग-अलग तरीकों से परिभाषित किया गया है। मूल ग्रन्थ अनुमानित रचना-काल योग की परिभाषामैत्रायणी उपनिषद लगभग चतुर्थ शताब्दी ईसापूर्व कत्वं प्राणमनसोरिन्द्रियाणां तथैव च। सर्वभाव परित्यागो योग इत्यभिधीयते॥ -- मैत्रायणी उपनिषद् 6/25 अर्थात् प्राण, मन व इन्द्रियों का एक हो जाना, एकाग्रावस्था को प्राप्त कर लेना, बाह्म विषयों से विमुख होकर इन्द्रियों का मन में और मन आत्मा में लग जाना, प्राण का निष्चल हो जाना योग है। वैशेषिक सूत्र लगभग चौथी शताब्दी ईसा पूर्व तदनारम्भ आत्मस्ये मनसि शरीरस्य दुःखाभावः संयोगः। -- वैशेषिक सूत्र 6/2/16 अर्थात् मन आत्मा में स्थिर होने पर उसके (मन के) कार्य का अनारम्भ है, वह योग है। कठोपनिषद ईसा पूर्व की अंतिम शताब्दियाँ यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह।बुद्धिश्च न विचेष्टते तामाहुः परमां गतिम्॥तां योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्द्रियधारणाम्‌।अप्रमत्तस्तदा भवति योगो हि प्रभवाप्ययौ ॥ -- कठोपनिषद 6 / 10-11, नचिकेता और यम के बीच सम्वादजब मन के साथ समस्त ज्ञानेन्द्रियाँ भलीभाँति स्थिर हो जाती है तथा बुद्धि की भी कोई चेष्टा नहीं रहती, तब इस अवस्था को परमागति कहते हैं । उसी स्थिर इन्द्रिय-धारणा को योग कहते हैं। उस अवस्था में साधक प्रमाद रहित होता है। क्योंकि 'योग' ही पदार्थों का उद्भव तथा लय (प्रभवाव्ययौ) दोनों ही है। भगवद्गीता लगभग दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व "सफलता और असफलता दोनों में समभाव (एक समान) रहो। ऐसी समता ही योग कहलाती है।" (2.48) "कर्मों में कुशलता ही योग है।" (2.50) "यह जानो कि जिसे योग कहा जाता है, वह दुःख के संयोग से वियोग (दुःखों से मुक्ति) है।" (6.23) पतंजलि योगसूत्र लगभग प्रारंभिक शताब्दियाँ ईस्वी 1.2. योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः – "चित्त की वृत्तियों का रुक जाना ही योग है।"1.3. तब पुरुष योगभाष्य योगसूत्र के समान ही योगः समाधिः - "समाधि ही योग है," जो एकाग्रता और निरुद्ध यानी विषय-रहित समाधि (असम्प्रज्ञात समाधि) को संदर्भित करता है। योगाचारभूमि-शास्त्र (श्रावकभूमि), एक महायान बौद्ध योगाचार ग्रंथ "योग चार प्रकार का है: श्रद्धा (विश्वास), आकांक्षा, दृढ़ता और उपाय।" (2.152) पाशुपत सूत्र पर कौंडिन्य का पञ्चार्थभाष्य चौथी शताब्दी ईस्वी "इस प्रणाली में, जीवात्मा और ईश्वर (प्रभु) का मिलन ही योग है।" (I.I.43) हरिभद्र सूरी द्वारा रचित एक जैन धर्म छठी शताब्दी ईस्वी "दृढ़ विश्वास के साथ, योगियों के स्वामियों ने हमारे सिद्धांत में योग को सम्यक् ज्ञान से शुरू होने वाले तीनों [सम्यक् ज्ञान, सम्यक् दर्शन और सम्यक् चारित्र] के संयोग (सम्बन्धः) के रूप में परिभाषित किया है, क्योंकि [इससे] मोक्ष के साथ जुड़ाव होता है.... आम बोलचाल में यह [योग] शब्द इनके कारणों के साथ [आत्मा के] संपर्क को भी दर्शाता है, क्योंकि कार्य के लिए कारण का उपयोग सामान्य है।" (2, 4) लिंग पुराण 7वीं–10वीं शताब्दी ईस्वी " 'योग' शब्द से तात्पर्य निर्वाण से है, जो शिव की स्थिति है।" (I.8.5a) आदि शंकराचार्य का ब्रह्मसूत्र-भाष्य लगभग 8वीं शताब्दी ईस्वी "योग के ग्रंथों में कहा गया है: 'योग वास्तविकता (तत्त्व) को जानने का साधन है' (अथ तत्त्वदर्शनभ्युपायो योगः)" (2.1.3) मालिनीविजयोत्तर तन्त्र, अद्वैत कश्मीर शैव दर्शन के प्राथमिक ग्रंथों में से एक 6ठी–10वीं शताब्दी ईस्वी "एक सत्ता का दूसरी सत्ता के साथ एक हो जाना योग कहा जाता है।" (4.4-8) शैव सिद्धांत के विद्वान नारायणकण्ठ की मृगेन्द्रतन्त्रवृत्ति 6ठी–10वीं शताब्दी ईस्वी "आत्म-नियंत्रण (स्वामित्व) प्राप्त करना ही योगी होना है। योगी शब्द का अर्थ है 'वह जो अनिवार्य रूप से अपने स्वरूप की अभिव्यक्ति... शिव-त्व (शिवत्वम्) से संयुक्त' हो।" (yp 2a) लक्ष्मणदेशिकेन्द्र का शारदातिलक, एक शाक्त धर्म 11वीं शताब्दी ईस्वी "योग के विशेषज्ञ कहते हैं कि जीवात्मा का आत्मा योगबीज, एक हठयोग ग्रंथ 14वीं शताब्दी ईस्वी "अपान और प्राण, अपने स्वयं के रज और वीर्य, सूर्य और चंद्रमा, जीवात्मा और परमात्मा का मिलन, और इसी प्रकार सभी द्वंद्वों का मिलन योग कहलाता है।" (89) योग के प्रकार योग की उच्चावस्था समाधि, मोक्ष, कैवल्य आदि तक पहुँचने के लिए अनेकों साधकों ने जो साधन अपनाये उन्हीं साधनों का वर्णन योग ग्रन्थों में समय समय पर मिलता रहा। उसी को योग के प्रकार से जाना जाने लगा। योग की प्रामाणिक पुस्तकों में शिवसंहिता तथा गोरक्षशतक में योग के चार प्रकारों का वर्णन मिलता है - मंत्रयोगों हष्ष्चैव लययोगस्तृतीयकः। चतुर्थो राजयोगः (शिवसंहिता , 5/11) मंत्रो लयो हठो राजयोगन्तर्भूमिका क्रमात् एक एव चतुर्धाऽयं महायोगोभियते॥ (गोरक्षशतकम् ) उपर्युक्त दोनों श्लोकों से योग के प्रकार हुए : मंत्रयोग, हठयोग लययोग व राजयोग। मंत्रयोग मन्त्र योग 'मंत्र' का समान्य अर्थ है- 'मननात् त्रायते इति मन्त्रः'। मन को त्राय (पार कराने वाला) मंत्र ही है। मन्त्र योग का सम्बन्ध मन से है, मन को इस प्रकार परिभाषित किया है- मनन इति मनः। जो मनन, चिन्तन करता है वही मन है। मन की चंचलता का निरोध मंत्र के द्वारा करना मंत्र योग है। मंत्र योग के बारे में योगतत्वोपनिषद में वर्णन इस प्रकार है- योग सेवन्ते साधकाधमाः। ( अल्पबुद्धि साधक मंत्रयोग से सेवा करता है अर्थात मंत्रयोग उन साधकों के लिए है जो अल्पबुद्धि है।) मंत्र से ध्वनि तरंगें पैदा होती है मंत्र शरीर और मन दोनों पर प्रभाव डालता है। मंत्र में साधक जप का प्रयोग करता है मंत्र जप में तीन घटकों का काफी महत्व है वे घटक-उच्चारण, लय व ताल हैं। तीनों का सही अनुपात मंत्र शक्ति को बढ़ा देता है। मंत्रजप मुख्यरूप से चार प्रकार से किया जाता है। (1) वाचिक (2) मानसिक (3) उपांशु (4) अजप्पा । हठयोग हठयोग हठ का शाब्दिक अर्थ हठपूर्वक किसी कार्य को करने से लिया जाता है। हठ प्रदीपिका पुस्तक में हठ का अर्थ इस प्रकार दिया है- हकारेणोच्यते सूर्यष्ठकार चन्द्र उच्यते। सूर्या चन्द्रमसो र्योगाद्धठयोगोऽभिधीयते॥ ह का अर्थ सूर्य तथा ठ का अर्थ चन्द्र बताया गया है। सूर्य और चन्द्र की समान अवस्था हठयोग है। शरीर में कई हजार नाड़ियाँ है उनमें तीन प्रमुख नाड़ियों का वर्णन है, वे इस प्रकार हैं। सूर्यनाड़ी अर्थात पिंगला जो दाहिने स्वर का प्रतीक है। चन्द्रनाड़ी अर्थात इड़ा जो बायें स्वर का प्रतीक है। इन दोनों के बीच तीसरी नाड़ी सुषुम्ना है। इस प्रकार हठयोग वह क्रिया है जिसमें पिंगला और इड़ा नाड़ी के सहारे प्राण को सुषुम्ना नाड़ी में प्रवेश कराकर ब्रहमरन्ध्र में समाधिस्थ किया जाता है। हठ प्रदीपिका में हठयोग के चार अंगों का वर्णन है- आसन, प्राणायाम, मुद्रा और बन्ध तथा नादानुसधान। घेरण्डसंहिता में सात अंग- षटकर्म, आसन, मुद्राबन्ध, प्राणायाम, ध्यान, समाधि जबकि योगतत्वोपनिषद में आठ अंगों का वर्णन है- यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि लययोग कुंडलिनी योग चित्त का अपने स्वरूप विलीन होना या चित्त की निरूद्ध अवस्था लययोग के अन्तर्गत आता है। साधक के चित्त् में जब चलते, बैठते, सोते और भोजन करते समय हर समय ब्रह्म का ध्यान रहे इसी को लययोग कहते हैं। योगत्वोपनिषद में इस प्रकार वर्णन है- गच्छस्तिष्ठन स्वपन भुंजन् ध्यायेन्त्रिष्कलमीश्वरम् स एव लययोगः स्यात (22-23) राजयोग राजयोग राजयोग सभी योगों का राजा कहलाया जाता है क्योंकि इसमें प्रत्येक प्रकार के योग की कुछ न कुछ सामग्री अवश्य मिल जाती है। राजयोग महर्षि पतंजलि द्वारा रचित अष्टांग योग का वर्णन आता है। राजयोग का विषय चित्तवृत्तियों का निरोध करना है। महर्षि पतंजलि के अनुसार समाहित चित्त वालों के लिए अभ्यास और वैराग्य तथा विक्षिप्त चित्त वालों के लिए क्रियायोग का सहारा लेकर आगे बढ़ने का रास्ता सुझाया है। इन साधनों का उपयोग करके साधक के क्लेशों का नाश होता है, चित्त प्रसन्न होकर ज्ञान का प्रकाश फैलता है और विवेक ख्याति प्राप्त होती है। योगाडांनुष्ठानाद शुद्धिक्षये ज्ञानदीप्तिरा विवेक ख्यातेः (2/28) राजयोग के अन्तर्गत महर्षि पतंजलि ने अष्टांग को इस प्रकार बताया है- यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयोऽष्टांगानि। योग के आठ अंगों में प्रथम पाँच बहिरंग तथा अन्य तीन अन्तरंग में आते हैं। उपर्युक्त चार प्रकार के अतिरिक्त गीता में दो प्रकार के योगों का वर्णन मिलता है- (१) ज्ञानयोग (२) कर्म योग ज्ञानयोग, सांख्ययोग से सम्बन्ध रखता है। पुरुष प्रकृति के बन्धनों से मुक्त होना ही ज्ञान योग है। सांख्य दर्शन में 25 तत्वों का वर्णन मिलता है। योग का इतिहास 300px|thumb|right|मोहनजोदड़ो-हड़प्पा से प्राप्त मुहर में योगमुद्रा योग का इतिहास वैदिक संहिताओं के अंतर्गत तपस्वियों तपस (संस्कृत) के बारे में ((कल | ब्राह्मण)) प्राचीन काल से वेदों में (१९०० से १५०० बी सी ई) उल्लेख मिलता है, जब कि तापसिक साधनाओं का समावेश प्राचीन वैदिक टिप्पणियों में प्राप्त है।[21] ^फ्लड, पी. 94. कई मूर्तियाँ जो सामान्य योग या समाधि मुद्रा को प्रदर्शित करती है, सिंधु घाटी सभ्यता (सी.3300-1700 बी.सी. इ.) के स्थान पर प्राप्त हुईं है। पुरातत्त्वज्ञ ग्रेगरी पोस्सेह्ल के अनुसार," ये मूर्तियाँ योग के धार्मिक संस्कार" के योग से सम्बन्ध को संकेत करती है।[22] ^ पोस्सेह्ल (2003), पीपी. 144-145 यद्यपि इस बात का निर्णयात्मक सबूत नहीं है फिर भी अनेक पंडितों की राय में सिंधु घाटी सभ्यता और योग-ध्यान में सम्बन्ध है।देखें: जोनाथन मार्क केनोयेरएक मूर्ती का "योग मुद्रा में बैटे हुए" ऐसा वर्णन करता है। जोनाथन मार्क केनोयेर द्वारा लिखे, "अरौंड द इंडस इन ९० स्लाइड्स". https://web.archive.org/web/20090323041459/http://www.harappa.com/indus/33.html 23 मार्च 2009 केरल वेर्नर लिखते है " पुरातात्विक खोज हमें अनुमान करने का समर्थन करता है की आर्य भारत के पूर्व के लोग योग शास्त्र की क्रियाओं से परिचित थे". http://books.google.com/books?id=c6b3lH0-OekC&pg=PA103 Yoga and Indian Philosophy Werner Karel 1998 Motilal Banarsidass Publ. 9788120816091 103[23] हैनरिच ज़िम्मेर एक मुद्रा में "योगमुद्रा" का वर्णन करते है। https://archive.org/details/mythssymbolsindi00zimm Myths and Symbols in Indian Art and Civilization Zimmer Heinrich Princeton University Press, New Ed edition 1972 978-0691017785 168 थॉमस म्क्विल्ले लिखते है कि "यह छह रहस्यमय सिंधु घाटी मुद्रा की छवियों में जो उत्कीर्ण मूर्तियां है उन में हठ योग के मूलबन्धासन नाम के आसन, या उस से मिलता जुलता उत्कटासन या बद्धा कोनासना प्रदर्शित है। http://books.google.com/books?id=Vpqr1vNWQhUC&pg=PA219 The shape of ancient thought McEvilley Thomas 2002 Allworth Communications 9781581152036 219-220 डॉ॰ फरजंद मसीह, पंजाब विश्वविद्यालय के पुरातत्व विभाग के अध्यक्ष, हाल ही में प्राप्त एक मुद्रा का वर्णन एक योगी के रूप का कहते है। अपूर्व वस्तुओं की खोज खंडहर में निहित खजाने की ओर संकेत करता है। https://web.archive.org/web/20100215133034/http://www.dawn.com/2007/05/08/nat7.htm 15 फ़रवरी 2010 गेविन फ्लड, "पशुपति सील" जोकि अन्य सीलों मे से एक है, के बारे में विवाद करते हुए लिखते है कि यह रूप एक योग मुद्रा में बैठे व्यक्ति की स्पष्ट नहीं लगती या यह एक मानव आकृति का प्रतिनिधित्व करती लगती है। फ्लड, पीपी. 28-29 . पशुपति सील के बारे में जियोफ्रे सामुएल का मानना है कि,"वास्तव में हमें यह स्पष्ट नहीं है कि यह मूर्ति किसी नारी या पुरुष, किसकी व्याख्या करती है".http://books.google.com/books?id=JAvrTGrbpf4C&pg=PA4 The Origins of Yoga and Tantra Samuel Geoffrey 2008 Cambridge University Press 9780521695343 4[26] ध्यान में उच्च चैतन्य को प्राप्त करने कि रीतियों का विकास श्रमानिक परम्पराओं द्वारा एवं उपनिषद् की परंपरा द्वारा विकसित हुआ था।[27] ^ फ्लड, पीपी. 94-95. बुद्ध के पूर्व एवं प्राचीन ब्रह्मिनिक ग्रंथों मे ध्यान के बारे में कोई ठोस सबूत नहीं मिलते हैं, बुद्ध के दो शिक्षकों के ध्यान के लक्ष्यों के प्रति कहे वाक्यों के आधार पर वय्न्न यह तर्क करते है की निर्गुण ध्यान की पद्धति ब्रह्मिन परंपरा से निकली इसलिए उपनिषद् की सृष्टि के प्रति कहे कथनों में एवं ध्यान के लक्ष्यों के लिए कहे कथनों में समानता है।[28] ^ अलेक्जेंडर व्य्न्न, दी ओरिजिन ऑफ़ बुद्धिस्ट मेडिटेशन. रौतलेड्ग 2007, पृष्ठ 51. यह संभावित हो भी सकता है, नहीं भी.[29] ^ अलेक्जेंडर व्य्न्न, दी ओरिजिन ऑफ़ बुद्धिस्ट मेडिटेशन. रौतलेड्ग 2007, पृष्ठ 56. उपनिषदों में ब्रह्माण्ड सम्बन्धी बयानों के वैश्विक कथनों में किसी ध्यान की रीति की सम्भावना के प्रति तर्क देते हुए कहते है की नासदीय सूक्त किसी ध्यान की पद्धति की ओर ऋग्वेद से पूर्व भी इशारा करते है।[30] ^ अलेक्जेंडर व्य्न्न, दी ओरिजिन ऑफ़ बुद्धिस्ट मेडिटेशन. रौतलेड्ग 2007, पृष्ठ 51. हिंदू ग्रंथ और बौद्ध ग्रंथ प्राचीन ग्रन्थो में से एक है जिन में ध्यान तकनीकों का वर्णन प्राप्त होता है।[31] ^ रिचर्ड गोम्ब्रिच, थेरावदा बौद्ध धर्म: ए सोशल हिस्ट्री फ्रॉम इंसिएंत बनारस टू माडर्न कोलम्बो. रौतलेड्ग और केगन पॉल, 1988, पृष्ठ 44. वे ध्यान की प्रथाओं और अवस्थाओं का वर्णन करते है जो बुद्ध से पहले अस्तित्व में थीं और साथ ही उन प्रथाओं का वर्णन करते है जो पहले बौद्ध धर्म के भीतर विकसित हुईं.[32] ^ अलेक्जेंडर व्य्न्न, दी ओरिजिन ऑफ़ बुद्धिस्ट मेडिटेशन. रौटलेड्ज 2007, पृष्ट 50 हिंदु वाङ्मय में,"योग" शब्द पहले कथा उपनिषद में प्रस्तुत हुआ जहाँ ज्ञानेन्द्रियों का नियंत्रण और मानसिक गतिविधि के निवारण के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है जो उच्चतम स्थिति प्रदान करने वाला माना गया है।[33] ^ फ्लड, पी. 95. विद्वानों कथा उपनिषद को पूर्व बौद्धत्व के साथ सूचीबद्ध नहीं करते, उदाहरण के लिए हेल्मथ वॉन ग्लासेनप्प देख सकते हैं,1950 कार्यवाही की "अकादेमी देर विस्सेंस्चाफ्तें," लितेरातुर अंड से http://www.accesstoinsight.org/ lib/authors/vonglasenapp/wheel002.html. https://web.archive.org/web/20130204142029/http://www.accesstoinsight.org/lib/authors/vonglasenapp/wheel002.html 4 फ़रवरी 2013 कुछ लोग कहते हैं कि यह पद बौद्ध है, उदाहरण हाजिम नाकामुरा का ए हिस्ट्री ऑफ़ एअर्ली वेदान्त फिलोसोफी, फिलोसोफी ईस्ट अंड वेस्ट, वोल. 37, अंख. 3 (जुलाई., 1987) जिसे अरविंद शर्मा ने समीक्षा की है, पीपी. 325-331. पाली शब्द "योग" का उपयोग करने की एक व्यापक जांच के लिए पूर्व बौद्ध ग्रंथों में देखे, थॉमस विलियम र्ह्य्स डेविड, विलियम स्टेड, पाली-इंग्लिश शब्दकोष. मोतीलाल बनारसीदास पुब्ल द्वारा डालें., 1993, पृष्ठ 558: http://books.google.com/books?id=xBgIKfTjxNMC&pg=RA1-PA558&dq=yoga+pali+ term&ir = # PRA1 lr-PA558, M1. https://web.archive.org/web/20150322083352/http://books.google.com/books?id=xBgIKfTjxNMC&pg=RA1-PA558&dq=yoga+pali+term&lr=#PRA1-PA558,M1 22 मार्च 2015 धम्मपदा में "आध्यात्मिक अभ्यास" के अर्थ में इस शब्द का प्रयोग के लिए देखे गिल फ्रोंस्दल, दी धम्मपदा, शम्भाला, 2005, पृष्ठ 56, 130 देखा. महत्वपूर्ण ग्रन्थ जो योग की अवधारणा से सम्बंधित है वे मध्य कालीन उपनिषद्, महाभारत,भगवद गीता 200 BCE) एवं पतंजलि योग सूत्र है। (ca. 400 BCE) पतंजलि के योग सूत्र योग सूत्र भारतीय दर्शन में, षड् दर्शनों में से एक का नाम योग है।[35] ^ छह आस्तिक दर्शन सम्प्रदायों के एक सिंहावलोकन के लिए, समूह पर विस्तार के साथ देखें : राधाकृष्णन अंड मूर, "सामग्री" और पीपी. स्कूलों [35] ^453-487.[36] ^ योग घराने के एक संक्षिप्त सिंहावलोकन के लिए देखें: चटर्जी अंड दत्ता, पी. 43. योग दार्शनिक प्रणाली,सांख्य स्कूल के साथ निकटता से संबन्धित है।[37] ^ दर्शन और संख्या के बीच घनिष्ठ संबंध के लिए देखें: चटर्जी अंड दत्ता, पी. 43. ऋषि पतंजलि द्वारा व्याख्यायित योग संप्रदाय सांख्य मनोविज्ञान और तत्वमीमांसा को स्वीकार करता है, लेकिन सांख्य घराने की तुलना में अधिक आस्तिक है, यह प्रमाण है क्योंकि सांख्य वास्तविकता के पच्चीस तत्वों में ईश्वरीय सत्ता भी जोड़ी गई है।[38] ^ अवधारणाओं के योग स्वीकृति के लिए, लेकिन भगवान के लिए एक वर्ग के जोड़ने की क्रिया के साथ देखें: राधाकृष्णन अंड मूर, पी. 453.[39]^ Samkhya के 25 सिद्धांतों को योगा ने स्वीकार करने के लिए देखें: चटर्जी अंड दत्ता, पी. 43. योग और सांख्य एक दूसरे से इतने मिलते-जुलते है कि मेक्स म्युल्लर कहते है,"यह दो दर्शन इतने प्रसिद्ध थे कि एक दूसरे का अंतर समझने के लिए एक को प्रभु के साथ और दूसरे को प्रभु के बिना माना जाता है।...."[40] ^ म्युलर (1899), अध्याय 7, "योग फिलोसोफी", पी. १०४. सांख्य और योग के बीच घनिष्ठ संबंध हेंरीच ज़िम्मेर समझाते है: इन दोनों को भारत में जुड़वा के रूप में माना जाता है, जो एक ही विषय के दो पहलू है।Sāṅkhya[41]यहाँ मानव प्रकृति की बुनियादी सैद्धांतिक का प्रदर्शन, विस्तृत विवरण और उसके तत्वों का परिभाषित, बंधन (बंधा) के स्थिति में उनके सहयोग करने के तरीके, सुलझावट के समय अपने स्थिति का विश्लेषण या मुक्ति में वियोजन मोक्ष की व्याख्या की गई है। योग विशेष रूप से प्रक्रिया की गतिशीलता के सुलझाव के लिए उपचार करता है और मुक्ति प्राप्त करने की व्यावहारिक तकनीकों को सिद्धांत करता है अथवा 'अलगाव-एकीकरण'(कैवल्य) का उपचार करता है।[42] ^ ज़िम्मेर (1951), पी. 280. पतंजलि, व्यापक रूप से औपचारिक योग दर्शन के संस्थापक माने जाते है।[43] ^ दार्शनिक प्रणाली के संस्थापक पतंजलि योग को यह रूप दिया, देखें : चटर्जी और पी० दत्त 42 पतंजलि योग, बुद्धि के नियंत्रण के लिए एक प्रणाली है जिसे राज योग के रूप में जाना जाता है।[44] ^ मन के नियंत्रण के लिए एक तंत्र के रूप में "राजा योग" के लिए और एक महत्वपूर्ण कार्य के रूप में पतंजलि के योग सूत्र के साथ संबंध के लिए देखे: फ्लड (1996), पीपी. 96-98. पतंजलि उनके दूसरे सूत्र मे "योग" शब्द को परिभाषित करते है, Patañjali Patanjali Yoga Sutras of Patañjali Studio 34 Yoga Healing Arts 2001-02-01 http://www.studio34yoga.com/yoga.php#reading etext 2008-11-24 https://www.webcitation.org/61C1yPwVm?url=http://www.studio34yoga.com/classes#reading 25 अगस्त 2011 dead जो उनके पूरे काम के लिए व्याख्या सूत्र माना जाता है: योगः चित्त-वृत्ति निरोधः - योग सूत्र 1.2 तीन संस्कृत शब्दों के अर्थ पर यह संस्कृत परिभाषा टिकी है। अई० के० तैम्नी इसकी अनुवाद करते है कि,"योग बुद्धि के संशोधनों (vṛtti [49]) का निषेध (nirodhaḥ [48]) है" (citta [50])। पाठ और शब्द मे से शब्द अनुवाद के लिए देखे:तैम्नी पी."योग इस दी इनहिबिशन ऑफ़ दी मोडीफिकेशंस ऑफ़ दी मैंड" 6. योग की प्रारंभिक परिभाषा मे इस शब्द nirodhaḥ [52] का उपयोग एक उदाहरण है कि बौद्धिक तकनीकी शब्दावली और अवधारणाओं, योग सूत्र मे एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है; इससे यह संकेत होता है कि बौद्ध विचारों के बारे में पतंजलि को जानकारी थी और अपने प्रणाली मे उन्हें बुनाई.[53] ^ बारबरा स्टोलेर मिलर, योगा:डिसिप्लिन टू फ्रीडम योग सूत्र पतंजलि को आरोपित किया है, पाठ का अनुवाद, टीका, परिचय और शब्दावली खोजशब्द के साथ. कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के प्रेस, 1996, पृष्ठ 9.स्वामी विवेकानंद इस सूत्र को अनुवाद करते हुए कहते है,"योग बुद्धि (चित्त) को विभिन्न रूप (वृत्ति) लेने से अवरुद्ध करता है।[54] ^ विवेकानाडा, पी. 115 right|thumb|200px|इस, दिल्ली के बिरला मंदिर में एक हिंदू योगी की मूर्ति पतंजलि का लेखन 'अष्टांग योग"("आठ-अंगित योग") एक प्रणाली के लिए आधार बन गया। 29th सूत्र के दूसरी किताब से यह आठ-अंगित अवधारणा को प्राप्त किया गया था और व्यावहारिक रूप मे भिन्नरूप से सिखाये गए प्रत्येक राज योग की एक मुख्य विशेषता है। आठ अंग हैं: यम : सत्य, अहिंसा, अस्तेय (चोरी न करना), अपरिग्रह (अनावश्यक धन और सम्पत्ति एकत्र न करना), ब्रह्मचर्य । नियम (पांच "धार्मिक क्रिया") : शौच (पवित्रता), सन्तोष, तपस, स्वाध्याय और ईश्वरप्राणिधान। आसन प्राणायाम : प्राण, सांस, "अयाम ", को नियंत्रित करना या बंद करना। साथ ही जीवन शक्ति को नियंत्रण करने की व्याख्या की गयी है। प्रत्याहार : बाहरी वस्तुओं से भावना अंगों के प्रत्याहार धारणा ("एकाग्रता"): एक ही लक्ष्य पर ध्यान लगाना ध्यान : ध्यान की वस्तु की प्रकृति का गहन चिंतन समाधि : ध्यान के वस्तु को चैतन्य के साथ विलय करना। इसके दो प्रकार है - सविकल्प और निर्विकल्प। निर्विकल्प समाधि में संसार में वापस आने का कोई मार्ग या व्यवस्था नहीं होती। यह योग पद्धति की चरम अवस्था है। इस संप्रदाय के विचार मे, उच्चतम प्राप्ति विश्व के अनुभवी विविधता को भ्रम के रूप मे प्रकट नहीं करता. यह दुनिया वास्तव है। इसके अलावा, उच्चतम प्राप्ति ऐसी घटना है जहाँ अनेक में से एक व्यक्तित्व स्वयं, आत्म को आविष्कार करता है, कोई एक सार्वभौमिक आत्म नहीं है जो सभी व्यक्तियों द्वारा साझा जाता है।[55] ^ स्टीफन एच. फिलिप्स, क्लास्सिकल इंडियन मेताफ्य्सिक्स: रेफुताशन्स ऑफ़ रेअलिस्म अंड दी एमेर्गेंस ऑफ़ "न्यू लॉजिक". ओपन कोर्ट प्रकाशन, 1995, पृष्ठ 12-13. भगवद गीता भगवद्गीता भगवद गीता (प्रभु के गीत), बड़े पैमाने पर विभिन्न तरीकों से योग शब्द का उपयोग करता है। एक पूरा अध्याय (छठा अध्याय) सहित पारंपरिक योग का अभ्यास को समर्पित, ध्यान के सहित, करने के अलावा[57] ^ जकोब्सन, पी. 10. इस मे योग के तीन प्रमुख प्रकार का परिचय किया जाता है।[58] ^ भगवद गीता, एक पूरा अध्याय (ch. 6) पारंपरिक योग का अभ्यास करने के लिए समर्पित सहित. इस गीता मे योग के प्रसिद्ध तीन प्रकारों, जैसे 'ज्ञान' (ज्ञान), 'एक्शन'(कर्म) और 'प्यार' (भक्ति) का परिचय किया है।" फ्लड, पी. 96 कर्म योग: कार्रवाई का योग। इसमें व्यक्ति अपने स्थिति के उचित और कर्तव्यों के अनुसार कर्मों का श्रद्धापूर्वक निर्वाह करता है। भक्ति योग: भक्ति का योग। भगवत कीर्तन। इसे भावनात्मक आचरण वाले लोगों को सुझाया जाता है। ज्ञाना योग: ज्ञान का योग - ज्ञानार्जन करना। मधुसूदन सरस्वती (जन्म 1490) ने गीता को तीन वर्गों में विभाजित किया है, जहाँ प्रथम छह अध्यायों मे कर्म योग के बारे मे, बीच के छह मे भक्ति योग और पिछले छह अध्यायों मे ज्ञाना (ज्ञान) योग के बारे मे बताया गया है।[59] ^ गम्भिरानान्दा, पी. 16 अन्य टिप्पणीकार प्रत्येक अध्याय को एक अलग 'योग' से संबंध बताते है, जहाँ अठारह अलग योग का वर्णन किया है।[60] ^ जकोब्सन, पी. 46. हठयोग हठ योग हठयोग योग, योग की एक विशेष प्रणाली है जिसे 15वीं सदी के भारत में हठ योग प्रदीपिका के संकलक, योगी स्वत्मरमा द्वारा वर्णित किया गया था। हठयोग पतंजलि के राज योग से काफी अलग है जो सत्कर्म पर केन्द्रित है, भौतिक शरीर की शुद्धि ही मन की, प्राण की और विशिष्ट ऊर्जा की शुद्धि लाती है।[62] [63] केवल पतंजलि राज योग के ध्यान आसन के बदले, [64] यह पूरे शरीर के लोकप्रिय आसनों की चर्चा करता है।[65] ^ हठयोग: यह प्रसंग, थिओरी अंड प्रक्टिस मिकेल बर्ली (पृष्ठ 16) द्वारा लिखा गया है। हठयोग अपनी कई आधुनिक भिन्नरूपों में एक शैली है जिसे बहुत से लोग "योग" शब्द के साथ जोड़ते है।[66] ^ फयूएर्स्तें, जोर्ग. 1996).दी शम्भाला गाइड टू योग बोस्टन और लंदन: शम्भाला प्रकाशन, इंक अन्य परंपराओं में योग प्रथा बौद्ध-धर्म मेडिटेशन किसे कहते हैं बौद्ध योग thumb|right|200px|बुद्ध पद्मासन मुद्रा में योग ध्यान में. प्राचीन बौद्धिक धर्म ने ध्यानापरणीय अवशोषण अवस्था को निगमित किया।[68] ^ ज़ेन बौद्ध धर्म: ए हिस्ट्री (भारत और चीन)हेंरीच डमौलिन, जेम्स डब्ल्यू हेइसिग, पॉल एफ निटटर (पृष्ठ 22) द्वारा लिखा गया है। बुद्ध के प्रारंभिक उपदेशों में योग विचारों का सबसे प्राचीन निरंतर अभिव्यक्ति पाया जाता है।[69] ^ बारबरा स्टोलेर मिलर, योगा:डिसिप्लिन टू फ्रीडम योग सूत्र पतांजलि को आरोपित किया है, पाठ का अनुवाद, टीका, परिचय और शब्दावली खोजशब्द के साथ. कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के प्रेस, 1996, पृष्ठ 8. बुद्ध के एक प्रमुख नवीन शिक्षण यह था की ध्यानापरणीय अवशोषण को परिपूर्ण अभ्यास से संयुक्त करे.[70] ^ अलेक्जेंडर वैन, दी ओरिजिन ऑफ़ बुद्धिस्ट मेडिटेशन. रौटलेड्ज 2007, पृष्ठ 73. बुद्ध के उपदेश और प्राचीन ब्रह्मनिक ग्रंथों में प्रस्तुत अंतर विचित्र है। बुद्ध के अनुसार, ध्यानापरणीय अवस्था एकमात्र अंत नहीं है, उच्चतम ध्यानापरणीय स्थिती में भी मोक्ष प्राप्त नहीं होता। अपने विचार के पूर्ण विराम प्राप्त करने के बजाय, किसी प्रकार का मानसिक सक्रियता होना चाहिए:एक मुक्ति अनुभूति, ध्यान जागरूकता के अभ्यास पर आधारित होना चाहिए। [71] ^ अलेक्जेंडर वैन, दी ओरिजिन ऑफ़ बुद्धिस्ट मेडिटेशन. रौटलेड्ज 2007, पृष्ठ 105. बुद्ध ने मौत से मुक्ति पाने की प्राचीन ब्रह्मनिक अभिप्राय को ठुकराया.[72] ^ अलेक्जेंडर वैन, दी ओरिजिन ऑफ़ बुद्धिस्ट मेडिटेशन. रौटलेड्ज 2007, पृष्ठ 96. ब्रह्मिनिक योगिन को एक गैरद्विसंक्य द्रष्टृगत स्थिति जहाँ मृत्यु मे अनुभूति प्राप्त होता है, उस स्थिति को वे मुक्ति मानते है। बुद्ध ने योग के निपुण की मौत पर मुक्ति पाने की पुराने ब्रह्मिनिक अन्योक्त ("उत्तेजनाहीन होना, क्षणस्थायी होना") को एक नया अर्थ दिया; उन्हें, ऋषि जो जीवन में मुक्त है के नाम से उल्लेख किया गया था।[73] ^ अलेक्जेंडर वैन, दी ओरिजिन ऑफ़ बुद्धिस्ट मेडिटेशन. रौटलेड्ज 2007, पृष्ठ 109. प्राणायाम योगकारा बौद्धिक धर्म योगकारा(संस्कृत:"योग का अभ्यास"[75] ^ डान लास्थौस: "वोट इस अंड इसंट योगकारा" https://web.archive.org/web/20131216190312/http://www.acmuller.net/yogacara/articles/intro-uni.htm 16 दिसंबर 2013 , शब्द विन्यास योगाचारा, दर्शन और मनोविज्ञान का एक संप्रदाय है, जो भारत में 4 वीं से 5 वीं शताब्दी मे विकसित किया गया था। योगकारा को यह नाम प्राप्त हुआ क्योंकि उसने एक योग प्रदान किया, एक रूपरेखा जिससे बोधिसत्त्व तक पहुँचने का एक मार्ग दिखाया है।[76] ^ डान लास्थौस. बौद्ध फेनोमेनोलोगी: ए फिलोसोफिकल इन्वेस्टीगेशन ऑफ़ योगकारा बुद्धिस्म अंड दी चेंग वेई-शिह लुन. (रौटलेड्ज) 2002 प्रकाशित. ISBN 0-7007-1186-4.पग 533 ज्ञान तक पहुँचने के लिए यह योगकारा संप्रदाय योग सिखाता है।[77] ^ सरल तिब्बती बौद्ध धर्म: ए गाइड टू तांत्रिक लिविंग, सी अलेक्जेंडर सिम्प्किंस, अन्नेल्लें एम. सिम्प्किंस द्वारा लिखा गया है। 2001 प्रकाशित. टटल प्रकाशन. ISBN 0-8048-3199-8 छ'अन (सिओन/ ज़ेन) बौद्ध धर्म ज़ेन (जिसका नाम संस्कृत शब्द "ध्याना से" उत्पन्न किया गया चीनी "छ'अन" के माध्यम से[78] ^ दी बुद्धिस्ट त्रडिशन इन इंडिया, भारत और जापान. विलियम थिओडोर डी बारी द्वारा संपादित किया गया है। पन्ने. 207-208. ISBN 0-394-71696-5 - "दी मेडिटेशन स्कूल ने, चीनी में "चान" नाम से कहते है जो संस्कृत शब्द ध्यान से लिया गया है, पश्चिम में जापानी उच्चारण ज़ेन " से जाना जाता है।)महायान बौद्ध धर्म का एक रूप है। बौद्ध धर्म की महायान संप्रदाय योग के साथ अपनी निकटता के कारण विख्यात किया जाता है। पश्चिम में, जेन को अक्सर योग के साथ व्यवस्थित किया जाता है;ध्यान प्रदर्शन के दो संप्रदायों स्पष्ट परिवारिक उपमान प्रदर्शन करते है।[80] ^ ज़ेन बौद्ध धर्म: ए हिस्ट्री (भारत और चीन)हेंरीच डमौलिन, जेम्स डब्ल्यू हेइसिग, पॉल एफ निटटर (पृष्ठ 13) द्वारा लिखा गया है। (पेज xviii) यह घटना को विशेष ध्यान योग्य है क्योंकि कुछ योग प्रथाओं पर ध्यान की ज़ेन बौद्धिक स्कूल आधारित है।[81]योग की कुछ आवश्यक तत्वों सामान्य रूप से बौद्ध धर्म और विशेष रूप से ज़ेन धर्म को महत्वपूर्ण हैं।[82] ^ ज़ेन बौद्ध धर्म: ए हिस्ट्री (भारत और चीन)हेंरीच डमौलिन, जेम्स डब्ल्यू हेइसिग, पॉल एफ निटटर (पृष्ठ 13) द्वारा लिखा गया है। (पृष्ठ 13) भारत और तिब्बत के बौद्धिक धर्म योग तिब्बती बौद्ध धर्म का केंद्र है। न्यिन्गमा परंपरा में, ध्यान का अभ्यास का रास्ता नौ यानों, या वाहन मे विभाजित है, कहा जाता है यह परम व्यूत्पन्न भी है।[83] ^ दी लैयेन्स रोर: अन इन्त्रोदुक्शन टू तंत्र चोग्यम त्रुन्ग्पा द्वारा. शम्भाला, 2001 ISBN 1-57062-895-5 अंतिम के छह को "योग यानास" के रूप मे वर्णित किया जाता है, यह है:क्रिया योग, उप योग (चर्या), योगा याना, महा योग, अनु योग और अंतिम अभ्यास अति योग.[84] ^सीक्रेट ऑफ़ दी वज्र वर्ल्ड: दी तांत्रिक बुद्धिस्म ऑफ़ तिबेट रेय रेगिनाल्ड ए शम्भाला द्वारा : 2002 मे लिखा गया। ISBN 1-57062-917-X पन्ना 37-38 सरमा परंपराओं नेमहायोग और अतियोग की अनुत्तारा वर्ग से स्थानापन्न करते हुए क्रिया योग, उपा (चर्या) और योग को शामिल किया हैं। अन्य तंत्र योग प्रथाओं में 108 शारीरिक मुद्राओं के साथ सांस और दिल ताल का अभ्यास शामिल हैं।[85] ^ सीक्रेट ऑफ़ दी वज्र वर्ल्ड: दी तांत्रिक बुद्धिस्म ऑफ़ तिबेट रेय रेगिनाल्ड ए शम्भाला द्वारा : 2002 मे लिखा गया।ISBN 1-57062-917-X पन्ना 57 अन्य तंत्र योग प्रथाओं 108 शारीरिक मुद्राओं के साथ सांस और दिल ताल का अभ्यास को शामिल हैं। यह न्यिन्गमा परंपरा यंत्र योग का अभ्यास भी करते है। (तिब. तरुल खोर), यह एक अनुशासन है जिसमे सांस कार्य (या प्राणायाम), ध्यानापरणीय मनन और सटीक गतिशील चाल से अनुसरण करनेवाले का ध्यान को एकाग्रित करते है।[86] ^ योगा:दी तिबेतन योगा ऑफ़ मूवमेंट, चोग्याल नम्खई नोरबू द्वारा लिखा गया है। स्नो लायन, 2008. ISBN 1-55939-308-4लुखंग मे दलाई लामा के सम्मर मंदिर के दीवारों पर तिब्बती प्राचीन योगियों के शरीर मुद्राओं चित्रित किया जाता है। चांग (1993) द्वारा एक अर्द्ध तिब्बती योगा के लोकप्रिय खाते ने कन्दली (तिब.तुम्मो) अपने शरीर में गर्मी का उत्पादन का उल्लेख करते हुए कहते है कि "यह संपूर्ण तिब्बती योगा की बुनियाद है".[87] ^ चांग, जी. सी.सी (1993).तिबेतन योगा. न्यू जर्सी: कैरल प्रकाशन समूह. ISBN 0-8065-1453-1, पन्ना.7 चांग यह भी दावा करते है कि तिब्बती योगा प्राना और मन को सुलह करता है, और उसे तंत्रिस्म के सैद्धांतिक निहितार्थ से संबंधित करते है। जैन धर्म thumb|right|100px|तीर्थंकर पार्स्व यौगिक ध्यान में कयोत्सर्गा मुद्रा में. thumb|175px]महावीर को केवल ज्ञान प्राप्ति मुलाबंधासना मुद्रा में दूसरी शताब्दी के जैन ग्रन्थ तत्त्वार्थसूत्र, के अनुसार मन, वाणी और शरीर सभी गतिविधियों का कुल 'योग' है। [88] ^ तत्त्वार्थसूत्र [6.1], मनु दोषी (2007) तत्त्वार्थसूत्र के अनुवाद, अहमदाबाद : श्रुत रत्नाकर पी. 102 उमास्वामी कहते है कि आस्रव या कार्मिक प्रवाह का कारण योग है[89] ^ तत्त्वार्थसूत्र [6.2] साथ ही- सम्यक चरित्र अर्थात योग नियंत्रण और अन्त में निरोध मुक्ति के मार्ग मे बेहद आवश्यक है। [90] ^ तत्त्वार्थसूत्र [6.2] अपनी नियमसार में, आचार्य कुन्दकुन्द ने योग भक्ति का वर्णन- भक्ति से मुक्ति का मार्ग - भक्ति के सर्वोच्च रूप के रूप मे किया है।[91] ^ नियमासरा [134-40] आचार्य हरिभद्र और आचार्य हेमचन्द्र के अनुसार पाँच प्रमुख उल्लेख संन्यासियों और 12 समाजिक लघु प्रतिज्ञाओं योग के अंतर्गत शामिल है। इस विचार के वजह से कही इन्डोलोज़िस्ट्स जैसे प्रो रॉबर्ट जे ज़्यीडेन्बोस ने जैन धर्म के बारे मे यह कहा कि यह अनिवार्य रूप से योग सोच की एक योजना है जो एक पूर्ण धर्म के रूप मे बढ़ी हो गयी। [92] ^ ज्यडेन्बोस, रॉबर्ट. जैनिस्म टुडे अंड इट्स फ्यूचर. मूंछें: मन्या वेर्लग, 2006. पन्ना.66 डॉ॰ हेंरीच ज़िम्मर संतुष्ट किया कि योग प्रणाली को पूर्व आर्यन का मूल था, जिसने वेदों की सत्ता को स्वीकार नहीं किया और इसलिए जैन धर्म के समान उसे एक विधर्मिक सिद्धांतों के रूप में माना गया था [93] ^ ज़िम्मर, हेंरीच (एड.) जोसेफ कैम्पबेल: फिलोसोफीस ऑफ़ इंडिया.न्यू यॉर्क: प्रिंसटन यूनिवर्सिटी प्रेस, 1969 पन्ना.60 जैन शास्त्र, जैन तीर्थंकरों को ध्यान मे पद्मासना या कायोत्सर्ग योग मुद्रा में दर्शाया है। ऐसा कहा गया है कि महावीर को मुलाबंधासना स्थिति में बैठे केवला ज्ञान "आत्मज्ञान" प्राप्त हुआ जो अचरंगा सूत्र मे और बाद में कल्पसूत्र मे पहली साहित्यिक उल्लेख के रूप मे पाया गया है।[94] ^ क्रिस्टोफर चप्पल. (1993) नॉनविलँस टू अनिमल्स, अर्थ, अंड सेल्फ इन एशियन त्रदिशन्स.न्यू यॉर्क: सनी प्रेस, 1993 पन्ना. 7 पतंजलि योगसूत्र के पांच यामा या बाधाओं और जैन धर्म के पाँच प्रमुख प्रतिज्ञाओं में अलौकिक सादृश्य है, जिससे जैन धर्म का एक मजबूत प्रभाव का संकेत करता है। [95] ^ ज्य्देंबोस (2006) पन्ना.66[96] ^ विवियन वोर्थिन्ग्तन द्वारा ए हिस्ट्री ऑफ़ योगा (1982) रौटलेड्ज ISBN 0-7100-9258-X पन्ना. 29. लेखक विवियन वोर्थिंगटन ने यह स्वीकार किया कि योग दर्शन और जैन धर्म के बीच पारस्परिक प्रभाव है और वे लिखते है:"योग पूरी तरह से जैन धर्म को अपना ऋण मानता है और विनिमय मे जैन धर्म ने योग के साधनाओं को अपने जीवन का एक हिस्सा बना लिया". [97] ^ विवियन वोर्थिंगटन (1982) पन्ना. 35 सिंधु घाटी मुहरों और इकोनोग्रफी भी एक यथोचित साक्ष्य प्रदान करते है कि योग परंपरा और जैन धर्म के बीच सांप्रदायिक सदृश अस्तित्व है। [98] ^ क्रिस्टोफर. (1993) चाप्पल, panna.6 विशेष रूप से, विद्वानों और पुरातत्वविदों ने विभिन्न तिर्थन्करों की मुहरों में दर्शाई गई योग और ध्यान मुद्राओं के बीच समानताओं पर टिप्पणी की है: ऋषभदेव की "कयोत्सर्गा" मुद्रा और महावीर के मुलबन्धासन मुहरों के साथ ध्यान मुद्रा में पक्षों में सर्पों की खुदाई पार्श्वनाथ की खुदाई से मिलती जुलती है। यह सभी न केवल सिंधु घाटी सभ्यता और जैन धर्म के बीच कड़ियों का संकेत कर रहे हैं, बल्कि विभिन्न योग प्रथाओं को जैन धर्म का योगदान प्रदर्शन करते है।[99] ^ क्रिस्टोफर. (1993) चाप्पल, पप.6-9 जैन सिद्धांत और साहित्य के सन्दर्भ जैन धर्म में योग प्राचीनतम के जैन धर्मवैधानिक साहित्य जैसे आचाराङ्गसूत्र और नियमसार, तत्त्वार्थसूत्र आदि जैसे ग्रंथों ने साधारण व्यक्ति और तपस्वीयों के लिए जीवन का एक मार्ग के रूप में योग पर कई सन्दर्भ दिए है। बाद के ग्रंथ, जिसमे योग की जैन अवधारणा विस्तारपूर्वक दी गयी है, वह निम्नानुसार हैं: पूज्यपाद (5 वीं शताब्दी ई०) इष्टोपदेश आचार्य हरिभद्र सूरी (8 वीं शताब्दी ई०) योगबिन्दु योगद्रिस्तिसमुच्काया योगशतक योगविंशिका आचार्य जोंदु (८वीं शताब्दी ई०) योगसार आचार्य हेमचन्द्र (११वीं सदी ई०) योगशास्त्र आचार्य अमितगति (११वीं शताब्दी ई०) योगसारप्राभृत इस्लाम सूफी संगीत के विकास में भारतीय योग अभ्यास का काफी प्रभाव है, जहाँ वे दोनों शारीरिक मुद्राओं (आसन) और श्वास नियंत्रण (प्राणायाम) को अनुकूलित किया है।[100] ^ सीटूएटिंग सुफ्फिस्म अंड योगा https://web.archive.org/web/20090327090930/http://www.unc.edu/~cernst/articles/JRAS2.doc 27 मार्च 2009 11 वीं शताब्दी के प्राचीन समय में प्राचीन भारतीय योग पाठ, अमृतकुंड, ("अमृत का कुंड") का अरबी और फारसी भाषाओं में अनुवाद किया गया था।[101] ^ केरोलिना संगोष्ठी तुलनात्मक इस्लामी अध्ययन https://web.archive.org/web/20090825225459/http://www.unc.edu/depts/islamsem/980522.shtml 25 अगस्त 2009 पर सन 2008 में मलेशिया के शीर्ष इस्लामिक समिति ने कहा जो मुस्लमान योग अभ्यास करते है उनके खिलाफ एक फतवा लागू किया, जो कानूनी तौर पर गैर बाध्यकारी है, कहते है कि योग में "हिंदू आध्यात्मिक उपदेशों" के तत्वों है और इस से ईश-निंदा हो सकती है और इसलिए यह हराम है। मलेशिया में मुस्लिम योग शिक्षकों ने "अपमान" कहकर इस निर्णय की आलोचना कि.[102] ^ श्रेय इस्लामी समुदाय: योगा मुसलमानों के लिए नहीं है https://web.archive.org/web/20081205182658/http://www.cnn.com/2008/WORLD/asiapcf/11/22/malaysia.yoga.banned.ap/index.html 5 दिसंबर 2008 - सी एन एन मलेशिया में महिलाओं के समूह, ने भी अपना निराशा व्यक्त की और उन्होंने कहा कि वे अपनी योग कक्षाओं को जारी रखेंगे.[103] ^ http://thestar.com.my/news/story.asp?file=/2008/11/23/nation/2625368&sec=nation https://web.archive.org/web/20110622072723/http://thestar.com.my/news/story.asp?file=%2F2008%2F11%2F23%2Fnation%2F2625368&sec=nation 22 जून 2011 इस फतवा में कहा गया है कि शारीरिक व्यायाम के रूप में योग अभ्यास अनुमेय है, पर धार्मिक मंत्र का गाने पर प्रतिबंध लगा दिया है,[104] ^ "मलेशिया के नेता: योगा मंत्र के बिना योग मुसलमानों के लिए ठीक है,"अगस्त 2021 InternetArchiveBot एसोसिएटेड प्रेस और यह भी कहते है कि भगवान के साथ मानव का मिलाप जैसे शिक्षण इस्लामी दर्शन के अनुरूप नहीं है।[105] ^ http://www.islam.gov.my/portal/lihat.php?jakim=3600 https://web.archive.org/web/20090106003351/http://www.islam.gov.my/portal/lihat.php?jakim=3600 6 जनवरी 2009 इसी तरह, उलेमस की परिषद, इंडोनेशिया में एक इस्लामी समिति ने योग पर प्रतिबंध, एक फतवे द्वारा लागू किया क्योंकि इसमें "हिंदू तत्व" शामिल थे।[106] ^ http://news.bbc.co.uk/2/hi/asia-pacific/7850079.stm https://web.archive.org/web/20090217135238/http://news.bbc.co.uk/2/hi/asia-pacific/7850079.stm 17 फ़रवरी 2009 किन्तु इन फतवों को दारुल उलूम देओबंद ने आलोचना की है, जो देओबंदी इस्लाम का भारत में शिक्षालय है।http://specials.rediff.com/news/2009/jan/29video-islam-allows-yoga-deoband.htm http://specials.rediff.com/news/2009/jan/29video-islam-allows-yoga-deoband.htm 19 अगस्त 2009 https://web.archive.org/web/20090822195937/http://specials.rediff.com/news/2009/jan/29video-islam-allows-yoga-deoband.htm 22 अगस्त 2009 live सन 2009 मई में, तुर्की के निदेशालय के धार्मिक मामलों के मंत्रालय के प्रधान शासक अली बर्दाकोग्लू ने योग को एक व्यावसायिक उद्यम के रूप में घोषित किया- योग के संबंध में कुछ आलोचनाये जो इसलाम के तत्वों से मेल नहीं खातीं.[108] ^ http://www.hurriyet.com.tr/english/domestic/11692086.asp?gid=244 https://web.archive.org/web/20111011035805/http://www.hurriyet.com.tr/english/domestic/11692086.asp?gid=244 11 अक्तूबर 2011 ईसाई धर्म सन 1989 में, वैटिकन ने घोषित किया कि ज़ेन और योग जैसे पूर्वी ध्यान प्रथाओं "शरीर के एक गुट में बदज़ात" हो सकते है। वैटिकन के बयान के बावजूद, कई रोमन कैथोलिक उनके आध्यात्मिक प्रथाओं में योग , बौद्ध धर्म और हिंदू धर्म के तत्वों का प्रयोग किया है।http://query.nytimes.com/gst/fullpage.html?res=9C0CE1D61531F934A35752C0A966958260&sec=&spon= Trying to Reconcile the Ways of the Vatican and the East Steinfels Peter 1990-01-07 New York Times 2008-12-05 तंत्र तंत्र तंत्र एक प्रथा है जिसमें उनके अनुसरण करनेवालों का संबंध साधारण, धार्मिक, सामाजिक और तार्किक वास्तविकता में परिवर्तन ले आते है। तांत्रिक अभ्यास में एक व्यक्ति वास्तविकता को माया, भ्रम के रूप में अनुभव करता है और यह व्यक्ति को मुक्ति प्राप्त होता है।[112] ^ शीर्षक: मेसोकोस्म: हिंदू धर्म और नेपाल में एक पारंपरिक नेवार सिटी मे संगठन. लेखक: रॉबर्ट अई लेवी. प्रकाशित: कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के प्रेस, 1991. पीपी 313हिन्दू धर्म द्वारा प्रस्तुत किया गया निर्वाण के कई मार्गों में से यह विशेष मार्ग तंत्र को भारतीय धर्मों के प्रथाओं जैसे योग, ध्यान, और सामाजिक संन्यास से जोड़ता है, जो सामाजिक संबंधों और विधियों से अस्थायी या स्थायी वापसी पर आधारित हैं। तांत्रिक प्रथाओं और अध्ययन के दौरान, छात्र को ध्यान तकनीक में, विशेष रूप से चक्र ध्यान, का निर्देश दिया जाता है। जिस तरह यह ध्यान जाना जाता है और तांत्रिक अनुयायियों एवं योगियों के तरीको के साथ तुलना में यह तांत्रिक प्रथाओं एक सीमित रूप में है, लेकिन सूत्रपात के पिछले ध्यान से ज्यादा विस्तृत है। इसे एक प्रकार का कुंडलिनी योग माना जाता है जिसके माध्यम से ध्यान और पूजा के लिए "हृदय" में स्थित चक्र में देवी को स्थापित करते है।[114] ^ शीर्षक: मेसोकोस्म:हिंदू धर्म और नेपाल में एक पारंपरिक नेवार सिटी मे संगठन. लेखक: रॉबर्ट मैं लेवी. प्रकाशित: कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के प्रेस, 1991. पीपी 317 भारत के प्रसिद्ध योगगुरु वैसे तो योग हमेशा से हमारी प्राचीन धरोहर रही है। समय के साथ-साथ योग विश्व प्रख्यात तो हुआ ही है साथ ही इसके महत्व को जानने के बाद आज योग लोगों की दिनचर्या का अभिन्न अंग भी बन गया है। लेकिन योग के प्रचार-प्रसार में विश्व प्रसिद्ध योगगुरुओं का भी योगदान रहा है, जिनमें से अयंगार योग के संस्थापक बी के एस अयंगर, स्वामी शिवानंद और योगगुरु रामदेव का नाम अधिक प्रसिद्ध है।http://khabar.ndtv.com/news/india/yoga-guru-bks-iyengar-dies-at-95-650330 संग्रहीत प्रति 17 मार्च 2015 https://web.archive.org/web/20150402115555/http://khabar.ndtv.com/news/india/yoga-guru-bks-iyengar-dies-at-95-650330 2 अप्रैल 2015 dead बीकेएस अंयगर बी के एस अयंगार अयंगर को विश्व के अग्रणी योग गुरुओं में से एक माना जाता है और उन्होंने योग के दर्शन पर कई किताबें भी लिखी थीं, जिनमें 'लाइट ऑन योगा', 'लाइट ऑन प्राणायाम' और 'लाइट ऑन द योग सूत्राज ऑफ पतंजलि' शामिल हैं। http://www.livehindustan.com/news/desh/national/article1-BKS-Iyengar-dead-Yoga-legend-passes-away-at-96-Twitter-full-of-condolences-39-39-446211.html संग्रहीत प्रति 17 मार्च 2015 https://web.archive.org/web/20150402155843/http://www.livehindustan.com/news/desh/national/article1-BKS-Iyengar-dead-Yoga-legend-passes-away-at-96-Twitter-full-of-condolences-39-39-446211.html 2 अप्रैल 2015 dead अयंगर का जन्‍म 14 दिसम्‍बर 1918 को बेल्‍लूर के एक गरीब परिवार में हुआ था। बताया जाता है कि अयंगर बचपन में काफी बीमार रहा करते थे। ठीक नहीं होने पर उन्‍हें योग करने की सलाह दी गयी और तभी से वह योग करने लगे। अयंगर को 'अयंगर योग' का जन्‍मदाता कहा जाता है। उन्होंने इस योग को देश-दुनिया में फैलाया। सांस की तकलीफ के चलते 20 अगस्त 2014 को उनका निधन हो गया।http://www.prabhatkhabar.com/news/national/yoga-guru-bks-iyengar-died/142411.html संग्रहीत प्रति 18 मार्च 2015 https://web.archive.org/web/20150402091707/http://www.prabhatkhabar.com/news/national/yoga-guru-bks-iyengar-died/142411.html 2 अप्रैल 2015 dead बाबा रामदेव बाबा रामदेव बाबा रामदेव भारतीय योग-गुरु हैं, उन्होंने योगासन व प्राणायामयोग के क्षेत्र में योगदान दिया है। रामदेव स्वयं जगह-जगह जाकर योग शिविरों का आयोजन करते हैं। योग दिवस अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस 21 जून 2015 को प्रथम अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाया गया। इस अवसर पर 192 देशों और 47 मुस्लिम देशों में योग दिवस का आयोजन किया गया। दिल्ली में एक साथ ३५९८५ लोगों ने योगाभ्यास किया।इसमें 84 देशों के प्रतिनिधि मौजूद थे। इस अवसर पर भारत ने दो विश्व रिकॉर्ड बनाकर 'गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स' में अपना नाम दर्ज करा लिया है। पहला रिकॉर्ड एक जगह पर सबसे अधिक लोगों के एक साथ योग करने का बना, तो दूसरा एक साथ सबसे अधिक देशों के लोगों के योग करने का। http://www.jagran.com/news/national-india-create-two-world-records-on-international-day-12507610.html संग्रहीत प्रति 23 जून 2015 https://web.archive.org/web/20150625055155/http://www.jagran.com/news/national-india-create-two-world-records-on-international-day-12507610.html 25 जून 2015 live योग का उद्देश्य योग के अभ्यास के कई लाभों के बारे में दुनिया भर में जागरूकता बढ़ाना है।लोगों के स्वास्थ्य पर योग के महत्व और प्रभावों के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए हर साल 21 जून को योग का अभ्यास किया जाता है। शब्द ‘योग‘ संस्कृत से लिया गया है जिसका अर्थ है जुड़ना या एकजुट होना। योग का महत्व वर्तमान समय में अपनी व्यस्त जीवन शैली के कारण लोग संतोष पाने के लिए योग करते हैं। योग से न केवल व्यक्ति का तनाव दूर होता है बल्कि मन और मस्तिष्क को भी शांति मिलती है योग बहुत ही लाभकारी है। योग न केवल हमारे दिमाग, मस्‍तिष्‍क को ही ताकत पहुंचाता है बल्कि हमारी आत्‍मा को भी शुद्ध करता है। आज बहुत से लोग मोटापे से परेशान हैं, उनके लिए योग बहुत ही फायदेमंद है। योग के फायदे से आज सब ज्ञात है, जिस वजह से आज योग विदेशों में भी प्रसिद्ध है। अगर आप इसका नियमित अभ्यास करते हैं, तो इससे धीरे-धीरे आपका तनाव भी दूर हो सकता है। योग का लक्ष्य योग का लक्ष्य स्वास्थ्य में सुधार से लेकर मोक्ष (आत्मा को परमेश्वर का अनुभव) प्राप्त करने तक है।[115] ^ जकोब्सन, पी. 10. जैन धर्म, अद्वैत वेदांत के मोनिस्ट संप्रदाय और शैव संप्रदाय के अन्तर में योग का लक्ष्य मोक्ष का रूप लेता है, जो सभी सांसारिक कष्ट एवं जन्म और मृत्यु के चक्र (संसार) से मुक्ति प्राप्त करना है, उस क्षण में परम ब्रह्मण के साथ समरूपता का एक एहसास है। महाभारत में, योग का लक्ष्य ब्रह्मा के दुनिया में प्रवेश के रूप में वर्णित किया गया है, ब्रह्म के रूप में, अथवा आत्मन को अनुभव करते हुए जो सभी वस्तुओं मे व्याप्त है।जकोब्सन, पी. 9 मीर्चा एलीयाडे योग के बारे में कहते हैं कि यह सिर्फ एक शारीरिक व्यायाम ही नहीं है, एक आध्यात्मिक तकनीक भी है। मीर्चा ईटु, मीर्चा एलीयाडे, बुखारेस्ट, कल की रोमानिया का प्रकाशन संस्था, दो हज़ार छह, नब्बे का पृष्ठ। (ISBN 973-725-715-4) सर्वपल्ली राधाकृष्णन लिखते हैं कि समाधि में निम्नलिखित तत्व शामिल हैं: वितर्क, विचार, आनंद और अस्मिता।सर्पवल्ली राधाकृष्णन, भारतीय दर्शन, दूसरा खंड, लंडन, जॉर्ज एलन और उइंन का प्रकाशन संस्था, एक हजार नौ सौ छियासठ, तीन सौ अस्सी का पृष्ठ। (ISBN 978-019-569-841-1) योग के प्रसिद्ध ग्रन्थ {| class="wikitable" |- ! ग्रन्थ !! रचयिता !! रचनाकाल/टिप्पणी |- | योगसूत्र || पतंजलि || ४०० ई. पूर्व |- | योगभाष्य || वेदव्यास || द्वितीय शताब्दी |- | तत्त्ववैशारदी || वाचस्पति मिश्र || ८४१ ई |- |योगयाज्ञवल्क्य || याज्ञवल्क्य || सबसे पुरानी संस्कृत पाण्डुलिपि ९वीं-१०वीं शताब्दी की है। |- | भोजवृत्ति || राजा भोज || ११वीं शताब्दी |- | गोरक्षशतक || गुरु गोरख नाथ || ११वीं-१२वीं शताब्दी |- | योगचूडामण्युपनिषद || - || १४वीं-१५वीं शताब्दी (रिचर्ड रोसेन के अनुसार) |- | योगवार्तिक || विज्ञानभिक्षु || १६वीं शताब्दी |- | योगसारसंग्रह || विज्ञानभिक्षु || १६वीं शताब्दी |- | हठयोगप्रदीपिका || स्वामी स्वात्माराम || १५वीं-१६वीं शताब्दी |- | सूत्रवृत्ति || गणेशभावा || १७वीं शताब्दी |- | योगसूत्रवृत्ति || नागेश भट्टनागोजीभट्ट कृत वृत्ति || १७वीं शताब्दी |- | शिवसंहिता || ऋषी आर्यवीर रुद्र || २५०० इ. पूर्व |- | घेरण्डसंहिता || घेरण्ड मुनि|| १५०० इ.पूर्व |- | हठरत्नावली || श्रीनिवास भट्ट || १७वीं शताब्दी |- | मणिप्रभा || रामानन्द यति|| १८वीं शताब्दी |- | सूत्रार्थप्रबोधिनी || नारायण तीर्थ || १८वीं शताब्दी |- | जोगप्रदीपिका || जयतराम || १७३७ ई. / यह हिन्दी, ब्रजभाषा, खड़ी बोली की मिलीजुली भाषा में रचित है और शब्दावली संस्कृत के अत्यन्त निकट है। |- | सचित्र योगसाधन || शिवमुनि || २०वीं शताब्दी ; हिन्दी में लिखितhttps://www.shivmunisamaj.com/list-of-books-by-shivmuni शिवमुनि महाराज का अमर साहित्य 31 दिसंबर 2022 31 दिसंबर 2022 https://web.archive.org/web/20221231051935/https://www.shivmunisamaj.com/list-of-books-by-shivmuni dead |- | योगदर्शनम्' || स्वामी सत्यपति परिव्राजक || २१वीं शताब्दी |} इन्हें भी देखें योग का इतिहास योग दर्शन अष्टांग योग योगसूत्र हठयोग जैन धर्म में योग अंतरराष्ट्रीय योग दिवस भारतीय मनोविज्ञान - कुछ लोग मानते हैं कि 'योग' भारतीय मनोविज्ञान का दूसरा नाम है। बाहरी कड़ियाँ योग योग-शब्दावली योग द्वारा रोग निवारण योगवैशारदी (कृणमचार्य योग मन्दिरम् की इस साइट पर योग के अनेक ग्रन्थ उपलब्ध हैं) योग सैद्धान्तिक (प्राक्शास्त्री प्रथमवर्ष, प्रथम सत्रार्ध के लिये) योग सम्बन्धित ग्रन्थ (देवनागरी में) सन्दर्भ 2 आगे पढ़ें Apte Vaman Shivram The Practical Sanskrit Dictionary https://archive.org/details/practicalsanskri0000apte 1965 Motilal Banarsidass Publishers Delhi 81-208-0567-4 (चौथा संशोधित और विस्तृत संस्करण)। चांग, जी सी सी (1993)। तिब्बती योग. न्यू जर्सी: कैरल पब्लिशिंग ग्रुप . ISBN 0-8065-1453-1 Chatterjee Satischandra Datta, Dhirendramohan An Introduction to Indian Philosophy 1984 University of Calcutta Calcutta Eighth Reprint Edition Donatelle, रेबेका जे हैल्थ: दी बेसिक्स. 6. एड. सैन फ्रांसिस्को: पियर्सन एडूकेशन, इंक 2005. फयूएर्स्तें, जोर्ज . दी शम्भाला गाइड टु योग. 1. एड. बोस्टन एंड लन्डन: शम्भाला पुब्लिकेशन्स 1996. Flood Gavin 1996 An Introduction to Hinduism Cambridge University Press Cambridge 0-521-43878-0 registration https://archive.org/details/introductiontohi0000floo Gambhirananda Swami 1998 Madhusudana Sarasvati Bhagavad_Gita: With the annotation Gūḍhārtha Dīpikā Advaita Ashrama Publication Department Calcutta 81-7505-194-9 Harinanda Swami Yoga and The Portal Jai Dee Marketing 0978142950 Jacobsen Knut A. (Editor) Larson, Gerald James (Editor) 2005 Theory And Practice of Yoga: Essays in Honour of Gerald James Larson Brill Academic Publishers 9004147578 (स्टडीज इन दी हिस्ट्री ऑफ़ रिलिजनस, 110) Keay John India: A History https://archive.org/details/indiahistoryfrom0000unse 2000 Grove Press New York 0-8021-3797-0 मार्शल, जॉन (1931)। मोहेंजोदारो एंड दी इन्दुस सिविलैज़ेशन:वर्ष 1922-27 के बीच मोहेंजोदारो में भारत सरकार द्वारा किए एक सरकारी खाता पुरातत्व खुदाई के होने के नाते. दिल्ली:इन्दोलोगिकल बुक हाउस. Michaels Axel Hinduism: Past and Present https://archive.org/details/hinduismpastpres0000mich 2004 Princeton University Press Princeton, New Jersey 0-691-08953-1 मित्रा, धर्म श्री. आसन: 608 योगा मुद्रा. 1. एड. कैलिफोर्निया: नई वर्ल्ड लाइब्रेरी 2003. Müller Max Max Müller 1899 Six Systems of Indian Philosophy; Samkhya and Yoga, Naya and Vaiseshika Susil Gupta (India) Ltd. Calcutta 0-7661-4296-5[129] पुस्तक का नया संस्करण; मूलतः यह दी सिक्स सिस्टम्स ऑफ़ इंडियन फिलोसोफी के अंतर्गत प्रकाशित किया गया है।'' Possehl Gregory Gregory Possehl The Indus Civilization: A Contemporary Perspective https://archive.org/details/induscivilizatio0000poss 2003 AltaMira Press 978-0759101722 Radhakrishnan S. Sarvepalli Radhakrishnan Moore, CA A Sourcebook in Indian Philosophy 1967 Princeton 0-691-01958-4 registration https://archive.org/details/sourcebookinindi00radh सरस्वती, स्वामी सत्यानन्दा. नवंबर 2002 (12 वें संस्करण)। "आसन प्राणायाम मुद्रा बंधा" ISBN 81-86336-14-1 Taimni I. K. The Science of Yoga https://archive.org/details/scienceofyogayog00unse 1961 The Theosophical Publishing House Adyar, भारत 81-7059-212-7 उशाराबुध, आर्य पंडित. फिलोसोफी ऑफ़ हठ योगा. 2. एड. पेन्नीसिलवेनिया हिमालयन इंस्टीट्युत प्रेस 1977, 1985. Yogshala Ekam Drishti Ekam Drishti Yogshala Yoga And Its Role In Stress Management: How To Become Calmer And Focused 2021 Rishikesh, India Vivekananda Swami Swami Vivekananda Raja Yoga https://archive.org/details/rjayogaorconquer0000vive 1994 Advaita Ashrama Publication Department Calcutta 81-85301-16-6 21 रिप्रिंट एडिशन Zimmer Heinrich Heinrich Zimmer Philosophies of India 1951 Princeton University Press New York, New York 0-691-01758-1 बोल्लिंगें सीरीज XXVI; जोसेफ कैम्बेल द्वारा संपादित. Weber Hans-Jörg L. Hans-Jörg L. Weber Yogalehrende in Deutschland: eine humangeographische Studie unter besonderer Berücksichtigung von netzwerktheoretischen, bildungs- und religionsgeographischen Aspekten 2007 University of Heidelberg Heidelberg https://web.archive.org/web/20090826191058/http://archiv.ub.uni-heidelberg.de/savifadok/volltexte/2008/121/ श्रेणी:हिंदू दार्शनिक अवधारणाएँ श्रेणी:योग श्रेणी:भारतीय दर्शन श्रेणी:संस्कृत शब्द श्रेणी:ध्यान श्रेणी:व्यायाम श्रेणी:भारतीय खोज