411 REFERENCE · Wikipedia
रघुनाथ महान्ती
Reference material by Wikipedia contributors. This retains its source identity and is not 411 news reporting.
सितंबर 2026
रघुनाथ महान्ती ରଘୁନାଥ ମହାନ୍ତି ओड़िआ १८ जुलाई १९१० बड़ाभुई, राणपुर राज्य, ओड़िशा ४ अप्रैल १९४१ भगलपुर जेल, बिहार फाँसी भारतीय स्वतंत्रता सेनानी, कवि राणपुर प्रजामंडल आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन राणपुर प्रजामंडल
रघुनाथ महान्ती (१८ जुलाई १९१० – ४ अप्रैल १९४१) ओड़िशा के एक स्वतंत्रता सेनानी, कवि और राणपुर प्रजामंडल आंदोलन के प्रमुख नेताओं में से एक थे। उन्होंने तत्कालीन राणपुर रियासत में राजशाही के निरंकुश शासन, जबरन श्रम, विभिन्न करों तथा प्रजा पर होने वाले अत्याचारों के विरुद्ध आंदोलन का नेतृत्व किया। जनवरी १९३९ में राणपुर में ब्रिटिश राजनीतिक एजेंट मेजर आर. एल. बजेलगेट की मृत्यु के बाद रघुनाथ महान्ती को गिरफ्तार किया गया और उन पर हत्या से संबंधित आरोप लगाए गए। मुकदमे के बाद उन्हें मृत्युदंड दिया गया और ४ अप्रैल १९४१ को भगलपुर जेल में फाँसी दे दी गई।Raghunath Mohanty Azadi Ka Amrit Mahotsav भारत सरकार, संस्कृति मंत्रालयDictionary of Martyrs: India's Freedom Struggle (1857–1947) 4 Indian Council of Historical Research एवं संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार 2019
प्रारंभिक जीवन
रघुनाथ महान्ती का जन्म १८ जुलाई १९१० को तत्कालीन राणपुर रियासत के बादभुई गाँव में हुआ था। उनके पिता का नाम नटबर महान्ती था, जो प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक थे। पिता से उन्हें साहित्य और कविता के प्रति रुचि प्राप्त हुई। उन्होंने राणपुर के एक माइनर स्कूल से प्राथमिक शिक्षा प्राप्त की और बाद में खुर्दा हाई स्कूल में अध्ययन किया। वहीं उनकी मित्रता दिबाकर परिड़ा से हुई, जो आगे चलकर राणपुर प्रजामंडल आंदोलन में उनके प्रमुख सहयोगी बने।दास बिनोदिनी The Prajamandala Movement in Orissa: Ranpur in Retrospect Orissa Review 2005 August
राणपुर रियासत में प्रजा पर अनेक प्रकार के कर और उपकर लगाए जाते थे। जबरन श्रम की प्रथा तथा शासकीय अधिकारियों द्वारा किए जाने वाले अत्याचारों से जनता में असंतोष बढ़ रहा था। इन परिस्थितियों ने रघुनाथ महान्ती के राजनीतिक विचारों और सामाजिक चेतना को प्रभावित किया।
साहित्यिक गतिविधियाँ
राजनीतिक गतिविधियों के साथ-साथ रघुनाथ महान्ती साहित्य और कविता से भी जुड़े थे। उपलब्ध सरकारी विवरण के अनुसार उन्होंने कम आयु में ही कविता लिखना प्रारंभ कर दिया था। १९३१ से १९३७ के बीच उनके नाम से सात पुस्तकों के प्रकाशन का उल्लेख मिलता है। उनकी रचनाओं में तत्कालीन ओड़िशा के सामान्य लोगों की कठिन सामाजिक परिस्थितियों और शोषण का चित्रण मिलता था। १९३८ में प्रकाशित उनकी काव्य-कृति संगीत मोहनभोग का भी उल्लेख सरकारी अभिलेख में मिलता है।
उनकी साहित्यिक अभिव्यक्ति और राजनीतिक सक्रियता एक-दूसरे से जुड़ी हुई थीं। राणपुर की सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों और शासकीय अत्याचारों के प्रति उनका विरोध उनके साहित्य में भी दिखाई देता था।
राणपुर प्रजामंडल आंदोलन
बीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक के अंतिम वर्षों में ओड़िशा की विभिन्न देशी रियासतों में प्रजामंडल आंदोलनों का विस्तार हुआ। इन आंदोलनों का उद्देश्य निरंकुश राजशाही के विरुद्ध प्रजा के अधिकारों, नागरिक स्वतंत्रता और उत्तरदायी शासन की माँग उठाना था। राणपुर में भी इसी पृष्ठभूमि में प्रजामंडल का गठन हुआ।
रघुनाथ महान्ती इस आंदोलन के प्रमुख नेताओं में शामिल थे। उनके साथ दिबाकर परिड़ा ने राणपुर की जनता को संगठित करने और राजशाही के विरुद्ध जनमत तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। प्रजामंडल की गतिविधियों में बनमाली राम अध्यक्ष तथा कृपासिंधु मिश्र उपाध्यक्ष के रूप में जुड़े थे, जबकि रघुनाथ महान्ती और दिबाकर परिड़ा संगठन के प्रमुख कार्यकर्ताओं में थे। उन्हें रघु-दिबाकर के नाम से जाना जाता था।
रघुनाथ और दिबाकर ने गाँव-गाँव जाकर लोगों को संगठित किया और अन्यायपूर्ण आदेशों का विरोध करने का आह्वान किया। आंदोलन में नागरिक स्वतंत्रता, वन एवं जल संसाधनों पर प्रजा के अधिकार तथा जबरन वसूली अथवा श्रम-प्रथाओं को समाप्त करने की माँग प्रमुख थी।
गांधी और राष्ट्रीय नेताओं से संपर्क
राणपुर की परिस्थितियों को राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ने के प्रयासों में रघुनाथ महान्ती और दिबाकर परिड़ा की भूमिका रही। भारत सरकार के स्वतंत्रता सेनानी संबंधी अभिलेख के अनुसार १९३४ में महात्मा गांधी के ओड़िशा दौरे के दौरान दोनों नेताओं ने राणपुर की स्थिति से उन्हें अवगत कराया। १९३६ में जवाहरलाल नेहरू के ओड़िशा दौरे के समय भी राणपुर की परिस्थितियों के संबंध में उन्हें जानकारी दी गई थी।
१९३९ में आंदोलन अधिक व्यापक हो गया। रघुनाथ महान्ती और दिबाकर परिड़ा के प्रयासों से प्रजामंडल की बैठकों में ओड़िशा के अन्य राष्ट्रवादी नेताओं की भागीदारी हुई। आंदोलन के विस्तार से राणपुर के राजा और उनके प्रशासन में चिंता बढ़ी और प्रजामंडल की गतिविधियों को रोकने के लिए दमनात्मक उपाय किए गए।
१९३९ का राणपुर विद्रोह
दिसंबर १९३८ और जनवरी १९३९ में राणपुर में राजनीतिक तनाव तेजी से बढ़ा। रियासत के शासक द्वारा प्रजामंडल को अवैध घोषित किए जाने तथा उसके नेताओं की गिरफ्तारी के बाद जनता ने राजमहल के सामने प्रदर्शन किया। आंदोलनकारियों की प्रमुख माँग गिरफ्तार नेताओं की रिहाई थी।
५ जनवरी १९३९ को बड़ी संख्या में लोग राणपुर राजमहल के सामने एकत्र हुए। राजा ने ब्रिटिश राजनीतिक एजेंट मेजर आर. एल. बजेलगेट से सहायता माँगी। बजेलगेट कुछ सशस्त्र पुलिसकर्मियों के साथ राणपुर पहुँचे। भीड़ और राजनीतिक एजेंट के बीच तनाव बढ़ गया। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार बजेलगेट ने भीड़ को तितर-बितर करने का प्रयास किया और गोली चलने से एक व्यक्ति की मृत्यु हुई। इसके बाद भीड़ ने उन पर हमला किया, जिसमें उनकी मृत्यु हो गई।
इस घटना ने राणपुर आंदोलन को निर्णायक मोड़ दिया। ब्रिटिश और रियासती प्रशासन ने आंदोलन के विरुद्ध कठोर दमनात्मक कार्रवाई शुरू की। अनेक लोगों को गिरफ्तार किया गया और कई आंदोलनकारियों को लंबी सजा अथवा निर्वासन का सामना करना पड़ा।
गिरफ्तारी और मुकदमा
बजेलगेट की मृत्यु के बाद रघुनाथ महान्ती और दिबाकर परिड़ा को गिरफ्तार किया गया। दोनों को राणपुर प्रजामंडल आंदोलन के प्रमुख नेताओं के रूप में इस घटना से संबंधित मुकदमे में अभियुक्त बनाया गया।
रघुनाथ और दिबाकर के बचाव के लिए स्थानीय लोगों और राष्ट्रवादी नेताओं की सहायता से एक रक्षा समिति गठित की गई। मुकदमे में उनके पक्ष में वकीलों ने पैरवी की, लेकिन अदालत ने दोनों को मृत्युदंड सुनाया।
रघुनाथ महान्ती और दिबाकर परिड़ा को ब्रिटिश प्रशासन ने मेजर बजेलगेट की हत्या के लिए दोषी ठहराया। हालांकि समकालीन और बाद के इतिहासलेखन में इस घटना की परिस्थितियों, भीड़ की भूमिका और आंदोलन के नेताओं की प्रत्यक्ष भूमिका को लेकर अलग-अलग विवरण मिलते हैं। इसलिए रघुनाथ महान्ती की भूमिका का वर्णन करते समय उन्हें आंदोलन का प्रमुख नेता और अभियुक्त कहना अधिक उपयुक्त है, जबकि घटना में उनकी व्यक्तिगत प्रत्यक्ष भूमिका के संबंध में स्रोतों में मतभेद को ध्यान में रखना आवश्यक है।
शहादत
रघुनाथ महान्ती और दिबाकर परिड़ा को ४ अप्रैल १९४१ को भगलपुर जेल में फाँसी दे दी गई।
उनकी फाँसी ने राणपुर प्रजामंडल आंदोलन के इतिहास में उन्हें शहीद के रूप में स्थापित किया। बाद के ओड़िशाई इतिहासलेखन में रघुनाथ महान्ती और दिबाकर परिड़ा को राणपुर के जनआंदोलन के प्रमुख शहीदों के रूप में स्मरण किया गया है।The Conflict Between Vedic Aryans and Iranians Journal of Indian History and Culture 2015 21 2
विरासत
रघुनाथ महान्ती का जीवन ओड़िशा की देशी रियासतों में चले प्रजामंडल आंदोलनों के इतिहास से जुड़ा हुआ है। इन आंदोलनों ने राजशाही की निरंकुश व्यवस्था, जबरन श्रम, कराधान और नागरिक अधिकारों के प्रश्नों को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में लाने में भूमिका निभाई। राणपुर आंदोलन इसी व्यापक राजनीतिक जागरण का एक महत्वपूर्ण उदाहरण था।
भारत सरकार के आजादी का अमृत महोत्सव कार्यक्रम में रघुनाथ महान्ती को ओड़िशा के स्वतंत्रता सेनानियों और शहीदों में शामिल करते हुए उनके जीवन तथा राणपुर आंदोलन में उनकी भूमिका का विवरण प्रकाशित किया गया।
२०१७ में भारत के प्रधानमंत्री की ओड़िशा यात्रा के दौरान स्वतंत्रता सेनानियों के वंशजों को सम्मानित किए जाने के अवसर पर रघुनाथ महान्ती और दिबाकर परिड़ा के वंशजों का भी उल्लेख किया गया था। इस अवसर पर दोनों को राणपुर आंदोलन के स्वतंत्रता सेनानियों के रूप में स्मरण किया गया।Prime Minister stirs Paika emotion The Telegraph 2017
यह भी देखें
ओड़िशा का इतिहास
भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन
सन्दर्भ
Dictionary of Martyrs: India's Freedom Struggle (1857–1947) 4 Indian Council of Historical Research एवं संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार 2019
दास, बिनोदिनी. “The Prajamandala Movement in Orissa: Ranpur in Retrospect”. Orissa Review, अगस्त २००५.
“Raghunath Mohanty”. Azadi Ka Amrit Mahotsav, संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार.
“The Conflict Between Vedic Aryans and Iranians”. Journal of Indian History and Culture, खंड २१, अंक २, दिसंबर २०१५.
“Prime Minister stirs Paika emotion”. The Telegraph, २०१७.
बाहरी कड़ियाँ
रघुनाथ महान्ती — आजादी का अमृत महोत्सव, भारत सरकार
The Prajamandala Movement in Orissa: Ranpur in Retrospect
Dictionary of Martyrs — Volume 4सितंबर 2026 InternetArchiveBot
श्रेणी:भारतीय स्वतंत्रता सेनानी
श्रेणी:ओड़िशा के स्वतंत्रता सेनानी
श्रेणी:ओड़िशा के शहीद
श्रेणी:प्रजामंडल आंदोलन
श्रेणी:१९४१ में निधन
श्रेणी:१९१० में जन्मे लोग