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विषकन्या
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लोक कथाओं एवं वैदिक ग्रंथों के अनुसार प्राचीन युग में विषकन्या का प्रयोग राजा अपने शत्रु का छलपूर्वक अन्त करने के लिए किया करते थे। इसकी प्रक्रिया में किसी रूपवती बालिका को बचपन से ही विष की अल्प मात्रा देकर पाला जाता था और विषैले वृक्ष तथा विषैले प्राणियों के सम्पर्क से उसको अभ्यस्त किया जाता था। इसके अतिरिक्त उसको संगीत और नृत्य की भी शिक्षा दी जाती थी, एवं सब प्रकार की छल विधियाँ सिखाई जाती थीं। अवसर आने पर इस विषकन्या को युक्ति और छल के साथ शत्रु के पास भेज दिया जाता था। इसकी मुख का श्वास तो विषमय होता ही है, परन्तु यह स्तन और योनि मे विष रखती है और जो पुरुष सम्भोग के समय स्तन और योनि चूसने से विष के प्रभाव से वह पुरुष रोगी होकर मर जाता है ।।
श्रेणी:प्राचीन राजनय